सरकारीपना का रोग

श्रीकांत सिंह।

कुछ लोग पत्रकारिता में तारीफ को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन जब इसकी वकालत कुछ पत्रकार साथी भी करने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि पत्रकारिता को सरकारीपना का रोग लग गया है। अरे भइया, पत्रकारिता में सरकार की तारीफ से ठीक उसी प्रकार परहेज करना चाहिए जैसे शुगर के मरीज को मीठा से परहेज करना होता है।

तारीफ के लिए सरकार के पास पूरा बजट होता है और वह उस पर खर्च भी करती है। मुफ्त में साहेब की तारीफ करने के लिए डॉक्‍टर ने बताया है क्‍या… आपको कोई भक्‍त पत्रकार कह देगा तो बुरा मान जाएंगे। यदि आप चारण बने रहना चाहते हैं और पत्रकार कहलाने का शौक भी चर्राया रहता है तो यह आपकी समस्‍या हो सकती है, पत्रकारिता की नहीं। वैसे, जनहित में सरकार की किसी कल्‍याणकारी योजना का विश्‍लेषण किया जा सकता है।

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बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां ‘राष्‍ट्रीय मंच’

फोर्थपिलर टीम।  

भाजपा के विरोध में ‘राष्‍ट्रीय मंच’ नाम से बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां निकल पड़ा है। इसमें अभी शत्रुघ्न सिन्हा, दिनेश त्रिवेदी(टीएमसी), माजिद मेमन, संजय सिंह (आप), सुरेश मेहता (पूर्व मुख्यमंत्री गुजरात), हरमोहन धवन (पूर्व केंद्रीय मंत्री), सोमपाल शास्त्री (कृषि अर्थशास्त्र), पवन वर्मा (जेडीयू), शाहिद सिद्दीक़ी, मोहम्मद अदीब, जयंत चैधरी (आरएलडी), उदय नारायण चौधरी (बिहार), नरेंद्र सिंह (बिहार), प्रवीण सिंह (गुजरात के पूर्व मंत्री), आशुतोष (आप) और घनश्याम तिवारी (सपा) शामिल हुए हैं।

बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने कहा, ‘मैं घोषणा करता हूं कि राष्ट्रमंच का सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का होगा। एनपीएस को ही देख लीजिए। नोटबंदी को मैं आर्थिक सुधार मानता हूं, फिर बुरी तरह लागू की गई जीएसटी। उससे छोटे उद्योग मर गए। बेरोज़गारी का क्या हाल है, भूख और कुपोषण के चलते बच्चों का भविष्य ख़तरे में है। आंतरिक सुरक्षा को देख लीजिए-ऐसे लगता है कि भीड़ ही न्याय करेगी और जब जाति और धर्म पर भीड़ तंत्र भारी पड़ता है तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।

बता दें कि किसानों के मुद्दों को लेकर बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने 30 जनवरी 2018 को राष्‍ट्रीय मंच की घोषणा की। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी भी शामिल हुईं। उन्‍होंने कहा कि बताया जाता है कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि विदेश नीति है, पर डोकलाम को ही देख लीजिए। जो चीन 10% था वो 90 % हो गया है। अब कोई 56 इंच की छाती को नहीं पूछता।

यशवंत सिन्‍हा ने दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर कहा कि हम सब अचानक साथ नहीं आए हैं। हम सब कई महीनों से संपर्क में थे और हम सभी देश की वर्तमान स्थिति पर चिंतित हैं। उन्‍होंने कहा कि हमें लगा कि देश की जनता के लिए एक आंदोलन करने की ज़रूरत है और हम वैचारिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हैं।

उन्‍होंने कहा कि हम बापू की समाधि पर गए तो लगा कि बापू का सरकारीकरण हो गया है। हमें अंदर नहीं जाने दिया गया। फिर काफी मानमुनव्‍वल के बाद हमें और मीडिया को अंदर जाने दिया गया। उन्‍होंने कहा कि 70 साल पहले आज के दिन उस महामानव ने देश के लिए अपना बलिदान दिया था। वर्तमान स्थिति में भी देश उन्हीं समस्याओं से ग्रस्त है। अगर आज हम नहीं खड़े हुए तो बापू का बलिदान व्यर्थ जाएगा।

यशवंत सिन्‍हा ने कहा कि न्यायालय में क्या हो रहा है-अब लीपापोती की जा रही है। आरोप क्या था कि कुछ केस को प्रफ़र्ड बेंच पर भेजा जा रहा था। क्या देश की जनता को जानने का हक़ नहीं है ? मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, उसका हाल आप देख ही रहे हैं। जो जांच एजेंसियां हैं सीबीआई, इनकम टैक्स आदि को किसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है। औद्योगिक विकास कम है और हमें देश के 60 करोड़ किसानों की फिक्र है। राज्य और केंद्र सरकारों ने किसान को भिखमंगा बना दिया है। किसान को एमएसपी नहीं मिल रही है। ये कभी मुद्दा नहीं बनता है।

घनन घनन घहराए बदरवा

घनन घनन घहराए बदरवा।

सघन बूंद बरसाए बदरवा।।

धरती तपत कण कण भए व्याकुल

जीव जंतु उपवन भए अाकुुल

सबकी प्यास बुझाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

दामिनि दमक दमक  चिग्घारै

दादुर अाैर पपीहा पुकारै

सबके मन काे भाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

धूप लजाकर जब  छिप जावै

ठंडी ठंडी पवन चलावै

गर्मी का ताप नसाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

प्रेम की ज्वाला बूंद की माला

दूर गगन से हुअा उजाला

मन में ज्याेत जगाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

खेती अाैर किसानी लेकर

सब फसलाें की जवानी लेकर

धरती हरी बनाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

माैसम के सब  मिजाज लेकर

संगीत का भी रियाज लेकर

देसराग दे जाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

सीएम नीतीश के काफिले पर क्‍यों हुआ हमला

बक्सर।

विकास कार्यों में भेदभाव का आरोप लगाकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काफिले पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया। पथराव में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए और सीएम को किसी तरह वहां से सुरक्षित निकाला जा सका। वह विकास समीक्षा यात्रा के लिए बक्सर जिले के नंदन गांव पहुंचे थे। पिछली बार भी सीएम नीतीश की विकास समीक्षा यात्रा के दौरान चौसा में कुछ ऐसा ही हुआ था।

कुछ असामाजिक तत्वों ने सीएम के कारकेड पर हमला कर दिया और जमकर पत्थरबाजी की, जिससे काफिले में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और गाड़ी लेकर भाग खड़े हुए। इस घटना में कई सुरक्षाकर्मी घायल हो गए।

गांव के ही चमटोली के लोगों का कहना था कि विकास केवल मुख्यमंत्री को दिखाने के लिए हुए, गांव के ही दूसरे इलाकों में कुछ नहीं हुआ। विरोध दायरे में था,  अचानक काफिले पर कुछ असामाजिक तत्व पत्थर चलाने लगे। आधा साइज के ईंट चलने से कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। काफिले में भगदड़ की स्थिति मच गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि सात निश्चय कार्यक्रम के तहत गांव में कोई काम नहीं हुआ। इसी को लेकर ग्रामीण विरोध जता रहे थे और सीएम को गांव लाने की मांग कर रहे थे। घटना के बाद सीएम नीतीश कुमार को गांव से सुरक्षित निकालकर वहां से दो किलोमीटर दूर एक फॉर्म पर ले जाया गया, जहां उन्‍होंने सभा को संबोधित किया।

सीएम को अहिनौरा में गार्ड ऑफ आनर दिया गया, जिसके बाद सीएम ने अपना भाषण पढ़ना शुरू किया और कहा कि जिस शादी में दहेज लिया जाता हो उस शादी में ना जाएं। उन्होंने दहेज और बाल विवाह को समाज से खत्म करने की बात कही।

उन्होंने लोगों से वादा किया कि जो भी वादा किया है वो पूरा करेंगे। इतना कहना था कि लोगों ने उन्हें काला झंडा दिखाया और अपना विरोध प्रकट किया। वहीं इससे पहले महादलित महिलाओं ने सीएम के काफिले को रोकने की भी कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस पर उठाए सवाल

नई दिल्‍ली।

सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने इतिहास में पहली बार देश के सामने आकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अनियमितताओं के संदर्भ में संवाददाता सम्मेलन कर चीफ जस्टिस पर सवाल उठाए। शुक्रवार को जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ व जस्टिस रंजन गोगोई ने मीडिया से बात कर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन पर आरोप लगाया कि वहां की व्‍यवस्‍था ठीक नहीं है।

अपने घर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जस्‍टिस चेलमेश्‍वर ने कहा, ‘प्रेस कांफ्रेंस को बुलाने का निर्णय हमें मजबूरी में लेना पड़ा है। मीडिया के सामने आने के अलावा दूसरा रास्‍ता नहीं बचा था। देश का लोकतंत्र खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। चीफ जस्‍टिस पर अब देश को फैसला करना होगा।’

नंबर दो के जज माने जाने वाले जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, ‘करीब दो महीने पहले हम चारों जजों ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखा और उनसे मुलाकात की। हमने उनसे बताया कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। सीजेआई से अनियमितताओं पर बात की थी। कई गड़बड़ियों की शिकायत की। हम नहीं चाहते कि 20 सालों में हम पर कोई आरोप लगे। न्‍यायपालिका की निष्‍ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन सीजेआई ने कोई कार्रवाई नहीं की।’

चेलमेश्वर ने कहा कि हमारे पत्र पर अब राष्ट्र को विचार करना है कि सीजेआई के खिलाफ महाभियोग चलाया जाना चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। बीते कुछ महीनों से काफी गलत चीजें हो रही हैं।

जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि हम वह पत्र सार्वजनिक करेंगे, जिससे पूरी बात स्पष्ट हो जाए। चेलमेश्वर ने कहा, ‘20 साल बाद कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है। इसलिए हमने मीडिया से बात करने का फैसला किया।’  उन्‍होंने कहा कि भारत समेत किसी भी देश में लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए यह जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था ठीक से काम करे।

यूपी के श्रमायुक्‍त का निर्देश, जल्‍द निपटाएं मजीठिया के मामले

नोएडा।

उत्‍तर प्रदेश के श्रमायुक्‍त ने नोएडा के उपश्रमायुक्‍त को मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े मामलों का निपटारा जल्‍द से जल्‍द करने का निर्देश दिया है। मजीठिया वेज बोर्ड के लिए संघर्ष कर रहे अखबारों के पत्रकार व गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए यह खबर संजीवनी से कम नहीं है। इन पत्रों की प्रतियां भी अपलोड की जा रही हैं।

मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किए जाने को लेकर देश भर के अखबार कर्मियों द्वारा दायर अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अभिषेक राजा और श्रीकांत सिंह ने उत्‍तर प्रदेश के श्रमायुक्‍त को पत्र लिखकर इसे जल्‍द से जल्‍द लागू करवाने की अपील की थी। इसी अपील पर संज्ञान लेकर उत्‍तर प्रदेश के श्रमायुक्‍त ने कार्रवाई करते हुए नोएडा के उपश्रमायुक्‍त को उक्‍त निर्देश जारी किया।

बता दें कि नोएडा के लेबर आफिस में इन दोनों के अलावा दर्जनों कर्मचारियों ने एरियर क्‍लेम का मुकदमा दायर किया है, जिस पर उपश्रमायुक्‍त की ओर से हीलाहवाली की जा रही है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों को न सिर्फ मजीठिया वेज बोर्ड को पूरी तरह से लागू करने का आदेश दे रखा है बल्कि श्रम विभाग को छह महीने के भीतर मामले का निपटारा करने का भी आदेश दिया है। मगर उपश्रमायुक्‍तों द्वारा अखबार मालिकों की मिलीभगत से तमाम मामलों को बेवजह लटकाने का प्रयास किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद देश भर के पत्रकार अपना हक पाने के लिए लेबर ऑफिस पहुंच रहे हैं और क्‍लेम भी लगा रहे हैं। कई राज्‍यों के श्रम विभागों ने कर्मचारियों के हक में कार्रवाई करते हुए आरसी भी जारी की है मगर उत्‍तर  प्रदेश में अब तक श्रम विभाग कर्मचारियों को परेशान ही करता रहा है।

एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल का दर्शन

श्रीकांत सिंह।

गुजरात विधानसभा चुनाव आज यानी 17 दिसंबर 2017 को एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल के बीच त्रिशंकु की भांति लटका हुआ है। चुनावी भविष्‍यवाणी करने में कुछ पत्रकारों को छोड़ दें तो ज्‍यादातर भाजपा के पक्ष में ईवीएम की तरह विनम्र, अतिविनम्र और विनम्राधिराज बने हैं। जयशंकर प्रसाद के एक नाटक का संदर्भ लें तो उसमें लिखा है-‘सीधे तने पर्वत के चरणों में कमजोर और लचकदार लताओं को लोटना ही चाहिए।’ ये कमजोर और लचकदार लताएं आज की पत्रकारिता की ओर संकेत करती हैं जिसकी वजह से कभी कभी एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल में उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुव का अंतर सामने आता है। भारत में केजरीवाल के मुख्‍यमंत्री बनने और अमेरिका में डोनाल्‍ड ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने में एक्जिट पोल धोखा खा गए थे। शायद यही वजह रही होगी कि ट्रंप ने अमेरिका के पत्रकारों को फेकू पत्रकार करार दिया था।

दरअसल, एक्जिट पोल के दर्शन की बात करें तो यह उस दशा को दर्शाता है जो हमारे मन की हालत होती है। हमारा मन सत्‍तारूढ़ पार्टी का इतना गुलाम हो चुका होता है कि उसके विरोध में कुछ सोचता ही नहीं। जैसे वैशाख नंदन को वैशाख में सबकुछ हरा-हरा दिखता है वैसे ही आज तमाम पत्रकारों को भाजपा में कोई दोष नजर नहीं आ रहा है। हर कोई अपने आंकड़े में भाजपा को जिताता नजर आता है। किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा भी हो सकती है। अनुमान लगाने में आखिर इतना बड़ा जोखिम कौन उठाए। इसीलिए मैंने भी न तो त्रिशंकु का अनुमान लगाया है और न ही किसी पार्टी विशेष के सत्‍ता में आने का। मैंने साफ-साफ कह दिया है-‘मेरे पास डेढ़ सौ सीटें हैं, जिन्‍हें किसी पार्टी को देना नहीं चाहता। भाजपा को इसलिए नहीं कि उसने उस लायक काम नहीं किया है और विपक्ष को इसलिए नहीं कि वह उतना सक्षम नहीं बन पाया है। ये है एक्जिट पोल का दर्शन।’

हमारे पत्रकारों से कहीं ज्‍यादा सटीक दर्शन जनता यानी मतदाताओं के पास होता है। इसीलिए वे समय समय पर पत्रकारों को चौंकाते रहते हैं। अपने अंदर का हाल किसी पत्रकार को नहीं बताते। बताते वही हैं जो पत्रकार सुनना चाहते हैं और सत्‍ता के समर्थन में भविष्‍यवाणी करना चाहते हैं। मुझे उन पत्रकारों के चिंतन पर कोफ्त होती है जो जनता तो दूर, पत्रकारों के ही हक मजीठिया को दिलाने में नखरे दिखा रही भाजपा को दूध की धुली बताते नहीं थकते और ऊपर से महान होने का आडंबर ओढ़ लेते हैं कि वे इतने महान हैं कि अपने हक की चर्चा भी नहीं करना चाहते। लेकिन सैलरी दस दिन लेट हो जाए तो घोर निराशा में डूबने लगते हैं। ऐसे पत्रकारों की भविष्‍यवाणियां हमेशा सच होंगी, इसमें संदेह की गुंजाइश बनी रहेगी। क्‍योंकि परिवर्तन का पहिया कब घूम जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर युग चाहे वह इंदिरा गांधी का रहा हो या राजीव गांधी का, या वर्तमान प्रात: स्‍मरणीय अथवा निंदनीय नरेंद्र मोदी का, भक्‍त पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी कुकुरमुत्‍ते की तरह उगती रही है। यह कुकुरमुत्‍ता युग अजर और अमर है। जब जब चुनावी बारिश होगी, इसे उगने से कोई रोक नहीं सकेगा। बजाय इस पर भरोसा करने के, आप अपने अंदर की आवाज सुनने का प्रयास करेंगे तो कभी गच्‍चा नहीं खाएंगे।