धोखातंत्र पर्व के रूप में तब्दील हो रहा लोकतंत्र का महापर्व


चरण सिंह राजपूत

आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी दल चुनावी समर में उतर चुके हैं। टिकट बंटवारे में ही धनबल का पूरा इस्तेमाल हो रहा है। यदि बात संविधान की करें तो आम चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है। जिस तरह से सभी नियम कानून को ताक पर रखकर चुनाव में स्तरहीन बयानबाजी और धन का इस्तेमाल होता है क्या इससे लोकतंत्र की रक्षा हो पा रही है?
जिस तरह से राजनीति पर विशेष परिवारों और पूंजीपतियों का कब्जा होता जा रहा है। यह न केवल राजतंत्र को बढ़ावा दे रहा बल्कि यह पर्व पूंजीवाद महापर्व के रूप में परिवर्तित होता जा रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा तो पूंजीपतियों की पार्टी मानी ही जाती है। कांग्रेस के साथ ही क्षेत्रीय दल भी इस मामले में पीछे नहीं हैं।
चुनाव लड़ने के लिए कितनी मारामारी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 11 अप्रैल से लोकसभा चुनाव हैं और अभी तक पार्टियां टिकट ही घोषित नहीं कर पाई हैं। यह हाल तो तब है जब हर पार्टी में टिकट के लिए पैसों के लेनदेन की खबरें आ रही हैं। बसपा इस मामले में सबसे आगे बताई जा रही है। जब टिकट बंटवारे में ही पैसों की इतनी मारामारी है तो चुनाव प्रचार में क्या हाल होगा बताने की जरूरत नहीं है। मतदाताओं के साथ ही मीडिया को खरीद कर संसद में पहुंचने के लिए पूंजीपति बेताब हैं।
बात पूंजीपतियों की चल रही है तो मैं यह भी क्लियर कर दूं कि राजनीतिक भाषा के साथ ही हम लोग व्यवसायियों को ही पूंजीपति मानकर चलते हैं। राजा महाराजाओं की जिंदगी बिता रहे अथाह सम्पत्ति के मालिक ये राजनेता नेता भी आज के पूंजीपति ही हैं। जो व्यक्ति अपने पर पूंजीपतियों के बराबर खर्च करता है वह भी पूंजीपति की श्रेणी में ही आता है।
बात देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही करते हैं। वह अपने को एक फ़क़ीर बताते हैं। उनके रहन सहन खान पीन और जीवन शैली से क्या फ़क़ीर की जिंदगी लगती है ? जो लोग आजादी की लड़ाई से न केवल कोसों दूर रहे बल्कि स्वार्थ के वशीभूत अंग्रेजों से सटे रहे। धंधेबाजी में सबसे आगे हैं। क्या उनसे राष्ट्रवाद की उम्मीद की जा सकती है ? जिनकी सोच ही समाज को बांटने की हो। क्या वे देशभक्त हो सकते हैं ?
अपने को दलित की बेटी बताने वाली मायावती हो। रामविलास पासवान हो। उदित राज हो। रामदास अठावले हो या फिर नए नेता के रूप में उभर रहे चंद्रशेखर। इनके रुतबे से कहीं लगता है कि ये लोग दलित नेता हैं। यही हाल अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव हों अजित सिंह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है कहीं से ये नेता पिछड़े लगते हैं ? अब तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का साधारण पहनावा भी ढकोसला लगने लगा है। चुनाव में अरबो खरबो खर्च करने वाले राजनेताओं को देश और समाज के भले की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यह कॉमन सेंस की बात है कि जो प्रत्याशी चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च करेंगे। क्या उनसे देश और समाज के भले की उम्मीद की जा सकती है। जो पार्टियां पैसे लेकर टिकट दे रही हैं। क्या वे जनता के लिए काम करेंगी ?
धंधे के रूप में तब्दील हो रही राजनीति में किसी भी तरह से पैसा कमाकर चुनाव लड़ना और संसद में पहुंचकर अपने धंधे को चमकाना बस यही मकसद रह गया है चुनाव लड़ने का। क्या इसे हम लोकतंत्र के महापर्व की संज्ञा दे सकते हैं ? देश के एक विशेष तबके ने देश की सत्ता और व्यवस्था कब्जा रखी है। बस पार्टी ओर चेहरे बदलते हैं। लोग वे ही रहते हैं। कुछ नेता तो ऐसे हैं जो हर सरकार में शामिल रहते हैं। विशुद्ध रूप से लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। दलित पिछड़े और गरीब के नाम पर पूंजीपति नेता जनता को ठग रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो लगातार गरीबी और अमीरी की दूरी क्यों बढ़ रही है ?
देश की सत्ता और व्यवस्था पूंजीपतियों के हाथों में जाने का कारण जनता भी है। गुलामी के चलते लोग अपना वोट की जाति धर्म और स्वार्थ के चलते पूंजीपतियों को दे देते हैं। ये जानने की जहमत नहीं उठाते कि उनका हक मारकर ही तो ये लोग पूंजीपति बने हैं। जो लोग हक मारने की प्रवत्ति अपनाए हुए हैं क्या वे उनके हक के लिए लड़ेंगे। एक तरफ खोखले राष्ट्रवाद के नाम पर जनता को बरगलाने का खेल चल रहा है तो दूसरी और दलित, पिछड़े और मुस्लिमों के हक की लड़ाई को लेकर। दोनों ओर पूंजीपतियों की लाबी है। बस किसी भी तरह से सीट और सत्ता हासिल कर ली जाए और फिर शुरू हो जनता की कमाई पर अय्याशी का खेल। हर चुनाव में अधिकतर वे ही चेहरे होते हैं। क्या बदला है और क्या बदल जायेगा ? मोदी सरकार तो देश बर्बाद करने पर तुली ही हुई है पर पांच साल तक विपक्ष क्या करता रहा ? और अब क्या कर रहा है?
जो लोग सच्चे मन से देश और समाज के लिए चिंतित हैं या बदलाव बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। वे इन राजनीतिक दलों की नजरों में बेवकूफ हैं। ज्यों ज्यों चुनाव आ रहे हैं त्यों त्यों मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ खड़े होने वाले लोग गायब होते जा रहे हैं। न किसी दल के पास कोई विचारधारा है और न ही जमीनी संघर्ष। बस पैसों के बल पर किसी तरह से सत्ता हथिया ली जाए।
लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में जाने जाना वाला मीडिया पूंजीपतियों की रखैल की भूमिका में है। तो क्या ऐसी राजनीति को समाजसेवा और ऐसे चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जा सकता है ? जिन चुनाव में जनता के साथ हर स्तर पर धोखा किया जाता हो वह लोकतंत्र नहीं धोखातंत्र महापर्व है।

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बज गया चुनावी बिगुल, लाेकसभा चुनाव 11 अप्रैल से, 23 मर्इ काे अाएंगे नतीजे

फाेर्थपिलर टीम।

चुनाव आयोग ने लोकसभा और चार राज्यों आंध्र, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए 10 मार्च को तारीखों का ऐलान कर दिया। इस बार लोकसभा चुनाव 7 चरणों में होंगे। 11 अप्रैल, 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को वोटिंग होगी। 23 मई को नतीजे आएंगे। तीन जून तक नई लोकसभा का गठन हो जाएगा।


मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने बताया कि इस बार लोकसभा चुनाव में कुल 90 करोड़ वोटर होंगे। इनमें 8.4 करोड़ नए मतदाता शामिल हैं। कुल वोटर में से 99.3 के पास वोटर आईडी है। 1.5 करोड़ वोटर 18-19 साल की उम्र के हैं। लोकसभा चुनाव के लिए आज से देशभर में आचार संहिता लागू हो गई है।

चुनाव आयुक्त ने बताया, पिछली बार 9 लाख मतदान केंद्र थे, इस बार 10 लाख पोलिंग बूथ होंगे। पहली बार पूरे देश के सभी बूथों पर वीवीपैट मशीन का इस्तेमाल होगा। लोकसभा चुनाव के लिए हेल्पलाइन नंबर-1950 होगा। सभी चुनाव अधिकारियों की गाड़ी में जीपीएस होगा। मोबाइल पर ऐप के जरिए भी आयोग को आचार संहिता के उल्लंघन की जानकारी दी जा सकती है और 100 मिनट के भीतर हमारे अधिकारी को इस पर एक्शन लेना ही होगा। शिकायतकर्ता की निजता का ख्याल रखा जाएगा।

अरोड़ा ने बताया, अगर प्रत्याशी अगर फॉर्म 26 में सभी जानकारियां नहीं भरता तो उसका नामांकन रद्द हो जाएगा। साथ ही बिना पैनकार्ड वाले उम्मीदवारों का नामांकन रद्द होगा। इस बार चुनाव में सोशल मीडिया एक्सपर्ट मीडिया सर्टिफिकेशन और मॉनिटरिंग कमेटी का हिस्सा होंगे। प्रत्याशियों को सोशल मीडिया अकाउंट और उसपर होने वाले प्रचार में खर्च राशि की जानकारी देनी होगी। चुनावी खर्च में सोशल मीडिया पर होने वाली राशि को भी जोड़ा जाएगा। वोटरों को नाम को लेकर भ्रम न हो इसलिए इस बार ईवीएम में प्रत्याशियों की फोटो भी दिखेगी।

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किन राज्यों में कितने चरण में होगी वोटिंग?

  • एक चरण में: आंध्र, अरुणाचल, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल, केरल, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, पंजाब, सिक्किम, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तराखंड, अंडमान-निकोबार, दादरा नगर हवेली, दमन एंड दीव, लक्षद्वीप, दिल्ली, पुडुचेरी, चंडीगढ़।
  • दो चरण में : कर्नाटक, मणिपुर, राजस्थान, त्रिपुरा।
  • तीन चरण में : असम, छत्तीसगढ़।
  • चार चरण में : झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा।
  • पांच चरण में : जम्मू-कश्मीर।
  • सात चरण में : बिहार, उत्तर प्रदेश, प. बंगाल।
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जम्मू-कश्मीर में अभी विधानसभा चुनाव नहीं

चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर में मौजूदा स्थिति को देखते हुए अभी विधानसभा चुनाव न कराने का फैसला किया। वहां आयोग ने 3 पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं। इसके अलावा आंध्र, सिक्किम और अरुणाचल में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव के लिए एक चरण में 11 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं, ओडिशा में चार चरणों 11, 18, 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी।

चार राज्यों में विधानसभा चुनाव

राज्यसीटेंवोटिंग2014 में किसकी सरकार बनी
आंध्रप्रदेश17511 अप्रैलतेदेपा
अरुणाचल6011 अप्रैलकांग्रेस
सिक्किम3211 अप्रैलएसडीएफ
ओडिशा14711, 18, 23 और 29 अप्रैलबीजद

मोदी ने कहा- लोकतंत्र का उत्सव शुरू, फर्स्ट टाइम वोटर्स रिकॉर्ड वोटिंग करें

मोदी ने ट्वीट किया, ”लोकतंत्र का त्योहार चुनाव आ गए। मैं अपने साथी हिंदुस्तानियों से अपील करता हूं कि 2019 के लोकसभा चुनाव को अपनी सक्रिय सहभागिता से सफल बनाएं। मैं उम्मीद करता हूं कि ये चुनाव ऐतिहासिक नतीजे देंगे। मैं पहली बार वोट डालने वालों से रिकॉर्ड संख्या में मतदान की अपील करता हूं।”

छह बड़े चेहरे 


नरेंद्र मोदी : भाजपा ने 2013 में माेदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था, तब से लोकसभा चुनाव समेत 32 चुनाव हो चुके हैं। हर चुनाव में मोदी ही भाजपा के लिए प्रचार का प्रमुख चेहरा रहे हैं। 

अमित शाह : पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे अमित शाह ने राज्य में एनडीए को 80 में से 73 सीटें दिलवाई थीं। जुलाई 2014 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। शाह के अध्यक्ष बनने के बाद अब तक 27 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से 14 चुनावों में भाजपा को जीत और 13 में हार मिली। 

राहुल गांधी : दिसंबर 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी को 2018 के आखिर में कामयाबी मिली जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। 20 साल में यह पहला मौका है, जब लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी कांग्रेस का नेतृत्व नहीं करेंगी। राहुल के नेतृत्व में पार्टी का यह पहला लोकसभा चुनाव होगा।

प्रियंका गांधी : राहुल गांधी ने प्रियंका को इसी साल 23 जनवरी को कांग्रेस महासचिव बनाया और पूर्वी उत्तर प्रदेश की 41 लाेकसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी। नेहरू-गांधी परिवार से कांग्रेस में यह 11वीं एंट्री है। इससे पहले प्रियंका सिर्फ अमेठी-रायबरेली में ही प्रचार करती थीं। 

ममता बनर्जी : मोदी विरोधी महागठबंधन को आकार देने की कोशिशों में ममता बनर्जी सबसे प्रमुख चेहरा हैं। 2014 में मोदी लहर के बावजूद बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 34 सीटें जीती थीं। ममता ने हाल ही में कोलकाता में विपक्ष की बड़ी रैली की थी। इसमें 15 से ज्यादा दलों के नेता शामिल हुए थे। हालांकि, ममता बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन से इनकार कर चुकी हैं।

मायावती-अखिलेश : 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा सिर्फ 5 सीटों पर जीत पाई थी। वहीं, बसपा का खाता भी नहीं खुला था। लेकिन दोनों पार्टियों का उत्तर प्रदेश में वोट शेयर 20% के आसपास था। 25 साल बाद दोनों दल भाजपा को रोकने के लिए साथ आए हैं। 2014 में भाजपा का उत्तर प्रदेश में वोट शेयर 43% था। ऐसे में मायावती-अखिलेश का साथ आना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
                
इन 4 राज्यों के नतीजे चौंका सकते हैं


आंध्र प्रदेश : पिछली बार तेदेपा ने यहां भाजपा के साथ गठबंधन किया था। दोनों दलों ने राज्य की 25 में से 17 सीटें जीती थीं। तेदेपा अब एनडीए से बाहर हो चुकी है। वहीं, जगनमोहन रेड्डी पिछले पांच साल से राज्य में लगातार यात्राएं कर राज्य में अपनी पार्टी वाईएसआरसीपी की पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। 

केरल : सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला राज्य में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। कोर्ट के आदेशानुसार सत्ताधारी वाम दल हर उम्र की महिला को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश देने के पक्ष में था, वहीं भाजपा-कांग्रेस ने फैसले का खुलकर विरोध किया था। राज्य में बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन भी हुए। ऐसे में माना जा रहा है कि 20 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में भाजपा पहली बार मुकाबले में दिख रही है। 

तमिलनाडु : राज्य की राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरों एम करुणानिधि और जे. जयललिता के निधन के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव है। द्रमुक ने इस बार कांग्रेस और अन्नाद्रमुक ने भाजपा-पीएमके के साथ गठबंधन किया है। पिछली बार राज्य की 39 में से 37 लोकसभा सीटें जीतने वाली अन्नाद्रमुक इस बार सिर्फ 27 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वहीं, द्रमुक ने भी 9 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी हैं।

ओडिशा : 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद यहां भाजपा सिर्फ एक सीट जीत पाई थी। तीन बार से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजद ने 21 में से 20 सीटें जीती थीं। मोदी ने यहां दिसंबर और जनवरी में कई दौरे किए हैं। 

पांच बड़े मुद्दे 

  1. राष्ट्रवाद : पुलवामा हमले के बाद भाजपा ने राष्ट्रवाद को मुख्य मुद्दा बनाया है।
  2. पाकिस्तान : वायुसेना ने पुलवामा हमले के बाद पाक में आतंकी शिविर पर हमला किया। इस हमले के सबूतों को लेकर भाजपा और विपक्ष आमने-सामने हैं।
  3. राफेल : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि राफेल डील में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार किया है। वहीं, सरकार राफेल को देश की जरूरत बता रही है।
  4. किसान : केंद्र सरकार ने अंतरिम बजट में छोटे किसानों के खाते में हर साल 6000 रुपए ट्रांसफर करने का ऐलान किया था। मोदी अपनी रैलियों में इसे क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं। वहीं, कांग्रेस मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किसानों की कर्ज माफी का मॉडल देशभर में लागू करने का वादा कर रही है।
  5. राम मंदिर : भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के अड़ंगों की वजह से अयोध्या विवाद पर जल्द फैसला नहीं आ पा रहा। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि भाजपा सिर्फ चुनाव के समय यह मुद्दा उठाती है।
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2014 में 5 राज्यों में विधानसभा की स्थिति

आंध्रप्रदेश (तेलंगाना समेत)

पार्टी                                        सीटें                             
तेदेपा102
वाईएसआर कांग्रेस67
भाजपा4
एनपीटी1
निर्दलीय1
कुल175

जम्मू-कश्मीर

पार्टी                                                       सीटें                          
पीडीपी28
भाजपा25
नेशनल कॉन्फ्रेंस15
कांग्रेस12
अन्य7
कुल87


सिक्किम

पार्टी                                                       सीटें                         
एसडीएफ                      22         
एसकेएम10
कुल32


अरुणाचल प्रदेश

पार्टी                                                  सीटें                             
कांग्रेस42
भाजपा11
पीपीए5
निर्दलीय2
कुल 60


ओडिशा

पार्टी                                                   सीटें                            
बीजद117
कांग्रेस16
भाजपा10
एसकेडी1
अन्य3
कुल147

दूर से ही दिखने लगा है राजनीतिक संकट

श्रीकांत सिंह

हिंदुओं की एकता के नाम पर बडी मुश्किल से देश की जनता एकजुट हुई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी मिलकर उसी जनता का भरोसा तोड रहे हैं। गरीबों की गैस सब्सिडी बंद है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इंडियन ऑयल और पीएमओ तक शिकायत करने का कोई असर नहीं हो रहा है। दिल्‍ली और यूपी में मेट्रो ट्रेन के किराये में बेतहासा इजाफा किया जा रहा है। यही तो एक जनहितकारी और पर्यावरण को अनुकूल बनाने वाली व्‍यवस्‍था थी, जिसे धंधे पर लगाया जा रहा है। मेट्रो के किराये में एकायक इतना इजाफा कर दिया गया है कि अब हालत यह है कि लोग अपनी कार सडकों पर लाने की सोचने लगे हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत का भी कोई लाभ जनता को नहीं मिल रहा है। पुलिस आज भी लोगों के एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। कानून व्‍यवस्‍था की हालत खराब है। सरकार मजदूरों की नहीं, मालिकों की बात सुन रही है। लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं है। सरकार सोच रही है कि विपक्ष तो समाप्‍त ही हो गया और मीडिया पालतू हो गया है। अब चाहे कोई काम करें या नहीं, अकंटक राज करेंगे।

ऐसा सोचना सरकार और भाजपा दोनों के लिए आत्‍मघाती होगा। अब यदि जनता का भरोसा टूट गया तो जनता मान लेगी कि तिकडम से उसे मूर्ख बनाया गया है। ऐसी हालत में क्षेत्रीय दलों का उदय फिर होने लगेगा और किसी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में आक्रोश का माहौल बनने लगा है। राजनीतिक संकट दूर से ही दिखाई पडने लगा है।

वेलेंटाइंस डे और गिरफ्तारियां

श्रीकांत सिंह

वेलेंटाइंस डे और गिरफ्तारियां। इनमें कोई न कोई संबंध जरूर है। तभी तो फिल्‍मी गीत लिखा गया था-कैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी…जी हां। इस मुबारक मौके पर दो गिरफ्तारियों की चर्चा आम है। आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में शशिकला नटराजन उर्फ चिनम्‍मा गिरफ्तारी की चौखट पर पहुंच गई हैं तो एक्जिट पोल प्रकाशित करने के आरोप में जागरण डॉट कॉम के संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

शेखर की गिरफ्तारी के संदर्भ में जागरण की ओर से कहा गया है- ‘डिजिटल इंग्लिश प्लेटफॉर्म के अलावा एग्जिट पोल से संबंधित खबर दैनिक जागरण अखबार में नहीं छापी गई। इंग्लिश वेबसाइट पर एग्जिट पोल से जुड़ी एक खबर अनजाने में डाली गयी थी,  इस भूल को फौरन सुधार लिया गया और संज्ञान में आते ही वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से संबंधित न्यूज रिपोर्ट को तुरंत हटा दिया गया था।’ सवाल यह है कि जागरण की ओर से अनजाने में कितने अपराध किए जाएंगे…माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना क्‍या जागरण प्रबंधन अनजाने में कर रहा है…सैकड़ों कर्मचारियों को एक झटके में क्‍या अनजाने में संस्‍थान से बाहर कर दिया गया…एनआरएचएम घोटाले में जागरण की संलिप्‍तता क्‍या अनजाने में हुई…जागरण की जम्‍मू यूनिट में क्‍या मादक द्रव्‍यों की तस्‍करी अनजाने में कराई जा रही थी।

जागरण के अपराधों की लिस्‍ट बड़ी लंबी है, लेकिन पहली गिरफ्तारी भले ही शशांक शेखर के साथ साजिश का एक नजीजा हो, लेकिन इससे मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू कराने के लिए संघर्षरत कर्मचारी उत्‍साहित हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि पुलिस दैनिक जागरण के प्रधान संपादक व मालिक संजय गुप्‍ता के घर भी पहुंची थी, लेकिन वह मौके पर नहीं मिले। 23 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया अवमानना मामले की सुनवाई है। इस बार सुनवाई से पहले ही जागरण के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। आपको याद होगा कि दुखी कर्मचारियों ने जागरण प्रबंधन और उसका साथ देने वाले पीएम नरेंद्र मोदी को बददुआ दी थी कि उनका हर कदम उलटा पड़े और वे असफलता के गर्त में गिर जाएं। उसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा है। बददुआ के ठीक बाद पीएम मोदी मैन ऑफ टाइम मैगजीन बनते बनते रह गए और चुनाव में उनकी नोटबंदी की साजिश नाकाम साबित हुई। चुनाव प्रभावित कराने का कलंक जो लगा सो अलग। आज नोटबंदी पर उठ रहे सवालों का एक भी जवाब केंद्र सरकार की ओर से नहीं आया है।

शशिकला नटराजन की गिरफ्तारी के मामले से साजिश की बू आ रही है, क्‍योंकि भाजपा पन्‍नीर सेल्‍वम के सहारे तमिलनाडु की राजनीति में अपना प्रभाव जमाना चाहती है, लेकिन पन्‍नीर सेल्‍वम को एआईडीएमके से हटा दिया गया है। अब मामला तमिलनाडु के राज्‍यपाल और एआईडीएमके के समर्थन पर फंसा है। पन्‍नीर सेल्‍वम यदि समर्थन के अभाव में किनारे लग जाते हैं तो यहां भी भाजपा को बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है। बची खुची कसर विधानसभा चुनाव के परिणाम पूरी कर सकते हैं। ये तो इंतहाए राजनीति है, रोता है क्‍या। आगे आगे देखिए होता है क्‍या।

जानें, ‘जागरण’ कैसे चलाता है ‘धंधा’

धंधे की बलिबेदी पर कुर्बान कर दिए गए शशांक शेखर त्रिपाठी  

श्रीकांत सिंह

एक अखबार के रूप में दैनिक जागरण समाप्‍त हो चुका है। लगातार उसका सर्कुलेशन गिर रहा है। विज्ञापन का भी प्रवाह थम गया है। आधे तिहाई दाम पर विज्ञापन बुक किए जाते हैं। एक सूत्र की मानें तो पहले जो विज्ञापन 90 लाख रुपये के होते थे, उन्‍हें 90 हजार में भी छाप दिया जाता है। विज्ञापनदाता भी समझ गए हैं कि जागरण अब फर्जीवाड़े का अड्डा बन चुका है। तो इस आधार पर जागरण जिंदा है। क्‍योंकि अब फर्जीवाड़ा उसका धंधा है। अपने इसी फर्जीवाड़े को चलाते रहने के लिए जागरण प्रबंधन ने जबरन शशांक शेखर त्रिपाठी को बलि का बकरा बना दिया है। जागरण के किसी भी संपादक की क्‍या मजाल जो प्रबंधन की इच्‍छा के बगैर कुछ भी छाप सके।

बता दें कि शशांक शेखर त्रिपाठी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, जो आज तक, दैनिक हिंदुस्‍तान और दैनिक जागरण में समय-समय पर वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं। उन्‍होंने एक जमाने में वर्तमान स्‍टेट प्रभारी विष्‍णु प्रकाश त्रिपाठी को नौकरी भी दी थी। उनसे इतनी बड़ी गलती हो सकती है, यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। उनसे गलती कराई गई है। इसलिए इस गलती के लिए सीधे तौर पर संजय गुप्‍ता जिम्‍मेदार हैं। अपने लोगों को फंसाने का जाल बिछाने के लिए ही जागरण में पिछले कुछ दिनों से स्‍टेट प्रभारियों के नाम प्रिंट लाइन में छपने लगे हैं। यह सब धंधा चलाने के लिए जागरण प्रबंधन ने किया है। वैसे यह बात भी गले से नीचे नहीं उतर रही है कि शशांक शेखर त्रिपाठी को हटा ही दिया जाएगा। जागरण प्रबंधन चुनाव आयोग को मूर्ख बनाने के लिए भी कोई नाटक रच सकता है क्‍योंकि नाराज प्रदेश सरकारों को मनाने के लिए पहले भी ऐसा होता आया है। अब अगला शिकार कौन होगा, यह देखने वाली बात होगी, क्‍योंकि पांच ऐसे तरीके हैं जिनका इस्‍तेमाल कर प्रत्याशियों और पार्टियों से वसूली की जाती है।

  1. विज्ञापन के रूप में चंदा देने के लिए प्रत्‍याशियों पर दबाव बनाया जाता है, जिसके लिए विज्ञापन विभाग नहीं रिपोर्टरों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  2. खबरनुमा विज्ञापन के रूप में भी जमकर वसूली की जाती है। कभी कभी तो बड़े आकार में इंटरव्‍यू भी प्रकाशित किए जाते हैं।
  3. खबर के रूप में वसूली करने के लिए भी जागरण प्रबंधन ऐसे भोले भाले रिपोर्टर नियुक्‍त करता है जो उसके धंधे को आगे बढ़ा सकें। जो रिपोर्टर अपना जमीर बचाने के लिए वसूली नहीं कर पाता, उसे तुरंत हटा दिया जाता है।
  4. चुप रहने के रूप में- मतलब प्रत्याशी के बारे में न नेगेटिव न पॉज़िटिव, कोई खबर नहीं चलाई जाएगी।
  5. केवल सकारात्मक खबर छापने के रूप में जागरण का धंधा बहुत पुराना है। इसके लिए जागरण में महिमा मंडन की प्रतिभा विकसित की गई है, जिसके तहत फुल पेज के इंटरव्‍यू प्रकाशित किए गए हैं।

धंधे का एक और तरीका है जो टीवी में खूब लोकप्रिय है, ‘कम्प्लीट पैकेज’। इसके तहत चुनाव के दौरान पार्टी को मुश्किल सवालों से बचाया जाता है। पर यह डील चुनाव से साल-छह महीने पहले हो जाती है, जिसे चैनल का रुझान कहा जाता है। रुझान का सबसे चर्चित मॉडल है, मुश्किल सवालों के वक्त उस पार्टी को या उससे जुड़े प्रतिनिधि को ब्रेक के बाद दिखाया जाना। आमतौर पर दर्शक ब्रेक से पहले ही मुश्किल सवालों और उसपर प्रतिनिधि की ओर से आयी राय सुनकर अपना मिजाज बना लेता है।

इसका दूसरा फॉर्म है टीवी डिबेट। जिस पार्टी या प्रतिनिधि से पैसा लिया गया है उसके पक्ष के तीन पैनलिस्ट बैठाना और जिससे नहीं लिया है उसके सबसे कमजोर लोगों को बुलाना या 3 के मुकाबले 1 को बुलाना।

दैनिक जागरण के न्यूज पोर्टल जागरण डॉट कॉम ने जिस तरह यूपी इलेक्शन के पहले चरण के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित कर आचार सहिता की धज्जियां उड़ाई थीं, उसके बाद चुनाव आयोग की ओर से सख्त एक्शन होना लाजिमी था।

एक्जिट पोल को लेकर जागरण मैनेजमेंट ने वेबसाइट के संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी को साइडलाइन कर उनकी जगह फिलहाल नोएडा ऑफिस में डिप्टी एडिटर फीचर की जिम्मेदारी संभाल रहे कमलेश रघुवंशी को दी है। कमलेश रघुवंशी ढाई दशक से अधिक समय से जागरण परिवार का हिस्सा हैं। लखनऊ, जागरण से अपनी पारी शुरू करने वाले कमलेश दिल्ली और पंजाब में बतौर स्थानीय संपादक कार्य कर चुके हैं। फीचर विभाग की जिम्मेदारी उन्होंने पिछले साल संभाली है। उससे पहले वे रांची में बतौर झारखंड  स्टेट हेड के तौर पर जागरण का नेतृत्व कर रहे थे। वे फीचर के साथ-साथ ऑनलाइन का प्रभार भी संभालेंगे।