मजीठिया : नई दुनिया जागरण को फिर भारी पड़ी चालाकी

अब श्रम न्यायालय ने लगाई पांच-पांच सौ की कॉस्ट

रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

हमने आपको पहले ही बताया था कि मध्यप्रदेश में श्रम न्यायालयों मे चल रहे मजीठिया के मामलों में नईदुनिया जागरण प्रबंधन की हर चाल उलटी पड़ रही है। इसका एक ओर ताजा मामला सामने आया है।
जानकारी के मुताबिक ग्वालियर श्रम न्यायालय में चल रहे मामले कूट परीक्षण तक पहुंच गए हैं, लेकिन प्रबंधन बार-बार बहाना बनाकर मामलों को लटकाना चाहता है। प्रबंधन के वकील लेबर कोर्ट में बहाना बनाकर भागते हैं।

पूर्व में जहां ग्वालियर हाईकोर्ट ने मामले में प्रबंधन को पांच-पांच हजार की कॉस्ट लगाई थी। इसमें सभी कर्मचारियों का प्रबंधन ने 09 अप्रैल को पांच-पांच हजार का नकद भुगतान कर दिया था। लेकिन 09 अप्रैल को राज्य अधिवक्ता संघ की हड़ताल के कारण मामले में कूट परीक्षण नहीं हो सका था और अगली तिथि 18 अप्रैल की निर्धारित हुई थी।

18 अप्रैल को कर्मचारी और उनके वकील पूरी तैयारी के साथ कूट परीक्षण के लिए श्रम न्यायालय पहुंचे थे। लेकिन प्रबंधन की ओर से एक जूनियर वकील कोर्ट में उपस्थित हुए और कूट परीक्षण के लिए अगली तारीख की मांग की।कर्मचारियों के वकील ने इस पर आपत्ति ली और माननीय न्यायाधीश महोदय को प्रबंधन की धूर्तता से अवगत कराया।

इस पर प्रबंधन के जूनियर वकील ने तर्क दिया कि उनके सीनियर वकील के यहां कोई कार्यक्रम है, इसलिए उन्हें अवसर दिया जाए। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कर्मचारियों क े वकील की आपत्ति सुनने के बाद प्रबंधन के वकील से स्पष्ट पूछा कि वे केवल हां या न में ये बताएं कि आज कूट परीक्षण करेंगे या नहीं। इस पर प्रबंधन का वकील बगले झांकने लगा। बात बिगड़ती देख बाहर आकर उसने अपने आकाओं को कोर्ट के रुख से अवगत कराया।

इसके बाद सीनियर वकील भागे-भागे कोर्ट पहुंचे और उन्होंने भी तारीख देने की मांग की। इसके बाद पुन: न्यायाधीश महोदय ने कहा कि केवल अपना उत्तर हां या न में दें। इसके बाद जब प्रबंधन के वकील ने असमर्थता जताई तो माननीय न्यायाधीश महोदय ने प्रत्येक प्रकरण में 500-500 रुपए कॉस्ट लगा दी। साथ ही माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों में सुनवाई हो रही है। इसलिए मामलों को तय समय में निपटाने के लिए अब डे टू डे सुनवाई की जाएगी। इसके बाद सभी प्रकरणों में दो दिन बाद की तारीख दे दी गई है।

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सुप्रीम कोर्ट के कठघरे को है ‘जागरण’ के मालिकों का इंतजार!

दैनिक जागरण की ‘गुड़गोबर’ पत्रकारिता : आरोपमुक्त को लिखा ‘आतंकी वासिफ़’

MediaVigil से साभार।

लगता है कि दैनिक जागरण की तिजोरी के साथ ही उसके पापों का भी घड़ा भर गया है। उसने अपने कर्मठ कर्मचारियों के साथ जो अत्‍याचार किए हैं, उनका हिसाब बराबर करने का समय आ गया है। मालिक संजय गुप्‍ता के खाते में अच्‍छे दिनों का डिपाजिट सूख चुका है। एक अदृश्‍य कंगाली का शिकंजा उन पर कसने लगा है।

हिंदी का नंबर एक अख़बार दैनिक जागरण बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बारे में लिखते हुए कभी ‘क़ातिल’ ‘रंगदार’ या ‘तड़ीपार’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल नहीं करता, जबकि उन पर क़त्ल, फ़िरौती वसूलने से लेकर एक लड़की की अवैध जासूसी कराने तक के अरोप लगे थे। जागरण बिलकुल ठीक करता है क्योंकि अमित शाह को अदालत से ‘बरी’ कर दिया गया है।

लेकिन जब नाम अमित की जगह ‘वासिफ़’ हो तो जागरण पत्रकारिता के इस सामान्य सिद्धांत को ताक पर रख देता है। वरना अदालत से बरी कर दिए जाने के बावजूद वह कानपुर के वासिफ़ हैदर को बार-बार आतंकी न लिखता। उसे इसमें कुछ ग़लत नहीं लगा। लेकिन इस एक नंबरी अख़बार से मोर्चा लेने की वासिफ़ की ज़िद की वजह से आपराधिक मानहानि का एक अहम मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। 3 अप्रैल को जस्टिस चालमेश्वर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसे गंभीर मसला मानते हुए शीघ्र सुनवाई के आदेश दिए।

जागरण के संपादक और प्रकाशक कठघरे में हैं। अदालत का रुख बता रहा है कि यह मामला बाक़ी मीडिया के लिए भी एक नज़ीर बन सकता है। वासिफ़ हैदर की कहानी भी सुन लीजिए। कानपुर निवासी वासिफ़ मेडिकल उपकरणों की सप्लाई करने वाली एक अमेरिकी मल्टीनेशनल, बैक्टन डिकिन्सन कंपनी में क्षेत्रीय बिक्री प्रबंधक के रूप में काम कर रहे थे जब 31 जुलाई 2001 को इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी), दिल्ली पुलिस, स्पेशल सेल और स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की टीमों ने उनका ‘अपहरण’ कर लिया। बम विस्फोट कराने से लेकर अवैध हथियारों तक के मामलों को कबूलने के लिए उन्हें ‘थर्ड डिग्री’ दी गई और ‘कबूलनामे’ का वीडियो भी बना लिया गया। इनमें एक मामला दिल्ली का भी था। ज़ाहिर है, चार बेटियों वाले वासिफ़ के परिवार पर कहर टूट पड़ा। पड़ोस ही नहीं पूरे कानपुर में उनके परिवार की थू-थू हुई।

लंबी जद्दोजहद के बाद अदालत से वे सभी मामलों में बरी हो गए। पूरी तरह निर्दोष साबित होने के बाद वे 12 अगस्त 2009 को जेल से बाहर आए। यानी बेगुनाह वासिफ़ की ज़िंदगी के आठ से ज़्यादा साल जेल की सलाखों के पीछे बीते।

जेल से निकलकर ज़िंदगी को पटरी पर लाना आसान नहीं था। बहरहाल, अदालत से मिला ‘निर्दोष होने’ का प्रमाणपत्र काम आया और धीर-धीरे वे समाज में स्वीकार किए जाने लगे। लेकिन करीब साल भर बाद जब 2010 में बनारस के घाट पर बम विस्फोट हुआ तो दैनिक जागरण ने एक ख़बर में इसका तार कानपुर से जोड़ते हुए लिखा कि ‘आतंकी वासिफ़’ पर नज़र रखी जा रही है। पता लगाने की कोशिश हो रही है कि वह किससे मिलता है, उसका ख़र्चा कैसे चलता है…वग़ैरह-वग़ैरह..।

जागरण कानपुर से ही शुरू हुआ अख़बार है और आज भी यह शहर उसका गढ़ है। ज़ाहिर है, इस अख़बार में ‘आतंकी’ लिखा जाना वासिफ़ के लिए सिर पर बम फूटने जैसा था। वे कहते रह गए कि अदालत ने उन्हें हर मामले में बरी कर दिया है, लेकिन अख़बार बार-बार उन्हें ‘आतंकी वासिफ़’ लिखता रहा। जो समाज थोड़ा क़रीब आया था, उसने फिर दूरी बना ली।

वासिफ़ के लिए यह आघात तो था, लेकिन उन्होंने भिड़ने की ठानी। उन्होंने 2011 में जागरण के ख़िलाफ़ स्पेशल सीजीएम कोर्ट में आपराधिक मानहानि का मुक़दमा दायर कर दिया। कोर्ट ने पुलिस को जाँच सौंपी तो पता चला कि वासिफ़ के आरोप सही हैं, लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि इसके बाद अदालत तारीख़ पर तारीख़ देने लगी।

वासिफ़ ने तब हाईकोर्ट का रुख किया जहाँ मामले के जल्द निपटारे का निर्देश हुआ। इस पर मजिस्ट्रेट ने जागरण की यह दलील मानते हुए कि- वासिफ़ पर पहले आरोप थे और कुछ मुकदमे चल भी रहे हैं, लिहाज़ा आतंकी लिखकर कोई मानहानि नहीं की गई- याचिका को निरस्त कर दिया। जबकि हक़ीक़त यह थी कि वासिफ़ के ख़िलाफ़ कोई मामला दर्ज नहीं था और न ही कोई जाँच चल रही थी। वे सभी मामलों में बरी हो चुके थे।

वासिफ़ ने इसके ख़िलाफ़ पहले सेशन्स कोर्ट और फिर हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन हर जगह निराशा हाथ लगी। उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास भी अख़बार की शिकायत की थी लेकिन कुछ हल नहीं निकला। वासिफ़ ने मीडिया विजिल को बताया कि इसी निराशा के दौर में उनकी मुलाकात प्रशांत भूषण से हुई। उन्होंने मामले को समझा और केस दायर कर दिया। सुप्रीमकोर्ट ने 30 मार्च 2015 को जागरण के एडिटर संजय गुप्त, मैनेजिंग एडिटर महेंद्र गुप्त और प्रकाशक कृष्ण कुमार विश्नोई के साथ-साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस मामले में नोटिस जारी कर दिया।

3 अप्रैल 2018 को इस मामले में एक बड़ा मोड़ आया जब जस्टिस चालमेश्वर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले को गंभीर माना। अदालत ने कहा कि इस मामले में क़ानून का बड़ा सवाल है, इसलिए इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता है।

अंग्रेज़ी वेबसाइट LIVELAW.IN  में छपी ख़बर के अनुसार वकील प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने तर्क दिया कि यह मुद्दा सिर्फ किसी एक के निर्दोष होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला कई मामलों में दोहराया गया एक बना बनाया पैटर्न है। इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए अदालत को इस पर समग्र रूप से विचार करना चाहिए।

प्रशांत भूषण की टीम के सदस्य एडवोकेट गोविंद ने कहा-  ‘सवाल यह है कि एक अखबार या मीडिया हाउस किसी व्यक्ति विशेष को एक आतंकवादी के रूप में कैसे प्रचारित कर सकता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति पर एक दफा आतंकवाद का झूठा आरोप लग चुका था। इस मसले पर कानून की धारा 499 और 500 से स्पष्ट है।’

अदालत ने मामले को गंभीर माना है। अगली सुनवाई जुलाई में होगी। उम्मीद है कि अदालत कुछ ऐसा आदेश ज़रूर देगी जिससे मीडिया आरोपितों और दोषियों में फ़र्क करने की तमीज़ वापस हासिल करने को मजबूर हो। बात निकली है तो दूर तलक जाने में ही सबकी भलाई है।

उन्‍हें नहीं दिखते दैनिक जागरण के दूसरे पाप

श्रीकांत सिंह।

ऐसे नेताओं को आप क्‍या कहेंगे, जिन्‍हें दैनिक जागरण के दूसरे पाप नहीं दिखते। ये नेता हैं- दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और केजरीवाल की दुलत्‍ती खाकर बागी हुए कपिल मिश्रा। इन्‍हें पत्रकारिता पर उस समय संकट नहीं दिखा जब दैनिक जागरण अपने असहाय कर्मचारियों पर अत्‍याचार किए जा रहा था और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए आज भी पत्रकारों का हक मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं कर रहा है। इस संदर्भ में दैनिक जागरण ने अपने 11 अप्रैल 2018 के अंक में एक खबर भी प्रकाशित की है, जिसकी कटिंग यहां संलग्‍न है।

जब आम आदमी पार्टी की सरकार के विधायकों ने दिल्ली विधानसभा में दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ खबरों पर आपत्ति जताई और मामले को विधानसभा की विशेषाधिकार समिति को सौंपने की मांग की तो उक्‍त सभी नेताओं को पत्रकारिता पर संकट नजर आने लगा। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी मांग को गंभीरता से लिया और मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया है।

दैनिक जागरण में कार्यरत एक कर्मचारी ने नोएडा स्थित कार्यालय का पूरा सीन हमारे साथ शेयर किया जो इस प्रकार है-सुधीर मिश्रा एक चपरासी समेत दो लोगों को साथ लेकर 11 अप्रैल को ही कार्यालय में रातभर जमे रहे और सुबह नौ बजे तक कुछ कागजात की फोटो कॉपी निकालते रहे। लीगल स्‍टाफ के सदस्‍य मनोज दुबे और राजेंद्र दुबे अपने वकीलों के साथ नोएडा यूनिट के मीटिंग हाल में कंपनी के कई दिग्‍गजों मालिक संजय गुप्‍ता, मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव, राजनीतिक संपादक प्रशांत मिश्रा के साथ 12 अप्रैल को मीटिंग हाल में माथापच्‍ची करते रहे।

भयभीत मुद्रा बनाए स्‍थानीय संपादक विष्‍णु त्रिपाठी ने तो मीटिंग हाल में पहले ही पहुंच कर अपना स्‍थान ग्रहण कर लिया था। एसी चालू होने के बावजूद सभी के चेहरे पर पसीने की कुछ बूंदें नजर आ रही थीं। सभी इस बात से चिंतित थे कि कहीं दिल्‍ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति मालिक संजय गुप्‍ता को तलब न कर ले। हालत यह हो गई कि लेबर आफिस में 12 अप्रैल के एक मामले की सुनवाई में भी दैनिक जागरण से कोई नहीं पहुंचा।

विपक्षी पार्टियों का सर्वनाश इसलिए हो रहा है, क्‍योंकि उन्‍हें विरोध करने के लिए जनहित के मुद्दे नहीं मिलते और वे अपना राजनीतिक उल्‍लू सीधा करने में लगी रहती हैं। तभी उन्‍हें सिर्फ इस मामले में लोकतंत्र की हत्या नजर आ रही है।

कपिल मिश्रा ने तो विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिखा था, लेकिन मजीठिया लागू कराने के लिए उन्‍होंने कभी भी कोई पत्र नहीं लिखा। उन्‍होंने कहा कि दैनिक जागरण अखबार के खिलाफ दिल्ली विधानसभा में अवमानना का प्रस्ताव जायज नहीं है। तो क्‍या दैनिक जागरण का सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताना जायज है… वाह रे कपिल‍ मिश्रा…तू भी क्रांतिकारी बनने के लिए मार करता है। शेम शेम…।

दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है। यह सरकार प्रेस की आजादी पर हमला कर रही है। दिल्ली में आपातकाल की तरह हालात हैं। गुप्‍ताजी, आप भी जाति के आधार पर फिसल रहे हैं। दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्‍ता ने पत्रकारिता को जिस तरह आपातकाल के हवाले कर दिया है, काश आपको भी उसका अहसास होता।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। मनोज जी, आप हर दिल अजीज गायक हैं, लेकिन आपकी संवेदना कभी भी लाचार पत्रकारों के पक्ष में व्‍यक्‍त नहीं हुई। उनके दुख दर्द पर एक गाना भी गा देते तो हम मान लेते कि आप पत्रकारों और पत्रकारिता का सम्‍मान करते हैं। जिनके बल पर आप राजनीति में उतरे हो, वही मां सरस्‍वती आपको कभी माफ नहीं करेंगी।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने भी इस मामले को लेकर केजरीवाल सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि दिल्ली सरकार में बैठे लोग अखबारों में अपने मन माफिक खबरें छपवाना चाहते हैं। सरकार ने प्रेस की आजादी पर हमला किया है। हम इसके खिलाफ एडिटर्स गिल्ड और कोर्ट में भी जाएंगे। माकन जी, आपकी ही पार्टी की सरकार की ओर से जारी मजीठिया वेतनमान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्‍बल, सलमान खुर्शीद और अभिषेक मनु सिंघवी लगातार मालिकों के शोषण के पैरोकार बने रहे। क्‍या यह सब आपको याद दिलाने की जरूरत है… इन नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना होगा और चुनावों में इन्‍हें माकूल जवाब दिए जाने की जरूरत है।

सरकारीपना का रोग

श्रीकांत सिंह।

कुछ लोग पत्रकारिता में तारीफ को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन जब इसकी वकालत कुछ पत्रकार साथी भी करने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि पत्रकारिता को सरकारीपना का रोग लग गया है। अरे भइया, पत्रकारिता में सरकार की तारीफ से ठीक उसी प्रकार परहेज करना चाहिए जैसे शुगर के मरीज को मीठा से परहेज करना होता है।

तारीफ के लिए सरकार के पास पूरा बजट होता है और वह उस पर खर्च भी करती है। मुफ्त में साहेब की तारीफ करने के लिए डॉक्‍टर ने बताया है क्‍या… आपको कोई भक्‍त पत्रकार कह देगा तो बुरा मान जाएंगे। यदि आप चारण बने रहना चाहते हैं और पत्रकार कहलाने का शौक भी चर्राया रहता है तो यह आपकी समस्‍या हो सकती है, पत्रकारिता की नहीं। वैसे, जनहित में सरकार की किसी कल्‍याणकारी योजना का विश्‍लेषण किया जा सकता है।

बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां ‘राष्‍ट्रीय मंच’

फोर्थपिलर टीम।  

भाजपा के विरोध में ‘राष्‍ट्रीय मंच’ नाम से बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां निकल पड़ा है। इसमें अभी शत्रुघ्न सिन्हा, दिनेश त्रिवेदी(टीएमसी), माजिद मेमन, संजय सिंह (आप), सुरेश मेहता (पूर्व मुख्यमंत्री गुजरात), हरमोहन धवन (पूर्व केंद्रीय मंत्री), सोमपाल शास्त्री (कृषि अर्थशास्त्र), पवन वर्मा (जेडीयू), शाहिद सिद्दीक़ी, मोहम्मद अदीब, जयंत चैधरी (आरएलडी), उदय नारायण चौधरी (बिहार), नरेंद्र सिंह (बिहार), प्रवीण सिंह (गुजरात के पूर्व मंत्री), आशुतोष (आप) और घनश्याम तिवारी (सपा) शामिल हुए हैं।

बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने कहा, ‘मैं घोषणा करता हूं कि राष्ट्रमंच का सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का होगा। एनपीएस को ही देख लीजिए। नोटबंदी को मैं आर्थिक सुधार मानता हूं, फिर बुरी तरह लागू की गई जीएसटी। उससे छोटे उद्योग मर गए। बेरोज़गारी का क्या हाल है, भूख और कुपोषण के चलते बच्चों का भविष्य ख़तरे में है। आंतरिक सुरक्षा को देख लीजिए-ऐसे लगता है कि भीड़ ही न्याय करेगी और जब जाति और धर्म पर भीड़ तंत्र भारी पड़ता है तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।

बता दें कि किसानों के मुद्दों को लेकर बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने 30 जनवरी 2018 को राष्‍ट्रीय मंच की घोषणा की। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी भी शामिल हुईं। उन्‍होंने कहा कि बताया जाता है कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि विदेश नीति है, पर डोकलाम को ही देख लीजिए। जो चीन 10% था वो 90 % हो गया है। अब कोई 56 इंच की छाती को नहीं पूछता।

यशवंत सिन्‍हा ने दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर कहा कि हम सब अचानक साथ नहीं आए हैं। हम सब कई महीनों से संपर्क में थे और हम सभी देश की वर्तमान स्थिति पर चिंतित हैं। उन्‍होंने कहा कि हमें लगा कि देश की जनता के लिए एक आंदोलन करने की ज़रूरत है और हम वैचारिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हैं।

उन्‍होंने कहा कि हम बापू की समाधि पर गए तो लगा कि बापू का सरकारीकरण हो गया है। हमें अंदर नहीं जाने दिया गया। फिर काफी मानमुनव्‍वल के बाद हमें और मीडिया को अंदर जाने दिया गया। उन्‍होंने कहा कि 70 साल पहले आज के दिन उस महामानव ने देश के लिए अपना बलिदान दिया था। वर्तमान स्थिति में भी देश उन्हीं समस्याओं से ग्रस्त है। अगर आज हम नहीं खड़े हुए तो बापू का बलिदान व्यर्थ जाएगा।

यशवंत सिन्‍हा ने कहा कि न्यायालय में क्या हो रहा है-अब लीपापोती की जा रही है। आरोप क्या था कि कुछ केस को प्रफ़र्ड बेंच पर भेजा जा रहा था। क्या देश की जनता को जानने का हक़ नहीं है ? मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, उसका हाल आप देख ही रहे हैं। जो जांच एजेंसियां हैं सीबीआई, इनकम टैक्स आदि को किसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है। औद्योगिक विकास कम है और हमें देश के 60 करोड़ किसानों की फिक्र है। राज्य और केंद्र सरकारों ने किसान को भिखमंगा बना दिया है। किसान को एमएसपी नहीं मिल रही है। ये कभी मुद्दा नहीं बनता है।

घनन घनन घहराए बदरवा

घनन घनन घहराए बदरवा।

सघन बूंद बरसाए बदरवा।।

धरती तपत कण कण भए व्याकुल

जीव जंतु उपवन भए अाकुुल

सबकी प्यास बुझाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

दामिनि दमक दमक  चिग्घारै

दादुर अाैर पपीहा पुकारै

सबके मन काे भाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

धूप लजाकर जब  छिप जावै

ठंडी ठंडी पवन चलावै

गर्मी का ताप नसाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

प्रेम की ज्वाला बूंद की माला

दूर गगन से हुअा उजाला

मन में ज्याेत जगाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

खेती अाैर किसानी लेकर

सब फसलाें की जवानी लेकर

धरती हरी बनाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

 

माैसम के सब  मिजाज लेकर

संगीत का भी रियाज लेकर

देसराग दे जाए बदरवा।

घनन घनन घहराए बदरवा।।

सीएम नीतीश के काफिले पर क्‍यों हुआ हमला

बक्सर।

विकास कार्यों में भेदभाव का आरोप लगाकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काफिले पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया। पथराव में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए और सीएम को किसी तरह वहां से सुरक्षित निकाला जा सका। वह विकास समीक्षा यात्रा के लिए बक्सर जिले के नंदन गांव पहुंचे थे। पिछली बार भी सीएम नीतीश की विकास समीक्षा यात्रा के दौरान चौसा में कुछ ऐसा ही हुआ था।

कुछ असामाजिक तत्वों ने सीएम के कारकेड पर हमला कर दिया और जमकर पत्थरबाजी की, जिससे काफिले में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और गाड़ी लेकर भाग खड़े हुए। इस घटना में कई सुरक्षाकर्मी घायल हो गए।

गांव के ही चमटोली के लोगों का कहना था कि विकास केवल मुख्यमंत्री को दिखाने के लिए हुए, गांव के ही दूसरे इलाकों में कुछ नहीं हुआ। विरोध दायरे में था,  अचानक काफिले पर कुछ असामाजिक तत्व पत्थर चलाने लगे। आधा साइज के ईंट चलने से कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। काफिले में भगदड़ की स्थिति मच गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि सात निश्चय कार्यक्रम के तहत गांव में कोई काम नहीं हुआ। इसी को लेकर ग्रामीण विरोध जता रहे थे और सीएम को गांव लाने की मांग कर रहे थे। घटना के बाद सीएम नीतीश कुमार को गांव से सुरक्षित निकालकर वहां से दो किलोमीटर दूर एक फॉर्म पर ले जाया गया, जहां उन्‍होंने सभा को संबोधित किया।

सीएम को अहिनौरा में गार्ड ऑफ आनर दिया गया, जिसके बाद सीएम ने अपना भाषण पढ़ना शुरू किया और कहा कि जिस शादी में दहेज लिया जाता हो उस शादी में ना जाएं। उन्होंने दहेज और बाल विवाह को समाज से खत्म करने की बात कही।

उन्होंने लोगों से वादा किया कि जो भी वादा किया है वो पूरा करेंगे। इतना कहना था कि लोगों ने उन्हें काला झंडा दिखाया और अपना विरोध प्रकट किया। वहीं इससे पहले महादलित महिलाओं ने सीएम के काफिले को रोकने की भी कोशिश की थी।