जानें, कृष्‍ण को समग्रता से कैसे समझा जा सकता है

सार तत्‍व-कृष्ण का जीवन एक अजीब विरोधाभासी-सा लगता है। एक ओर कमाल की आसक्ति है। दूसरी ओर कमाल की अनासक्ति। लेकिन वह विरोधाभास दूर से ही नजर आता है। वह आभास भर को ही है। कृष्ण के काम करने का ढंग ही निराला है। जानें, कृष्‍ण को समग्रता से कैसे समझा जा सकता है।

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राजीव कटारा की फेसबुक वाल से साभार।
नीत्शे एक ऐसा देवता तलाश रहे थे, जो नाच-गा सके। यानी जीवन से भरपूर एक देवता। एक ऐसा देवता, जो मनुष्य की पहुंच में हो। देवता हो, लेकिन हो मानुष। अगर कोई देवता मानुष जैसा होगा, तो उसे हंसना और रोना भी होगा। उसे काम भी करना पड़ेगा।
अपने यहां वैसा देवता तलाश नहीं पाए थे नीत्शे। कृष्ण पर सोचते हुए अक्सर नीत्शे की परिभाषा में फिट होने वाले देवता की याद आती है। सचमुच भरपूर जीवन जीने वाले देवता हैं कृष्ण। और एक भरा-पूरा जीवन वही जी सकता है, जो अपने जीवन को ही कर्मभूमि बना ले। उस लिहाज से कृष्ण बेजोड़ हैं। कर्मयोगी हैं कृष्ण। कृष्ण का पर्याय हो गया है कर्मयोग। कृष्ण जीवन भर काम करते नजर आते हैं। काम ही काम जैसे उनका जीवन हो। और काम भी किस तरह करते हैं वह? अनासक्त कर्म। यानी काम करो, बाकी सब भूल जाओ। यहां तक कि फल की भी इच्छा मत करो। कर्मण्येवाधिकारस्ते…।
कृष्ण का जीवन एक अजीब विरोधाभासी-सा लगता है। एक ओर कमाल की आसक्ति है। दूसरी ओर कमाल की अनासक्ति। लेकिन वह विरोधाभास दूर से ही नजर आता है। वह आभास भर को ही है। कृष्ण के काम करने का ढंग ही निराला है। वह जब कोई काम करते हैं, तो जबर्दस्त आसक्त नजर आते हैं। उस काम को वह पूरे मन से करते हैं। काम पूरा होते ही वह अनासक्त हो जाते हैं। वह जो भी करते हैं उसमें गजब की आसक्ति दिखती है। उसे करते ही वह उससे अलग-थलग हो जाते हैं। कभी-कभी इसीलिए वह क्षणवादी भी दिखलाई पड़ते हैं। एक पल को अपने पूरेपन में जीते हैं। लेकिन उससे चिपके नहीं रह जाते। यही वजह है कि उनके यहां कोई वापसी नहीं है। लेकिन किसी भी पल का कोई अधूरापन भी नहीं है। यह कोई कर्मयोगी ही कर सकता है। यही क्या अपने आज में जीना नहीं है?

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नवधा अंधभक्ति

प्रथम करहु गुंडन कर संगा। दूसरि चरित बनाइ कुरंगा।।
तीसरि जन चारण बनि जावा। चौथी निज सम्मान गंवावा।।
पंचम कर सज्जन कर निंदा। मुर्दा हो अथवा हो जिंदा।।
छठी होइ दुर्जन कर पूजा। कलजुग माहि उपाय न दूजा।।
सप्तम जन चापलूस कहावा। अष्टम यह मत सबहि सुनावा।।

नवम लात नित खाइके, उफ न करहिं मन माहिं।
दुर्जन प्रेमी ते नर, अंधभक्त कहि जाहिं।। (दोहा-420)

श्रीकांत व‍िरचित अरामायण से साभार  

हमारे देश का वोटर बहुत कन्‍फ्यूज होता है

यहां स्‍कैम का फुलफार्म कुछ ऐसे बताते हैं

हमारे देश का वोटर बहुत कन्‍फ्यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है

कहीं रैली, कहीं नारा, कहीं हमला भी होता है

कहीं पर दम दिखाने को बड़ा जुमला भी होता है

मगर होती नहीं है कद्र अब उत्‍तम विचारों की

सैलरी के लिए मुद्दत से लड़ते पत्रकारों की

यही तबका है जो हरहाल में मिसयूज होता है।

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है।

नहीं है लोक का वो तंत्र जो सबका भला चाहे

यहां बनता वही नेता जो खुद अपना भला चाहे

कहीं पर बात की बातें, कहीं जजबात की बातें

जमीं पर कुछ नहीं दिखता, सभी की बात की बातें

दिखा दे जो यहां चैनल, बस वही न्‍यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है, कहीं पर यूज होता है

किसानों की कसक का नाम लेकर जीत जाते हैं

विरोधी की ठसक का नाम लेकर जीत जाते हैं

 

मगर कुछ काम करने की, जिन्‍हें आदत नहीं होती

वही हर बार का देखो एलेक्‍शन जीत जाते हैं

कोई चूना लगाकर देश से क्‍यूं भाग जाता है

कोई वादे से अपने जीत कर भी भाग जाता है

मगर अब तक नहीं निपटा जो हम पर ड्यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है

-SHRIKANT SINGH