सात मूस खाय के…

एक देशी कहावत है-सात मूस खाय के बिलार चली हज का। यानी सात चूहे खाने के बाद बिल्‍ली धार्मिक होने का नाटक कर रही है। ऐसे ही एक स्‍वनाम धन्‍य दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में हैं, जिन्‍हें चिंदी चोरों के गुरु के नाम से जाना जाता है। उनके लिए चिंदी चोरों का गुरु लिखना ही पर्याप्‍त है, क्‍योंकि इस कर्म से वह ज्‍यादा आसानी से पहचाने जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि उन्‍होंने दारू की बोतल न पेश करने वाले को कभी नौकरी नहीं करने दिया। जिसने दारू की बोतल पेश कर दी, उसके लिए दैनिक जागरण जैसे महापापी के बैनर पर मानो दलाली करने का दरवाजा ही खुल गया। पैदल चलकर जागरण में भर्ती होने आए तमाम लोगों के पास आज चमचमाती कारें हैं।

महिला कर्मचारियों से छेड़छाड़ के मामले में तो ये पक्‍के गुरु हैं। न जाने कितनी बार महिला कर्मचारियों ने इन्‍हें माफी मांगने के लिए मजबूर किया, लेकिन ये आदत से मजबूर हैं। आज कल उन्‍होंने एक नया पाखंड रचा है। सिर पर चोटी, कंधे पर जनेऊ और मुख पर राम। हर कुकर्म आजमाने के बाद उनका नया भेष चौंकाता है, शक पैदा करता है और उनके किसी नए छल की आशंका से डराता भी है, क्‍योंकि बड़े पाप करने के लिए ही इंसान भेष बदलता है।

 

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दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति

समाचारों में दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति साफ नजर आ रही है। यह सब पकड़ कर लाए गए चिंदी चोरों की वजह से हो रहा है। बनियौटा इसलिए कि स्‍टोरी की जगह स्‍टोर लिखा गया है। चिंदी चोरी इसलिए कि जागरण की वेबसाइट पर चल रही खबर ‘धमकी से समझौते तक, जानें डोकलाम पर डील की इनसाइड स्टोरी’ को ताजा-ताजा टाइम्‍स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज की लीड से झाड़ लिया गया है।

 

डरावना डेरा या राजनीति

डेरा सच्‍चा सौदा, गुरमीत राम रहीम, कार्रवाई, मीडिया, राजनीति, हिंसा, धर्म और सेवा आदि अनेक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर विचारों की भरमार है। लेकिन कुछ विचार लोगों की आंखें खोल देते हैं। यहां हम उन्‍हीं कुछ चुने हुए विचारों को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

प्रमोद शुक्‍ला लिखते हैं-मित्रों, साथी विजय राज सिंह का यह विचार भी महत्वपूर्ण है, आप इससे सहमत या असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, पर पहले इस विचार की गहराई को समझने की जरूरत है।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

रामरहीम ने रेप और हत्या समेत जितने अपराध किये/करवाए, चाहे अब ज़ाहिर या अभी भी गुप्त, सब गलत हैं।

न्यायालय ने जो फैसला दिया, उसका समर्थन करते हैं। पर साथ ही, उनका डेरा हर कहीं खुलना चाहिए, खासकर बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, केरल आदि, ताकि धर्म बना रहे। हिन्दू “दलितों” गरीबों, और पिछड़ों का जितना कल्याण इनका डेरा करता आया है, मिशनरी या वक्फ क्या, कोई नहीं करता। सरकार तक उनको सिर्फ वोटबैंक मानती है, सरकार बना पाने के सौदे के तौर पर आरक्षण बना रहने देती है, थोड़ा बढ़ा भी देती है। बिलकुल घपलेबाज़ी है उस सौदे में।

सच्चा सौदा इन (“दलितों” आदि) का सिर्फ डेरा के साथ है। वह इनको पालते हैं, यह धर्म को। इसी को “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहा गया है। हमारी दृष्टि में, हिंदुत्व में डेरा का यह अमूल्य योगदान है। न सिर्फ वह हिन्दुओं को कन्वर्ट होने से रोकने में अच्छा काम कर रहे हैं, बल्कि सिखों और हिन्दुओं को वैसे ही एक मानते हैं जैसे बिलकुल शुरुआत में था। साथ ही, यह जहां एक तरफ “सर्व धर्म सम भाव” के जरिये “सहिष्णुता” ले कर चलते हैं, वहीं उस अधूरे श्लोक को “धर्म हिंसा तथैव च” से पूरा कर सनातन का पूरा स्वरूप प्रकट करते हैं।

फैसला आने पर जो हिंसा डेरा ने किया, वह सरासर गलत है, और अगर नुकसान की भरपाई सम्पत्ति के जाब्ते से होना तय हुआ है, तो प्रार्थना है कि बिलकुल वैसा ही हो, उस आदेश के खिलाफ डेरा हर अपील पर हारे। मगर मूल उद्देश्य का बना रहना जरूरी है। यह डेरा न सही, कोई और सही। भांगड़ा, ढाबे और तंदूरी की ही तरह यह पंजाबी चीज भी उतनी ही अखिल-भारतीय हो।

दिलीप सी मंडल की यह प्रस्‍तुति लाजवाब है- क्या अजीब संयोग है। राम रहीम को जिस हेलीकॉप्टर में जेल ले जाया गया, वह वही हेलीकॉप्टर था, जिस पर बैठकर नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव प्रचार किया था। यानी ऑगुस्टा वेस्टलैंड AW139 हेलीकॉप्टर। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अब एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं।

राजेश चंद्रा लिखते हैं- ये आरएसएस भाजपा के बलात्कार सेनानी हैं। हिन्दू साध्वियों का बलात्कार करने वाले गुरमीत राम रहीम को न्याय दिलाने के लिये भारतीय सेना से लड़ रहे हैं।

आलोक नंदन लिखते हैं- अंधा और बेतरतीब नेतृत्व विध्वंस के सिवा आपको कुछ नहीं दे सकता…व्यवस्था स्थापित करने की न्यूनतम क्रूरता सीमा क्या है ? और इसको तय करने का अधिकार किसे है ? ………

पुष्‍परंजन लिखते हैं- लम्बी ज़ुबान वाले साक्षी महाराज से सोच समझ कर बयान दिलवाया गया! बदज़ुबानी में पीएचडी कर चुके साक्षी महाराज के ज़रिये दो काम हुआ है। एक, न्यायपालिका को धमकाना। दूसरा, डेरा समर्थक वोट बैंक को यह बताना कि बीजेपी की इच्छा के विरुद्ध यह निर्णय हुआ है।

कोर्ट चाहे तो मानहानि ही नहीं, अदालत को धमकाने के मामले में महाराज जी को एक बार फिर तिहाड़ भेज सकती है। यों,  बलात्कार के आरोप वाले मामले आते हैं तो साक्षी महाराज का अगस्त 2000 वाला पुराना दर्द उखड आता है। बलात्कार के मामले में तिहाड़ रिटर्न हैं साक्षी महाराज।

सवाल यह है कि क्या इस देश में सभी अपराधियों को सरकार गेस्ट हाउस उपलब्ध कराती है? तो फिर इस बलात्कारी बाबा को अम्बाला जेल के बदले, गेस्ट हाउस देकर दामाद जैसा ट्रीटमेंट किस बिना पर? सीबीआई कोर्ट से निकला तो पुलिस गार्ड ऑफ़ ओनर के अंदाज़ में खड़ी थी। अपराधी घोषित होने के बाद भी बाबा वीवीआईपी है। हेलीकॉप्टर से गेस्ट हाउस पधारे।

मोदी-खट्टर सरकार को 30 लोगों के मरने 300 के घायल होने से अधिक चिंता बलात्कारी बाबा को आरामदेह सुविधाएँ देने की है ! ऐसा लचर और लिजलिजा मुख्यमंत्री पूरे जीवन में मैंने नहीं देखा। इस शख्स ने एक बार भी हिंसा फ़ैलाने वाले गुरमीत के गुंडों का नाम नहीं लिया। पूरे बयान में यह थकेला मुख्यमंत्री “कुछ लोग”-” कुछ लोग ” करता रहा !

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड है। यहां मालिक और नौकर में भारी भेदभाव किया जाता है। मजीठिया की बात करें तो अखबार मालिकों को खुली छूट है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन मनमर्जी से कर सकते हैं। जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के 26 अगस्‍त के अंक में प्रकाशित एक खबर उदाहरण लें तो पता चलेगा कि किस प्रकार दक्षिण कोरिया में सैमसंग जैसी बड़ी कंपनी के वारिस को घूस कांड में पांच साल की कैद हो गई। यहां तो अखबार मालिक चाहे डीएलसी को घूस दें या पूरा प्रशासन ही खरीद लें, कोई पूछने वाला नहीं है।

तीन तलाक: अमित शाह के बयानों का मतलब

नई दिल्‍ली।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट ने ठीक उसी प्रकार जलेबी छानी है, जैसे कि मजीठिया मामले में किया था। आखिर जिन्‍होंने इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है, भला उनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या किया है ? यह अलग बात है कि मोदी और शाह उसकी वाहवाही लूटने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इन्‍हीं मुद्दों पर हमने फेसबुक के कुछ मित्रों की राय एकत्र की है।

इन्हें कौन देगा न्याय?

जो मुस्लिम ट्रिपल-तलाक पर आज आये फैसले का स्वागत है, पर इस फैसले से उत्साहित होकर जो हिन्दू नाच एवं इतरा रहे हैं उन्हें हिन्दुओं में पत्नी को छोड़ने के बढ़ रहे रिवाज पर भी अदालत में बहस करानी चाहिए। मैं अनगिनत बेबस हिन्दू युवतियों को देख रहा हूं कि वे बिना तलाक पति से अलग रहने को विवश हैं। और अदालत और पुलिस उनकी कोई मदद नहीं कर पा रही है। (राय तपन भारती की फेसबुक वाल से साभार)

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क्या सचमुच मुस्लिम महिलाओं को “मुक्ति” मिल गई?

अभी सरकार को बहुत कुछ करना है। अगले सत्र में देखिए, संसद के ज़रिये कैसा क़ानून बनता है। सरकार से ज़्यादा इस देश के मुस्लिम समाज को सुधार “Reforms” के लिए आगे आना होगा। क्या दारुल क़ज़ा ( इस्लामिक कोर्ट ) को बंद कराना अगले अभियान का हिस्सा होगा?  चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति केहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर क्यों तीन तलाक़ के समर्थन में थे?  उनके तर्कों को समझने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान समेत दुनिया के 22 मुसलमान देश हैं,  जहां ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित है। पाकिस्तान ने भारत से अलग होने के नौ साल बाद, 1956 में ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया था। मगर,  इस इस्लामिक देश में औरतों पर ज़ुल्म रुका नहीं। क्योंकि पाकिस्तान का मुस्लिम समाज औरतों पर सितम को मूकदर्शक होकर देखता रहा।

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने बहुत दूर की सोचकर हिदायत दी है कि इसे राजनीतिक उपलब्धि और प्रोपेगंडा का हिस्सा न बनाए। मगर, जोश में इसे कोई मान रहा है क्या? जश्न और पटाख़े के शोर में वैसे लोग निशाने पर हैं, जो इसके पक्ष में नहीं थे। अमित शाह के ताज़ा बयान को ही देख लीजिए। बीजेपी अध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की कोई परवाह नहीं। “प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी की वजह से ऐसा हुआ”,  अमित शाह के बयानों से यही बात निकल रही है! (पुष्‍परंजन की फेसबुक वाल से साभार)

अभिशेक रंजन लिखते हैं-तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफ़्ती मोकर्रम से बात हुई। उनके मुताबिक़ मुस्लिम औरतों को दीन का इल्म नहीं है,  इसलिए वे अदालत के फ़ैसले से खुश हैं, जबकि यह फैसला शरीयत के ख़िलाफ़ है।

सत्‍यप्रकाश चौधरी लिखते हैं- अब सरकार को एक कलमबंद मुसलिम विवाह कानून की ओर बढ़ना चाहिए। समान नागरिक संहिता सिर्फ मसले बढ़ाएगी। समान नागरिक संहिता की पहली बाधा होगी कि किसके साथ शादी जायज है। एक हिंदू बोलेगा एक गोत्र में भी नहीं,  दूसरा बोलेगा मामा-भांजी में भी सही।

खतौली रेल हादसे पर सरकार की थू-थू : टूटे ट्रैक पर तेज़ गाड़ी चलाने में माहिर हैं मोदी जी

मुजफ्फरनगर।

रेल भाड़े के रूप में सरकार भले ही लोगों की चमड़ी उधेड़ ले रही हो, रेल टिकट निरस्‍त कराने पर लोगों की जेब काट ले रही हो, लेकिन उसे रेलवे सुरक्षा की कोई परवाह नहीं है। जब से केंद्र में भाजपा सरकार आई है, कभी बुलेट ट्रेन तो कभी टेल्‍गो ट्रेन का सपना दिखाकर जुमले ही छोड़े जा रहे हैं। रेलवे का कोई भला नहीं हो पाया है। उलटे रेलवे को निजी हाथों में बेचने का कुचक्र अलग से रचा जा रहा है। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। आप भी जानें कौन क्‍या लिख रहा है।

बस एक बुलेट ट्रेन चाहिए, बाक़ी रेल यात्री जाएँ भाड़ में-पुष्‍प रंजन

भारतीय रेल का बेड़ा उसी दिन से ग़र्क़ होना आरम्भ हो गया था, जिस दिन उसे आम बजट से जोड़ कर संसद में सवाल-जवाब से दूर रखा गया। एशिया में चीन के बाद सबसे बड़ा और दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेल नेटवर्क को एक ढीले-ढाले व्यक्ति के हवाले कर दिया गया है। विश्व में सबसे अधिक यात्री भारतीय रेल से सफर करते हैं। मगर, रेल सुधार की गति खरामा-खरामा है। अब भी इंडियन रेल की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा है। जबकि,  दुनिया के 22 देशों में हाई स्पीड रेल ट्रैक पर ट्रेन न्यूनतम 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही है।

सवा अरब के इस देश में अंग्रेज़ों के ज़माने के बने अधिकांश रेल ट्रैक और पुल भगवान भरोसे हैं। यात्रियों की जेब, सफाई और सुरक्षा के नाम पर तबीयत से काटी जा रही है। सच सामने आने पर थू-थू भी होती है, पर नेता और इनके भक्त श्वान मुद्रा में देह झाड़कर चल देते हैं, या फिर ठीकरा पिछले रेलमंत्रियों पर फोड़ देते हैं। स्वयंघोषित “वर्ल्ड लीडर” मोदी को इंडियन रेल की दुर्गति नहीं दिखती क्या? उन्हें बस अहमदाबाद-मुंबई रूट पर बुलेट ट्रेन चाहिए,  बाक़ी रेल यात्री जाएँ भाड़ में!

लो जी, हो गई कार्रवाई !

प्राचीन काल में हत्या के दोषी राजा को मृत्युदंड के वास्ते उसकी शक्ल का एक पुतला बनाकर उसे फांसी पर लटका दिया जाता था,  ताकि प्रजा को लगे कि न्याय हो रहा है। मेंबर रेलवे बोर्ड, उत्तर रेलवे के जीएम को तत्काल प्रभाव से छुट्टी  और चार आला अधिकारियों का निलंबन क्या कुछ इसी तरह की कवायद है?  वो जो खतौली में जीआरपी ने अज्ञात लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज़ किया है,  उसमें इन “ज्ञात वीआईपी अभियुक्तों” के नाम नहीं हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस अपराध के लिए जवाबदेह हैं।

इससे तो अच्छा तानाशाह व्यवस्था वाले चीन और उत्तर कोरिया को मानिए, जहाँ ऐसे अपराध के लिए सीधा जेल है। और उस विभाग के मंत्री तक नहीं बक्शे जाते ! वो तो शुक्र मनाएं कि समय पर सारे साक्ष्य मिल गए, जिससे रेलवे की लापरवाही साबित हुई, वरना मुज़फ्फरनगर, मेरठ  और खतौली से एक समुदाय विशेष के जाने कितने युवक उठा लिए जाते। स्थानीय लोगों की जागरूकता, बिना डर के बयान देने, और बहुत हद तक मिडिया द्वारा सच के साथ खड़े रहने के कारण कई ज़िंदगियाँ फ़र्ज़ी जांच के नाम पर तबाह होते-होते बची हैं !

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प्रमोद शुक्‍ला की फेसबुक वाल पर मिला- प्रभू के के आने पर उम्मीद बंधी थी कि कुछ नया होगा, टिकट ब्लैक पर रोक लगेगी, पर ये तो सबसे बड़ा ब्लैकिया निकला। तत्काल और प्रीमियम तत्काल से कमाई के चक्कर में ट्रेन की बोगियाँ खाली दौड़ रही हैं। अब मुनाफाखोरी की रौ में रोलिग टिकट यानि जैसे जैसे ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाएगी किराया ऑटोमेटिक दो गुना, चार गुना या छह गुना हो जाएगा। जो सबसे ज्यादा किराया देने को तैयार होगा बर्थ उसी को मिलेगी। रिपेरिंग में भी घेटाला, टायलेट के दरवाजे चौखट से छोटी साइज के कि बाहर से भीतर का सब कुछ दिखता है। मोबाइल चार्जिंग सॉकेट के अन्दर कनेक्शन टर्मिनल ही गायब है। -विक्रम सिंह भदौरिया

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अपनी फेसबुक वाल पर अरुण माहेश्‍वरी लिखते हैं- टूटे ट्रैक पर तेज़ रफ़्तार / इसको कहते मोदी सरकार। मिशन इनका गाल बजाना / झूठी बातों का व्यापार।

अमित शाह का अपेक्षित बयान : “रेल दुर्घटना होती रही है, हो रही है और होगी।” टूटे ट्रैक पर तेज़ गाड़ी चलाने में मोदी जी माहिर हैं ! रेल बजट को केंद्रीय बजट में मिला कर मोदी जी ने रेलवे पर अपने और जेटली के दोहरे निकम्मेपन को लाद दिया है। दुर्घटनाएँ तो होंगी ही।

प्रमोद पटेल लिखते हैं- हादसों से सबक नहीं लेते जिम्मेदार। ट्रेन हादसे में मरने वाले लोगों के लिए दुआ करेंगे कि भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। अगर दिल में थोड़ा सा दर्द है तो ॐ शांति लिखें।

अमिताभ अग्निहोत्री लिखते हैं- प्रभु जी नहीं चल पा रही है तो छोड़ दीजिए।

कल्‍याण कुमार लिखते हैं- रेलवे को चलाने के लिए हार्ड वर्किंग नहीं बल्कि स्मार्ट वर्किंग चाहिए… ईमानदार को ईनाम और बेईमान की विदाई ही रास्ता…त्वरित फैसला करो…

आकाशवाणी ने क्‍यों प्रसारित नहीं किया माणिक का यह भाषण

समाचार सार-

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का वह भाषण जिसे भारत के संघीय ढांचे के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर आकाशवाणी ने प्रसारित करने से इनकार कर दिया। आप भी जानें कि ऐसा क्‍या है भाषण में।

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त्रिपुरा के प्रियजनो,

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सबका अभिनंदन और सबको शुभकामनाएं। मैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों की अमर स्मृतियों को श्रद्धांजलि देता हूँ। उन स्वतंत्रता सेनानियों में जो आज भी हमारे बीच मौजूद है उन सबके प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ।

स्वतंत्रता दिवस को मनाना कोई आनुष्ठानिक काम भर नहीं है। इसके ऐतिहासिक महत्व और इस दिन के साथ जुड़ी भारतवासियों की गहरी भावनाओं के चलते इसे राष्ट्रीय आत्म-निरीक्षण के एक महत्वपूर्ण उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए।

इस स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर हमारे सामने कुछ अत्यंत प्रासंगिक,  महत्वपूर्ण और समसामयिक प्रश्न उपस्थित हैं। विविधता में एकता भारत की परंपरागत विरासत है। धर्म निरपेक्षता के महान मूल्यों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट बनाए रखा है। लेकिन आज धर्म-निरपेक्षता की इसी भावना पर आघात किए जा रहे हैं। हमारे समाज में अवांछित जटिलताएं और दरारें पैदा करने के षड़यंत्र और प्रयत्न किए जा रहे हैं।

धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर,  भारत को एक खास धर्म पर आधारित देश में बदलने और गाय की रक्षा के नाम पर उत्तेजना फैला कर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर हमला किया जा रहा है। इनके कारण अल्प-संख्यक और दलित समुदाय के लोगों पर हमले हो रहे हैं। उनके बीच सुरक्षा का भाव ख़त्म हो रहा है। उनके जीवन में भारी कष्ट हैं। इन नापाक रुझानों को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है,  न बर्दाश्त किया जा सकता है।

ये विभाजनकारी प्रवृत्तियां हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के उद्देश्यों,  स्वप्नों और आदर्शों के विरुद्ध हैं। जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया,  उल्टे उसमें भितरघात किया, जो अत्याचारी और निर्दयी अंग्रेज़ लुटेरों के सहयोगी थे और राष्ट्र-विरोधी ताक़तों से मिले हुए थे, उनके अनुयायी अभी विभिन्न नामों और रंगों की ओट में भारत की एकता और अखंडता पर चोट कर रहे हैं।

प्रत्येक वफ़ादार और देशभक्त भारतवासी के आज एकजुट भारत के लिए और इन विध्वंसक साज़िशों और हमलों को परास्त करने के लिए शपथ लेनी चाहिए। हम सबको मिल कर संयुक्त रूप में अल्प-संख्यकों,  दलितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने और देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

 

आज ग़रीबों और अमीरों के बीच का फर्क तेज़ी से बढ़ रहा है। मुट्ठी भर लोगों के हाथ में राष्ट्र के विशाल संसाधान और संपदा सिमट रहे हैं। आबादी का विशाल हिस्सा ग़रीब है। ये लोग अमानवीय शोषण के शिकार हैं। उनके पास न भोजन है,  न घर,  न कपड़ें,  न शिक्षा,  न चिकित्सा और न निश्चित आय के रोजगार की सुरक्षा। यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विपरीत है।

इन परिस्थितियों के लिए हमारी आज की राष्ट्रीय नीतियां सीधे ज़िम्मेदार हैं। इन जन-विरोधी नीतियों को ख़त्म करना होगा। लेकिन यह काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता। इसके लिए वंचित और पीड़ित जनों को जागना होगा, आवाज उठानी होगी और निर्भय हो कर सामूहिक रूप से बिना थके प्रतिवाद करना होगा। हमारे पास निश्चित तौर पर ऐसी वैकल्पक नीति होनी चाहिए जो भारत के अधिकांश लोगों के हितों की रक्षा कर सके।

इस वैकल्पिक नीति को रूपायित करने के लिए वंचित,  पीड़ित भारतवासियों को इस स्वतंत्रता दिवस पर एकजुट होकर एक व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन शुरू करने की प्रतिज्ञा करनी होगी। बेरोज़गारी की बढ़ती हुई समस्या ने हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में निराशा और हताशा के भाव को पैदा किया है। एक ओर लाखों लोग अपना रोजगार गंवा रहे हैं,  तो दूसरी ओर करोड़ों बेरोज़गार नौजवान काम की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके लिए मृग मरीचिका की तरह है।

राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बिना बदले इस विकराल समस्या का समाधान संभव नहीं है। यह नीति मुट्ठी भर मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट के स्वार्थ को साधती है। भारत की आम जनता की क्रय शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हो रही है। इसीलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर छात्रों,  नौजवानों और मेहनतकशों को इन विनाशकारी नीतियों को बदलने के लिए सामूहिक और लगातार आंदोलन छेड़ने का प्रण करना होगा।

केंद्र की सरकार की जन-विरोधी नीतियों की तुलना में त्रिपुरा की सरकार अपनी सीमाओं के बावजूद दबे-कुचले लोगों के उत्थान पर विशेष ध्यान देते हुए सभी लोगों के कल्याण की नीतियों पर चल रही है। यह एक पूरी तरह से भिन्न और वैकल्पिक रास्ता है। इस रास्ते ने न सिर्फ त्रिपुरा की जनता को आकर्षित किया है बल्कि देश भर के दबे हुए लोगों में सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है।

त्रिपुरा में प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह सहन नहीं हो रहा है। इसीलिए शांति, भाईचारे और राज्य की अखंडता को प्रभावित करने के लिए जनता के दुश्मन एक के बाद एक साज़िशें रच रहे हैं। विकास के कामों को बाधित करने की भी कोशिश चल रही है। इन नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को अलग-थलग करना होगा।

इसी पृष्ठभूमि में, स्वतंत्रता दिवस पर, त्रिपुरा के सभी शुभ बुद्धिसंपन्न, शांतिप्रिय और विकासकामी लोगों को इन विभाजनकारी ताक़तों के खिलाफ आगे आने और एकजुट होकर काम करने का संकल्प लेना होगा।

-अरुण माहेश्‍वरी की फेसबुक वाल से साभार।