एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल का दर्शन

श्रीकांत सिंह।

गुजरात विधानसभा चुनाव आज यानी 17 दिसंबर 2017 को एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल के बीच त्रिशंकु की भांति लटका हुआ है। चुनावी भविष्‍यवाणी करने में कुछ पत्रकारों को छोड़ दें तो ज्‍यादातर भाजपा के पक्ष में ईवीएम की तरह विनम्र, अतिविनम्र और विनम्राधिराज बने हैं। जयशंकर प्रसाद के एक नाटक का संदर्भ लें तो उसमें लिखा है-‘सीधे तने पर्वत के चरणों में कमजोर और लचकदार लताओं को लोटना ही चाहिए।’ ये कमजोर और लचकदार लताएं आज की पत्रकारिता की ओर संकेत करती हैं जिसकी वजह से कभी कभी एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल में उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुव का अंतर सामने आता है। भारत में केजरीवाल के मुख्‍यमंत्री बनने और अमेरिका में डोनाल्‍ड ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने में एक्जिट पोल धोखा खा गए थे। शायद यही वजह रही होगी कि ट्रंप ने अमेरिका के पत्रकारों को फेकू पत्रकार करार दिया था।

दरअसल, एक्जिट पोल के दर्शन की बात करें तो यह उस दशा को दर्शाता है जो हमारे मन की हालत होती है। हमारा मन सत्‍तारूढ़ पार्टी का इतना गुलाम हो चुका होता है कि उसके विरोध में कुछ सोचता ही नहीं। जैसे वैशाख नंदन को वैशाख में सबकुछ हरा-हरा दिखता है वैसे ही आज तमाम पत्रकारों को भाजपा में कोई दोष नजर नहीं आ रहा है। हर कोई अपने आंकड़े में भाजपा को जिताता नजर आता है। किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा भी हो सकती है। अनुमान लगाने में आखिर इतना बड़ा जोखिम कौन उठाए। इसीलिए मैंने भी न तो त्रिशंकु का अनुमान लगाया है और न ही किसी पार्टी विशेष के सत्‍ता में आने का। मैंने साफ-साफ कह दिया है-‘मेरे पास डेढ़ सौ सीटें हैं, जिन्‍हें किसी पार्टी को देना नहीं चाहता। भाजपा को इसलिए नहीं कि उसने उस लायक काम नहीं किया है और विपक्ष को इसलिए नहीं कि वह उतना सक्षम नहीं बन पाया है। ये है एक्जिट पोल का दर्शन।’

हमारे पत्रकारों से कहीं ज्‍यादा सटीक दर्शन जनता यानी मतदाताओं के पास होता है। इसीलिए वे समय समय पर पत्रकारों को चौंकाते रहते हैं। अपने अंदर का हाल किसी पत्रकार को नहीं बताते। बताते वही हैं जो पत्रकार सुनना चाहते हैं और सत्‍ता के समर्थन में भविष्‍यवाणी करना चाहते हैं। मुझे उन पत्रकारों के चिंतन पर कोफ्त होती है जो जनता तो दूर, पत्रकारों के ही हक मजीठिया को दिलाने में नखरे दिखा रही भाजपा को दूध की धुली बताते नहीं थकते और ऊपर से महान होने का आडंबर ओढ़ लेते हैं कि वे इतने महान हैं कि अपने हक की चर्चा भी नहीं करना चाहते। लेकिन सैलरी दस दिन लेट हो जाए तो घोर निराशा में डूबने लगते हैं। ऐसे पत्रकारों की भविष्‍यवाणियां हमेशा सच होंगी, इसमें संदेह की गुंजाइश बनी रहेगी। क्‍योंकि परिवर्तन का पहिया कब घूम जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर युग चाहे वह इंदिरा गांधी का रहा हो या राजीव गांधी का, या वर्तमान प्रात: स्‍मरणीय अथवा निंदनीय नरेंद्र मोदी का, भक्‍त पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी कुकुरमुत्‍ते की तरह उगती रही है। यह कुकुरमुत्‍ता युग अजर और अमर है। जब जब चुनावी बारिश होगी, इसे उगने से कोई रोक नहीं सकेगा। बजाय इस पर भरोसा करने के, आप अपने अंदर की आवाज सुनने का प्रयास करेंगे तो कभी गच्‍चा नहीं खाएंगे।

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चोटी वाले तेरा जवाब नहीं…

फोर्थपिलर टीम।

चुरकी सोंटा हो जाना-यानी डर जाना। यह मुहावरा या कहावत गांव में बहुत प्रचलित थी। क्‍योंकि डर की कई वजहें थीं। स्‍कूल में अध्‍यापक का डर सबसे बड़ा डर हुआ करता था। खैर। चुरकी का मतलब होता है-चोटी। और सोंटा हो जाने का तात्‍पर्य यह है कि दंड के समान हो जाना। सब टीवी के एक लोकप्रिय धारवाहिक में आप तेनालीरामा की चुरकी सोंटा होते देख सकते हैं। उनकी चुरकी यानी चोटी तो बात भी करती है।

अभी पिछले दिनों अफवाह फैली थी कि दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट के एक चोटी के संपादक की चोटी कट गई है। उनकी चोटी को किसी चोटी कटवा ने नहीं काटा, उन्‍होंने खुद कटवाया है। कारण। लोग कहने लगे थे कि सुप्रीम कोर्ट का टाइम बाउंड आदेश आते ही उनकी चुरकी सोंटा हो गई थी। इसलिए उन्‍होंने चोटी ही कटवा दी। न रहेगी चोटी और न होगी सोंटा। लेकिन बाद में पता चला कि उनके चोटी रखने के कार्य को पाखंड बताया जाने लगा था। इसलिए उन्‍होंने चोटी को छिपाने के लिए उसे तेल से सराबोर कर दिया और उसे अपने बालों में छिपा लिया था, जिससे लोग भ्रमित होने लगे थे।

पिछले आलेखों में इनके बारे में बताया जा चुका है कि ये भ्रष्‍टाचार का डंका बजाने के लिए ब्राह्मणवाद का नारा दिया करते थे। लेकिन जब इन्‍होंने एक झटके में 200 ब्राह्मणों की नौकरी खा ली तो लोग इन्‍हें रावण की उपाधि से विभूषित करने लगे, जिसने अपने भाई को ही राज्‍य से निकाल दिया।

गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस में राम जी के मुखारविंद से कहलवा दिया था-मोहि न सोहाइ ब्रह्म कुल द्रोही। यानी मुझे ब्राह्मण कुल के द्रोही पसंद नहीं हैं। लेकिन ये तो खुद ब्राह्मण हैं। राम जी इनका क्‍या करेंगे। अब संजय गुप्‍ता भले ही इन्‍हें पसंद करें, लेकिन राम जी तो इनका वही हश्र करेंगे, जो रावण का किया था।

पता चला है कि ये चोटी वाले संपादक महोदय आजकल बहुत फ्रस्‍टेट रहते हैं। कर्मचारी मजीठिया के लक्ष्‍य के काफी करीब पहुंच चुके हैं। क्‍लेम लगाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के प्रकाश में लेबर कोर्ट भी सतर्क है। कम अवधि की डेट दे रहा है। आज नहीं तो कल इनसे संजय गुप्‍ता साहब पूछेंगे ही-तेरा क्‍या होगा चोटी वाले।

क्या हैं पैराडाइज़ पेपर्स?

पैराडाइज़ पेपर्स जनता ते सामने आने वाले वो वित्तीय दस्तावेज़ हैं जो दुनिया भर के अमीर और ताक़तवर लोगों के टैक्स हेवन देशों में बड़े निवेशों पर रोशनी डालते हैं. तकनीकी भाषा में इसे ऑफ़शोर फिनांस कहा जा रहा है.
इस पूरे हफ्ते सैकड़ों लोगों और कंपनियों की कर और वित्तीय जानकारियां साझा की जा रही हैं. तमाम जानकारियां इस बात पर केंद्रित हैं कि कैसे राजनेताओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सेलेब्रिटी और हाई प्रोफ़ाइल लोगों ने ट्रस्ट, फाउंडेशन, काग़ज़ी कंपनियों के ज़रिए टैक्स अधिकारियों से अपने कैश और सौदों को छुपाए रखा.

पिछले साल के पनामा पेपर्स की ही तरह ये दस्तावेज़ जर्मन अख़बार ज़्यूड डॉयचे त्साइटुंग ने हासिल किए थे. दस्तावेज़ों की जांच इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) ने की है.
बीबीसी पैनोरमा और गार्डियन दुनिया के उन 100 मीडिया समूहों में से हैं जो इन दस्तावेज़ों की जांच कर रही हैं.

पैराडाइज़ पेपर्स नाम इसलिए चुना गया क्योंकि जिन देशों के नाम इसमें आए हैं, उन्हें दुनिया की ख़ूबसूरत जगहों में गिना जाता है. इसमें बरमूडा भी शामिल है जहां मुख्य कंपनी ‘ऐपलबी’ का हेडक्वॉर्टर है. इन देशों में टैक्स हेवन यानी कर चोरी का स्वर्ग कहे जाने की तमाम खूबियां हैं. इसके बाद नाम आता है ‘आयल ऑफ़ मैन’ जिसका भी एक बड़ा रोल रहा है.

किनका पर्दाफ़ाश किया जा रहा है?
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सैकड़ों राजनेताओं, मल्टीनेशनल्स, सिलेब्रिटीज़ और रईस लोगों के टैक्स हेवन देशों में निवेश से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हुई है. इनमें से कुछ घरेलू लोग भी हैं. इस सेक्टर में काम कर रहे लीगल फर्म्स, वित्तीय संस्थानों और एकाउंटेंट्स के कामकाज पर ये पेपर्स रोशनी डालते हैं. अभी तक जो कहानियां सामने आई हैं.
द पैराडाइज़ पेपर्स में दावा किया गया है कि ब्रितानी महारानी के निजी धन में से क़रीब एक करोड़ पाउंड विदेश में निवेश किए गए. इन पैसों को डची ऑफ़ लेंकास्टर ने कैमन आइलैंड्स और बरमुडा के फंड में निवेश किया था. ये महारानी को आय देते हैं और उनके क़रीब 50 करोड़ पाउंड की निजी जागीर के निवेशों को संभालते हैं.
दस्तावेज़ों में ये भी दावा किया गया है कि डोनल्ड ट्रंप के क़रीबी सहयोगी रॉस ने एक जहाजरानी कंपनी में निवेश बरक़रार रखा जो रूस की एक ऊर्जा कंपनी के लिए गैस और तेल का परिवहन करके सालाना करोड़ों डॉलर कमाती है. रूस की एनर्जी फर्म में व्लादिमीर पुतिन के दामाद और अमरीका के प्रतिबंधों का सामना कर रहे दो लोगों का भी निवेश है.
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रडो के क़रीबी सहयोगी ऐसी विदेशी स्कीम से जुड़े हैं, जिससे संभव है कि देश को करोड़ों डॉलर का नुक़सान पहुंचा हो. टैक्स हेवन देशों को बंद करने के लिए अभियान चलाने वाले ट्रुडो के लिए इससे हालात शर्मनाक हो सकते हैं.
कंज़र्वेटिव पार्टी के पूर्व डिप्टी चेयरमैन और बड़े दानदाता, लॉर्ड एश्क्रॉफ्ट ने अपने विदेशी निवेश के प्रबंधन में नियमों की अनदेखी की हो सकती है. अन्य दस्तावेज़ों से पता चलता है कि उन्होंने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में अपना नॉन-डोम (ग़ैर रिहायशी) दर्ज़ा बरकरार रखा जबकि ऐसी रिपोर्टें आईं थी कि वो ब्रिटेन के स्थायी नागरिक बन गए हैं.

कैसे होती है टैक्स चोरी?
पैराडाइज़ पेपर्स के स्रोत?
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इनमें 1400 जीबी से भी ज़्यादा डेटा हैं और तकरीबन 1.34 करोड़ दस्तावेज़. इनमें 68 लाख दस्तावेज़ क़ानूनी सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनी ऐपलबी और कॉर्पोरेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी एस्टेरा से मिले हैं. दोनों कंपनियां 2016 तक ऐपलबी के नाम से काम करती रही थीं. इसी साल एस्टेरा स्वतंत्र रूप से वजूद में आई.
अन्य साठ लाख दस्तावेज़ 19 देशों से मिले हैं. इनमें ज्यादातर कैरिबियाई इलाके हैं. दस्तावेज़ों का एक छोटा हिस्सा सिंगापुर से काम करने वाली इंटरनेशनल ट्रस्ट और कॉर्पोरेट सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी एशियासिटी ट्रस्ट है. सार्वजनिक हुए दस्तावेज़ सात दशकों के समय (1950 से 2016) को समेटे हुए हैं.

ऐपलबी क्या है?
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ज़्यादातर दस्तावेज़ ऐपलबी कंपनी के हैं. बरमुडा स्थित ये कंपनी क़ानूनी सेवाए देती है. ये अपने ग्राहकों को शून्य या बेहद कम कर वाले देशों में कंपनियां स्थापित करने में मदद करती है. इस कंपनी का इतिहास साल 1890 से शुरू होता है. अपने क्षेत्र की दुनिया की दस बड़ी कंपनियों में इसका नाम लिया जाता है.
सार्वजनिक हुई जानकारी से ये पता चलता है कि ऐपलबी की क्लाइंट लिस्ट में अमरीकियों का बोलबाला है. 31,000 अमरीकी पते इस लिस्ट में हैं. 14 हज़ार पते ब्रिटेन के हैं और 12 हज़ार बरमुडा के.
पैराडाइज़ पेपर्स किसने लीक किए?
साल 2016 के पनामा पेपर्स की ही तरह ये दस्तावेज़ जर्मन अख़बार ज़्यूड डॉयचे त्साइटुंग ने हासिल किए थे. दस्तावेज़ों की जांच इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) ने की है. अख़बार ने अपने सूत्र सार्वजनिक नहीं किए हैं.
दस्तावेज़ों पर कौन काम कर रहा है?
दस्तावेज़ों की जांच इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) ने की है. बीबीसी पैनोरमा और गार्डियन 67 देशों के उन 100 मीडिया समूहों में से हैं जो इन दस्तावेज़ों की जांच कर रही हैं. आईसीआईजे दुनिया के खोजी पत्रकारों का ग्लोबल नेटवर्क है.

इसमें जनहित क्या है?
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दस्तावेज़ों की जांच करने वाले मीडिया संस्थानों का कहना है कि ये जांच जनहित में हैं, क्योंकि टैक्स हेवन देशों से लीक हुए दस्तावेज़ों से बार-बार ग़लत काम सामने आए हैं. सार्वजनिक हुए इन दस्तावेज़ों की वजह से दुनिया भर में कई देशों में सैंकड़ों जांच शुरू हुए हैं और नतीज़तन राजनेताओं, मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्रियों का अपना पद छोड़ना पड़ा है.

पनामा लीक्स से कैसे अलग?
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पिछले चार सालों में ये पांचवी बड़ी लीक है. हालांकि पनामा पेपर्स आकार के लिहाज से ज़्यादा बड़े थे लेकिन पैराडाइज पेपर्स में जानकारियों और सूचना का पैमाना कहीं बड़ा है. इन्हें पनामा पेपर्स के दस्तावेज़ों से ज़्यादा सख्त माना जा रहा है.

टैक्स हेवन क्या है?
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ऐसे संस्थानों को आम भाषा में टैक्स हेवन जहाँ आसानी से कर बचाया जा सकता है. इंडस्ट्री की भाषा में इन्हें ऑफ़शोर फ़ाइनेंसियल सेंटर्स (ओएफ़सी) कहा जाता है. ये आमतौर पर स्थिर, भरोसेमंद और गुप्त होते हैं और अक्सर छोटे द्वीप होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ़ द्वीप ही होते हैं, और इनमें ग़लत कार्यों को रोकने के लिए क्या उपाय हैं इसे लेकर भिन्नताएं हो सकती हैं.

माल्टा में पनामा गेट खोलने वाली पत्रकार की हत्या
क्या हैं पैराडाइज पेपर्स- ये बड़ी संख्या में लीक दस्तावेज़ हैं, जिनमें ज़्यादातर दस्तावेज़ आफ़शोर क़ानूनी फर्म ऐपलबी से संबंधित हैं. इनमें 19 तरह के टैक्स क्षेत्र के कारपोरेट पंजीयन के पेपर भी शामिल हैं. इन दस्तावेज़ों से राजनेताओं, सेलिब्रेटी, कारपोरेट जाइंट्स और कारोबारियों के वित्तीय लेनदेन का पता चलता है.
1.34 करोड़ दस्तावेज़ों को जर्मन अख़बार ने हासिल किया है और इसे इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) से शेयर किया है. 67 देशों के क़रीब 100 मीडिया संस्था से इसमें शामिल हैं, जिसमें गार्डियन भी शामिल है. बीबीसी की ओर से पैनोरमा की टीम इस अभियान से जुड़ी है. बीबीसी इन दस्तावेज़ों को मुहैया कराने वाले स्रोत के बारे में नहीं जानती.

[साभार- बी बी सी ]

ऐसे लिखें एक संपूर्ण समाचार

पत्रकारिता सीखें-भाग एक

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता यानी समाचार लिखने की कला। वैसे तो यह कला काफी कुछ कुदरत की देन होती है। तमाम बड़े पत्रकार अपनी कुदरती प्रतिभा के बल पर ही नाम रोशन कर सके हैं, क्‍योंकि उनके जमाने में इस क्षेत्र में प्रशिक्षण की व्‍यवस्‍था ही नहीं थी। लेकिन आज पत्रकारिता सिखाने वाले संस्‍थानों की बाढ़ सी आ गई है फिर भी बड़े पत्रकार नहीं पैदा हो रहे हैं। हम इस आलेखमाला के जरिये कुछ ऐसे प्रमुख विंदुओं की चर्चा करेंगे जो समाचार लेखन में मददगार होते हैं।

अच्‍छा समाचार लिखने के लिए पत्रकारीय दृष्टि का होना अतिआवश्‍यक होता है। निरंतर अभ्‍यास से ही यह दृष्टि पैदा हो पाती है। पत्रकारीय दृष्टि का आशय है कि किसी भी घटना की रिपोर्टिंग करते समय ऐसी बातों पर नजर रखना, जिन पर आम आदमी का ध्‍यान नहीं जाता। मसलन, किसी भवन में आग लगने की घटना घटी है तो क्‍या उस भवन में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्‍त उपाय किए गए हैं या नहीं। भवन निर्माण के मानकों का पालन हुआ है या नहीं। वहां जो उद्योग चलाया जा रहा है, उसकी स्‍थानीय प्रशासन से अनुमति है या नहीं।

इसके बाद नंबर आता है समाचार के तत्‍वों का। सामान्‍य तौर पर समाचार के तत्‍वों को 5 डब्‍ल्‍यू और 1 एच के जरिये समझा जाता है। पहला डब्‍ल्‍यू है-ह्वाट यानी क्‍या हुआ। दूसरा डब्‍ल्‍यू है-ह्वेयर यानी कहां की घटना है। तीसरा डब्‍ल्‍यू है-ह्वैन यानी कब की घटना है। चौथा डब्‍ल्‍यू है-ह्वाई यानी घटना क्‍यों घटित हुई। पांचवां डब्‍ल्‍यू है-हू यानी घटना के पीछे कौन है। एच का मतलब है हाऊ यानी घटना कैसे घटी। समाचार लेखन के इन छह तत्‍वों पर ध्‍यान दिया जाए तो एक संपूर्ण समाचार लिखा जा सकता है।

आमतौर पर देखा जाता है कि पत्रकारिता का अधकचरापन इतना बढ़ गया है कि अनगिनत पत्रकारिता संस्‍थानों से पास होकर निकले अधिकांश पत्रकारों के समाचार में इन बुनियादी तत्‍वों का अभाव रहता है। इन बुनियादी बातों के अलावा समाचार को सजाने और उसे जानकारी से लैस करने के और भी टिप्‍स हैं जो एक सफल पत्रकार बनाने में सहायक होते हैं। उन पर चर्चा फिर कभी…।

पत्रकारिता के सारे मानदंड भूल जाता है दैनिक जागरण

फोर्थपिलर टीम।

सुप्रीम कोर्ट में पेशी होती है तो दैनिक जागरण प्रबंधन क्‍वालिटी जर्नलिज्‍म यानी गुणवत्‍ता वाली पत्रकारिता की दुहाई देता है, लेकिन जब पुलिस को बचाना होता है या अपने किसी कर्मचारी का दायित्‍व सिर पर आता है तो वह पत्रकारिता के सारे मानदंड भूल जाता है। पिछले दो दिनों में उसने दो खबरों के साथ जी भरकर अत्‍याचार किया है और यह साबित करने की चेष्‍टा की है कि वह अपने कर्मचारियों पर ही नहीं, खबरों के साथ भी अत्‍याचार करने में नंबर वन है।

पहली खबर गाजीपुर से है, जिसमें दैनिक जागरण के पत्रकार व आरएसएस कार्यकर्ता राजेश मिश्र की दिनदहाड़े गोली मार कर हत्‍या कर दी गई। इस खबर को वहां के अखबारों ने पहले पेज पर स्‍थान दिया है, जबकि दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में भी यह खबर नहीं छपी है। सुबह ईपेपर देखा गया तो गाजीपुर संस्‍करण अपलोड ही नहीं किया गया था। अलबत्‍ता डिजिटल में यह खबर जरूर नजर आ रही है और उसमें इस बात का भी उल्‍लेख है कि राजेश मिश्र दैनिक जागरण के अंशकालिक पत्रकार थे। अब जागरण राजेश मिश्र की कितनी आर्थिक मदद करेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

दूसरी खबर नोएडा से है जिसमें दिनदहाड़े दो लग्‍जरी कारें लूट ली जाती हैं, फिर भी यह खबर नोएडा पुलआउट पर निपटा दी जाती है। इनमें एक कार तो दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव की है। इस मामले में दैनिक जागरण बार-बार एसएसपी का बयान छाप रहा है, लेकिन कारों का कहीं अता-पता नहीं है। कारें बरामद होने की संभावना बहुत कम है, क्‍योंकि चोरों ने अब तक कारों को ठिकाने लगा दिया होगा। इसलिए पुन: अपील की जाती है कि जागरण की कार में कर्मचारियों के खून पसीने का पैसा लगा होने के कारण कम से कम जागरण वालों की कार लौटा दी जाए, क्‍योंकि शोषण की बनियाद पर खरीदी गई कार से किसी को सुख नहीं मिलेगा।

 

लौटा दो लुटेरों की कार

फोर्थपिलर टीम!   

दैनिक जागरण से एक अफवाह और एक खबर जारी हुई है। अफवाह के मुताबिक संजय गुप्‍ता की एक करोड़ रुपये वाली कार बदमाशों ने छीन ली, जबकि दैनिक जागरण के नोएडा पुलआउट पर खबर छपी है कि ‘दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक की कार लूटी’, जिसमें एसएसपी का वर्जन भी छपा है कि-इस लूट को वह चैलेंज के रूप में लेंगे।

फिर भी ऐसा लगता नहीं है कि कार बरामद हो पाएगी क्‍योंकि जो नोएडा पुलिस दैनिक जागरण के गेट पर फरवरी 2015 में हुई 36 हजार रुपये की लूट का एफआईआर आज तक दर्ज नहीं कर सकी है, वह कार को कैसे बरामद कर पाएगी। 36 हजार रुपये की लूट की शिकायत नोएडा के सेक्‍टर 26 स्थित एसएसपी ऑफिस में 24 फरवरी 2015 को दर्ज की गई थी। इस मामले की जानकारी पाने के लिए कई आरटीआई लगाई गई, जिलाधिकारी से लेकर ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव तक शिकायत की गई, लेकिन मामले को सिस्‍टम ने हजम कर लिया।

इसलिए अब कार लुटेरों से अपील करनी होगी कि वे लुटेरों की उस कार को लौटा दें, जो दैनिक जागरण के कर्मचारियों का खून चूस कर खरीदी गई थी। कार जिनके कब्‍जे में थी, उन्‍हीं के इशारे पर दैनिक जागरण के गार्डों ने कंपनी के एक कर्मचारी से लूटपाट की थी। नोएडा पुलिस से भी अपील है कि उस शिकायत की भी एफआईआर दर्ज करे जिसमें कार होल्‍डर मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव पर 36 हजार रुपये की छिनैती कराने का आरोप है।

संपादकों के लिए ज्ञान

फोर्थपिलर टीम।

संपादकों के लिए समाचार का चयन बहुत बड़ी चुनौती है। सटीक ख़बरों का चयन उनकी विशेष योग्यता होती है। समाचार चयन के साथ ही उनका विभाजन भी कम बड़ी चुनौती नहीं है। ये दोनों काम आंतरिक समाचार प्रबंधन का हिस्सा हैं। इनमें कुशलता अच्छी पढ़ाई, गहन अध्ययन, समझ, अनुभव और फिर इनके आधार पर मानसिक तर्क-वितर्क से आती है।

ये चुनौतियां कम पढ़े-लिखे या कुपढ़ संपादकों के लिए समस्या बन जाती हैं। वे अपनी टीम के पत्रकारों के लिए अलग तरह की दिक्कतें खड़ी कर देते हैं। यह बात उन पर खास तौर से लागू होती है, जो बिना पढ़े-लिखे नाते-रिश्तेदारी अथवा यारी-दोस्ती के रास्ते नौकरी पाने के बाद किसी समाचार संपादक या संपादक का लटक बनकर यह मुकाम पा जाते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। आप जिस अखबार या चैनल में काम करते हैं, मान लीजिए एक खबर आती है कि नीति आयोग ने सरकार को निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया है। अब पहले तय करना होगा कि ख़बर लेनी है या नहीं। लेनी है तो किस डेस्क (जनरल या बिजनेस या खेल डेस्क) से यह खबर बननी चाहिए और फिर कहां ली जानी चाहिए। मोटी अक्ल वाला संपादक भी तय कर लेता है कि यह ख़बर ली जानी है।

हालांकि इसके बाद उसका दिमाग जवाब दे जाता है। फिर वह इस समाचार को बिजनेस डेस्क के हवाले कर देता है। अब बताइए कि इसमें बिजनेस क्या है? यह तो नीतिगत मसला है जिसका संबंध राजनीति और समाज से है। अर्थ या व्यापार से यह तब जुड़ती है जब कंपनियां इसका विरोध अथवा समर्थन करती हैं या फिर मान लीजिए टाटा समूह अपनी कंपनियों में आरक्षण लागू करने की घोषणा कर देता है।

बुनियादी सबक : कोई खबर इसलिए आर्थिक नहीं हो जाती कि उसमें कंपनी, निजी क्षेत्र या उद्योग शब्द आ गया है।