जानें, ‘जागरण’ कैसे चलाता है ‘धंधा’

धंधे की बलिबेदी पर कुर्बान कर दिए गए शशांक शेखर त्रिपाठी  

श्रीकांत सिंह

एक अखबार के रूप में दैनिक जागरण समाप्‍त हो चुका है। लगातार उसका सर्कुलेशन गिर रहा है। विज्ञापन का भी प्रवाह थम गया है। आधे तिहाई दाम पर विज्ञापन बुक किए जाते हैं। एक सूत्र की मानें तो पहले जो विज्ञापन 90 लाख रुपये के होते थे, उन्‍हें 90 हजार में भी छाप दिया जाता है। विज्ञापनदाता भी समझ गए हैं कि जागरण अब फर्जीवाड़े का अड्डा बन चुका है। तो इस आधार पर जागरण जिंदा है। क्‍योंकि अब फर्जीवाड़ा उसका धंधा है। अपने इसी फर्जीवाड़े को चलाते रहने के लिए जागरण प्रबंधन ने जबरन शशांक शेखर त्रिपाठी को बलि का बकरा बना दिया है। जागरण के किसी भी संपादक की क्‍या मजाल जो प्रबंधन की इच्‍छा के बगैर कुछ भी छाप सके।

बता दें कि शशांक शेखर त्रिपाठी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, जो आज तक, दैनिक हिंदुस्‍तान और दैनिक जागरण में समय-समय पर वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं। उन्‍होंने एक जमाने में वर्तमान स्‍टेट प्रभारी विष्‍णु प्रकाश त्रिपाठी को नौकरी भी दी थी। उनसे इतनी बड़ी गलती हो सकती है, यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। उनसे गलती कराई गई है। इसलिए इस गलती के लिए सीधे तौर पर संजय गुप्‍ता जिम्‍मेदार हैं। अपने लोगों को फंसाने का जाल बिछाने के लिए ही जागरण में पिछले कुछ दिनों से स्‍टेट प्रभारियों के नाम प्रिंट लाइन में छपने लगे हैं। यह सब धंधा चलाने के लिए जागरण प्रबंधन ने किया है। वैसे यह बात भी गले से नीचे नहीं उतर रही है कि शशांक शेखर त्रिपाठी को हटा ही दिया जाएगा। जागरण प्रबंधन चुनाव आयोग को मूर्ख बनाने के लिए भी कोई नाटक रच सकता है क्‍योंकि नाराज प्रदेश सरकारों को मनाने के लिए पहले भी ऐसा होता आया है। अब अगला शिकार कौन होगा, यह देखने वाली बात होगी, क्‍योंकि पांच ऐसे तरीके हैं जिनका इस्‍तेमाल कर प्रत्याशियों और पार्टियों से वसूली की जाती है।

  1. विज्ञापन के रूप में चंदा देने के लिए प्रत्‍याशियों पर दबाव बनाया जाता है, जिसके लिए विज्ञापन विभाग नहीं रिपोर्टरों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  2. खबरनुमा विज्ञापन के रूप में भी जमकर वसूली की जाती है। कभी कभी तो बड़े आकार में इंटरव्‍यू भी प्रकाशित किए जाते हैं।
  3. खबर के रूप में वसूली करने के लिए भी जागरण प्रबंधन ऐसे भोले भाले रिपोर्टर नियुक्‍त करता है जो उसके धंधे को आगे बढ़ा सकें। जो रिपोर्टर अपना जमीर बचाने के लिए वसूली नहीं कर पाता, उसे तुरंत हटा दिया जाता है।
  4. चुप रहने के रूप में- मतलब प्रत्याशी के बारे में न नेगेटिव न पॉज़िटिव, कोई खबर नहीं चलाई जाएगी।
  5. केवल सकारात्मक खबर छापने के रूप में जागरण का धंधा बहुत पुराना है। इसके लिए जागरण में महिमा मंडन की प्रतिभा विकसित की गई है, जिसके तहत फुल पेज के इंटरव्‍यू प्रकाशित किए गए हैं।

धंधे का एक और तरीका है जो टीवी में खूब लोकप्रिय है, ‘कम्प्लीट पैकेज’। इसके तहत चुनाव के दौरान पार्टी को मुश्किल सवालों से बचाया जाता है। पर यह डील चुनाव से साल-छह महीने पहले हो जाती है, जिसे चैनल का रुझान कहा जाता है। रुझान का सबसे चर्चित मॉडल है, मुश्किल सवालों के वक्त उस पार्टी को या उससे जुड़े प्रतिनिधि को ब्रेक के बाद दिखाया जाना। आमतौर पर दर्शक ब्रेक से पहले ही मुश्किल सवालों और उसपर प्रतिनिधि की ओर से आयी राय सुनकर अपना मिजाज बना लेता है।

इसका दूसरा फॉर्म है टीवी डिबेट। जिस पार्टी या प्रतिनिधि से पैसा लिया गया है उसके पक्ष के तीन पैनलिस्ट बैठाना और जिससे नहीं लिया है उसके सबसे कमजोर लोगों को बुलाना या 3 के मुकाबले 1 को बुलाना।

दैनिक जागरण के न्यूज पोर्टल जागरण डॉट कॉम ने जिस तरह यूपी इलेक्शन के पहले चरण के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित कर आचार सहिता की धज्जियां उड़ाई थीं, उसके बाद चुनाव आयोग की ओर से सख्त एक्शन होना लाजिमी था।

एक्जिट पोल को लेकर जागरण मैनेजमेंट ने वेबसाइट के संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी को साइडलाइन कर उनकी जगह फिलहाल नोएडा ऑफिस में डिप्टी एडिटर फीचर की जिम्मेदारी संभाल रहे कमलेश रघुवंशी को दी है। कमलेश रघुवंशी ढाई दशक से अधिक समय से जागरण परिवार का हिस्सा हैं। लखनऊ, जागरण से अपनी पारी शुरू करने वाले कमलेश दिल्ली और पंजाब में बतौर स्थानीय संपादक कार्य कर चुके हैं। फीचर विभाग की जिम्मेदारी उन्होंने पिछले साल संभाली है। उससे पहले वे रांची में बतौर झारखंड  स्टेट हेड के तौर पर जागरण का नेतृत्व कर रहे थे। वे फीचर के साथ-साथ ऑनलाइन का प्रभार भी संभालेंगे।

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