अखबार मालिकों के धमकाने पर मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

‘पत्रकार आवाज’ से साभार।

तीन चार महीने पहले ही हिंदुस्‍तान नोएडा ने अपने मशीन के 15-16 कर्मचारियों से बर्खास्‍तगी और ग्रेच्‍युटी आदि रोकने की धमकी देकर जबरन इस्‍तीफा ले लिया और कई अन्‍य पर इस्‍तीफा देने का दबाव बनाया हुआ है। मजबूरी में इस्‍तीफा देने वाले वे साथी अब सड़क पर हैं या कोई छोटा-मोटा काम कर गुजर बसर कर रहे हैं। वहीं, भास्‍कर ने भी जबरन इस्‍तीफा लेने का अभियान चलाया हुआ है। यहां बस इतना ही अंतर है कि जिन साथियों के इस्‍तीफे लिए गए हैं उनमें से ज्‍यादातर अभी संस्‍थान में ही कार्यरत हैं। इनके इस्‍तीफों का कहां और कैसे इस्‍तेमाल होगा किसी को नहीं पता। ऐसा ही कुछ अन्‍य संस्‍थानों में भी चल रहा है या चल चुका है। ‘आज समाज’ जैसे कुछ समाचार-पत्रों में तो स्‍थायी कर्मियों को तीन साल के लिए अनुबंध पत्र दे दिए गए।

इस्‍तीफा देकर क्‍या खो रहे हैं आप

प्रबंधन एक सोची समझी नीति के तहत काम कर रहा है। उसे पता है 7 फरवरी 2014 में मजीठिया वेजबोर्ड और वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 को खत्‍म करने को लेकर सिविल पिटिशन 246/2011 के साथ सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी अन्‍य सभी याचिकाएं खारिज हो गई थीं। उसके बाद उनकी रिव्‍यू पिटिशन भी खारिज हो गई। ऐसे में उनको अपने संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड आज नहीं तो कल लागू करना ही पड़ेगा और उन्‍हें अपने कर्मियों को मजीठिया के अनुसार वेतन और एरियर का भुगतान करना ही पड़ेगा। ऐसे में व़े मजीठिया वेजबोर्ड के तहत आने वाले कर्मियों की संख्‍या में कमी करके भविष्‍य में अपने ऊपर आने वाले आर्थिक बोझ को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

यहां आने वाले बोझ शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए किया गया है, क्‍योंकि जिन कर्मियों का वह इस्‍तीफा नहीं ले पाएगा उन्‍हें उसे मजीठिया के अनुसार एरियर तो देना ही पड़ेगा वहीं,  फि‍टमेंट और प्रमोशन के अनुसार व़ेजबोर्ड के सभी लाभ देने पड़ेंगे तब तक जब तक कि वह नौकरी पर रहता है। यानी मजीठिया के अनुसार जो वेतन बनता है वो देना पड़ेगा। आपको समझाने के लिए नीचे एक उदाहरण दे रहे हैं-मजीठिया के अनुसार नवंबर 2011 में ग्रेड ए के समाचार पत्र में एक्‍स श्रेणी के शहर में भर्ती सीनियर सब एडिटर रमेश का 17,000 रुपये बेसिक के हिसाब से 37,761 रुपये मासिक वेतन बनता है, जो कि बढ़ते-बढ़ते मई 2017 में 63,163 रुपये हो जाता है। इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है।

ऐसे में रमेश का नवंबर 2011 से मई 2017 तक का औसत वेतन 25 हजार रुपये प्रतिमाह मान लिया जाए तो ऱमेश को कम से कम 15 लाख रुपये का एरियर संस्‍थान को देना पड़ेगा (इसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये के करीब रात्रि भत्‍ता और पीएफ, एलटीए आदि का अंतर शामिल नहीं है)। इसके अलावा इसका बढ़ा हुआ वेतन अर्थात कम से कम 63,163 रुपये हर माह देने पड़ेंगे और इसके अलावा न चाहते हुए भी मजीठिया के अनुसार हर साल वेतन में बढ़ोतरी और हर पांच साल में एक विशेष इंक्रीमेंट और हर दस साल में एक प्रमोशन देना पड़ेगा। प्रबंधन जानता है कि वेजबोर्ड के अंतर्गत आने वाले रमेश जैसे कर्मियों का वेतन कुछ समय बाद लाख रुपये से ऊपर पहुंच जाएगा। ऐसे में उनकी ग्रेच्‍युटी और पीएफ का एमाउंट भी बढ़ता जाएगा।

इसलिए वे जबरन इस्‍तीफा अभियान चलाए हुए हैं कि एरियर से नहीं बच सकते तो कम से कम बढ़ते हुए वेतनमान पर तो कैंची चला दी जाए। कैसे, इसे भी उदाहरण देकर समझाते हैं।

संस्‍थान ने रमेश के साथ ही उसी तिथि और पद पर भर्ती ओम से मई 2017 में जबरन इस्‍तीफा ले लिया। अब जब संस्‍थान को मजीठिया वेजबोर्ड लागू करना पड़ेगा तो रमेश अपने 15 लाख रुपये के एरियर के साथ कम से कम 21,510 के बेसिक पर 63,163 रुपये वेतनमान के रूप में प्राप्‍त करेगा (रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं)। वहीं,  ओम के हाथ लगेंगे एरियर के केवल 15 लाख रुपये। यदि कंपनी ओम को उसी पद पर नई भर्ती दिखाकर नौकरी पर रखती भी है तो,  उसका 17,000 के बेसिक के अनुसार वेतनमान 50,129 रुपये होगा (इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है)। यानी कि हर महीने कम से कम 13 हजार रुपये और पीएफ, ग्रेच्‍युटी, एलटीए, प्रमोशन आदि में नुकसान, जोकि समय के साथ-साथ तेजी से बढ़ता ही जाएगा। और यदि हिंदुस्‍तान के साथियों की तरह कंपनी उन्‍हें नौकरी पर नहीं रखती हैं तो अब आप खुद समझ सकते हैं आपका कितना बड़ा नुकसान हो रहा है।

मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

उपरोक्‍त उदाहरणों से आपको वस्‍तुस्थिति समझ में आ गई होगी। हिंदुस्‍तान के कुछ साथियों ने ग्रेच्‍युटी की मामूली सी राशि रुकने के डर से और कुछ ने अन्‍य कारणों से इस्‍तीफा दे दिया। संस्‍थान ने इस्‍तीफा लेने के बाद उन्‍हें तुरंत बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। ऐसे में इस्‍तीफा देकर क्‍या आप भी उनकी श्रेणी में आना चाहते हैं। इसलिए यदि आपसे संस्‍थान जबरन ग्रेच्‍युटी रोकने, बर्खास्‍तगी,  तबादले आदि की धमकी देकर इस्‍तीफा मांगता है तो कतई न दें और कानूनी उपायों को अपनाने की तरफ कदम बढ़ाएं।

इस स्थिति में क्‍या करें

ऐसा नहीं है सुप्रीम कोर्ट इससे अनजान है, सुनवाई के दौरान यह मुद्दा हमारे वकीलों द्वारा कई बार उठाया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2016 की सुनवाई के बाद दिए ऑर्डर में उल्‍लेख किया है… It has been brought to our notice by the learned counsels for some of the contesting parties that in case of some establishments, details of which need not be specifically mentioned herein, employees have been retrenched/terminated and in respect of certain other establishments the employees have been forced/compelled to sign undertakings which were later on used as to make out declarations that the employees do not desire to be covered by the Wage Board reommendations.

जबरन इस्‍तीफे के एक मामले का उल्‍लेख मध्‍यप्रदेश श्रमायुक्‍त द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिपोर्ट में भी है। उसमें पेज नंबर 20 पर भास्‍कर के साथी sanjay kumar chuhan के Forced Resignation का मामला इंदौर उप श्रमायुक्‍त द्वारा लेबर कोर्ट को रेफर करने का जिक्र है।

इसके अलावा कुछ अन्‍य साथियों ने भी अलग-अलग राज्‍यों में जबरन इस्‍तीफा देने के बाद उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज करवाने के साथ रिकवरी भी लगा रखी है, जिन पर सुनवाई जारी है। इसलिए हमारा उन सभी साथियों से अनुरोध है जिनका जबरन इस्‍तीफा प्रबंधन ने लिया है, वे पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं। हम जानते हैं एफआईआर दर्ज कराने में आपको कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ेगा, क्‍योंकि प्रभावशाली समाचार पत्र प्रबंधन के कारण पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर सकती है। ऐसे में यदि आपके राज्‍य में ऑनलाइन पुलिस शिकायत दर्ज कराने की सुविधा है तो वहां ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवाएं। नहीं तो केस लड़ रहे अपने साथियों से संपर्क कर उनकी मदद मांगें। इसके बाद आप रिकवरी बनवाकर और किसी कानून के जानकार से मैटर लिखवाकर डीएलसी में 17(1) और जबरन इस्‍तीफे के खिलाफ अलग-अलग केस लगवाएं। डीएलसी में दायर 17(1) की रिकवरी और इस्‍तीफे के खिलाफ लगवाए गए केस की प्रतिलिपि पर मोहर लगवाना व साइन करवाना न भूलें।

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