टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय की सच्चाई-एक

संस्करणों के बंद होने का सच 

मजीठिया मंच

बिहार, झारखंड, दिल्ली और दक्षिण भारतीय शहरों में हाल में शुरू हुए अखबारों के संस्कंरण क्या‍ विस्तार नहीं है? टाइम्स ऑफ इंडिया कहता है- पिछले पांच वर्षों से बड़े दैनिक अखबारों के संस्करण बंद हो रहे हैं, कर्मचारियों पर खर्च बढ़ा है और इसलिए इन्होंने अपना विस्तांर मजबूरन रोक रखा है।

हकीकत क्या है…
टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऐसे एक भी अखबार के बंद होने की न तो सूची पेश की है और न कारण। हां उसका इशारा अपने प्रतिद्वंद्वी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के पिछले दिनों इंदौर, भोपाल और रांची के संस्करणों के बंद किए जाने की ओर है। इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता के कुछ संस्करण बंद हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है केवल हिन्दुास्तान टाइम्स और एक्सप्रेस ही अखबार नहीं है। इस दौरान दर्जनों अखबार नई दिल्ली और देश भर के कई राजधानी और छोटे-बड़े शहरों में उग आए हैं। बड़े अखबारों के संस्करण शहर के आधार पर छापे जा रहे हैं। कुछ उदाहरण यहां पेश हैं।

देशबंधु ,राजस्थान पत्रिका, दक्कन हेराल्डे के अलावा अन्य दक्षिण भारत के कुछ अखबार दिल्ली में छपने लगे हैं। स्टेटसमैन बंद नहीं हुआ है, नेशनल हेराल्ड कोई भी परिस्थिति हो लेकिन फिर से शुरू हो गया है। राष्ट्री्य सहारा का हाल बेहाल है लेकिन छपना जारी है, भले ही कर्मचारियों को वेतन न देने के लिए पैसा न हो उसके पास लेकिन तिहाड़ जेल में बंद अपने मालिक की तीमारदारी में कोई कमी नहीं की जा रही है।

इतना ही नहीं, राजस्थान पत्रिका के कई संस्करण दक्षिण भारत के कई शहरों में शुरू किए गए हैं। कहने का मतलब पिछले पांच वर्षों में कुछ बड़े दैनिकों के एकाधिकार पर हमला हुआ है और बड़े पैमाने पर (चाहे कारण जो रहे हों अखबारों का विस्तार हुआ है। सबूत के तौर पर आरएनआई की रिपोर्ट को लिया जा सकता है। जिस अखबार के संस्करणों के बंद होने की बात की जा रही है उसी अखबार समूह के हिन्दी के अखबार ने उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में कई नए संस्करण शुरू किए हैं। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर जैसे अखबारों ने बड़े पैमाने पर इस दौरान अपना विस्तार किया है। प्रभात खबर भी झारखंड से निकल कर बिहार के कई शहरों से छपने लगा है। दैनिक अखबारों की यह प्रगति और विस्तार टाइम्स ऑफ इंडिया को क्यों नहीं दिखाई पड़ रही, इसका हमें कारण खोजना चाहिए।

विस्तार के एक और पहलू पर हमें गौर करना चाहिए। इन सभी अखबारों के मालिकों ने बड़े पैमाने पर इंटरनेट संस्करण शुरू किए हैं। कुछ तो मजीठिया वेज बोर्ड से बचने के लिए भी और अधिक तकनीकी विकास की मजबूरी के कारण भी। साथ ही इन अखबारों ने कई तरह के अन्य गैर अखबारीय धंधे भी शुरू किए हैं और अपने अखबारीय कर्मचारियों को इन नई कंपनियों में भर्ती दिखा रहे हैं। (मजीठिया वेज बोर्ड न लागू करने के आरोप में सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे अवमानना के केस 411/ 2014, अभिषेक राजा एवं अन्य बनाम संजय गुप्ता के मामले में दायर हलफनामों तथा सबूतों से भी हमारे तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया को यह विस्तार न जाने क्यों नजर नहीं आ रहा।

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