लौटा दो लुटेरों की कार

फोर्थपिलर टीम!   

दैनिक जागरण से एक अफवाह और एक खबर जारी हुई है। अफवाह के मुताबिक संजय गुप्‍ता की एक करोड़ रुपये वाली कार बदमाशों ने छीन ली, जबकि दैनिक जागरण के नोएडा पुलआउट पर खबर छपी है कि ‘दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक की कार लूटी’, जिसमें एसएसपी का वर्जन भी छपा है कि-इस लूट को वह चैलेंज के रूप में लेंगे।

फिर भी ऐसा लगता नहीं है कि कार बरामद हो पाएगी क्‍योंकि जो नोएडा पुलिस दैनिक जागरण के गेट पर फरवरी 2015 में हुई 36 हजार रुपये की लूट का एफआईआर आज तक दर्ज नहीं कर सकी है, वह कार को कैसे बरामद कर पाएगी। 36 हजार रुपये की लूट की शिकायत नोएडा के सेक्‍टर 26 स्थित एसएसपी ऑफिस में 24 फरवरी 2015 को दर्ज की गई थी। इस मामले की जानकारी पाने के लिए कई आरटीआई लगाई गई, जिलाधिकारी से लेकर ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव तक शिकायत की गई, लेकिन मामले को सिस्‍टम ने हजम कर लिया।

इसलिए अब कार लुटेरों से अपील करनी होगी कि वे लुटेरों की उस कार को लौटा दें, जो दैनिक जागरण के कर्मचारियों का खून चूस कर खरीदी गई थी। कार जिनके कब्‍जे में थी, उन्‍हीं के इशारे पर दैनिक जागरण के गार्डों ने कंपनी के एक कर्मचारी से लूटपाट की थी। नोएडा पुलिस से भी अपील है कि उस शिकायत की भी एफआईआर दर्ज करे जिसमें कार होल्‍डर मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव पर 36 हजार रुपये की छिनैती कराने का आरोप है।

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संपादकों के लिए ज्ञान

फोर्थपिलर टीम।

संपादकों के लिए समाचार का चयन बहुत बड़ी चुनौती है। सटीक ख़बरों का चयन उनकी विशेष योग्यता होती है। समाचार चयन के साथ ही उनका विभाजन भी कम बड़ी चुनौती नहीं है। ये दोनों काम आंतरिक समाचार प्रबंधन का हिस्सा हैं। इनमें कुशलता अच्छी पढ़ाई, गहन अध्ययन, समझ, अनुभव और फिर इनके आधार पर मानसिक तर्क-वितर्क से आती है।

ये चुनौतियां कम पढ़े-लिखे या कुपढ़ संपादकों के लिए समस्या बन जाती हैं। वे अपनी टीम के पत्रकारों के लिए अलग तरह की दिक्कतें खड़ी कर देते हैं। यह बात उन पर खास तौर से लागू होती है, जो बिना पढ़े-लिखे नाते-रिश्तेदारी अथवा यारी-दोस्ती के रास्ते नौकरी पाने के बाद किसी समाचार संपादक या संपादक का लटक बनकर यह मुकाम पा जाते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। आप जिस अखबार या चैनल में काम करते हैं, मान लीजिए एक खबर आती है कि नीति आयोग ने सरकार को निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया है। अब पहले तय करना होगा कि ख़बर लेनी है या नहीं। लेनी है तो किस डेस्क (जनरल या बिजनेस या खेल डेस्क) से यह खबर बननी चाहिए और फिर कहां ली जानी चाहिए। मोटी अक्ल वाला संपादक भी तय कर लेता है कि यह ख़बर ली जानी है।

हालांकि इसके बाद उसका दिमाग जवाब दे जाता है। फिर वह इस समाचार को बिजनेस डेस्क के हवाले कर देता है। अब बताइए कि इसमें बिजनेस क्या है? यह तो नीतिगत मसला है जिसका संबंध राजनीति और समाज से है। अर्थ या व्यापार से यह तब जुड़ती है जब कंपनियां इसका विरोध अथवा समर्थन करती हैं या फिर मान लीजिए टाटा समूह अपनी कंपनियों में आरक्षण लागू करने की घोषणा कर देता है।

बुनियादी सबक : कोई खबर इसलिए आर्थिक नहीं हो जाती कि उसमें कंपनी, निजी क्षेत्र या उद्योग शब्द आ गया है।

अंधेरे के पुजारी

फोर्थपिलर टीम।

दीपावली एक ऐसा त्‍योहार है जिसमें अंधेरे का महत्‍व प्रकाश से कम नहीं है। यही एक मौका है जब प्रकाश और अंधकार एक दूसरे से संघर्ष तो करते हैं, एक दूसरे को स्‍थापित भी करते हैं। लेकिन इन संघर्षों का लक्ष्‍य प्रकाश ही होता है फिर भी कुछ लोग अंधेरे के पुजारी होते हैं। आप समझ गए होंगे-मैं किसकी बात कर रहा हूं। ठीक समझा आपने, मैं दैनिक जागरण की ही बात कर रहा हूं।

हमारे भूगोल के शिक्षक पढ़ाते रहे हैं कि ह्वांग हो नदी को चीन का शोक कहा जाता है। लेकिन दैनिक जागरण के लिए दीपावली प्राय: शोक लेकर आती है। यह शोक कभी वास्‍तविक होता है तो कभी पाखंड का बहाना। दीपावली के मौके पर प्राय: दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्‍ता के परिवार में कभी मरनी पड़ जाती है तो कभी व्‍यापार में घाटा हो जाता है। इसी बहाने वह दीपावली पर शोक मनाने का बहाना पाते रहे हैं और अपने कर्मचारियों को मिठाई, बोनस आदि देने से बचते रहे हैं।

अब तो शोक ने दैनिक जागरण के मालिकों को गले लगा लिया है। इस दीपावली उनके लिए शोक की घड़ी लेकर आया है मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश जिसमें छह माह के अंदर मजीठिया का भुगतान करने की बात कही गई है।

नोएडा कार्यालय के एक सूत्र ने तो यहां तक कहा है कि पिछले 13 अक्‍टूबर को आए सुप्रीम के आदेश को धता बताने के लिए संजय गुप्‍ता ने विष्‍णु त्रिपाठी, नीतेंद्र श्रीवास्‍तव व मनोज दुबे जैसे धूर्त मैनेजरों के साथ रात नौ बजे तक मंथन किया, लेकिन कोई उपाय नहीं सूझा। अब नोएडा कार्यालय में मालिकों के चेहरों पर एक ओर मुर्दानगी छाई है तो नौकरी में बरकरार कर्मचारियों के उत्‍साह की कोई सीमा नहीं है, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश समयबद्ध हो जाने से उन्‍हें छह माह में मजीठिया वेतनमान न मिला तो वे अदालत की शरण ले सकेंगे। देखा जाए तो जागरण में अंधेरे का ही साम्राज्‍य है। प्रकाश के रूप में लाखों रुपये का मजीठिया एरियर ही आशा की एकमात्र किरण है।

कानपुर यूनिट का भी यही हाल है, जहां पहले मालिकों की तूती बोलती रही है तो अब श्रम कार्यालयों में क्‍लेम लगाने वालों की भीड़ बढ़ रही है। अदालतों में होने वाला विलंब जागरण प्रबंधन के लिए एकमात्र संजीवनी रही है, लेकिन मजीठिया क्रांतिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को समयबद्ध करा कर दैनिक जागरण रूपी निशाचर रावण की नाभि के अमृत को सुखा दिया है। इसलिए अब मजीठिया रूपी रामराज्‍य अधिक दूर नहीं है। क्‍लेम का मामला ज्‍यादा से ज्‍यादा हाईकोर्ट तक जाएगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट जाने की अखबार मालिकों की अब कोई औकात नहीं रह गई है। उन्‍हें जितना भी फ्रॉड और फरेब करना था, करके हार चुके हैं। अंधेरे के इन पुजारियों का समय समाप्‍त हो चुका है। अब ये अपनी उलटी गिनती का नजारा देखने के लिए तैयारी में लगे हैं।

दैनिक जागरण में अंधेरे का एक पुजारी ऐसा है, जिसके पाखंड की चर्चा आजकल जोरों पर है। अंधेरे के इस पुजारी ने पहले ब्राह्मणवाद का नारा देकर दैनिक जागरण में काम करने वाले काबिल ठाकुरों की छुट्टी करा दी, क्‍योंकि संजय गुप्‍ता को चापलूसी पसंद है और वह इसकी किसी बात को नहीं टालता। आलोचना शुरू हुई तो अपने को निष्‍पक्ष दिखाने के लिए इसने ढाई सौ ब्राह्मणों की नौकरी खा ली। फिर आलोचना हुई तो इस  पाखंडी ने अब ब्राह्मण का भेष धारण कर लिया है। वही लंबी चोटी, जनेऊ और माथे पर टीका, जिसका कि वह हमेशा विरोध करता रहा है और सांकृत्‍यायन जैसे संस्‍कारी लोगों का मजाक उड़ाता रहा है। लेकिन इन ब्राह्मण प्रतीकों की आड़ में वह दैनिक जागरण के नाम पर पंचायत चुनावों के दौरान लाखों रुपये पीट चुका है। अब उसकी नजर आने वाले चुनावों पर है।

इस भ्रष्‍टाचारी का पर्दाफाश करने के लिए पोस्‍ट को अधिक से अधिक शेयर किए जाने की जरूरत है। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि इस भ्रष्‍टाचारी को समाज के लोगों ने दंडित न किया तो यह पूरे समाज का बड़ा नुकसान करेगा। आखिर पता तो लगे कि इस पाखंडी का धर्म क्‍या है, जाति क्‍या है और पेशा क्‍या है… इतने लक्षण बताएंगे तो दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट का कोई भी कर्मचारी उसका नाम बता देगा। यह चैलेंज हम आप पर छोड़ते हैं कि कितने लोग पहचान कर उसका नाम बता पाते हैं। दैनिक जागरण में अंधेरे के दूसरे पुजारियों पर चर्चा फिर कभी… ।

सात मूस खाय के…

एक देशी कहावत है-सात मूस खाय के बिलार चली हज का। यानी सात चूहे खाने के बाद बिल्‍ली धार्मिक होने का नाटक कर रही है। ऐसे ही एक स्‍वनाम धन्‍य दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में हैं, जिन्‍हें चिंदी चोरों के गुरु के नाम से जाना जाता है। उनके लिए चिंदी चोरों का गुरु लिखना ही पर्याप्‍त है, क्‍योंकि इस कर्म से वह ज्‍यादा आसानी से पहचाने जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि उन्‍होंने दारू की बोतल न पेश करने वाले को कभी नौकरी नहीं करने दिया। जिसने दारू की बोतल पेश कर दी, उसके लिए दैनिक जागरण जैसे महापापी के बैनर पर मानो दलाली करने का दरवाजा ही खुल गया। पैदल चलकर जागरण में भर्ती होने आए तमाम लोगों के पास आज चमचमाती कारें हैं।

महिला कर्मचारियों से छेड़छाड़ के मामले में तो ये पक्‍के गुरु हैं। न जाने कितनी बार महिला कर्मचारियों ने इन्‍हें माफी मांगने के लिए मजबूर किया, लेकिन ये आदत से मजबूर हैं। आज कल उन्‍होंने एक नया पाखंड रचा है। सिर पर चोटी, कंधे पर जनेऊ और मुख पर राम। हर कुकर्म आजमाने के बाद उनका नया भेष चौंकाता है, शक पैदा करता है और उनके किसी नए छल की आशंका से डराता भी है, क्‍योंकि बड़े पाप करने के लिए ही इंसान भेष बदलता है।

 

दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति

समाचारों में दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति साफ नजर आ रही है। यह सब पकड़ कर लाए गए चिंदी चोरों की वजह से हो रहा है। बनियौटा इसलिए कि स्‍टोरी की जगह स्‍टोर लिखा गया है। चिंदी चोरी इसलिए कि जागरण की वेबसाइट पर चल रही खबर ‘धमकी से समझौते तक, जानें डोकलाम पर डील की इनसाइड स्टोरी’ को ताजा-ताजा टाइम्‍स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज की लीड से झाड़ लिया गया है।

 

डरावना डेरा या राजनीति

डेरा सच्‍चा सौदा, गुरमीत राम रहीम, कार्रवाई, मीडिया, राजनीति, हिंसा, धर्म और सेवा आदि अनेक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर विचारों की भरमार है। लेकिन कुछ विचार लोगों की आंखें खोल देते हैं। यहां हम उन्‍हीं कुछ चुने हुए विचारों को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

प्रमोद शुक्‍ला लिखते हैं-मित्रों, साथी विजय राज सिंह का यह विचार भी महत्वपूर्ण है, आप इससे सहमत या असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, पर पहले इस विचार की गहराई को समझने की जरूरत है।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

रामरहीम ने रेप और हत्या समेत जितने अपराध किये/करवाए, चाहे अब ज़ाहिर या अभी भी गुप्त, सब गलत हैं।

न्यायालय ने जो फैसला दिया, उसका समर्थन करते हैं। पर साथ ही, उनका डेरा हर कहीं खुलना चाहिए, खासकर बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, केरल आदि, ताकि धर्म बना रहे। हिन्दू “दलितों” गरीबों, और पिछड़ों का जितना कल्याण इनका डेरा करता आया है, मिशनरी या वक्फ क्या, कोई नहीं करता। सरकार तक उनको सिर्फ वोटबैंक मानती है, सरकार बना पाने के सौदे के तौर पर आरक्षण बना रहने देती है, थोड़ा बढ़ा भी देती है। बिलकुल घपलेबाज़ी है उस सौदे में।

सच्चा सौदा इन (“दलितों” आदि) का सिर्फ डेरा के साथ है। वह इनको पालते हैं, यह धर्म को। इसी को “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहा गया है। हमारी दृष्टि में, हिंदुत्व में डेरा का यह अमूल्य योगदान है। न सिर्फ वह हिन्दुओं को कन्वर्ट होने से रोकने में अच्छा काम कर रहे हैं, बल्कि सिखों और हिन्दुओं को वैसे ही एक मानते हैं जैसे बिलकुल शुरुआत में था। साथ ही, यह जहां एक तरफ “सर्व धर्म सम भाव” के जरिये “सहिष्णुता” ले कर चलते हैं, वहीं उस अधूरे श्लोक को “धर्म हिंसा तथैव च” से पूरा कर सनातन का पूरा स्वरूप प्रकट करते हैं।

फैसला आने पर जो हिंसा डेरा ने किया, वह सरासर गलत है, और अगर नुकसान की भरपाई सम्पत्ति के जाब्ते से होना तय हुआ है, तो प्रार्थना है कि बिलकुल वैसा ही हो, उस आदेश के खिलाफ डेरा हर अपील पर हारे। मगर मूल उद्देश्य का बना रहना जरूरी है। यह डेरा न सही, कोई और सही। भांगड़ा, ढाबे और तंदूरी की ही तरह यह पंजाबी चीज भी उतनी ही अखिल-भारतीय हो।

दिलीप सी मंडल की यह प्रस्‍तुति लाजवाब है- क्या अजीब संयोग है। राम रहीम को जिस हेलीकॉप्टर में जेल ले जाया गया, वह वही हेलीकॉप्टर था, जिस पर बैठकर नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव प्रचार किया था। यानी ऑगुस्टा वेस्टलैंड AW139 हेलीकॉप्टर। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अब एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं।

राजेश चंद्रा लिखते हैं- ये आरएसएस भाजपा के बलात्कार सेनानी हैं। हिन्दू साध्वियों का बलात्कार करने वाले गुरमीत राम रहीम को न्याय दिलाने के लिये भारतीय सेना से लड़ रहे हैं।

आलोक नंदन लिखते हैं- अंधा और बेतरतीब नेतृत्व विध्वंस के सिवा आपको कुछ नहीं दे सकता…व्यवस्था स्थापित करने की न्यूनतम क्रूरता सीमा क्या है ? और इसको तय करने का अधिकार किसे है ? ………

पुष्‍परंजन लिखते हैं- लम्बी ज़ुबान वाले साक्षी महाराज से सोच समझ कर बयान दिलवाया गया! बदज़ुबानी में पीएचडी कर चुके साक्षी महाराज के ज़रिये दो काम हुआ है। एक, न्यायपालिका को धमकाना। दूसरा, डेरा समर्थक वोट बैंक को यह बताना कि बीजेपी की इच्छा के विरुद्ध यह निर्णय हुआ है।

कोर्ट चाहे तो मानहानि ही नहीं, अदालत को धमकाने के मामले में महाराज जी को एक बार फिर तिहाड़ भेज सकती है। यों,  बलात्कार के आरोप वाले मामले आते हैं तो साक्षी महाराज का अगस्त 2000 वाला पुराना दर्द उखड आता है। बलात्कार के मामले में तिहाड़ रिटर्न हैं साक्षी महाराज।

सवाल यह है कि क्या इस देश में सभी अपराधियों को सरकार गेस्ट हाउस उपलब्ध कराती है? तो फिर इस बलात्कारी बाबा को अम्बाला जेल के बदले, गेस्ट हाउस देकर दामाद जैसा ट्रीटमेंट किस बिना पर? सीबीआई कोर्ट से निकला तो पुलिस गार्ड ऑफ़ ओनर के अंदाज़ में खड़ी थी। अपराधी घोषित होने के बाद भी बाबा वीवीआईपी है। हेलीकॉप्टर से गेस्ट हाउस पधारे।

मोदी-खट्टर सरकार को 30 लोगों के मरने 300 के घायल होने से अधिक चिंता बलात्कारी बाबा को आरामदेह सुविधाएँ देने की है ! ऐसा लचर और लिजलिजा मुख्यमंत्री पूरे जीवन में मैंने नहीं देखा। इस शख्स ने एक बार भी हिंसा फ़ैलाने वाले गुरमीत के गुंडों का नाम नहीं लिया। पूरे बयान में यह थकेला मुख्यमंत्री “कुछ लोग”-” कुछ लोग ” करता रहा !

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड है। यहां मालिक और नौकर में भारी भेदभाव किया जाता है। मजीठिया की बात करें तो अखबार मालिकों को खुली छूट है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन मनमर्जी से कर सकते हैं। जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के 26 अगस्‍त के अंक में प्रकाशित एक खबर उदाहरण लें तो पता चलेगा कि किस प्रकार दक्षिण कोरिया में सैमसंग जैसी बड़ी कंपनी के वारिस को घूस कांड में पांच साल की कैद हो गई। यहां तो अखबार मालिक चाहे डीएलसी को घूस दें या पूरा प्रशासन ही खरीद लें, कोई पूछने वाला नहीं है।