नोटबंदी के बाद मिली भयानक बेरोजगारी की सौगात

देश के तीन करोड़ कामगारों में चार लाख बेरोजगार, लाइनों में लगने वाले 100 से अधिक लोगों की मौत

नौकरी को परिवार के मुखिया का स्‍थान प्राप्‍त है। किसी परिवार के कामगार की नौकरी जाती है तो वह परिवार एक तरह से अनाथ हो जाता है। लेकिन पता नहीं क्‍यों सरकारें इस मुद्दे की अनदेखी करती रही हैं। कांग्रेस तो इसी मुद्दे पर सत्‍ता में आई थी। आज की बात करें तो केंद्र सरकार की नोटबंदी के 50 दिन देश पर भारी पड़े हैं जिसके नतीजे आने शुरू हो गए हैं, जबकि कालाधन कितना बाहर आया उस पर सरकार मौन है। इस संदर्भ में गूगल किया तो पता चला कि देश के लगभग तीन करोड़ कामगारों में लगभग चार लाख बेरोजगार हो गए। 8 नवंबर को लागू की गई नोटबंदी के बाद लाइनों में लगने वाले 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई। आर्थिक विकास दर घटी सो अलग। झारखंड और ओडिशा जैसे प्रदेशों के दिहाड़ी कामगारों की आय प्रतिदिन 50 रुपये तक घटी है। उत्‍तर भारत के प्रदेशों में रबी की फसल को 41 प्रतिशत का झटका लगा है। शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और विवाह कार्यक्रमों की बात करें तो जनजीवन अस्‍तव्‍यस्‍त हो गया।    

वरिष्‍ठ पत्रकार राय तपन भारती अपनी फेसबुक वाल पर लिखते हैं-केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करने से मोदी समर्थक बंदरों की तरह उछलने लगते हैं। उन्हें नहीं पता कि सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने से सरकार का ही भला होता है। तीन साल पहले नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव में कहा था कि देश में बेघरों को घर देना हैरियल एस्टेट को मजबूत बनाना है जिससे लाखों को रोजगार मिलता है। इस सेक्टर से कम से कम 350 तरह के उद्योगों को काम मिलता है। परंतु बीते तीन साल में इस रियल एस्टेट को बर्बाद करने में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। तरह तरह के टैक्स का बोझ। बैंकों से लोन लेने में कठिनाई। बेईमान बिल्डरों पर सख्ती में देरी आदि। नोटबंदी में करंसी संकट होने पर रियल एस्टेट के साथ ही मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के लेबर भी अपने-अपने गांव लौट गए। शहरों और गांवों में मकानों के निर्माण कार्य लगभग ठप हैं। निवेश करने वाली जनता रो रही है और सरकार सो रही है। सरकार बिल्डर के बजाय फ्लैट खरीदारों की भलाई की सोचे।

मजीठिया मंच ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है-खबर है कि हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स के चार संस्‍करण बंद किए जा रहे हैं। इसका ताल्‍लुक नोटबंदी से है या फिर मजीठिया से, कहा नहीं जा सकता। लेकिन एक बात जरूर है कि प्रबंधन और मालिकान के उल्‍टे सुलटे और जन विरोधी विज्ञापन प्रधानता वाली नीति अपनाने का हश्र तो यही होगा। लेकिन मालिकों के इस गलत और गैरजिम्‍मेदारीपूर्ण व अनैतिक नीति का आम कर्मचारी क्‍यों फल भुगते। सरकार को चाहिए कि ऐसे मालिकों से कठोरता से निपटे। ये मालिक जब मन होता है, संस्‍करण निकाल देते हैं और विज्ञापन व चमचागीरी का माल हड़प लेने के बाद दोष कर्मचारियों पर मढ़ कर अखबार बंद कर देते हैं। पिछले एक दशक से ज्‍यादा समय से हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स और हिन्‍दुस्‍तान की मालकिन श्रीमती शेाभना भरतिया ने अपने इन दोनों प्रतिष्ठित अखबारों को अन्‍य अखबारों की तरह ही विज्ञापन पत्र में तब्‍दील कर दिया है। 

अरुण माहेश्वरी ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है-भारी उन्माद के साथ नोटबंदी की घोषणा और पिछले दो महीने से अब तक चल रहे अर्थव्यवस्था के विध्वंस के तांडव के बाद प्रधानमंत्री मोदी तो शिवशंभु की शांत मुद्रा में आ गए हैं। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक (7-8 जनवरी 2017)  को उन्होंने एक ढोंगी साधू के सत्संग का रूप देकर अपने सभी नेताओं को दरिद्र नारायण की सेवा का व्रत लेने और जनता के बीच जाकर मोदी भजनाम में डूब जाने का प्रवचन दिया और उनकी भक्ति की इसी मूर्च्छा की ओट में राजनीति के इस भव जगत से मोक्ष की अपने भावी योजना का अंदेशा भी दे दिया। वहींझोली लेकर फ़क़ीरी में निकल जाने वाली योजना का! लेकिन अफसोस कि अपने पीछे वे अपनी जिन सभी पटरानियों को रोता-कलपता भारी कष्ट में छोड़ कर जाएंगे उनमें एक सबसे ख़ूबसूरत और ताज़ा-तरीन चेहरे वाला मासूम सा नाम भी है आरबीआई के गवर्नर श्रीमान उर्जित पटेल का।

मोदी सरकार ने नोटबंदी की कुमति का ठीकरा अपनी इसी पटरानी की बेजा माँग पर फोड़ा है। पीयूष गोयल नामक शेयर बाज़ार से उठ कर केंद्रीय मंत्रिमंडल तक पहुँचे तोते की तरह शेयर-दलालों की भाषा को रटने वाले मंत्री ने संसद के मंच पर कहा था कि प्रधानमंत्री ने नवंबर को टेलिविजन के चैनलों पर नोटबंदी का जो ताता-थैय्या नृत्य का प्रदर्शन किया थावह इसी उर्जित नामक पटरानी की ज़िद का परिणाम था।बहरहालआज की सबसे ताज़ा खबर यह है कि एक ओर जब प्रधानमंत्री ने गोपी चंदन लगा कर कंठीधारी साधू का बाना पहन लिया है और ग़रीब प्रभु की सेवा के कीर्तन में मगन हो गए हैंतभी बेचारे उर्जित को संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने अपराधी के कठघरे में आने और नोटबंदी की अपनी बेजा ज़िद के अपराध के लिए सफ़ाई देने का फ़रमान पहुँचा दिया है।लोक लेखा समिति के प्रमुख की ओर से आगामी 28 जनवरी को उन्हें बुलाया गया है और इस बुलावे के साथ ही उनके सामने दस सवाल भी रखे हैंजिन पर उन्हें समिति को संतुष्ट करने के लिए कहा गया है। उन्हें बताना है कि नोटबंदी के इस महा-यज्ञ मेंइस दौरान रिजर्व बैंक की गुलाटियां ले रही नीतियों और इस पूरे विषय से जुड़ी संदेहास्पद गोपनीयता में आपकीअर्थात रिजर्व बैंक की क्या भूमिका रही है?

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