सरकार को समझना है तो समझें मीडिया के हालात

नई दिल्‍ली। आपके पास सुबह सुबह जो खबरें आती हैं और चाय की चुस्कियों के साथ आपको अपडेट करती हैं, क्‍या आपने कभी सोचा कि ये कितने संघर्षों के बाद आप तक पहुंचती हैं। सघन पत्रकारिता के बावजूद देश के एक जवान को सिस्‍टम की खामियों की जानकारी आम जनता को देने के लिए आगे आना पड़ा। क्‍या आपने कभी कल्‍पना की कि पत्रकारिता न होती तो सिस्‍टम किस प्रकार आपके हक को चट कर जाता। एक पत्रकार का जीवन कितने संघर्षों से भरा होता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह सिस्‍टम से लड़ता है, अपने संस्‍थान के मालिकों की मुनाफाखोरी से संघर्ष करता है और अपनी आर्थिक विषमताओं को नजरअंदाज कर दिन रात आपके लिए खबरें तैयार करने में जुटा रहता है।

ईमानदार पत्रकार आर्थिक विषमताएं इसलिए झेलने को अभिशप्‍त है कि वह सभी की आर्थिक विषमताएं दूर करने के लिए आवाज उठाता है, लेकिन उसकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। न सरकारें न आम जनता। सरकारी वेतनमानों की घोषणा होती है तो उसके आकर्षण से महंगाई बढ़ जाती है, लेकिन पत्रकारों के लिए जितने भी वेज बोर्ड गठित किए गए उनमें से किसी का भी लाभ पत्रकारों को नहीं मिला। जब से मैं पत्रकारिता में हूं, केवन नाम सुना है-पालेकर अवार्ड, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और मजीठिया आयोग। इन आयोगों के बारे में केवल सुना गया है, किसी भी मीडिया में इनकी चर्चा तक नहीं हुई। कारण, मीडिया देश के बड़े बड़े लालाओं के चंगुल में है। ये लाला लोग जिन पत्रकारों की मेहनत के बल पर लाखों करोड़ों और अरबों में खेल रहे हैं, उन्‍हें वेजबोर्ड के अनुसार सैलरी नहीं देना चाहते। यही वजह है कि किसी की क्‍या मजाल जो अखबार में पत्रकारों के किसी वेजबोर्ड की चर्चा तक कर दे। दूसरी बात यह कि ये लाला लोग सरकार में उच्‍च पदों पर बैठे नेताओं से समझौता भी करते हैं और पत्रकारिता की हत्‍या कर तरह तरह के लाभ उठाते हैं। किसी ने कहा था कि पत्रकारिता को सरकार से उतना खतरा नहीं है, जितना मीडिया घरानों के इन लालाओं से है।

मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन न दिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक इसलिए पहुंचा कि ये लाला लोग अर्थव्‍यवस्‍था की पारदर्शी हो रही प्रवृत्ति से डर गए थे और खुद ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए कि पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड गठित किए जाने की व्‍यवस्‍था ही समाप्‍त कर दी जाए। भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि इन लालाओं के मुनाफाखोरी और लालची अरमान पूरे नहीं हुए और सुप्रीम कोर्ट में इनकी बात नहीं मानी गई। फिर भी कुछ जुझारू पत्रकार मजीठिया के लिए वर्षों से सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए उन्‍हें इन लालाओं की प्रताड़ना भी झेलनी पड़ रही है। सैकड़ों पत्रकारों को नौकरी से बेदखल कर दिया गया है। इसी डर से अधिकांश पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट जाने तक की जुर्रत नहीं की।

इसलिए पत्रकारिता के हालात को समझना होगा। पत्रकारों को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन उनके हालात को झेल पाना बहुत ही कठिन। जरा सोचिए, समाचारों से रूबरू होने के लिए आप जो खर्च करते हैं, अखबार का बिल देते हैं, न्‍यूज चैनल को पैसा देते हैं, इंटरनेट समाचारों के लिए डाटा का खर्च उठाते हैं और अगर आप व्‍यापारी हैं तो मीडिया में विज्ञापन भी देते हैं और उसका भारी भरकम खर्च उठाते हैं, वह सब मीडिया घराने के लाला लोग अकेले चट कर जाते हैं और उलटे पत्रकारिता को कलंकित करने से भी बाज नहीं आते। तो आपका नुकसान कौन कर रहा है-पत्रकार या ये मुनाफाखोर मीडिया घराने।

सरकार भी पत्रकारों का साथ नहीं देती। वह तो मीडिया घरानों के साथ खड़ी नजर आती है। विपक्ष के भी नेता स्‍वार्थवश पत्रकारों का साथ नहीं देते, क्‍योंकि पत्रकारिता मीडिया घरानों के चंगुल में फंसी है। मीडिया घराने सरकार और विपक्ष दोनों से लाभ लेते हैं और बदले में सरकार व विपक्ष का झूठा यशोगान करते हैं। इसी यशोगान के भ्रम में मतदाता यह समझ नहीं पाता कि सरकार ठीक काम कर रही है या नहीं। और चुनाव होता है तो हम गलत फैसला कर जाते हैं। इस प्रकार सारी व्‍यवस्‍था गलत हाथों में पांच साल के लिए पहुंच जाती है।

कुछ लालची पत्रकार भी मतदाता को भ्रमित करने के खेल में शामिल हो जाते हैं, जो पत्रकारों की ऐसी इमेज बना देते हैं कि आम आदमी को हर पत्रकार लंपट, दलाल और भ्रष्‍ट नजर आने लगता है। इसलिए हालात को समझे बिना आप व्‍यवस्‍था को ठीक नहीं कर सकते। व्‍यवस्‍था को ठीक करना है तो पत्रकारिता को ठीक करना होगा। पत्रकारिता को ठीक करने के लिए आम जनता से भी आवाज उठनी चाहिए। आखिर पत्रकारिता है किसके लिए…। आम जनता के लिए या इन लालाओं की मुनाफाखोरी के लिए। आम जनता यदि तय कर ले कि उसी मीडिया को सब्‍सक्राइब किया जाएगा जिस मीडिया हाउस में पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन दिया जाता हो। आप ऐसा करेंगे तो निश्चित तौर पर पत्रकारिता ठीक हो जाएगी और तब कोई भी नेता आपको मूर्ख नहीं बना पाएगा।

इस दृष्टि से वरिष्‍ठ पत्रकार राय तपन भारती ने जिस ओर ध्‍यान आकर्षित किया है, उधर किसी ने सोचने की जहमत तक नहीं उठाई है। उनके फेसबुक वाल का संदर्भ लें तो इधर दो-तीन सालों से यह प्रवृत्ति बढ़ रही है कि बिना जाने-समझे कुछ लोग तमाम मीडिया वालों को भ्रष्ट और बेईमान पत्रकार घोषित कर देते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट पढ़कर मन बहुत खिन्न हो जाता है। मुझे तरस आती है कि वे मीडिया के लोगों के संघर्ष को एकदम नहीं जानते। उनकी वास्तविक स्थिति से एकदम अवगत नहीं हैं। सारे पत्रकार टीवी खबरों के धुरंधर रजत शर्मा की तरह सरकार की चाटुकारिता नहीं कर सकते। संभव हो कि हजारों में एकाध भ्रष्ट और बेईमान हों। पर इनकी संख्या नगण्य है।

वे भला बहुतायत पत्रकारों के कष्ट और संघर्ष को क्या समझें? मेरे इंजीनियर पुत्र ने नौकरी आरंभ करने के अगले साल ही अपने अच्छे वेतन की बदौलत एक छोटी कार खरीद ली। पर 32 साल पहले जब मैंने रांची से पत्रकारिता का कैरियर आरंभ किया तो मोपेड से अपने अखबार के दफ्तर जाता था। दो साल बाद ही स्कूटर खरीद सका। वह भी आधी रकम पिताजी से लेनी पड़ी। अपनी नौकरी का 18 साल बीता तो जिंदगी में पहली कार नसीब हुई। यानी 14 साल से ही मैं कार चला पा रहा हूं। मेरी जीवनसंगिनी अगर बिजनेस के मैदान में नहीं उतरती तो मुझे भी औरों की तरह आर्थिक संघर्ष अधिक करना पड़ता। बच्चों के सही नौकरी में आने से भी परिवार को मजबूती मिली। हमारा परिवार आज अच्छा-खासा आईटी रिटर्न भी भरता है।

दूसरी तरफ, मेरे अनगिनत पत्रकार मित्रों के पास अब भी कार नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर आप सबको बेईमान क्यों बताते हैं? क्या टीवी चैनलों पर अंजना ओम कश्यप जैसे चमचमाते न्यूज एंकरों को देखकर आपने सभी पत्रकारों को संपन्न समझ लिया है? तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। कृपया अपनी जानकारी को आज ही ठीक कर लें।

पत्रकार का काम शासन और शासक के गलत कार्यों की आलोचना करना होना ही चाहिए। हम सरकार की अनावश्यक तारीफ नहीं कर सकते। मीडिया चमचागीरी करेगा तो लोकतंत्र ध्वस्त हो जाएगा।

मीडिया में प्रोवीडेंट फंड कटवाने वाले पत्रकारों को ही पेंशन मिलती है वह भी अधिकतम 3 हजार रुपये और वह भी 60 साल की उम्र से। अगर 40 या 45 की उम्र में नौकरी छूट गई तो सरकार या मीडिया संस्थान से उसे कोई पेंशन नहीं मिलती। हजारों पत्रकारों की आर्थिक हालत बहुत ही खराब है।

सरकार और समाज ने मीडिया के साथ सौतेला व्यवहार रखा तो नई पीढ़ी मीडिया में नहीं आएगी। वैसे भी 90 % मीडिया संस्थान मुद्रास्फीति की दर के मुताबिक पत्रकारों को वेतन और भत्ता नहीं देते। पता लगाइए, कितनी मीडिया कंपनियां वेतन आयोग की सिफारिश मानती हैं? सच जानने के बाद ही मीडिया पर कुछ लिखिए।

रवि पी शर्मा कहते हैं, मेरा शुरू से मिडिया कर्मियों से नजदीकी संपर्क रहा। उनमें से अधिकतर की आर्थिक स्थिति से अवगत हूँ। हमारे एक चचा (पिता जी के मित्र) जिनको प्यार से हम लोग चचा कहते हैं। अंग्रेजी अख़बार ट्रब्यून से सेवा निवृत्‍त हैं। उनकी स्थिति से परिचत हूँ। पूर्व में किसी प्रकार की पेंशन व्यवस्था भी नहीं थी जिस कारण बुढ़ापे में अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

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