चरखा पर चरचा: हंगामा है क्‍यूं बरपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बचकानी हरकत पर लोग हंगामा कर रहे हैं। बचकानी हरकत इसलिए कि जैसे राष्‍ट्रीय पर्वों पर बच्‍चे महात्‍मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों की वेशभूषा में अपने स्‍कूल के कार्यक्रम में शामिल होते हैं, ठीक उसी अंदाज में मोदी जी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर व डायरी में नजर आ रहे हैं। बात तब और बढ़ गई जब हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने महात्‍मा गांधी के बारे में विवादित बयान दे दिया।

दरअसल, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के 2017 के कैलेंडर में कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने कई लोगों को चौंका दिया है। केवीआईसी डायरी के नए साल के कैलेंडर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगी है। जहां इस कैलेंडर पर आपत्ति जताई जा रही है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि पहले कभी भी केवीआईसी के किसी सामान पर महात्मा गाँधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर डायरी पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी।

हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने ने कहा कि जिस दिन से नोटों पर गांधी की तस्‍वीर लगी है तब से रुपये की कीमत गिरने लगी है। हालांकि विवाद होने के बाद उन्‍होंने बयान वापस ले लिया। वहीं भाजपा ने भी अपने आप को इस बयान से किनारे कर लिया है। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। पार्टी का इससे लेना-देना नहीं है। अपने बयानों को लेकर अक्‍सर विवादों में रहने वाले हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा, गांधी जी के नाम से खादी पेटेंट थोड़े ही हो गया। जब से खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ गया खादी डूब गई। खादी उठ ही नहीं पाई। गांधी का ऐसा नाम है जिस दिन से नोट पर चिपक गए, उस दिन से नोट की कीमत गिर गई। तो अच्‍छा किया है गांधी की तस्‍वीर हटा के मोदी के चित्र को लगा दिया गया है। मोदी ज्‍यादा बेटर ब्रैंड नेम है। मोदी का नाम लगने से खादी की सेल 14 प्रतिशत बढ़ी है।

जब उनसे पूछा गया कि आपकी सरकार ने जो नए नोट छापे हैं उनमें भी गांधी की तस्‍वीर है। इस पर विज ने जवाब दिया कि धीरे-धीरे हट जाएंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि कैलेंडर पर बापू की तस्वीर होनी ही चाहिए। यह कहना गलत होगा कि बापू की तस्वीर को पीएम मोदी ने रिप्लेस कर दिया है।

वहीं महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। वहीं भाजपा ने सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। तुषार गाँधी ने कहा-हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। ऐसा कैसे कर सकते हो, कुछ तो शर्म किया करो। टीवी पर ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई बुराई नहीं होती है।

उन्‍होंने कहा कि जिस तरह से भ्रष्ट राजनेता पैसे का इस्तेमाल गलत कार्यों के लिए करते हैं, उससे पहले अच्छा होगा बापू नोट से हटा दिए जाएं। पीएम नरेंद्र मोदी पॉलीवस्त्रों के प्रतीक हैं जबकि बापू ने अपने बकिंगम पैलेस के दौरे के दौरान खादी पहनी थी न कि 10 लाख रुपये का सूट। आप हाथ में चरखा लेकर बापू के हत्यारे नाथूराम को दिल में बसाकर दोनों कार्य नहीं कर सकते हो।

चर्चित साहित्‍यकार उदय प्रकाश के शब्‍दों में, चरखे से सूत कातना पूँजी और मशीनी टेक्नोलॉजी की तानाशाही का अहिंसावादी, विनम्र, एकाग्र और मानवीय प्रतिरोध था। वहीं चर्चा में रहने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है। कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था। कोई उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है। मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिए गए और खलनायक की तरह दिखाए जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं। इसका स्वागत होना ही चाहिए।

शंभूनाथ शुक्‍ल की फेसबुक वाल कहती है-न वो चरखा समझे न ये समझे। चरखा तो बापू ही समझते थे और चरखे का मतलब कोई सूत कातना भर नहीं था। चरखा एक विचार था और खादी उसका प्रतिफलन। बापू ने न सिर्फ चरखा कातना सिखाया बल्कि नमक बनाना और साबुन बनाना भी। जरा थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि पचास साल पहले हर गांव में जो ऊसर होता था उसकी मिट्टी से कपड़े धोए जाते थे और महुआ से साबुन तथा तेल व घी। मगर उस विचार को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा जब गांधी जी जिंदा थे और उन्होंने चरखे से स्वावलंबन सिखाया। मेरी चाची, जो अब लगभग 90 साल की हैं आज भी जब समय मिलता है तब चरखा कातती हैं और अपने ही एकमात्र पेड़ महुआ के फूल चैत में लगन से बिनती हैं और उससे बनता है साबुन तथा घी। आज भी वे तालाब में अपने कपड़े ऊसर की मिट्टी से ही धोती हैं। उन्होंने न कभी सनलाइट खरीदा न लाइफबॉय और न ही आज का घड़ी।

प्रतिक्रिया स्‍वरूप राम सागर का कहना है-बड़ा अच्छा लगता है जब कोई गाँव,  देहात की बात करता है, विशेष कर गुजरे जमाने की, उस जमाने के रहन-सहन और रीति-रिवाजों की। बड़े दुख की बात है कि 15-20 वर्षों में आपकी चाची की पीढ़ी न रहेगी तो उस जमाने के क्रियाकलाप आप जैसों की पीढ़ी के लिए केवल यादें बन कर ही रह जाएंगी। हमारी प्राचीन जीवनशैली पर सम्भवतः न पुस्तकें ही लिखी जा रही हैं और न ही फिल्में बन रही हैं। कुछ पुरानी फिल्मों में प्राचीन ग्राम्य जीवनशैली के थोड़े-बहुत दर्शन होते हैं। उनमें से कुछ नाम हैं – दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, सौदागर (अमिताभ बच्चन, नूतन, पद्मा खन्ना अभिनीत), शोले। और भी ऐसी कुछ फिल्में होंगी। आप और आपके पाठक मुझसे अधिक जानते होंगे। काश नई पीढ़ी में कुछ फिल्म निर्माता अपने देश की पुरानी ग्राम्य जीवनशैली और सांस्कृतिक धरोहरों को फिल्मों के माध्यम से संजो पाते।

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