MAJITHIA : सुप्रीम कोर्ट का पूरा आदेश एक साथ हिंदी में

सुप्रीम कोर्ट में दायर 83 अवमानना याचिकाओं और तीन रिट पेटिशनों का 19 जून, 2017 को निपटारा कर दिया गया लेकिन अभी जंग बाकी है…क्या उसके लिये आप तैयार हैं…यहाँ पूरा आदेश एक साथ हिंदी में है…इसे हनुमान चालीसा की तरह याद रखना होगा… 

अखबार प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान न दिए जाने और माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई 83 अवमानना याचिकाओं और तीन रिट पेटिशनों का निपटारा करते हुए 19 जून, 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है, उसे कुछ कर्मचारी साथी मालिकों के पक्ष में बताकर निराशा का माहौल पैदा करने में जुटे हुए हैं। हालांकि इस निर्णय में मालिकों के पक्ष में सिर्फ एक ही बात गई है, वो यह है कि कोर्ट ने इनके खिलाफ अवमानना को स्वीकार नहीं किया है और जिन अखबार मालिकों ने मजीठिया वेजबोर्ड अधूरा लागू किया है और जिनने नहीं लागू किया है उन्हें एक और मौका दिया गया है।

इसके अलावा कोर्ट ने अपने फैसले में अधिकतर बातें कर्मचारियों के हित में ही लिखी हैं। इनका जिक्र यहां करना मुनासीब नहीं होगा, क्योंकि इस पर अब तक सोशल मीडिया, साइटों और व्हाट्सएप ग्रुपों में बड़ी चरचा हो चुकी है। अफवाहों और निराशा के दौर में मेरा इतना ही कहना है कि अखबार मालिक भले ही अवमानना से बच गए हों, मगर वेजबोर्ड देने से नहीं बचे हैं। अब भी उन्हें  कानूनी शिकंजे में फंसाया जा सकता है। इसके लिए हमारे कुछ साथी जुट चुके हैं। अब सभी साथियों से एक ही अनुरोध रहेगा कि वे १९ जून की जजमेंट का हिंदी अनुवाद पढ़ कर स्वयं ही यह तय करें कि यह निर्णय हमारे पक्ष में है या नहीं। काफी लंबा और कानूनी मामला होने के कारण बड़ी कुशलता और मेहनत से अनुवाद करने की कोशिश की गई है। इसकी पहली किश्त प्रस्तुत है। बाकी का हिस्सा अगली किश्तों में जारी किया जाता रहेगा।

-रविंद्र अग्रवाल

मजीठिया क्रांतिकारी, हिमाचल प्रदेश

संपर्क नंबर : 9816103265

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जजमेंट का अनुवाद 

  1. श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 (यहां संक्षिप्त में अधिनियम) देश भर के श्रमजीवी पत्रकारों और समाचारपत्र स्थापनाओं में कार्यरत अन्य व्यक्तियों सेवा की शर्तों को विनियमित/रेगूलेट करने के लिए किया गया था। यह अधिनियम अन्य विषयों में(इंटर एलिया), ग्रेच्यूटी के लिए पात्रता, काम के घंटे, छुट्टी के साथ-साथ श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार अखबार कर्मियों को देय वेतन/मजदूरी निर्धारण के निपटारे के लिए कानून की एक व्यापक रचना है, जैसा कि हो सकता है।

जहां तक कि वेतन/मजदूरी के निर्धारण और संशोधन का संबंध है, अधिनियम की धारा 9 के तहत गठित वेतन बोर्ड द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों से जुड़े वेतनमान/मजदूरी के ऐसे निर्धारण या संशोधन का कार्य किया जाता है। वेतनबोर्ड की सिफारिशों को अगर स्वीकार किया जाता है, तो अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा इसे अधिसूचित किया जाता है। अधिनियम की धारा 12 के तहत जारी केंद्र सरकार के आदेश के संचालन में आने पर प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार को उस दर पर वेतन/मजदूरी दी जाएगी, जो इस आदेश में इस आदेश में निर्दिष्ट की गई दर से कम नहीं होगी, यह प्रावधान धारा 13 मुहैया करवाती है। अधिनियम का अध्याय 2 क (Chapter IIA) समाचारपत्र स्थापनाओं के गैरपत्रकार कर्मचारियों से  जुड़े एक समान((pari materia/श्रमजीवी पत्रकारों की तरह) प्रावधानों को समाहित किए हुए है।

  1. अधिनियम की धारा 16 में यह प्रावधान है कि इसके प्रावधान किसी भी अन्य कानून में या इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात किए गए किसी अधिनिर्णय, करार या सेवा के अनुबंध के निबंधनों में अंतरविष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे। धारा 16 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के प्रावधानों को एक विशिष्ट ध्यान देने की आवश्यकता होगी और इसलिए इसका सार नीचे दिया जा रहा है:

धारा 16 की उपधारा (1) के प्रावधान

इस अधिनियम के निहित समाचारपत्र कर्मचारी ऐसे किसी अधिनिर्णय, करार, या सेवा के अनुबंध के अधीन या अन्यथ, किसी विषय के संबंध में ऐसे फायदों का हकदार है, जो उसके लिए उनसे अधिक अनुकूल हैं जिनका वह हस अधिनियम के अधीन हकदार है, तो वह सामाचारपत्र कर्मचारी उस विषय के संबंध में उन अधिक अनुकूल फायदों को इस बात के होते हुए भी हकदार बना रहेगा कि वह अन्य विषयों के संबंध में फायदे इस अधिनियम के अधीन प्राप्त करता है।

धारा 16 की उपधारा (2)

इस अधिनियम में निहित कुछ भी किसी अखबार कर्मचारी को किसी नियोक्ता के साथ किसी भी मामले में ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार जो उसके लिए उनसे अधिक अनुकूल हैं जिनका वह इस अधिनियम के तहत हकदार है, देने के लिए समझौता करने से नहीं रोक सकता है।

  1. धारा 16 ए, धारा 12 के अधीन, या धारा 13एए या धारा 13 डीडी के साथ गठित धारा 12 के अधीन केंद्रीय सरकार के किसी आदेश में विनिर्दिष्ट अखबार कर्मियों को मजदूरी के भुगतान के अपने दायित्व के कारण, किसी भी कर्मचारी को पदच्युत या सेवान्मुक्त करने के लिए नियोक्ता पर प्रतिबंध लगाती है।
  2. अधिनियम की धारा 17 नियोक्ता से धन की वसूली के साथ संबंधित है। मौजूदा अवमानना मामलों की सुनवाई को जारी रखने (2)के लिए एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार मुहैया करवाए गए उपायों पर केंद्रीत है, अधिनियम की धारा 17 को नीचे व्यक्त किया जा सकता है:

17(1) यहां किसी नियोक्ता द्वारा किसी अखबार कर्मी को इस अधिनियम के अधीन कोई रकम देय है वहां अखबार कर्मी स्वयं या इस नामित लिखित रूप से उसके द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति अथवा उस कर्मचारी की मृत्यु हो जाने की दशा में उसके कुटुंब का कोई सदस्य, वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसको देय रकम की वसूली के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकेगा और यदि राज्य सरकार या ऐसे प्राधिकारी का, जिसे राज्य सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, समाधान हो जाता है कि कोई रकम वैसे देय है तो वह उस रकम के लिए एक प्रमाणपत्र कलैक्टर को भेजेगा और कलैक्टर उस रकम को उसी रीति से वूसली करने के लिए कार्रवाई करेगा जिसमें भू-राजस्व की बकाया वसूली की जाती है।

(2) यदि किसी अखबार कर्मी को उसके नियोक्ता से इस अधिनियम के अधीन देय राकम की बाबत कोई प्रश्र पैदा हो तो राज्य सरकार, स्वप्रेरणा से या उसको आवेदन किए जाने पर उस प्रश्र को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन या उस राज्य में प्रवृत्त औद्योगिक विवादों की जांच पड़ताल और निपटारे से संबद्ध किसी तत्समान कानून के अधीन उस द्वारा गठित किसी श्रम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगी और उक्त अधिनियम या कानून उस श्रम न्यायालय के संबंध में ऐसे प्रभावी होंगे मानो ऐसा निर्देशित प्रश्र उस अधिनियम या कानून के अधीन न्यायनिर्णय के लिए उस श्रम न्यायालय को निर्देषित विषय हों।

(2) श्रम न्यायालय का निर्णय उसके द्वारा उस राज्य सरकार को भेजा जाएगा, जिसने निर्देश किया और ऐसी कोई रकम जिसे श्रम न्यायालय ने देय पाया हो उपधारा(1) में उपबंधित रीति से वसूल की जा सकेगी।

  1. अधिनियम की धारा 17बी अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति की व्यवस्था करती है।
  2. धारा 9 और 13सी के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार ने 24.05.2007 को डा. न्यायमूर्ति नारायण कुरुप(उच्च न्यायालय मद्रास के सेवानिवृत्त कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश) की अध्यक्षता में श्रमजीवी पत्रकारों और गैरपत्रकार कर्मियों को देय वेतन/मजदूरी का निर्धारण करने के लिए दो वेतनबोर्डों का गठन किया था। न्यायमूर्ति कुरुप के 31.7.2008 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए जाने पर न्यायमूति जी.आर. मजीठिया (मुंबई उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश) को 04.03.2009 को दो वेतनबोर्डों का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। न्यायमूति मजीठिया(इसके बाद मजीठिया वेतनबोर्ड के रूप में संदर्भित)की अध्यक्षता वाले वेतनबोर्ड ने अपनी सिफारिशें 31.12.2010 को केंद्र सरकार को प्रस्तुत कीं। इसे केंद्र सरकार द्वारा 25.10.2011 को स्वीकार कर लिया गया और अधिनियम की धारा 12 के तहत इस संबंध में एक अधिसूचना 11.11.2011 को प्रकाशित की गई।
  3. यहां तक कि पहले अधिनियम की धारा 12 के तहत 11.11.2011 को सरकार की अधिसूचना प्रकाशित हुई थी, मजीठिया वेजबोर्ड अधिनिर्णय/अवार्ड से प्रभावित विभिन्न समाचारपत्र स्थापनाओं ने इस न्यायालय के समक्ष भारत के संविधान की धारा 32 के तहत न्यायिक याचिकाएं(writ petitions) दायर करके वेजबोर्ड की सिफारिशों को चुनौती दी थी, रिट पेटिशन(सी) नंबर 246 आफ 2011 इसमें प्रमुख मामला था। अधिनियम की धारा 12 के तहत 11.11.2011 की अधिसूचना को न्यायिक याचिकाओं की लंबितता के दौरान जारी किया गया था, जिसे न्यायिक याचिाकाओं में संशोधन करके चुनौती के तहत लाया गया था।
  4. उपरोक्त रिट याचिकाओं में, अन्य बातों के साथ(इंटर एलिया) इस आधार पर चुनौती गई थी कि 1974 में किए गए संशोधन सहित अधिनियम संवैधानिक तौर पर अवैध था और इसके अलावा यह कि वेजबोर्ड का गठन अधिनियम में निहित वैधानिक प्रावधानों के विपरित था। श्रमजीवी पत्रकारों के साथ-साथ गैरपत्रकार कर्मचारियों के वेतन/मजदूरी के निर्धारण के लिए वेजबोर्डों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया गलत और दोषपूर्ण थी, जिसे न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।
  5. वेजबोर्ड की सिफारिशों के साथ-साथ इन सिफारिशों को स्वीकृति देने वाली दिनांक 11.11.2011 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली उपरोक्त रिट याचिकाओं को इस न्यायालय ने अपने फैसले और दिनांक 07.02.2014 के आदेश के साथ अस्वीकृत कर दिया था। इस स्तर पर न्यायालय के उसके दिनांक 07.02.2014 के फैसले, जिसमें कि विवादास्पद रिट याचिकाओं को खारिज किया गया था, को निम्रलिखित निष्कर्षों पर सारगर्भित करना जरूरी होगा।

(i) कार्यवाही और विभिन्न लिखित माध्यमों पर सुविस्तृत रूप से जाने के बाद हम पूरी तरह संतुष्ट हैं कि मजीठिया वेजबोर्ड की कार्यवाही एक वैध दृष्टिकोण से संचालिक की गई है और वेजबोर्ड का कोई भी निर्णय एकतरफा या मनमाने ढंग से नहीं लिया गया है। अपेक्षाकृत विभिन्न आंकड़ों पर विचार करने के बाद वेजबोर्ड के सभी सदस्यों की उपस्थिति में सभी निर्णय एक सुसंगत तरीके से लिए गए थे और हमने विवादित वेजबोर्डों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं पाई है।

(ii)  प्रासंगक दस्तावेजों को समझने के बाद, हम संतुष्ट हैं कि वेतन/मजदूरी संशोधन के उद्देश्यों के लिए सभी प्रासंगिक भौतिक/आर्थिक सूचनाओं की जानकारी एकत्रित करके वेजबोर्ड द्वारा व्यापक और विस्तृत अध्ययन किया गया है। नफे और नुकसान के विभिन्न तरीकों और आधुनिक युग में वेतन संशोधन के सिद्धांतों पर विचार-विमर्श करने के बाद सिफारिशों तक पहुंचा गया है। ऐसा नहीं माना जा सकता कि मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा अनुशंसित वेतन/मजदूरी संरचना अनुचित है।

(iii)  हमने ध्यानपूर्वक सभी विवरणों की छानबीन की है। यह स्पष्ट है कि मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को अंधाधुंध तरीके से आयातित/भरोसा नहीं किया गया है। छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों में निहित वेरिएवल पे की अवधारणा को यह सुनिश्चित करने के लिए वेजबोर्ड की सिफारिशों में सम्मिलित किया गया है कि अखबार कर्मियों का वेतन/मजदूरी अन्य सरकारी क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के सामान हैं। मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा इस तरह का समावेश समाचारपत्र प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को न्यायसंगत व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए सावधानीपूर्वक विचार के बाद किया गया था, और यह ऐसा करने के उसके अधिकारों के तहत उचित था।

(iv) तदनुसार, हम मानते हैं कि वेजबोर्ड की सिफारिशें कानून में मान्य हैं, वास्तविक और स्वीकार्य विचारों पर आधारित है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप के लिए कोई वैध आधार नहीं है। नतीजतन सभी रिट याचिकाओं को खारिज किया जाता है।

(v) हमारे निष्कर्ष और सभी रिट याचिकाओं की बर्खास्तगी को ध्यान में रखकर संशोधित/निर्धारित वेतन/मजदूरी 11.11.2011 से देय होगी, जब भारत सरकार ने मजीठिया वेजबोर्डों की सिफारिशों को अधिसूचित किया था। मार्च 2014 तक के सभी बकाया का भुगतान सभी पात्र व्यक्तियों को आज से एक वर्ष की अवधि के भीतर चार समान किश्तों में किया जाएगा और अप्रैल 2014 से संशोधित मजदूरी का भुगतान जारी रहेगा।

  1. मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड/अधिनिर्णय पर एक नजर इशारा करेगी कि वेजबोर्ड ने प्रतिष्ठानों/स्थापनाओं के पिछले तीन लेखा वर्षों, 2007-08, 2008-09, 2009-10 के औसत सकल राजस्व के आधार पर समाचारपत्र प्रतिष्ठानों/स्थापनाओं को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया था। औसत सकल राजस्व के आधार पर समाचारपत्र प्रतिष्ठानों की आठ श्रेणियां निकाली गई थीं और श्रमजीवी पत्रकारों और गैरपत्रकार कर्मचारियों को अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था। सिफारिशें न केवल वेतन / मजदूरी के संशोधित वेतनमान और वेरिएवल पे परिवर्तनीय वेतन के संबंध में थीं, बल्कि साथ ही महंगाई भत्ता, घर किराया भत्ता, परिवहन भत्ता, पहाड़ी क्षेत्र भत्ता / कठिनाई भत्ता आदि की संशोधित दरों के संबंध में भी थीं।
  2. इस चरण में मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के खंड 20जे, जो मौजूदा कार्यवाही में विवाद के मुख्य क्षेत्रों में से एक है, पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा सकता है।

“20जे संशोधित वेतनमानसभी कर्मचारियों पर 1 जुलाई 2010 से लागू होगा। हालांकि यदि कोई कर्मचारी इन अनुशंसाओं के प्रवर्तन के लिए अधिनियम की धारा 12 के तहत सरकारी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन हफ्तों के भीतर अपने मौजूदा वेतनमान और वर्तमान परिलब्धियों/प्रतिभूतियों को बनाए रखने का विकल्प चुनता है, तो वह अपने मौजूदा वेतनमान तथा ऐसी परिलब्धियों को बनाए रखने का पात्र होगा।”

  1. मजीठिया वेजबोर्ड ने यह भी विनिर्दिष्ट/दर्शाया किया था कि तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में जो प्रतिष्ठान लगातार भारी नकदी हानि से पीडि़त हैं उन्हें बकाए के भुगतान में छूट दी जाएगी, जो अवार्ड के क्लॉज/खंड 21 से स्पष्ट होता है नीचे सारगर्भित किया गया है।

“पूर्वव्यापी/भूतलक्षी प्रभाव के क्रियान्वित किए जाने के कारण इस अवार्ड/पंचाट के प्रवर्तन/लागू होने की तारीख से देय बकाया, यदि हो, का भुगतान इस अवार्ड के प्रवर्तन की तरीख के प्रत्येक छह माह बाद तीन समान किश्तों में किया जाएगा तथा पहली किश्त का भुगतान तीन महीने के भीतर होगा; बशर्ते,इस अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पूर्व के तीन लेखा वर्षों में लगातार भार नकद नुकसान झेल रहे समाचारपत्र प्रतिष्ठान को किसी भी बकाए के भुगतान से छुट दी जाएगी। हालांकि, इन समाचारपत्र प्रतिष्ठानों को इस अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख  अर्थात 1जुलाई 2010 से, अपने कर्मचारियों का वेतन पुनरीक्षित वेतनमान में नोशनल/अनुमानित आधार पर निर्धारित करना होगा।”

  1. मौजूदा अवमानना याचिकाओं (संख्या 83) में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा विधिवत अनुमोदित और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड के अवार्ड/पंचाट के अनुसार वेतन और भत्तों का भुगतान नहीं किया गया है। तीन(3) रिट याचिकाएं यानी रिट पेटिशन नंबर 998 आफ 2016,148 आफ 2017 और 299 आफ 2017 संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह आरोप लगाते हुए दायार की गई हैं कि मामले से जुड़े उन पत्रकारों और कर्मचारियों के तबादले और बर्खास्तगी/छंटनी मनमाने तरीके से की गई है, जो दावा करते हैं कि उन्होंने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के उचित क्रियान्वयन की मांग की है। उपरोक्त विषय मौजूदा मामलों के समूह में विचाराधीन विषय वस्तू है।
  2. शामिल मुद्दों और रिट याचिकाओं की बड़ी संख्या को ध्यान में रखते हुए, जिन्हें इस न्यायालय के समक्ष लाया गया था, इस कोर्ट द्वारा समय-समय पर मुद्दों के प्रभावी समाधान के लिए विभिन्न आदेश सुनाए गए हैं। दिनांक 24.4.2015, 14.4.2016 और 8.11.2016 के आदेश, जिन्हें नीचे दिया गया है को विशिष्ट ध्यान देने और उल्लेख करने की आवश्यकता होगी।

दिनांक 28 अप्रैल 2015 के आदेश

सभी राज्य अपने संबंधित मुख्य सचिवों के माध्यम से, आज से चार सप्ताह के भीतर, श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 की धारा 17-बी के तहत निरीक्षकों की नियुक्ति करेंगे, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत पत्रकारों सहित अखबार कर्मचारियों की सभी श्रेणियों के बकाया और अनुदानों/अधिकारों/पात्रता को उनके नियमों के अनुसार कार्यान्वित किया गया है। राज्य सरकार द्वारा नियुक्त निरीक्षक स्वाभाविक रूप से अधिनियम के तहत प्रदान की गई अपनी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और प्रत्येक राज्य के श्रम आयुक्त के माध्यम से ऊपर दर्शाए गए मुद्दे पर सटीक निष्कर्षों के साथ इस न्यायालय को रिपोर्ट सौंपेंगे।  (हमारे द्वारा जोर दिया जाता है)

दिनांक 14 मार्च 2016 को जारी आदेश:

हमने न्यायालय के आदेशानुसार वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत देयताओं/दायित्वों से बचने के लिए गलत तरीके से सेवाओं की बर्खास्तगी और धोखे से लिए गए अधिकारों के आत्मसमर्पण के आरोप लगाकर दाखिल की गई विभिन्न इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन पर भी विचार किया है। चूंकि अब तक प्राप्त की गई शिकायतें संख्या में काफी ज्यादा हैं, यह कोर्ट प्रत्येक मामले में व्यक्तिगत रूप से जांच करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए हम प्रत्येक राज्य के श्रम आयुक्त को निर्देश देते हैं कि इस तरह की सभी शिकायतों पर गौर करके और इनका निर्धारण/व्याख्या करके आवश्यक रिपोर्टें 12 जुलाई, 2016 को या इससे पूर्व, इस न्यायालय के सामने फाइल करेंगे। हम प्रत्येक व्यक्तिगत कर्मचारी जिन्होंने इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन दाखिल की हैं और उन कर्मचारियों को भी जो अभी इस कोर्ट को संपर्क कर रहे हैं और जिनकी शिकायतें ऊपर दर्शाए अनुसार ही हैं, को यह स्वतंत्रता देते हैं कि वे इस आदेशानुसार राज्य के श्रम आयुक्त के पास जाएं। (हमारे द्वारा जोर दिया जाता है)

दिनांक 08 नवंबर, 2016 के आदेश

कारणों के चलते हम वर्तमान में विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों से मांगी गई रिपोर्टों के आधार पर मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के कार्यान्वयन की निगरानी के कार्य को मौजूदा समय में रिकार्ड करना जरूरी नहीं समझते हैं,बाद की तिथि के लिए स्थगित करते हैं। इसके बजाय यह बुद्धिमतापूर्ण और वास्तव में आवश्यक होगा कि कुछ कानून के प्रश्रों को हल किया जाए, जो अब तैयार कर दिए गए हैं और कोर्ट के अनुरोध पर, वरिष्ठ वकील श्री कॉलिन गोन्साल्वेस द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत कर दिए गए हैं। पहले कानूनी प्रारुपण/फार्मूलों को माना और तय किया जाए इसके बाद मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के तंत्र/मैक्रिज्म के बारे में आदेशों का पालन किया जाएगा। (हमारे द्वारा जोर दिया जाता है)

  1. न्यायालय के उपरोक्त आदेशों के आधार पर, विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के कार्यान्वयन के संबंध में स्थिति को दर्शाती कई रिपोर्टें पेश की हैं। उक्त रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ राज्यों में कुछ प्रतिष्ठानों ने पूर्ण रूप से अवार्ड लागू कर दिया है, जबकि अन्य ने इसे आंशिक रूप से लागू किया है। कुछ मामलों में किर्यान्वयन के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है। अवार्ड के कार्यान्वयन न करने और आंशिक कार्यान्वयन, जैसा कि हो सकता है, के कारणों की गवाही श्रम आयुक्तों की रिपोर्टें दे रही हैं, को चार तहों में पहचाना जा सकता है, जिन्हें नीचे इंगित किया गया है।

(1) श्रम आयुक्तों द्वारा दी गई रिपोर्टों के अनुसार कुछ प्रतिष्ठानों में मजीठिया अवार्ड के क्लॉज/खंड 20(जे) के तहत कई कर्मचारी केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों से पूर्व मौजूद वेतन/मजदूरी के ढांचे के तहत शासित होने/कार्य करने को सहमत हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों की प्रमाणिकता और स्वैच्छिकता का मुद्दा कथित तौर पर कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत किया गया है, भी श्रम आयुक्तों की रिपोर्टों में दर्शाया गया है कि कुछ मामले अधिनियम की धारा 17(ऊपर उद्धृत) के प्रावधानों के तहत न्यायिक प्रक्रिया के अधीन किए जा रहे हैं।

(2) मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड की शर्तों को समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा केवल नियमित कर्मचारियों के लिए कार्यान्वित करने की आवश्यकता होती है, न कि संविदात्मक/ठेका कर्मचारियों के लिए।

(3) मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा अनुशंसित और केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत वेरिएवल पे/परवर्ती वेतन का तत्व महंगाई भत्ते जैसे अन्य भत्तों की गणना के उद्देश्य के लिए ध्यान में रखा जाना आवश्यक नहीं है।

 

(4) इस न्यायालय में श्रम आयुक्तों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने गंभीर वित्तीय बाधाओं का हवाला देते हुए बकाया भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त की है।

  1. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

वेजबोर्ड द्वारा अनुसंशित, जैसे कि केंद्र सरकार द्वारा मंजूर और स्वीकृत वेतन/मजदूरी को संबंधित श्रमजीवी और गैर पत्रकार कर्मचारियों के अधिनियम द्वारा गारंटी दी जाती है। केवल अधिक लाभकारी/फायदेमंद और अनुकूल दरों को अपना कर ही अधिसूचित वेतन/मजदूरी को निर्गत/खत्म किया जा सकता है। इसलिए, अवमानना याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पिछली मजदूरी संरचना द्वारा नियंत्रित किसी भी समझौता या परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग), जो मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा सुझाई गई सिफारिशों से कम अनुकूल है, वो वैध नहीं है। इसके अलावा, वाद-विवाद उठाया गया था कि कोई भी परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग) स्वैच्छिक नहीं है, इन्हें दबाव और स्थानांतरण/बर्खास्त किए जाने के खतरे के तहत प्राप्त किया गया है। इसलिए अवमानना याचिकाकर्ताओं का निवेदन है कि उपरोक्तानुसार न्यायालय द्वारा मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को स्पष्ट किया जा सकता है।

  1. जहां तक कि वेरिएवल-पे, अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों, और वित्तीय क्षमता का संबंध है, अवमानना याचिकाकर्ताओं का मामला इस प्रकार से है कि उपरोक्त सभी मामलों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा पूरी तरह से निपटाया गया है। उन सिफारिशों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो कथित वजह पर कोई और बहस या विवाद के लिए कोई गुंजाईश नहीं है। अनुमोदित और अधिसिूचित वेजबोर्ड की सिफारिशें अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन के हकदार होंगे और वेरिएवल पे के समावेश द्वारा सभी भत्तों की गणना करेंगे। सभी नियोक्ता निर्धारित अवधि से बकाया राशि का भुगतान करने के लिए भी बाध्य हैं, जब तक कि एक प्रतिष्ठान को अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पहले तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में भारी नकदी हानि का सामना करना पड़ रहा है, जो कि नियोक्ता द्वारा अनुमानित महज वित्तीय कठिनाइयों से अलग होना चाहिए।
  2. अवमाना याचिकाओं का विरोध किया गया और सामाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि अवमानना याचिकाकर्ताओं के जरिये उठाए गए, ऊपर पहचाने गए, चार मुद्दे, किसी भी तरह से, रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को घोषित मुख्य फैसले में नहीं निपटे गए हैं। इसलिए, यह मान लिया गया है कि अवमानना क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए, मुख्य रिट पेटिशन में दिनांक 07.02.2014 को पारित किए फैसले को विस्तारित, स्पष्ट नहीं किया जा सकता है या कुछ जोड़ा नहीं जा सकता है, ताकि आरोपित गैर-अनुपालना को सीमित अवमानना क्षेत्राधिकार के चारों कोनों के भीतर लाया जा सके। चूंकि चार मुद्दे, ऊपर क्रस्टिलीकृत/स्पष्ट हैं, रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को घोषित फैसले का हिस्सा नहीं बनते हैं, इसलिए यह आग्रह नहीं किया जा सकता कि सामाचारपत्र संस्थानों को ऐसे नियमों/आवश्यकताओं के कथिततौर पर उल्लनंघन या अव्हेलना करके अवमानना करने का दोषी माना जाए, जिसे कि अब मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड का हिस्सा होने के लिए जिम्मेदार ठहराने की मांग की जा ही है और इसलिए इसे दिनांक 07.02.2014 को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिए गए फैसले का हिस्सा होने का दावा किया जा रहा है, जिसको लागू ना किए जाने का आरोप है।
  3. अब तक, सिविल अवमानना होने पर न्यायालय की शक्ति के रूपों का संबंध, इस न्यायालय के कई फैसलों में विस्तार से बताया गया है। उदाहरणत्या, निम्रलिखित विचारों/कथनों के लिए कपिल देव प्रसाद साह बनाम बिहार राज्य के मामले को संदर्भ बनाया जा सकता है। …इस संदर्भ के अंडरलाइन बिंदूओं का ही अनुवाद किया जा रहा है।

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…अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति का उपयोग तभी किया जाता है, जब न्यायालय के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन हुआ हो। क्योंकि अवमानना का नोटिस और अवमानना की सजा बहुत दूर के परिणाम हैं और इन शक्तियों को सिर्फ तभी लागू किया जाना चाहिए, जब आदालत के आदेश का जानबूझ कर उल्लंघन करने का स्पष्ट मामला बनाता हो। …यहां तक कि लापरवाही और लापरवाही के कारण अवज्ञा हो सकती है, खासकर जब व्यक्ति का ध्यान न्यायालय के आदेशों और उसके निहितार्थ के लिए खींचा जाता है।

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अदालत के आदेश का अनुपालन करने से इनकार करने वाले या लगातार आदेश की अव्हेलना करने वाले व्यक्ति के खिलाफ अवमानना के लिए दंडित करने का क्षेत्राधिकार मौजूद है।

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कोई व्यक्ति कोर्ट के आदेश को खारिज नहीं कर सकता. आकस्मिक, दुर्घटनात्मक, वास्तविक या अनजाने में कार्य करने या आदेश की शर्तों का अनुपालन करने के लिए वास्तविक अक्षमता को जानबूझकर/विलफुल से बाहर रखना होगा। न्यायालय के आदेशों की अवज्ञा की शिकायत करने वाले याचिकाकर्ता को न्यायालय के आदेश की जानबूझकर या तिरस्कारपूर्ण अवज्ञा का आरोप लगाना चाहिए।

(हमारे द्वारा जोर दिया गया है )

इसी तरह पैरा नंबर 20 और 21 में अवमानना साबित करने और अवमानना के दौरान याचिकाकर्ताओं द्वारा मुख्य मुद्दे से हटकर अन्य बातें उठाने और न्यायालय की सीमा को लेकर विभिन्न मुकद्दमों के संदर्भ दिए गए हैं। इनका अनुवाद बाकी जरूरी पैराग्राफ के अनुवाद के बाद किया जाएगा।

  1. प्रत्युत्तर में दायर किए गए विभिन्न शपथपत्रों में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा अपनाए गए स्टैंड/कदम से, समय-समय पर विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों द्वारा दायर की गई रिपोर्टों में किए गए बयानों से, और साथ ही दायर की गई लिखित दलीलों से और आगे दखी गई मौखिक प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड हिस्से में या नहीं कार्यान्वित किया है, इसके तहत क्या इन समाचारपत्र संस्थानों ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड, जिसे दी गई चुनौती को इस न्यायालय द्वारा रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 के फैसले/जजमेेंट में निरस्त कर दिया गया है, की गुंजाईश और दायरे को माना है। दृढ़मत है कि अवार्ड के गैर-कार्यान्वयन या आंशिक कार्यान्वयन को लेकर जो आरोप है, जैसा कि हो सकता है, स्पष्ट रूप से विशेष तौर पर संबंधित समाचारपत्र संस्थानों की अवार्ड की समझ से उपजा है, यह हमारा विचारणीय नजरिया है कि संबंधित प्रतिष्ठानों को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को दिए गए फैसले/जजमेेंट की जानबूझकर अव्हेलना का जिम्मेवार नहीं ठहरया जा सकता है। अच्छा रहेगा, कथित चूक को बदल कर इस न्यायालय द्वारा बरकरार रखे गए अवार्ड की गलत समझ के तौर पर जगह दी जाए। इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाएगा, ताकि न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 की धारा 2बी में परिभाषित सिविल अवमानना के उत्तरदायित्व को अकर्षित किया जा सके। यद्यपि कथित चूक हमारे लिए स्पष्टत: साक्ष्य है,किसी भी समाचारपत्र प्रतिष्ठान को जानबूझकर या इरादतन ऐसा करने के विचार की गैरमौजूदगी में अवमानना का उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर वे अवार्ड को इसकी उचित भावना और प्रभाव में, इस रोशनी के साथ कि हम अब क्या राय/समझौता प्रस्तावित करते हैं, लागू करने का एक और अवसर पाने के हकदार हैं।
  2. मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को इस अदालत ने दिनांक 07.02.2014 को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिए गए फैसले में मंजूरी दे दी गई है। इसलिए, इस अवार्ड को पूर्ण रूप से लागू किया जाना है। हालांकि यह सही है कि संबंधित मुद्दों (i) खंड 20जे, (ii)क्या पुरस्कार अनुबंधित कर्मचारियों पर लागू होता है, (iii) क्या इसमें वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन शामिल है और (iv) वित्तीय क्षरण/घाटे की सीमा जो कि बकाए के भुगतान को रोकने के लिए उचित होगी, को विशेष रूप से किसी भी अवार्ड या इस न्यायालय के फैसले में नहीं निपटा गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है हो सकता है कि अवार्ड की शर्तों के क्षेत्र और दायरे की पुनरावृत्ति जरूरी और उचित होगी। न्यायलय के आदेश(ओं) का उचित और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हम इसके बाद ऐसा करने का प्रस्ताव करते हैं।
  3. जहां तक कि अधिनियम के प्रावधानों के साथ पढ़े जाने वाले अवार्ड के अभी तक के अत्याधिक विवादास्पद मुद्दे क्लॉज 20(जे) का का स्वाल है, यह स्पष्ट है कि अधिनियम की धारा 2(सी) में परिभाषित प्रत्येक अखबार कर्मचारी को अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन/मजदूरी प्राप्त करने की गारंटी का हकदार बनाता है। अधिसूचित वेतन/मजदूरी, जैसा कि हो सकता है, सभी मौजूदा अनुबंधों की जगह लेती है(supersedes करती है)। हालाकि विधायिका ने धारा १६ के प्रावधानों को शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया है कि मजदूरी तय होने और अधिसूचित होने के बावजूद , संबंधित कर्मचारी के लिए अधिनियम की धारा 12 की अधिसूचना के मुकाबले उसे अधिक फायदा देने वाले/अनुकूल किसी लाभ को स्वीकार करने का अवसर हमेशा खुला रहेगा। मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड का क्लॉज 20(जे), इसलिए, उपरोक्त रोशनी में पढऩा और समझना होगा। अधिनियम के तहत एक कर्मचारी को जो देय है, उससे कम प्राप्त करने के विकल्प की उपलब्धता पर अधिनियम खामोश है। इस प्रकार का विकल्प वास्तव में आर्थिक छूट के सिद्धांत के दायरे में है, संबंधित कर्मचारियों के विशिष्ट स्टैंड/दृढ़मत को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले में ऐसा मुद्दा नहीं उठता है, जो वर्तमान मामलों में उनके द्वारा तैयार की गई कथित रूप से अनैच्छिक प्राकृति की अंडरटेकिंग(परिवचन/वचन) से संबधित है। इसलिए अधिनियम की धारा 17 के तहत तथ्यों की पहचान करने वाली अथारिटी/प्राधिकरण द्वारा इसके तहत उत्पन हो रहे विवाद का निराकरण किया जाना चाहिए, जैसा कि बाद में व्यक्त/विज्ञापित किया गया है।
  4. विधायिका के इतिहास से संबंधित किसी भी घटना में और अधिनियम को अधिनियमित/लागू करने से प्राप्त होने वाले उद्देश्य अर्थात अगर समाचारपत्र कर्मचारियों के लिए उचित मजदूरी नहीं है, तो न्यूनतम उपलब्ध करवाने के लिए, विजय कॉटन मिल्ज लि. और अन्य बनाम अजमेर राज्य (एआईआर1955 एससी 33) मामले में घोषणा/निर्णय के अनुपात के तहत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत अधिसूचित तय मजदूरी को बिना-मोलभाव के कारण मौजूदा अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से नियंत्रित किया जाएगा। बिजय कॉटेन मिल्ज़ लिमिटेड(सुप्रा) मामले की रिपोर्ट में पैरा चार, जोकि विशिष्ट सूचना के लिए उपरोक्त मुद्दे से जुड़ता है, नीचे दिया गया है:

“4. यह शायद ही विवादित हो सकता है कि श्रमिकों को जीने के लिए मजदूरी सुरक्षित करना, जो न केवल महज शारीरिक निर्वाह परंतु साथ ही स्वास्थ्य और मर्यादा का पोषण/अनुरक्षण करता है, जनता के सामान्य हित के अनुकूल है। हमारी संविधान के अनुच्छेद 43 में समाहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि 1928 में जिनेवा में एक न्यूनतम मजदूरी फिक्सिंग सम्मेलन आयोजित किया गया था और इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों को अंतरराष्ट्रीय श्रम संहिता में शामिल किया गया था। कहा जाता है कि इन प्रस्तावों को प्रभावी बनाने के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम परित किया गया था। साउथ इंडिया एस्टेट लेबर रेजोल्यूशंस आर्गेनाइजेशनबनाम स्टेट आफ मद्रास(एआईआर 1955 एमएडी45,पृष्ठ47) के अनुसार:

यदि श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के आनंद से सुरक्षित किया जाना है और वे अपने नियोक्ता के शोषण से सुरक्षित किए जाने हैं, तो यह पूरी तरह जरूरी है कि उनके अनुबंध की आजादी पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए और इन पावंदियों को किसी भी मायने में अनुचित नहीं ठहरया जा सकता। दूसरी ओर, नियोक्ताओं को शिकायत करते नहीं सुना जा सकता, अगर वे अपने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने को मजबूर करते हैं, भले ही मजदूर अपनी गरीबी और असहाय होने के कारण कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं।  (जोर/Emphasis हमारा है)

  1. अधिनियम के प्रावधानों में या वेजबोर्ड अवार्ड की शर्तों में ऐसा कुछ नहीं है, जो हमें अवार्ड के लाभ देने के लिए अनुबंध या ठेका कर्मचारियों को छोड़ कर, नियमित कर्मचारियों तक सीमित करेगा। इस संबंध में हमने अधिनियम की धारा 2(सी), 2(एफ) और 2(डीडी) में परिभाषित समाचारपत्र कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों की परिभाषा पर ध्यान दिया है। जहां तक वेरिएबल-पे का संबंध है, इस पर पहले ही उपरोक्त पैरा 7 में ध्यान दिया गया है और सारगर्भित किया गया है, जब यह न्यायालय वेरिएवल-पे की अवधारणा पर चर्चा की, तो विचार किया कि इस राहत का मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड में उचित और न्यायसंगत निरुपण किया गया है। इसलिए वेरिएबल-पे के संबंध में कोई अन्य विचार लेकर इस लाभ को दबाने/रोकने का कोई प्रश्र नहीं उठता है। वास्तव में अवार्ड के प्रासंगिक भाग का एक पठन यह दर्शाता है कि वेरिएबल-पे की अवधारणा, जो अवार्ड में लागू की गई थी, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट में निहित ग्रेड-पे से ली गई है और इसका उद्देश्य अधिनियम के दायरे में आने वाले श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों को याथासंभव केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समतुल्य लाना है। जहां तक कि भारी नकदी हानि की बात है, हमारा मानना है कि बिलकुल वही भाव स्वयं इंगित करता है कि वह वित्तीय कठिनाइयों से अलग है और इस तरह की हानि प्रकृति में पंगु होने की सीमा से अलग, अवार्ड में निर्धारित समय की अवधि के अनुरुप होने चाहिए। यह तथ्यात्मक सवाल है जिसे केस टू केस या मामला दर मामला निर्धारित किया जाना चाहिए।
  2. इस मामले में सभी संदेहों और अस्पष्टताओं को स्पष्ट करते हुए और यह मानते हुए कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान को, हमारे समक्ष मामलों के तथ्यों में, अवमानना करने का दोषी नहीं ठहरया जाना चाहिए, हम निर्देश देते हैं कि अब से मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू न किए जाने या अन्यथा के संबंध में सभी शिकायतों को अधिनियम की धारा 17 के तहत मुहैया करवाए गए तंत्र के अनुसार निपटाया जाएगा। न्यायालयों के अवमानना क्षेत्राधिकार या अन्यथा के इस्तेमाल के लिए दोबारा न्यायालयों से संपर्क करने के बजाय अधिनियम के तहत मुहैया करवाई गई प्रवर्तन/इन्फोर्समेंट और उपचारकारी मशीनरी द्वारा ऐसी शिकायतों का समाधान किया जाना अधिक उचित होगा।
  3. जहां तक कि तबादलों/ बर्खास्तगी के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली रिट याचिकाओं के रूप में, जैसा कि मामला हो सकता है, से संबंध है, ऐसा लगता है कि ये संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं की सेवा शर्तों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के अत्याधिक विशेषाधिकार रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल इस तरह के सवाल के अधिनिर्णय के लिए करना न केवल अनुचित होगा परंतु ऐसे सवालों को अधिनियम के तहत या कानूनसंगत प्रावधानों(औद्योगिक विवाद अधिनियमए 1947 इत्यादि), जैसा कि मामला हो सकता है, के तहत उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष समाधान के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।
  4. उपरोक्त राशनी में, सभी अवमानना याचिकाओं के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई रिट याचिकाओं का उत्तर मिल गया होगा और उपरोक्त संबंध में इनका निपटारा किया जाता है।

राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों

श्रीकांत सिंह। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि गैरकानूनी काम करने वाली कंपनियों पर कडी कार्रवाई होगी। तीन लाख ऐसी कंपनियां हैं जो आर्थिक लेनदेन के मामले में शक के घेरे में हैं और एक लाख कंपनियों का पंजीकरण निरस्‍त कर दिया गया है। ऐसा फैसला राजनीतिक गुणा भाग करने वाले नहीं, राष्‍ट्र के लिए जीने वाले ही कर सकते हैं। मैं मोदी जी से यह पूछना चाहता हूं-आप अखबार मालिकों के मामले में कब राजनीतिक गुणा भाग लगाना बंद करेंगे। कुछ गिने चुने अखबार मालिक न केवल गैरकानूनी काम कर रहे हैं, मजीठिया अवमामनना मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर देश की सर्वोच्‍च अदालत का अपमान भी कर रहे हैं।

पिछले दिनों मैंने दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव से फोन पर मजीठिया वेतनमान लागू करने का आग्रह किया तो वह सरासर झूठ बोल गए और कहा कि दैनिक जागरण में मजीठिया वेतनमान पहले से लागू है। मतलब साफ है कि वे मजीठिया वेतनमान नहीं देना चाहते हैं, भले इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने आइने की तरह साफ कर दिया है।

मोदी जी, ये अखबार मालिक जिन लोगों के साथ अत्‍याचार कर रहे हैं, वे गरीब लोग ही हैं। आपकी परिभाषा में गरीब कौन है, यह समझ से परे है। अभी तक किसी अखबार मालिक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। किसी अखबार का पंजीकरण भी निरस्‍त नहीं किया गया है। आप राष्‍ट्र के लिए जीने मरने की कसम खा चुके हैं तो सबसे पहले इन मुनाफाखोर अखबार मालिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराएं, भले ही वे भाजपा और आपका गुणगान क्‍यों न करते हों।

आपकी नजर में यदि राष्‍ट्रवाद अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना है तो अपने विरोधियों की कंपनियों को चुन चुन कर बर्बाद कर दीजिए और अखबार मालिकों के अत्‍याचार को फलने फूलने दीजिए। आप सरकार में हैं, सत्‍ता आपके हाथ में है। आप किसी को भी कुचल दें और किसी को भी बचा दें, इस पर फिलहाल आपका अख्तियार है। फिर आप राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों रच रहे हैं।

मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट का आदेश 19 जून 2017

श्रीकांत सिंह।

मजीठिया अवमानना मामले पर सुप्रीम कोर्ट के 19 जून 2017 के आदेश को लेकर तरह तरह की आशंकाओं और भ्रम के कारण लोग इस दुविधा में हैं कि उनका हक मिलेगा भी या नहीं। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपको आपका हक मिलेगा और जरूर मिलेगा, लेकिन थोड़ा संघर्ष तो करना ही होगा। आपको बता दें कि मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मालिकान डरे हुए हैं। इस डर का ही परिणाम है कि जागरण प्रकाशन लिमिटेड का एक निवेशक निकल भागा है। शायद उसे शक है कि मजीठिया देना पड़ गया तो उसका नुकसान उसे भी होगा। यहां हम सुप्रीम कोर्ट का आदेश यथावत अपलोड कर रहे हैं और बाद में हिंदी वर्जन भी अपलोड करेंगे। आप उस आदेश को ठीक से पढ़ें और उसके अनुसार अपने क्षेत्र के उपश्रमायुक्‍त से कदम उठाने का अनुरोध करें।

न्‍याय व्‍यवस्‍था का काला अध्‍याय  

श्रीकांत सिंह।

अराजकता तभी आती है, जब न्‍याय व्‍यवस्‍था फेल हो जाती है। सबसे पहले सक्षम लोग अराजकता फैलाते हैं और शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था परवान चढने लगती है। अक्षम लोगों पर अत्‍याचार इतना बढ जाता है कि वे हथियार उठाने को बाध्‍य हो जाते हैं। नक्‍सल समस्‍या तो इसका एक उदाहरण भर है। भविष्‍य कितना भयावह होने जा रहा है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। मजीठिया अवमानना मामले में 19 जून 2017 को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह न्‍याय व्‍यवस्‍था के काले अध्‍यायों में दर्ज हो चुका है।

बडी मुश्किल से छोटे पत्रकारों की बडी टीम सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंची। वर्षों तक केस को लटकाए रखा गया। अंत में फैसला वही ढाक के तीन पात। ताजा फैसले में कुछ भी नया नहीं है। अवमानना के केस का मतलब ही यही है कि अदालत के आदेश का उल्‍लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्‍य में वे ऐसी जुर्रत न कर सकें।

तो दोषियों को दंडित कौन करेगा। न्‍याय पालिका ने तो पल्‍ला झाड लिया है। क्‍या इसका मतलब यही समझा जाए कि लोग खुद निपट लें। न्‍याय पालिका, पुलिस, प्रशासन आदि के अधिकारी क्‍या लोगों की गाढी कमाई से जुटाए गए राजस्‍व से केवल सैलरी उठाएंगे और कोई काम नहीं करेंगे। उन्‍हें कर्तव्‍य बोध कौन कराएगा।

हमारे नेता तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। हर पांच साल बाद जुमले छोड कर आपको मूर्ख बनाएंगे और भारी बहुमत से जीत हासिल कर लेंगे। आखिर कब तक चलेगा यह सब। कौन है जो न्‍याय पालिका को पंगु बना रहा है। कौन है जो इस देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहा है। उसे पहचानना और दंडित करना जरूरी हो गया है, क्‍योंकि यह देश हमारा है, उनका नहीं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर लग जाएं अधिकारियों के पीछे

श्रीकांत सिंह।

पिछले आलेख का संदर्भ लें तो हमने कहा था कि मायूस होने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढने और समझने की जरूरत है। मैंने आज ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा पढा और जो मेरी समझ में आया उसे आपके सामने रख रहा हूं। अगर आपको कहीं संदेह लगे तो आप भी आदेश को पढें और उस संदर्भ में मुझसे चर्चा कर सकते हैं। मेरा मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जो आशंका जताई जा रही है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुन: हमें श्रम आयुक्‍त या लेबर कोर्ट का रास्‍ता दिखा दिया है, जबकि कोर्ट का आदेश कहता है- Section 17 of the act deals with recovery of money due from an employer. As a core issue on the maintainability of the presrnt contempt cases centers around the remedy provided for by the aforesaid provision of the act, section 17 of the Act may be set out hereunder. यानी, सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना मामलों को न्‍यायसंगत ढंग से निपटाने के लिए धारा 17 के तहत प्रावधान किए गए हैं, जिनका निस्‍तारण संबंधित अधिकारारियों द्वारा ही संभव है। इस बारे में धारा 17 के विभिन्‍न खंडों में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि वे अधिकारी हमें टरकाने लगेंगे तो हम क्‍या करेंगे… उसके लिए आपको जीवटता तो दिखानी ही पडेगी। आपको अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी और संयुक्‍त रूप से अधिकारियों को घेरना होगा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उन्‍हें काम करने के लिए बाध्‍य करना होगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए स्‍पष्‍ट निर्देश दे रखा है। देखें-धारा 17-1, 17-2, 17-3।

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि 20-जे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढें तो उसमें साउथ इंडिया इस्‍टेट लेबर रिलेशंस आर्गनाइजेशन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास की नजीर देकर समझाया गया है कि सेवायोजकों की यह शिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उनके कर्मचारी इस आधार पर कम वेतन पर काम करना चाहते हैं कि वे अत्‍यंत गरीब और असहाय हैं।

तबादला, निलंबन और प्रताडना मामलों के संदर्भ में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ऐसे मामलों का निस्‍तारण उचित प्राधिकारी ही कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संबंधित अधिकारी मनमानी करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। उन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उनसे काम कराया जा सकता है। ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर पाएंगे मगर आपको भी सख्‍ती दिखानी होगी।

पत्रकार भाई मायूस न हों, मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से समझें

श्रीकांत सिंह।

लंबी प्रतीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून 2017 को मजीठिया अवमानना मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया तो खबरों का भवंरजाल कुछ इस तरह से फैला कि लोग भ्रमित होने लगे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर फैसले की कॉपी अपलोड हो गई है, लेकिन लोगों का भ्रम दूर नहीं हो रहा है। इस वजह से तमाम पत्रकार और गैर पत्रकार अखबार कर्मचारी मायूस होने लगे हैं। जबकि मायूस होने के उतने कारण नहीं हैं, जितने कि लोग मायूस होने लगे हैं। पहली बार मजीठिया मामले को इतनी बड़ी कवरेज मिली है और गूगल समाचार पर मजीठिया अवमानना मामले पर फैसले से संबंधित खबरें फ्लैश हो रही हैं।

मौखिक तौर भी तमाम भ्रामक बातें फैल रही हैं। कोई कह रहा है कि श्री अरुण जेटली ने श्री रंजन गोगोई से अखबार मालिकों की डील कराई है तो कोई कह रहा है कि 16 जून को केंद्र सरकार की ओर से बुलाई गई बैठक में ही सबकुछ सेट करा दिया गया था। खैर, सुप्रीम कोर्ट का आदेश अपनी जगह पर बरकरार है और बहुत सारी उलझनें भी सुलझा दी गई हैं। अब जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढ़ा जाए और उसके अनुरूप अपने हक के लिए लड़ा जाए। किस समाचार माध्‍यम ने क्‍या लिखा है, उसे धन्‍यवाद और साभार ज्‍यों का त्‍यों हम यहां दे रहे हैं। उन समाचारों को पढ़ कर आपको काफी कुछ समझने में मदद मिलेगी। आपको जो समझ में न आए, उस बारे में हमारी मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

बीबीसी हिंदी

मजीठिया वेज बोर्डः सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कौन हारा कौन जीता?

संदीप राय बीबीसी संवाददाता, दिल्ली।

मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अख़बार मालिकों को ‘विलफ़ुल डिफॉल्टर’ यानी जानबूझ कर अवमानना करने वाला नहीं माना. सोमवार को फैसला देते हुए कोर्ट ने कर्मचारियों की ओर से दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया लेकिन साथ ही वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए अख़बार समूहों और समाचार एजेंसियों को एक और मौका दिया.

कर्मचारी इसे अपने हक़ में बड़ा फैसला मान रहे हैं जबकि इस मामले में पैरवी करने वाले दोनों पक्षों का वकील इसे संतुलित फैसला मान रहे हैं. आइए पांच बिंदुओं में जानते हैं कि ताज़ा फैसला क्या है और इसमें कर्मचारियों और अख़बार समूहों के मालिकों के लिए क्या आदेश दिए गए हैं.

कर्मचारियों के लिए क्या हैं मायने?

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कांट्रैक्चुअल कर्मचारी, 20-जे और वैरिएबल पे को स्पष्ट करते हुए कहा है कि संस्थान में नियुक्त स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों को समान रूप से नये वेतनमान का लाभ मिलना चाहिए. मजीठिया वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों में 20-जे एक विवादास्पद धारा रही है जिसमें संस्थान और कर्मचारियों के समझौते पर आधारित वेतन देने की बात कही गई थी.

कर्मचारियों का कहना है कि इसकी आड़ में संस्थान नया वेतनमान लागू करने से बचते रहे हैं. कई संस्थानों ने इस बावत मौजूदा वेतन पर सहमति के हस्ताक्षर करवाकर सबूत के तौर पर कोर्ट में इसे पेश भी किया. लेकिन अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 20-जे के तहत केवल कर्मचारी को लाभ की स्थिति में ही समझौता मान्य होगा यानी कम वेतन पर समझौता मान्य नहीं होगा.

कोर्ट ने वैरियेबल पे (परिवर्तनीय वेतन) लागू करने का भी साफ़ निर्देश दिया है. इससे उन संस्थानों के कर्मचारियों को फ़ायदा होगा, जहां नया वेतनमान तो लागू हो गया है लेकिन वैरिएबल पे को छोड़ दिया गया है.

क्या कहते हैं कर्मचारी?

दैनिक जागरण समूह के ख़िलाफ़ कोर्ट में जाने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक अशोक राणा ने बीबीसी से कहा, “इस फैसले से कर्मचारियों के एक बड़े हिस्से को फ़ायदा होने वाला है, लेकिन बहुत सारे कर्मचारी फिर से पुरानी स्थिति में आ गए हैं.”

अशोक राणा के अनुसार, ‘कोर्ट ने स्थायी और अनुबंध पर रखे गए पत्रकारों के बीच कोई भेद मानने से इनकार किया है. इससे उन कर्मचारियों को फ़ायदा होगा जहां वेतन सिफ़ारिशें लागू हुई हैं लेकिन अनुबंध के कर्मचारियों को इससे अलग रखा गया है, जैसे समाचार एजेंसी पीटीआई या इंडियन एक्सप्रेस समूह.’

वो इस फैसले को कर्मचारियों की आंशिक जीत मानते हैं, “कोर्ट ने भले ही मालिकों को विलफ़ुल डिफ़ाल्टर नहीं माना, हालांकि कोर्ट के सामने इसकी कई नज़ीर थी और अवमानना का मामला खारिज कर दिया.” दैनिक जागरण के कर्मचारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले जाने माने वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस ने इसे ‘कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला’ बताया है. उन्होंने कहा, “कांट्रैक्चुअल कर्मचारियों, वैरिएबल पे और 20 जे- पर स्पष्ट आदेश कर्मचारियों के लिए बहुत बड़े फायदे की बात है.”

अख़बार समूहों पर क्या असर पड़ेगा?

 इस मामले में दैनिक जागरण और टाइम्स ग्रुप की ओर से पैरवी कर चुके सुप्रीम कोर्ट के वकील वीरेंद्र कुमार मिश्रा, इस फैसले को बहुत ‘संतुलित’ मानते हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, “माननीय कोर्ट का फैसला बहुत संतुलित है. इसमें एक तरफ़ कर्मचारियों की चिंताओं को दूर किया गया है तो दूसरी तरफ़ मालिकों को वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों को ईमानदारी से लागू करने का मौका दिया है.”

एडवोकेट वीरेंद्र मिश्रा के अनुसार, कोर्ट ने कहा है कि नियोक्ता के साथ आगे के किसी भी विवाद को एक प्रक्रिया के तहत श्रम आयुक्त, श्रमिक अदालत या संबंधित तंत्र के मार्फ़त हल किया जाय.

कुछ कर्मचारी क्यों हैं निराश?

दैनिक जागरण के ख़िलाफ़ मुख्य याचिकाकर्ता अभिषेक राजा फैसले के इस हिस्से को ‘निराशाजनक’ बताते हैं. राजा कहते हैं, “कोर्ट में क़रीब चार साल की लड़ाई का नतीजा ये है कि हम फिर से लेबर कोर्ट के चक्कर लगाएं.” उनके अनुसार, “ये फैसला फिर उसी जगह चला गया है, जब 7 फ़रवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों को मानने का आदेश दिया था.”

अभिषेक राजा का कहना है कि ‘कर्मचारी बड़ी उम्मीद में थे कि अदालत वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें लागू करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित करेगी. लेकिन लगता है कर्मचारियों को अभी लंबी अदालती लड़ाई लड़नी पड़ेगी.’

इंडियन एक्स्प्रेस न्यूज पेपर्स वर्कर्स यूनियन के महासचिव पीयूष वाजपेयी कहते हैं, “वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों को लागू करने की मांग करने वाले जिन कर्मचारियों की नौकरी चली गई, उनका ट्रांसफ़र हुआ, उस पर कोई दिशा निर्देश आने की उम्मीद की जा रही थी.” अभिषेक राजा के अनुसार, अकेले दैनिक जागरण समूह में 300 कर्मचारियों को निकाला गया था.

क्या है मामला?

पिछली यूपीए सरकार ने पत्रकारों के वेतन को पुनः निर्धारण के लिए मजीठिया वेज बोर्ड गठित किया था. बोर्ड पूरे देश भर के पत्रकारों और मीडिया कर्मियों से बातचीत कर सरकार को अपनी सिफ़ारिश भेजी थीं. तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने इन सिफ़ारिशों को मानते हुए, इसे लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की थी.

लेकिन अख़बार मालिकों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फ़रवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लागू करने के आदेश पर मुहर लगा दी. कोर्ट ने अप्रैल 2014 से एरियर और नए मानदंडों पर वेतन और एक साल के अंदर एरियर देने का आदेश दिया. लेकिन जब संस्थानों ने इसे लागू नहीं किया तो कर्मचारी अवमानना की याचिका लेकर फिर उसी अदालत में पहुंच गए.

इस मामले में विभिन्न अख़बारों और समाचार एजेंसियों के कर्मचारियों की ओर से कुल 83 याचिकाएं आईं, जिनमें क़रीब 10,000 कर्मचारी शामिल थे. सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस की यूनियन ने अगस्त 2014 में अवमानना याचिका दायर की थी. लेकिन मामले बढ़ते गए और अलग अलग सुनवाई कर पाना मुश्किल हो गया तो सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मुकदमों को एक साथ नत्थी कर दिया और संयुक्त सुनवाई शुरू की थी.

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एनडीटीवी इंडिया

मजीठिया केस : अखबार मालिक अवमानना के दोषी नहीं, कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मियों को भी लाभ दें: सुप्रीम कोर्ट

मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू ना करने पर देश के बड़े अखबार समूहों के खिलाफ दाखिल अदालत की अवमानना के मामले में फैसला सुनाया है.

आशीष कुमार भार्गव की रिपोर्ट, नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू ना करने पर देश के बड़े अखबार समूहों के खिलाफ दाखिल अदालत की अवमानना के मामले में फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि अखबार समूहों ने आदेश के बावजूद डिफॉल्ट किया लेकिन ये जानबूझकर नहीं किया इसलिए उनके खिलाफ अवमानना का मामला नहीं बनता. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि वित्तीय घाटा वेज बोर्ड लागू न करने की कोई वजह नहीं. कोर्ट ने इसे लागू करने के लिए जो एक्ट में प्रावधान हैं उसी मशीनरी के तहत मामले का निपटारा करने के आदेश दिए.  मजीठिया आयोग की सिफारिशें सभी रेगुलर और कॉन्ट्रैक्ट वाले कर्मियों पर लागू होंगी.

तीन मई को कोर्ट ने सारी दलीलों की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मियों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए, लेकिन इस आदेश का पालन मीडिया संस्थानों ने नहीं किया.

देश के बड़े समाचार समूहों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया. आरोप है कि मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ से वंचित रखा. जिन कर्मचारियों ने इनकी बात नहीं मानी, उन्हें स्थानांतरण करके प्रताड़ि किया जा रहा है. कईयों को नौकरी से निकाल दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों, श्रम विभाग और सूचना व जन सम्पर्क निदेशालयों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए जिम्मेदारी तय की है, लेकिन वे इसकी पालना नहीं करवा रहे हैं. वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं दायर की. इसके बाद देशभर से सभी बड़े अखबारों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं लगी.

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नवभारत टाइम्‍स

शीर्ष अदालत ने मजीठिया वेजबोर्ड सिफारिशें लागू नहीं करने के मुद्दे पर अपना फैसला सुनाया

नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा)।  

उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि कुछ अखबार संस्थानों द्वारा पत्रकारों एवं गैरपत्रकारों के वेतनमान पर मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू नहीं करना जानबूझाकर की गई ऐसी चूक नहीं है जो अवमानना मानी जाए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उसने सात फरवरी 2014 को अपने फैसले में वेजबोर्ड सिफारिशों को मंजूरी दी थी और इसलिए इन्हें पूरी तरह से लागू करना होगा।

शीर्ष अदालत ने वेजबोर्ड की सिफारिशों और उसके फैसले को लागू करने का एक और मौका दिया और कहा कि सिफारिशों को लागू नहीं करना या इनका कुछ हिस्सा लागू करना संबंधित अखबारी संस्थानों द्वारा खास तरीके से सिफारिशों को समझाने के कारण होता है। शीर्ष अदालत ने पत्रकारों, गैरपत्रकारों और संघों द्वारा दायर 83 अवमानना याचिकाओं का निपटारा करते हुए अपना फैसला सुनाया।

न्यायमूर्त रंजन गोगोई और न्यायमूर्त िनवीन सिन्हा की पीठ ने कहा कि कथित चूक :डिफाल्ट: इस अदालत द्वारा बरकरार रखी गईं सिफारिशों की गलत समझा के कारण हुई है। यह अदालत अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2 :बी: के तहत परिभाषित दीवानी अवमानना के दायित्व की तरफ जाने वाली इरादतन चूक नहीं मानी जाएगी।

पीठ ने कहा कि कथित चूक वैसे तो स्पष्ट रूप से हमारे लिए साक्ष्य है, इसे करने की इरादतन मंशा का अभाव किसी भी अखबारी संस्थान को अवमानना का भागी नहीं बना सकता। वहीं दूसरी ओर, जो कुछ हमने कहा उसके आलोक में, वे सिफारिशों को उनकी उचित भावना एवं प्रभाव में लागू करने के एक और अवसर के हकदार हैं।

पीठ ने कहा कि सिफारिशों का उपबंध 20 :जे: और श्रमजीवी पत्रकार एवं अन्य समाचार पत्र कर्मचारी :सेवा की स्थितियां: एवं विविध प्रावधान अधिनियम 1955 इसमें परिभाषित हर समाचारपत्र कर्मचारी को वेतन :वेज: प्राप्त करने का हकदार बनाता है, जैसी कि वेजबोर्ड ने सिफारिश की है और केन्द्र सरकार ने इसे मंजूरी दी है एवं अधिसूचित किया है।

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इनाडू इंडिया

कांट्रैक्चुअल कर्मचारियों को भी देना होगा मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया संस्थानों में काम करनेवाले पत्रकारों और गैर पत्रकारों को लेकर जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू नहीं करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर आज फैसला सुना दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी मीडिया संस्थान में काम करनेवाले कांट्रैक्चुअल कर्मचारियों को भी मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ देना होगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सात फरवरी 2014 को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू करने के अपने फैसले पर मुहर लगाते हुए सभी मीडिया संस्थानों को इसे लागू करने का निर्देश दिया है। पिछले तीन मई को कई याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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सत्‍याग्रह

मजीठिया वेज बोर्ड विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया

सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों को वेज बोर्ड की सभी सिफारिशें लागू करने और कर्मचारियों के बकाया वेतन-भत्ते का तय समय में भुगतान करने का निर्देश दिया है

सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पत्रकारों और अखबार मालिकों के बीच जारी विवाद में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया है. खबरों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रिंट मीडिया समूहों को मजीठिया वेज बोर्ड की सभी सिफारिशें लागू करने का निर्देश दिया है. जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि ये समूह वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करते हुए नियमित और संविदा कर्मियों के बीच कोई अंतर नहीं करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट की अवमानना याचिका पर यह फैसला सुनाया है. अदालत ने इस पर तीन मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि अखबारों को अपने कर्मचारियों को 11 नवंबर 2011 से मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा तय वेतन और भत्तों का भुगतान करना होगा. इसके अलावा मार्च 2014 तक के बकाया वेतन-भत्तों का एक साल के भीतर चार किश्तों में भुगतान करना होगा. मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लेकर अखबारी समूहों की दलील थी कि ये सिफारिशें लागू करना उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर है. उनका यह भी कहना था कि अगर इन्हें लागू करने में जोर-जबरदस्ती की गई तो अखबार आर्थिक समस्याओं में घिर सकते हैं.

प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन भत्तों की समीक्षा करने के लिए कांग्रेसनीत पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड बनाया था. इसने चार साल बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे केंद्रीय कैबिनेट ने स्वीकार कर लिया था. इसे 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित कर दिया गया था. लेकिन, अखबारी समूहों ने इसे मानने से इनकार करते हुए इसे अदालत में चुनौती दी थी. इसके बाद फरवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने वेज बोर्ड की सिफारिशों पर मुहर लगाते हुए इसे लागू करने का निर्देश दिया था.

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जनप्रहरी एक्‍सप्रेस

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: उसे ही मिलेगा मजीठिया वेजबोर्ड, जो लेबर कोर्ट में लड़ेगा

जयपुर।

मजीठिया वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश रंजन गोगोई व जस्टिस नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने दोपहर तीन बजे यह फैसला सुनाते हुए कहा कि वेजबोर्ड से संबंधित मैटर संबंधित लेबर कोर्टों में सुने जाएंगे।

वेजबोर्ड में बन रहा पत्रकारों व गैर पत्रकारों का एरियर समेत व अन्य वेतन भत्ते संबंधित लेबर कोर्ट या अन्य कोर्ट में ही तय किए जाएं। संबंधित कोर्ट इन पर त्वरित फैसला करें। वेज बोर्ड में सबसे विवादित बिंदू 20-जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 20-जे को लेकर एक्ट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है। इसलिए इसका फैसला भी संबंधित कोर्ट ही तय करेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अवार्ड को गलत समझने के चलते मीडिया संस्थानों पर कंटेम्प्ट नहीं बनती।

अवमानना याचिकाओं में दायर ट्रांसफर, टर्मिनेशन व अन्य प्रताडऩाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश नहीं दिए। सुप्रीम कोर्ट के 36 पेजों में दिए गए फैसले से साफ है कि कोर्ट ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ कटेम्प्ट को नहीं माना लेकिन साफ कहा भी है कि कर्मचारियों को वेजबोर्ड दिया और वेजबोर्ड से संबंधित एरियर वेतन भत्ते कर्मचारियों की प्रताडऩा आदि से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी लेबर कोर्ट पर डाली है। अब लेबर कोर्ट ही पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मामले में फैसला देगा। इससे स्पष्ट है कि जिसे वेजबोर्ड चाहिए उसे लेबर कोर्ट ही जाना ही होगा।

गौरतलब है कि करीब ढाई साल से वेजबोर्ड के लिए देश के हजारों पत्रकार व गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफ ारिशों को लागू नहीं करने पर देश के नामचीन मीडिया संस्थान राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी समेत कई मीडिया संस्थानों के खिलाफ पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई। दो साल सुनवाई के बाद पिछले महीने कोटज़् ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। पत्रकारों की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजालविस, परमानन्द पांडे ने पैरवी की, वहीं मीडिया संस्थानों की तरफ से देश के नामचीन वकील मौजूद रहे।

यह है मजीठिया वेजबोर्ड प्रकरण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफ सिफारिशों के अनुरुप पत्रकारों व गैर पत्रकार कमिज़्यों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं, लेकिन समानता, अन्याय के खिलाफ लडऩे, सच्चाई और ईमानदारी का दंभ भरने वाले राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक नवज्योति, महानगर टाइम्स, राष्ट्रदूत, ईवनिंग पोस्ट, ईवनिंग प्लस, समाचार जगत, सांध्य ज्योति दपज़्ण आदि कई दैनिक समाचार पत्र है, जिन्होने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उडाते हुए राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर जैसे बड़े समाचार पत्रों में तो वहां के प्रबंधन ने मानवीय पहलु और कानूनों को ताक में रखकर अपने कर्मचारियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए, ताकि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं दे पाए। हस्ताक्षर नहीं करने वाले कर्मचारियों को स्थानांतरण करके प्रताडि़त किया गया। सैकड़ों पत्रकारों व गैर पत्रकारों के दूरस्थ क्षेत्रों में तबादले कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों, श्रम विभाग और सूचना व जन सम्पर्क निदेशालयों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए जिम्मेदारी तय की है, लेकिन इन्होंने कोई पालना नहीं करवाई। जबकि मजीठिया वेजबोर्ड बनने के साथ ही केन्द्र सरकार ने समाचार-पत्रों पर वेतन-भत्तों का बोझ नहीं पड़े, इसके लिए विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी समेत कई अन्य रियायतें प्रदान कर दी थी। वषज़् 2008 से देश-प्रदेश के समाचार पत्रों में सरकारी विज्ञापन बढ़ी दरों पर आ रहे हैं और दूसरी रियायतें भी उठा रहे हैं।

छह साल में विज्ञापनों से समाचार-पत्रों ने करोड़ों-अरबों रुपए कमाए, लेकिन इसके बावजूद समाचार-पत्र प्रबंधन अपने कमज़्चारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं दे रहे हैं। जब आदेशों की पालना नहीं हुई तो देश भर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं लगाकर मीडिया संस्थानों के खिलाफ मोर्चा खोला। यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, छत्तीसगढ़, बिहार आदि राज्यों से सवाज़्धिक अवमानना याचिकाएं लगी।

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सबगुरु न्‍यूज

बडी खबर : मीडिया मालिकों को करना पडेगा मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप भुगतान

नई दिल्ली।

मजीठिया वेज बोर्ड अवमानना मामले में सोमवार को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आ गया। फैसले इस फैसले से तय हो गया की प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ जरूर मिलेगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मीडिया मालिक को अवमानना का दोषी नहीं माना साथ ही वेजबोर्ड के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को लेबर कोर्ट जाने और रिकवरी इशू कराने की सलाह दी है। सुप्रीमकोट जजों ने फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न मानने के पक्ष में लंबी चौड़ी दलीलें पेश की हैं।

पत्रकारों के पक्ष में ये कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों को वेज बोर्ड की सभी सिफारिशें लागू करने और कर्मचारियों के बकाया वेतन-भत्ते का तय समय में भुगतान करने का निर्देश दिया है। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि ये समूह वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करते हुए नियमित और संविदा कर्मियों के बीच कोई अंतर नहीं करेंगे। बता दें कि अदालत ने इस पर तीन मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

क्या है मजीठिया मामला

प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन भत्तों की समीक्षा करने के लिए कांग्रेसनीत पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड बनाया था। इसने चार साल बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे केंद्रीय कैबिनेट ने स्वीकार कर लिया था।

इसे 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित कर दिया गया था। लेकिन, अखबारी समूहों ने इसे मानने से इनकार करते हुए इसे अदालत में चुनौती दी थी। इसके बाद फरवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने वेज बोर्ड की सिफारिशों पर मुहर लगाते हुए इसे लागू करने का निर्देश दिया था।

बता दें कि अखबारों में कार्यरत कर्मियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को अप्रेल 2014 में सुप्रीमकोर्ट द्वारा वैध ठहराने के बावजूद भी मीडिया घरानों ने कर्मचारियों को उनका हक नहीं दिया। ऐसे में इस मामले में अवमानना याचिका दाखिल की गई। लंबी लडाई और उससे भी लम्बी सुप्रीमकोर्ट की सुनवाई के बाद सोमवार को फैसला आया।

जानकारों का कहना है

इस बीच कानून के कुछ जानकारों का कहना है कि कानूनी पेचीदगियों के बीच सुप्रीमकोर्ट का यह फैसला पत्रकारों को किसी तरह का नुकसान पहुंचाने वाला नहीं बल्कि राहत देने वाला है वह इसलिए कि मीडिया समूह मजीठिया की जिन धाराओं का गलत मतलब निकाल कर पैसा देने से बच रहे थे उनमें से अधिकतर पर सुप्रीमकोर्ट ने अपनी राय रख दी है, लेबर कोर्ट को इसी के अनुरूप काम करना होगा। राजस्थान से जुडे अधिकतर पत्रकार जो इस लडाई से जुडे हुए है वे पहले से ही व्यवस्थित तरीके से लेबर कोर्ट में जा चुके हैं।

यूं आसानी से समझें सुप्रीम कोर्ट का आदेश

  1. सभी अखबारों के लिए मजीठिया लागू करना जरूरी।
  2. धारा 20-j खारिज
  3. जो जो लोग भी मजीठिया लेना चाहते हैं उन सभी को लेबर कोर्ट में अप्लाई करना होगा।
  4. मजीठिया के लिए स्थाई और ठेके पर रखे गए लोग सभी हकदार है।
  5. एरियर की गणना लेबर कोर्ट करेगा।
  6. टर्मिनेशन और ट्रांसफर के केस भी केस टू केस लेबर कोर्ट ही सुनेगा।
  7. मजीठिया वेज बोर्ड को सही तरह से नही समझ पाने के कारण मालिको पर अवमानना नहीं होती है।
  8. लेबर कोर्ट के लिए कोई समय सीमा तय नहीं।
  9. सभी राज्य सरकारों और लेबर कोर्ट को मजीठिया लागू करने के निर्देश।
  10. लेबर कोर्ट से RCC कटवानी होगी।

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खास खबर

अखबारों को मजीठिया बोर्ड की सिफारिशें पूरी लागू करनी होंगी : SC

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्देश दिया कि समाचार पत्रों के कर्मचारियों के वेतनों पर मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करना होगा और प्रबंधन भुगतान से बचने के लिए फंड की कमी का हवाला नहीं दे सकता।

न्यायालय ने सोमवार को अपने फैसले में कहा कि जहां तक मजीठिया बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने का सवाल है, तो पूर्णकालिक तथा ठेके के कर्मचारियों में कोई अंतर नहीं है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने तीन मई को इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट सहित समाचार पत्र कर्मचारी संघों की अवमानना याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायालय ने सोमवार को कहा कि समाचार पत्रों ने अदालत के पहले के आदेशों की अवमानना जानबूझ कर नहीं की।

इससे पहले, कई समाचार पत्रों के वकीलों ने दलील दी कि वेतन बोर्ड की सिफारिशें उनके भुगतान करने की क्षमता से बाहर होंगी। प्रिंट मीडिया कंपनियों ने कहा कि भुगतान के लिए मजबूर किए जाने से समाचार पत्रों की वित्तीय व्यवस्था चरमरा जाएगी। समाचार पत्र संघों ने दलील दी कि समाचार पत्र भुगतान करने में सक्षम हैं, लेकिन वे ऎसा करने से बच रहे हैं।

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भड़ास

एनडीटीवी ने मजीठिया मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भ्रामक खबर चलाई

यशवंत सिंह।

एनडीटीवी ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर केवल मीठी मीठी खबर ही अपने यहां चलाई ताकि मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी दी जा सके. भड़ास में जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सारांश प्रकाशित कर इसे एक तरह से मीडियाकर्मियों की हार और मीडिया मालिकों की जीत बताया गया तो देश भर के मीडियाकर्मी कनफ्यूज हो गए. वे चर्चा करने लगे कि किस खबर को सच मानें? एनडीटीवी की या भड़ास की? एनडीटीवी ने जोर शोर से टीवी पर दिखाया कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोई उनसे पूछे कि भइया मजीठिया लागू करने का निर्देश कोई नया थोड़े है और न ही यह नया है कि ठेके वालों को भी मजीठिया का लाभ दिया जाए.

(आज हुए फैसले पर एक वेबसाइट पर छपी मीठी-मीठी खबर)

(एनडीटीवी पर चली मीठी-मीठी पट्टी.)

कांग्रेस के जमाने वाले केंद्र सरकार की तरफ से पहले ही मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कानून बनाकर नोटिफाई कर दिया गया था और इसके खिलाफ वर्षोंं चली सुनवाई के बाद मीडिया मालिकों की आपत्ति को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के आदेश दे दिए थे. ये सब पुरानी बातें हैं. ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देने के खिलाफ अवमानना याचिका का था. फिलहाल जो मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था वह यह था कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं कर रहे हैं इसलिए उन्हें अवमानना का दोषी माना जाए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, संभव हो तो जेल भेजा जाए ताकि आगे से ऐसी हिमाकत न कर सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी नहीं माना. दूसरा मामला यह था कि जिन हजारों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनके संस्थानों ने नहीं दिया, उनको लाभ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई बड़ी पहल करे, आदेश करे. जैसे एक संभावना यह थी कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तरह नेशनल मजीठिया ट्रिब्यूनल बना दिया जाए और यह ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में डे टुडे सुनवाई करके सारे क्लेम को अंजाम तक पहुंचाकर मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाए. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने सारी जिम्मेदारी लेबर कोर्टों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.

अरे भाई, लेबर कोर्ट तो पहले से ही मीडिया मालिकों से फिक्स थे और हैं. लेबर विभाग और कोर्ट मीडिया मालिकों के इशारे पर काम करते हैं, यह कोई नई बात नहीं है. कायदे से सुप्रीम कोर्ट को दोषी लेबर कमिश्नरों को टांगना चाहिए था जो इतने समय बाद भी मीडियाकर्मियों को उनका क्लेम नहीं दिलवा सके. एनडीटीवी की तरफ से फैसले के नतीजे को बताने की जगह मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी देने के लिए केवल मीठी मीठी बातें ही प्रकाशित प्रसारित की गई.

भड़ास का मानना है कि तथ्यों को सही तरीके से और पूरे सच के साथ रखना चाहिए ताकि हकीकत और हालात की पूरी तरह समीक्षा के बाद संबंधित पक्ष अपनी-अपनी अगली और रायलीस्टिक रणनीति तय कर सकें. जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे थे, उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए हैं. लेबर कोर्टोंं में सबको लड़ना है और अच्छे से लड़ना है, बड़े वकीलों द्वारा बनाई गई रणनीति (इस बारे में शीघ्र खबरें भड़ास पर प्रकाशित होंगी या सभी को मेल कर बता दिया जाए) के तहत लड़ना है और मीडिया मालिकों को हराकर अपना हक लेना है. अगर लेबर कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट दाएं बाएं करेंगे तो उनको टांगा जाएगा, उनकी कुंडली निकाली जाएगी और उन्हें नंगा किया जाएगा ताकि वह किसी भी प्रलोभन या दबाव में मीडिया मालिकों का पक्ष न लेकर पूरे मामले में सच और झूठ का फैसला कर न्याय करें.

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हम चाह लें तो मालिक अखबार नहीं निकाल सकते

प्‍यारे पत्रकार भाइयों,

सुप्रीम कोर्ट की शह मिल जाने के बाद अब लाला आपकी नाक में दम करने वाला है। कब तक डेस्‍क पर बैठे-बैठे जिंदगी तमाम कर दोगे। आज अखबार छप रहे हैं, यह आश्‍चर्य की बात है। किसानों ने अपनी सब्‍जी, दूध सब सडक पर फेंक दिया। संघर्ष में डट गए तो सरकार झुक गई। हमारे सामने अखबार मालिकों की कोई औकात नहीं है। हम चाहें तो उसे एक पल में झुका सकते हैं। बस यह संकल्‍प करने की देरी है। आप एक बार संकल्‍प कर लीजिए कि मजीठिया नहीं तो काम नहीं। हम चाह लें तो अखबार मालिक अखबार नहीं निकाल सकते हैं।

हमें एक ऐसी सेना का गठन करना होगा जो अखबार को मार्केट में जाने से रोकेगी। हम तब तक लाला का अखबार बीच चौराहे पर जलाते रहें, जब तक कि वह मजीठिया लागू नहीं कर देता। लाला का अखबार सेना और पुलिस के बल पर नहीं बेचा जा सकता। हम एक और अभियान चला सकते हैं। घर घर संपर्क करके मजीठिया के बारे में जानकारी दे सकते हैं और मजीठिया लागू न करने वाले अखबार का सब्‍सक्रिप्‍शन न लेने का अनुरोध कर सकते हैं।

हम चाह लें तो अखबार का लाला मार्केट में टिक नहीं पाएगा। अगर आप यह सोचते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की शह पाने के बाद लाला आपको आसानी से नौकरी करने देगा तो यह आपकी भूल है। जब आपकी नौकरी जानी तय है और यह भी तय है कि बिना लडे घर बैठे आपको मजीठिया नहीं मिलेगा तो आप संघर्ष के लिए क्‍यों नहीं निकल पडते। हमारे वश में आपको समझाना और स्थिति से अवगत कराना भर है। बाकी आप अपना अच्‍छा बुरा खुद सोच सकते हैं।