दिल्‍ली सरकार से सबक लें देशभर की राज्‍य सरकारें

मजीठिया न देने वाले अखबार मालिकों से होगी पांच गुना वसूली, जेल भेजने की भी व्‍यवस्‍था

नई दिल्‍ली।

भारतीय जनता पार्टी को आम आदमी पार्टी ने आइना दिखाने का काम किया है। इसलिए पत्रकार व गैर पत्रकार श्रमिकों के वेतन संबंधी मामलों में भाजपा शासित राज्‍यों की सरकारों को सबक लेना चाहिए। एक ओर अखबार मालिक दिनदहाड़े गुंडागर्दी का परिचय दे रहे हैं तो दिल्‍ली को छोड़ सभी राज्‍य सरकारें उनकी गुंडागर्दी का पोषण करने में लगी हैं। सरकारों के जनविरोधी रवैये का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कोई मिले।

केंद्र और देशभर की राज्य सरकारों को एक नजीर देते हुए दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार पहली ऐसी सरकार बन गई है जिसने दिल्ली के पत्रकारों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिलाने के लिए कानून में संशोधन किया है। इसके लिए बकायदा 8 मई 2018 को दिल्ली राजपत्र में इसकी अधिसूचना जारी की गई है। विधि, न्याय एवं विधायी कार्य विभाग की अधिसूचना की जानकारी दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने आफिशियल ट्वीटर हैंडल के जरिये दी है।

इसमें लिखा है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा के निम्नलिखित अधिनियम में राष्ट्रपति की सहमति 17 अप्रैल 2018 को प्राप्त कर ली गई है। इसे जनसाधारण के लिए प्रकाशित किया जा रहा है। इसके तहत दिल्ली सरकार ने दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए कार्यरत पत्रकार एवं अन्य के लिए समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और विविध उपबंध अधिनियम 1955 का पुन: संशोधन किया है जिसके तहत 1955 के केंद्रीय अधिनियम में संख्या 45 की धारा 17 की उपधारा 1 के बाद उपधारा क को जोड़ा गया है।

इसके तहत किसी अन्य प्रकार के दंड पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो इस अधिनियम के अंतर्गत प्राधिकारी, समाचार पत्र के कर्मचारी को देय वेतन की राशि के पांच गुणा अधिकतम तक क्षतिपूर्ति राशि के भुगतान का निर्देश दे सकता है। यानी अगर नियोक्ता ने कर्मचारियों का बकाया नहीं दिया तो धारा 17 (1) की नई उपधारा क में सक्षम अधिकारी पांच गुना तक की राशि दंड स्वरुप वसूल सकता है।

साथ ही अधिनियम संख्या 45 की धारा 18 में संशोधन करते हुए उपधारा (1) में आए शब्द अर्थदंड जो दो सौ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है,  को संशोधन करते हुए उसमें किसी प्रकार का कारावास जो 6 माह तक बढ़ाया जा सकता है या अर्थंदड जो रुपये 5000 तक बढ़ाया जा सकता है या दोनों कर दिया है। शर्त यह होगी कि किसी कर्मचारी को देय वेतन के न भुगतान करने की स्थिति में नियोक्ता किसी प्रकार के कारावास के दंड का भागी होगा  जो 6 माह तक बढ़ाया जा सकता है।

1955 के केंद्रीय अधिनियम संख्या 45 की धारा 18 की उपधारा 1(क) में आए शब्द अर्थंदंड सहित दंडनीय जो पांच सौ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है, के स्थान पर संशोधन कर किसी अवधि के लिए किसी प्रकार की कारावास सहित दंडनीय जो एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, कर दिया है। अर्थदंड का भी भागी होगा जो 10 हजार रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।

शर्त यह है कि किसी कर्मचारी को देय वेतन का भुगतान न करने की स्थिति में नियोक्ता किसी प्रकार के कारावास सहित दंडनीय होगा,  जो एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है और अर्थदंड जो एक हजार रुपये प्रति कर्मचारी प्रतिदिन की दर से बढ़ाया जा सकेगा या दोनों सहित जब तक अपराध जारी रहता है।

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आखिर में एक सामंत ने भी औरत को सुपीरियर माना

शेष नारायण सिंह की एफबी वाल से साभार।

मेरे बाबू, स्व लाल साहेब सिंह, होते तो आज ८७ साल के हो गए होते लेकिन आज से ठीक १० साल पहले १९ फरवरी २००१ को चले गए. मकसूदन के पट्टी पिरथी सिंह के सबसे बुज़ुर्ग बाबू साहेब की मृत्यु हो गयी .अवध के सुल्तानपुर जिले के एक मामूली हैसियत वाले ज़मींदारों के परिवार में उनका जन्म १९२४ में हुआ था. सुल्तानपुर जिले के राजकुमार ठाकुरों की भदैयां शाखा के मकसूदन गाँव के मूल परिवार में जन्मे मेरे बाबू के पूर्वज भी शिक्षित नहीं थे.

१८५७ में जब सुल्तानपुर पर दुबारा क़ब्ज़ा करने के इरादे अंग्रेजों ने हमला किया तो कोई विरोध नहीं हुआ . उसके पहले इस इलाके के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाया था . शायद हमारे पुरखे भी उस लड़ाई में शामिल थे . लेकिन जब १८६१ के बाद अवध के पुनर्गठन का काम शुरू हुआ तो ठा. दुनियापति सिंह को मकसूदन की ज़मींदारी मिल गयी. गोमती नदी के किनारे एक टीले पर उन्होंने अपनी गढ़ी बनायी .अंग्रेजों को बाकायदा लगान देने की शर्त पर मिली यह ज़मींदारी १२ गाँवों की थी . उनके चार लड़के थे और चारों ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद गाँवों का बँटवारा कर लिया . सबसे छोटे भाई , पिरथी सिंह की सातवीं पीढी में मेरे पिता जी का जन्म हुआ था. बाबू के पिता जी तो कुशाग्रबुद्धि थे लेकिन शिक्षा उन्होंने भी चहारुम तक की हे एपाई .

बाबू बहुत लाडले थे , घर में कई बाबा दादा थे लिहाज़ा खेल कूद में ज्यादा रूचि ली और पढाई उन्होंने भी बमुश्किल चहारुम तक ही पाई. जब उनका जन्म हुआ तो देश में महात्मा गाँधी की आंधी चल रही थी लेकिन मेरे गाँव में उसका कहीं कोई पता नहीं था .मेरे गाँव में उन दिनों केवल दो लोगों के पास सरकारी नौकरी थी एक डाकखाने में चिट्ठीरसा थे और दूसरे पुलिस में कांस्टेबिल . रियाया थे दोनों . लेकिन ज़मींदारों के परिवार में कोई भी नौकरी करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था .कहीं कुछ भी रिकार्ड नहीं है मेरे परिवार के बारे में . शायद ज़मीन जायदाद के रिकार्डों में या अवध के ज़मींदारों के बारे में जहां लिखा गया है वहां कुछ जानकारी मिल जायेगी. .१३ साल की उम्र में मेरे बाबू की शादी हो गयी थी . मेरी माँ उनसे २ साल बड़ी थीं और मौजूदा जौनपुर सिटी स्टेशन के पास के गाँव सैदन पुर के किसान ठाकुरों के परिवार से आई थी. १९३७ में मेरी माँ जब आयीं ,उसके बाद का अपने परिवार का ब्यौरा मैंने सुन रखा है . माई अक्सर अपने बचपन और जवानी के दिनों की बातें किया करती थीं . उन्हें मालूम था कि १९३७ में जब उनकी शादी हुई तो देश में गान्ही का राज आ चुका था .

यानी गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट १८३५ के तहत राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बन चुकी थीं .. जौनपुर और सुलतानपुर के बीच ट्रेन चलने लगी थी ,हालांकि मेरे बाबू की शादी में कोई भी ट्रेन से नहीं गया था. हाथी, घोड़े, ऊँट और बैलगाड़ियों से उनकी बारात गयी थी. तीन दिन वहां रुके थे और बारातियों का खूब आदर सत्कार हुआ था . मेरे नाना अपने इलाके के चमेली उगाने वाले बड़े किसान थे जिसके फूल का इस्तेमाल जौनपुर के प्रसिद्ध चमेली के तेल में होता था .इस आदर सत्कार का जलवा था कि उसके बाद से मेरी माँ के गाँव की कई लड़कियों की शादी हमारे इलाके में हुई .शिक्षा दीक्षा के बारे में मेरे ननिहाल में भी ख़ास ध्यान नहीं दिया गया था क्योंकि मेरी माँ और मामा लोगों ने भी कोई
पढाई नहीं की . हालांकि उन दिनों जौनपुर शहर के आस पास के ठाकुरों में शिक्षा का मह्त्व पहचान लिया गया था. जौनपुर में तिलक धारी सिंह ने क्षत्रिय हाई स्कूल की स्थापना कर दी थी जो मेरी माँ के घर से पैदल जाने पर ३० मिनट की दूरी पर था. यह अलग बात है कि मेरी माँ को शिक्षा का मह्त्व मालूम था. मेरे माता पिता की शादी का वही वक़्त है जब देश की राजनीति बहुत गरमा चुकी थी . आज़ादी की लड़ाई अपने उफान पर थी, लखनऊ में अवध तालुकेदार कानफरेंस हो चुकी थी . जिन्ना ने लखनऊ के इसी सम्मलेन में दो राष्ट्र के सिद्धांत का नारा बुलंद कर दिया था. यूरोप में हिटलर और मुसोलिनी पूरी तरह से माज़िनी और नीत्शे के दर्शन को राजनीति में लागू करने के लिए कमर कस चुके थे . अंग्रेजों ने जिन्ना को उकसा कर पाकिस्तान की मांग करने के लिए तैयार कर किया था . १९४० में उन्होंने अलग देश की मांग कर भी दी. . उसी दौर में १९४२ आया जिसने पूरी दुनिया में राजनीतिक संघर्ष के व्याकरण को बदल दिया. हर वह नेता जो भारत की आज़ादी चाहता था जेलों में ठूंस दिया गया , लेकिन अंग्रेजों के वफादार राजनेता ऐश करते रहे. उनमें से कोई जेल नहीं गया .

दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था . लेकिन मेरे पुरखों के घर में सारी बहस इस बात को लेकर थी कि लाल साहेब की शादी को कितने साल हो गए लेकिन कोई औलाद क्यों नहीं हो रही थी. लगभग सब को शक़ था कि किसी भूत का असर है . बहुत सारे पंडितों और ओझाओं को तलब किया गया और शादी के ८ साल बाद मेरी बड़ी बहन का जन्म हुआ. भला बताइये, जब मेरी बहन का जन्म हुआ तो मेरी माँ की उम्र कुल २३ साल की थी लेकिन तब तक उन्हें बाकायदा बाँझ घोषित किया जा चुका था और परिवार के शुभचिन्तक वंश परंपरा चलाने के लिए मेरे पिता जी की दूसरी शादी का सुझाव देने लगे थे . उन दिनों हिन्दू मैरेज एक्ट १९५५ नहीं लागू था इसलिए इस प्रस्ताव पर कोई नाराजगी नहीं थी . लेकिन १९४५ में मेरी बहन के जन्म के साथ वह ख़तरा ख़त्म हो गया .उसके जन्म के बाद लोगों को अंदाज़ लगा कि देश में कहीं हलचल है क्योंकि उसके लिए नए कपड़ों का जुगाड़ करना बहुत ही मुश्किल हो गया . उन दिनों युद्ध की वजह से मिलों का सारा कपड़ा लाम पर तैनात सिपाहियों के लिए जाता था . देशवासियों को कपड़ा देने के लिए राशन प्रणाली लागू कर दी गयी थी.

१९४७ में देश आज़ाद हो गया लेकिन उसका मेरे गाँव में कोई असर नहीं पड़ा . हमारे इलाके में कोई कांग्रेसी नहीं था. लेकिन यू पी ज़मींदारी एबालिशन एक्ट लागू होने के बाद मेरे खानदान में आज़ादी की हैसियत को अनुभव किया गया . रातोंरात सारी ज़मीन किसानों की हो गयी और फिर गंधिया ( महात्मा गाँधी का अपमान सूचक संबोधन ) को गाली देने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह मेरे बड़े होने तक सुना जाता था . दिलचस्प बात यह है कि जब ज़मींदारी उन्मूलन हुआ तो महात्मा गाँधी की शहादत के ४ साल पूरे हो चुके थे लेकिन मेरे खानदान के लोगों को उनकी ताक़त का अंदाज़ १९५२ में लगा जब नए निजाम में ज़मींदार भी आम आदमी हो गए. .मेरा महात्मा गाँधी से परिचय एक ऐसे आदमी के रूप में हुआ जिसने मेरे सभी खेत दूसरों को दे दिया था . मेरी समझ में नहीं आता था कि यह कैसे संभव हुआ . बाद में स्कूल जाने पर साबरमती के संत के बारे में पता चला . स्कूल से लौट कर जब मैंने अपने बाबू के काका को बताया कि महात्मा गाँधी ने देश को आज़ादी दिलवाई थी तो वे बहुत खफा हो गए और मेरे बाबू से कहा कि स्कूल जा कर के बच्चा उल्टी सीधी बातें सीख रहे हैं .

यह अलग बात है कि उनके बेटे और मेरे बाबू के चचेरे भाई उन दिनों खुद हाई स्कूल में पढ़ते थे . लेकिन शायद मेरे काका ने कभी गाँधी को बड़ा आदमी बताने की बेवकूफी नहीं की थी . इसलिये उनकी पढाई से किसी को एतराज़ नहीं था. मेरे काका ने भी दसवीं के बाद पढाई छोड़ दी थी . मेरे बाबू ने भी मंसूबा बना लिया था कि लड़के को दसवीं तक पढायेगें. ज़मींदारी उन्मूलन के वक़्त मेरे पिता जी की उम्र करीब २७-२८ साल की थी. बहुत ताक़तवर थे . लाठी के जोर से उन्होंने अपनी बहुत सारी ज़मीन वापस ले ली जो किसानों के नाम शिकमी लग गयी थी. कई बाग़ हाथ से निकल गए क्योंकि वे १९२२ में ही नीलाम हो चुके थे क़र्ज़ की डिक्री के बाद मकसूदन के कुछ बनियों ने उन बागों को नीलाम करवा लिया था लेकिन क़ब्ज़ा हमारे पुरखों का ही था. हुआ यूं कि जब नीलामी की डुगडुगी बजी तो हमारे बुज़ुर्ग ज़मींदारों ने कहा कि बनिया की हिम्मत है कि वह हमारी बाग़ ले लेगा . नीलामी तो कागज़ में ही होगी , मौके पर तो बाग़ हमारी ही रहेगी . लेकिन १९५२ के बाद सब कुछ ख़त्म हो गया.

इसी अभाव के माहौल में मेरा बचपन शुरू हुआ . अमिलियातर के नन्ह्कऊ सिंह मुझे चुप्पे से स्कूल लेकार गए. मेरे बाबू को पता ही नहीं चला कि मैं कब दूसरी जमात में चला गया .उन्होंने मेरी बड़ी बहन को कभी स्कूल के तरफ मुंह नहीं करने दिया था . मुझसे चार साल छोटी बहन को मेरी बड़ी बहन ने ही मेरे साथ स्कूल भेजना शूरू कर दिया था लेकिन बाबू ने उसे मिडिल स्कूल में कभी नहीं जाने दिया. जहां तक मेरा सवाल है गाँव के लड़कों के साथ मैं स्कूल जाने लगा और जब बाबू के मित्र स्व बब्बन सिंह एक दिन स्कूल गए तो उन्हें पता लगा कि लम्बरदार का बेटा तो दूसरी क्लास में पंहुच गया हैं , आकर बाबू से बताया तब मेरे लिए किताब आई. याद नहीं कब लेकिन प्राइमरी में ही बाबू ने घोषित कर दिया था कि अगर फेल हो जाओगे तो पढाई बंद करवा देगें . माई की इच्छा थी कि लड़का पढ़ लेगा तो दलिद्दर भाग जाएगा. पढाई चलती रही . आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास होने के बाद बाबू बहुत खुश हुए और अपने रिश्ते के चचेरे बड़े भाई धोंधर सिंह से बात कर आये कि अब लड़के को बम्बई में बैंक में नौकरी पर लगवा दें . वे देना बैंक में चपरासी थे. उन्होंने कहा कि अभी पढने दो , लड़का पढने में अच्छा है . बाबू निराश तो हुए लेकिन नौवीं क्लास में नाम लिखवा दिया . वे चाहते थे कि कोई छोटी मोटी नौकरी कर लेगें तो आमदनी में वृद्धि हो जायेगी .

मेरे छोटे भाई को बाबू बहुत पसंद करते थे क्योंकि वह गोरा था और शरीर से मज़बूत था . वे चाहते थे कि अगर बड़ा बेटा कुछ काम कर लेगा तो छोटे की ज़िंदगी बन जायेगी . धोंधर सिंह की बात मानकर बाबू ने नाम तो लिखा दिया लेकिन साथ में चेतावनी भी कि अगर फेल हुए तो पढाई बंद करवा देगें . शायद इसीलिये हाई स्कूल के इम्तिहान के ठीक पहले टाईफाइड हो जाने के बाद भी मैंने दसवीं का इम्तिहान दिया . कमजोरी इतनी थी कि मैं चल नहीं सकता था लेकिन बाबू ने डोली पर बैठाकर कहारों के कंधे से मुझे परीक्षा केंद्र तक पंहुचवा दिया . उसके बाद वे पढाई किसी कीमत पर नहीं होने देना चाहते थे लेकिन माँ की जिद के चलते पढाई हुई और मेरे खानदान में मुझे पहला ग्रेजुएट होने का सौभाग्य मिला. मेरे बाबू बहुत खुश हुए थे जब मैं १९७३ में डिग्री कालेज का लेक्चरर हो गया था लेकिन अपनी खुशी का खुले आम इज़हार कभी नहीं किया . उसके बाद तो उनकी कभी नहीं चली . हालांकि उसके पहले वे दोनों बहनों की शादी का काम निपटा चुके थे .बच्चों के शादी ब्याह को वे काम मानते थे . शायद इसी लिए चौदह पन्द्रह साल की उम्र में सभी बच्चों की शादी करके ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते थे . शिक्षा के मह्त्व को उन्होंने तब समझा जब मेरे कुछ साथी जो सरकार में उच्च पदों पर पंहुच गए थे ,घर आकर बाबू का पाँव छूते थे. जब मेरे बेटे ने आई आई एम में दाखिला लिया और अखबारों में छपने लगा कि इस दाखिले का क्या मतलब है तब उनको लगा कि शिक्षा की वजह से मामूली लोगों का भाग्य भी बदल सकता है. लोग आकर उन्हें बताते थे कि आई आई एम का क्या मतलब है. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी . सिद्धार्थ के एम बी ए करने के अगले साल ही बाबू चले गए .

आज उनकी बहुत याद आ रही है . उनका जीवन इस बात का सबूत है कि माहौल में तरक्की के सारे लक्षण मौजूद हो फिर भी तरक्की तब तक नहीं होती जब तक के आपके अन्दर वह जज़बा न पैदा हो . बच्चों को सही दिशा देने में माँ बाप को जिद नहीं करना चाहिए . अब बाबू के पौत्र का बेटा पैदा हो चुका है . अगर बाबू की चली होती तो मेरे बेटे की शादी वे आज से पंद्रह साल पहले कर चुके होते .लेकिन बाद के वक़्त में वे यह बात स्वीकार करने लगे थे कि वे गलत थे और माई सही थीं . जो लोग ज़मींदारी और सामंती परिवेश से वाकिफ हैं उन्हें समझ में आ जाएगा कि अपनी पत्नी को अपने से सुपीरियर मानना कितनी बड़ी क्रान्तिकारी घटना है .

मजीठिया : नई दुनिया जागरण को फिर भारी पड़ी चालाकी

अब श्रम न्यायालय ने लगाई पांच-पांच सौ की कॉस्ट

रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

हमने आपको पहले ही बताया था कि मध्यप्रदेश में श्रम न्यायालयों मे चल रहे मजीठिया के मामलों में नईदुनिया जागरण प्रबंधन की हर चाल उलटी पड़ रही है। इसका एक ओर ताजा मामला सामने आया है।
जानकारी के मुताबिक ग्वालियर श्रम न्यायालय में चल रहे मामले कूट परीक्षण तक पहुंच गए हैं, लेकिन प्रबंधन बार-बार बहाना बनाकर मामलों को लटकाना चाहता है। प्रबंधन के वकील लेबर कोर्ट में बहाना बनाकर भागते हैं।

पूर्व में जहां ग्वालियर हाईकोर्ट ने मामले में प्रबंधन को पांच-पांच हजार की कॉस्ट लगाई थी। इसमें सभी कर्मचारियों का प्रबंधन ने 09 अप्रैल को पांच-पांच हजार का नकद भुगतान कर दिया था। लेकिन 09 अप्रैल को राज्य अधिवक्ता संघ की हड़ताल के कारण मामले में कूट परीक्षण नहीं हो सका था और अगली तिथि 18 अप्रैल की निर्धारित हुई थी।

18 अप्रैल को कर्मचारी और उनके वकील पूरी तैयारी के साथ कूट परीक्षण के लिए श्रम न्यायालय पहुंचे थे। लेकिन प्रबंधन की ओर से एक जूनियर वकील कोर्ट में उपस्थित हुए और कूट परीक्षण के लिए अगली तारीख की मांग की।कर्मचारियों के वकील ने इस पर आपत्ति ली और माननीय न्यायाधीश महोदय को प्रबंधन की धूर्तता से अवगत कराया।

इस पर प्रबंधन के जूनियर वकील ने तर्क दिया कि उनके सीनियर वकील के यहां कोई कार्यक्रम है, इसलिए उन्हें अवसर दिया जाए। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कर्मचारियों क े वकील की आपत्ति सुनने के बाद प्रबंधन के वकील से स्पष्ट पूछा कि वे केवल हां या न में ये बताएं कि आज कूट परीक्षण करेंगे या नहीं। इस पर प्रबंधन का वकील बगले झांकने लगा। बात बिगड़ती देख बाहर आकर उसने अपने आकाओं को कोर्ट के रुख से अवगत कराया।

इसके बाद सीनियर वकील भागे-भागे कोर्ट पहुंचे और उन्होंने भी तारीख देने की मांग की। इसके बाद पुन: न्यायाधीश महोदय ने कहा कि केवल अपना उत्तर हां या न में दें। इसके बाद जब प्रबंधन के वकील ने असमर्थता जताई तो माननीय न्यायाधीश महोदय ने प्रत्येक प्रकरण में 500-500 रुपए कॉस्ट लगा दी। साथ ही माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों में सुनवाई हो रही है। इसलिए मामलों को तय समय में निपटाने के लिए अब डे टू डे सुनवाई की जाएगी। इसके बाद सभी प्रकरणों में दो दिन बाद की तारीख दे दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट के कठघरे को है ‘जागरण’ के मालिकों का इंतजार!

दैनिक जागरण की ‘गुड़गोबर’ पत्रकारिता : आरोपमुक्त को लिखा ‘आतंकी वासिफ़’

MediaVigil से साभार।

लगता है कि दैनिक जागरण की तिजोरी के साथ ही उसके पापों का भी घड़ा भर गया है। उसने अपने कर्मठ कर्मचारियों के साथ जो अत्‍याचार किए हैं, उनका हिसाब बराबर करने का समय आ गया है। मालिक संजय गुप्‍ता के खाते में अच्‍छे दिनों का डिपाजिट सूख चुका है। एक अदृश्‍य कंगाली का शिकंजा उन पर कसने लगा है।

हिंदी का नंबर एक अख़बार दैनिक जागरण बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बारे में लिखते हुए कभी ‘क़ातिल’ ‘रंगदार’ या ‘तड़ीपार’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल नहीं करता, जबकि उन पर क़त्ल, फ़िरौती वसूलने से लेकर एक लड़की की अवैध जासूसी कराने तक के अरोप लगे थे। जागरण बिलकुल ठीक करता है क्योंकि अमित शाह को अदालत से ‘बरी’ कर दिया गया है।

लेकिन जब नाम अमित की जगह ‘वासिफ़’ हो तो जागरण पत्रकारिता के इस सामान्य सिद्धांत को ताक पर रख देता है। वरना अदालत से बरी कर दिए जाने के बावजूद वह कानपुर के वासिफ़ हैदर को बार-बार आतंकी न लिखता। उसे इसमें कुछ ग़लत नहीं लगा। लेकिन इस एक नंबरी अख़बार से मोर्चा लेने की वासिफ़ की ज़िद की वजह से आपराधिक मानहानि का एक अहम मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। 3 अप्रैल को जस्टिस चालमेश्वर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसे गंभीर मसला मानते हुए शीघ्र सुनवाई के आदेश दिए।

जागरण के संपादक और प्रकाशक कठघरे में हैं। अदालत का रुख बता रहा है कि यह मामला बाक़ी मीडिया के लिए भी एक नज़ीर बन सकता है। वासिफ़ हैदर की कहानी भी सुन लीजिए। कानपुर निवासी वासिफ़ मेडिकल उपकरणों की सप्लाई करने वाली एक अमेरिकी मल्टीनेशनल, बैक्टन डिकिन्सन कंपनी में क्षेत्रीय बिक्री प्रबंधक के रूप में काम कर रहे थे जब 31 जुलाई 2001 को इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी), दिल्ली पुलिस, स्पेशल सेल और स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की टीमों ने उनका ‘अपहरण’ कर लिया। बम विस्फोट कराने से लेकर अवैध हथियारों तक के मामलों को कबूलने के लिए उन्हें ‘थर्ड डिग्री’ दी गई और ‘कबूलनामे’ का वीडियो भी बना लिया गया। इनमें एक मामला दिल्ली का भी था। ज़ाहिर है, चार बेटियों वाले वासिफ़ के परिवार पर कहर टूट पड़ा। पड़ोस ही नहीं पूरे कानपुर में उनके परिवार की थू-थू हुई।

लंबी जद्दोजहद के बाद अदालत से वे सभी मामलों में बरी हो गए। पूरी तरह निर्दोष साबित होने के बाद वे 12 अगस्त 2009 को जेल से बाहर आए। यानी बेगुनाह वासिफ़ की ज़िंदगी के आठ से ज़्यादा साल जेल की सलाखों के पीछे बीते।

जेल से निकलकर ज़िंदगी को पटरी पर लाना आसान नहीं था। बहरहाल, अदालत से मिला ‘निर्दोष होने’ का प्रमाणपत्र काम आया और धीर-धीरे वे समाज में स्वीकार किए जाने लगे। लेकिन करीब साल भर बाद जब 2010 में बनारस के घाट पर बम विस्फोट हुआ तो दैनिक जागरण ने एक ख़बर में इसका तार कानपुर से जोड़ते हुए लिखा कि ‘आतंकी वासिफ़’ पर नज़र रखी जा रही है। पता लगाने की कोशिश हो रही है कि वह किससे मिलता है, उसका ख़र्चा कैसे चलता है…वग़ैरह-वग़ैरह..।

जागरण कानपुर से ही शुरू हुआ अख़बार है और आज भी यह शहर उसका गढ़ है। ज़ाहिर है, इस अख़बार में ‘आतंकी’ लिखा जाना वासिफ़ के लिए सिर पर बम फूटने जैसा था। वे कहते रह गए कि अदालत ने उन्हें हर मामले में बरी कर दिया है, लेकिन अख़बार बार-बार उन्हें ‘आतंकी वासिफ़’ लिखता रहा। जो समाज थोड़ा क़रीब आया था, उसने फिर दूरी बना ली।

वासिफ़ के लिए यह आघात तो था, लेकिन उन्होंने भिड़ने की ठानी। उन्होंने 2011 में जागरण के ख़िलाफ़ स्पेशल सीजीएम कोर्ट में आपराधिक मानहानि का मुक़दमा दायर कर दिया। कोर्ट ने पुलिस को जाँच सौंपी तो पता चला कि वासिफ़ के आरोप सही हैं, लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि इसके बाद अदालत तारीख़ पर तारीख़ देने लगी।

वासिफ़ ने तब हाईकोर्ट का रुख किया जहाँ मामले के जल्द निपटारे का निर्देश हुआ। इस पर मजिस्ट्रेट ने जागरण की यह दलील मानते हुए कि- वासिफ़ पर पहले आरोप थे और कुछ मुकदमे चल भी रहे हैं, लिहाज़ा आतंकी लिखकर कोई मानहानि नहीं की गई- याचिका को निरस्त कर दिया। जबकि हक़ीक़त यह थी कि वासिफ़ के ख़िलाफ़ कोई मामला दर्ज नहीं था और न ही कोई जाँच चल रही थी। वे सभी मामलों में बरी हो चुके थे।

वासिफ़ ने इसके ख़िलाफ़ पहले सेशन्स कोर्ट और फिर हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन हर जगह निराशा हाथ लगी। उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास भी अख़बार की शिकायत की थी लेकिन कुछ हल नहीं निकला। वासिफ़ ने मीडिया विजिल को बताया कि इसी निराशा के दौर में उनकी मुलाकात प्रशांत भूषण से हुई। उन्होंने मामले को समझा और केस दायर कर दिया। सुप्रीमकोर्ट ने 30 मार्च 2015 को जागरण के एडिटर संजय गुप्त, मैनेजिंग एडिटर महेंद्र गुप्त और प्रकाशक कृष्ण कुमार विश्नोई के साथ-साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस मामले में नोटिस जारी कर दिया।

3 अप्रैल 2018 को इस मामले में एक बड़ा मोड़ आया जब जस्टिस चालमेश्वर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले को गंभीर माना। अदालत ने कहा कि इस मामले में क़ानून का बड़ा सवाल है, इसलिए इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता है।

अंग्रेज़ी वेबसाइट LIVELAW.IN  में छपी ख़बर के अनुसार वकील प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने तर्क दिया कि यह मुद्दा सिर्फ किसी एक के निर्दोष होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला कई मामलों में दोहराया गया एक बना बनाया पैटर्न है। इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए अदालत को इस पर समग्र रूप से विचार करना चाहिए।

प्रशांत भूषण की टीम के सदस्य एडवोकेट गोविंद ने कहा-  ‘सवाल यह है कि एक अखबार या मीडिया हाउस किसी व्यक्ति विशेष को एक आतंकवादी के रूप में कैसे प्रचारित कर सकता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति पर एक दफा आतंकवाद का झूठा आरोप लग चुका था। इस मसले पर कानून की धारा 499 और 500 से स्पष्ट है।’

अदालत ने मामले को गंभीर माना है। अगली सुनवाई जुलाई में होगी। उम्मीद है कि अदालत कुछ ऐसा आदेश ज़रूर देगी जिससे मीडिया आरोपितों और दोषियों में फ़र्क करने की तमीज़ वापस हासिल करने को मजबूर हो। बात निकली है तो दूर तलक जाने में ही सबकी भलाई है।

उन्‍हें नहीं दिखते दैनिक जागरण के दूसरे पाप

श्रीकांत सिंह।

ऐसे नेताओं को आप क्‍या कहेंगे, जिन्‍हें दैनिक जागरण के दूसरे पाप नहीं दिखते। ये नेता हैं- दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और केजरीवाल की दुलत्‍ती खाकर बागी हुए कपिल मिश्रा। इन्‍हें पत्रकारिता पर उस समय संकट नहीं दिखा जब दैनिक जागरण अपने असहाय कर्मचारियों पर अत्‍याचार किए जा रहा था और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए आज भी पत्रकारों का हक मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं कर रहा है। इस संदर्भ में दैनिक जागरण ने अपने 11 अप्रैल 2018 के अंक में एक खबर भी प्रकाशित की है, जिसकी कटिंग यहां संलग्‍न है।

जब आम आदमी पार्टी की सरकार के विधायकों ने दिल्ली विधानसभा में दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ खबरों पर आपत्ति जताई और मामले को विधानसभा की विशेषाधिकार समिति को सौंपने की मांग की तो उक्‍त सभी नेताओं को पत्रकारिता पर संकट नजर आने लगा। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी मांग को गंभीरता से लिया और मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया है।

दैनिक जागरण में कार्यरत एक कर्मचारी ने नोएडा स्थित कार्यालय का पूरा सीन हमारे साथ शेयर किया जो इस प्रकार है-सुधीर मिश्रा एक चपरासी समेत दो लोगों को साथ लेकर 11 अप्रैल को ही कार्यालय में रातभर जमे रहे और सुबह नौ बजे तक कुछ कागजात की फोटो कॉपी निकालते रहे। लीगल स्‍टाफ के सदस्‍य मनोज दुबे और राजेंद्र दुबे अपने वकीलों के साथ नोएडा यूनिट के मीटिंग हाल में कंपनी के कई दिग्‍गजों मालिक संजय गुप्‍ता, मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव, राजनीतिक संपादक प्रशांत मिश्रा के साथ 12 अप्रैल को मीटिंग हाल में माथापच्‍ची करते रहे।

भयभीत मुद्रा बनाए स्‍थानीय संपादक विष्‍णु त्रिपाठी ने तो मीटिंग हाल में पहले ही पहुंच कर अपना स्‍थान ग्रहण कर लिया था। एसी चालू होने के बावजूद सभी के चेहरे पर पसीने की कुछ बूंदें नजर आ रही थीं। सभी इस बात से चिंतित थे कि कहीं दिल्‍ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति मालिक संजय गुप्‍ता को तलब न कर ले। हालत यह हो गई कि लेबर आफिस में 12 अप्रैल के एक मामले की सुनवाई में भी दैनिक जागरण से कोई नहीं पहुंचा।

विपक्षी पार्टियों का सर्वनाश इसलिए हो रहा है, क्‍योंकि उन्‍हें विरोध करने के लिए जनहित के मुद्दे नहीं मिलते और वे अपना राजनीतिक उल्‍लू सीधा करने में लगी रहती हैं। तभी उन्‍हें सिर्फ इस मामले में लोकतंत्र की हत्या नजर आ रही है।

कपिल मिश्रा ने तो विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिखा था, लेकिन मजीठिया लागू कराने के लिए उन्‍होंने कभी भी कोई पत्र नहीं लिखा। उन्‍होंने कहा कि दैनिक जागरण अखबार के खिलाफ दिल्ली विधानसभा में अवमानना का प्रस्ताव जायज नहीं है। तो क्‍या दैनिक जागरण का सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताना जायज है… वाह रे कपिल‍ मिश्रा…तू भी क्रांतिकारी बनने के लिए मार करता है। शेम शेम…।

दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है। यह सरकार प्रेस की आजादी पर हमला कर रही है। दिल्ली में आपातकाल की तरह हालात हैं। गुप्‍ताजी, आप भी जाति के आधार पर फिसल रहे हैं। दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्‍ता ने पत्रकारिता को जिस तरह आपातकाल के हवाले कर दिया है, काश आपको भी उसका अहसास होता।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। मनोज जी, आप हर दिल अजीज गायक हैं, लेकिन आपकी संवेदना कभी भी लाचार पत्रकारों के पक्ष में व्‍यक्‍त नहीं हुई। उनके दुख दर्द पर एक गाना भी गा देते तो हम मान लेते कि आप पत्रकारों और पत्रकारिता का सम्‍मान करते हैं। जिनके बल पर आप राजनीति में उतरे हो, वही मां सरस्‍वती आपको कभी माफ नहीं करेंगी।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने भी इस मामले को लेकर केजरीवाल सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि दिल्ली सरकार में बैठे लोग अखबारों में अपने मन माफिक खबरें छपवाना चाहते हैं। सरकार ने प्रेस की आजादी पर हमला किया है। हम इसके खिलाफ एडिटर्स गिल्ड और कोर्ट में भी जाएंगे। माकन जी, आपकी ही पार्टी की सरकार की ओर से जारी मजीठिया वेतनमान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्‍बल, सलमान खुर्शीद और अभिषेक मनु सिंघवी लगातार मालिकों के शोषण के पैरोकार बने रहे। क्‍या यह सब आपको याद दिलाने की जरूरत है… इन नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना होगा और चुनावों में इन्‍हें माकूल जवाब दिए जाने की जरूरत है।

सरकारीपना का रोग

श्रीकांत सिंह।

कुछ लोग पत्रकारिता में तारीफ को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन जब इसकी वकालत कुछ पत्रकार साथी भी करने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि पत्रकारिता को सरकारीपना का रोग लग गया है। अरे भइया, पत्रकारिता में सरकार की तारीफ से ठीक उसी प्रकार परहेज करना चाहिए जैसे शुगर के मरीज को मीठा से परहेज करना होता है।

तारीफ के लिए सरकार के पास पूरा बजट होता है और वह उस पर खर्च भी करती है। मुफ्त में साहेब की तारीफ करने के लिए डॉक्‍टर ने बताया है क्‍या… आपको कोई भक्‍त पत्रकार कह देगा तो बुरा मान जाएंगे। यदि आप चारण बने रहना चाहते हैं और पत्रकार कहलाने का शौक भी चर्राया रहता है तो यह आपकी समस्‍या हो सकती है, पत्रकारिता की नहीं। वैसे, जनहित में सरकार की किसी कल्‍याणकारी योजना का विश्‍लेषण किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस पर उठाए सवाल

नई दिल्‍ली।

सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने इतिहास में पहली बार देश के सामने आकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अनियमितताओं के संदर्भ में संवाददाता सम्मेलन कर चीफ जस्टिस पर सवाल उठाए। शुक्रवार को जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ व जस्टिस रंजन गोगोई ने मीडिया से बात कर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन पर आरोप लगाया कि वहां की व्‍यवस्‍था ठीक नहीं है।

अपने घर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जस्‍टिस चेलमेश्‍वर ने कहा, ‘प्रेस कांफ्रेंस को बुलाने का निर्णय हमें मजबूरी में लेना पड़ा है। मीडिया के सामने आने के अलावा दूसरा रास्‍ता नहीं बचा था। देश का लोकतंत्र खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। चीफ जस्‍टिस पर अब देश को फैसला करना होगा।’

नंबर दो के जज माने जाने वाले जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, ‘करीब दो महीने पहले हम चारों जजों ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखा और उनसे मुलाकात की। हमने उनसे बताया कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। सीजेआई से अनियमितताओं पर बात की थी। कई गड़बड़ियों की शिकायत की। हम नहीं चाहते कि 20 सालों में हम पर कोई आरोप लगे। न्‍यायपालिका की निष्‍ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन सीजेआई ने कोई कार्रवाई नहीं की।’

चेलमेश्वर ने कहा कि हमारे पत्र पर अब राष्ट्र को विचार करना है कि सीजेआई के खिलाफ महाभियोग चलाया जाना चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। बीते कुछ महीनों से काफी गलत चीजें हो रही हैं।

जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि हम वह पत्र सार्वजनिक करेंगे, जिससे पूरी बात स्पष्ट हो जाए। चेलमेश्वर ने कहा, ‘20 साल बाद कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है। इसलिए हमने मीडिया से बात करने का फैसला किया।’  उन्‍होंने कहा कि भारत समेत किसी भी देश में लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए यह जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था ठीक से काम करे।