पत्रकारिता है कहां…

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता पर हमले हो रहे हैं। ऐसा हमने सुना है। यह भी सुना है कि उससे प्रेस क्‍लब वाले पत्रकार काफी खफा हैं। क्‍यों, एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर संकट आन पडा है। यह भी ताना मारा जा रहा है प्रणय राय ने मजीठिया वेतनमान के बारे में सुना तक नहीं है। हालांकि एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने मजीठिया वेतनमान पर काफी कुछ चर्चा की है। और यह भी कहा जा रहा है कि प्रेस की आजादी के लिए हमें एकजुट होना चाहिए खासकर एनडीटीवी के मामले में क्‍योंकि उसने सरकार की गलत नीतियों पर काफी कुछ उंगली उठाई है। ये सारी बातें अपनी जगह ठीक हैं पर पत्रकारिता है कहां।

पहले पत्रकारिता का मतलब समझने की कोशिश करें। पत्रकारिता का सीधा सा मतलब है सरकार की जवाबदेही को सामने लाना। सरकार के फैसलों पर उठने वाले सवाल मंत्रियों के सामने लाना और उनके जवाब को जनता के सामने लाना। लेकिन सरकार के मंत्री जवाब देने के लिए तैयार कहां होते हैं। मध्‍य प्रदेश के मंदसौर मामले पर केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सवालों के जवाब देने के बजाय किस प्रकार बाबा रामदेव के साथ योग की टांग तोडते नजर आए, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुझे याद है, जब मैंने नरेंद्र मोदी को पहली बार टीवी पर बकैती करते देखा था। उनसे गोधरा पर सवाल पूछे जा रहे थे, जिसके जवाब में वह गुजरात के किसानों की बात कर रहे थे। खैर। आज तो यह प्रचलित है कि मोदी जी से मिलने का मतलब है मंगल ग्रह पर जाने जैसा मुश्किल काम। यह अलग बात है कि विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज कहती हैं कि यदि कोई मंगल ग्रह पर फंसा है तो उसे भी वह बचा लेंगी।

कुल मिलाकर एक आम पत्रकार और सरकार के बीच संवाद समाप्‍त हो चुका है। ऐसे में हमारा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि पत्रकारिता समाप्‍त हो चुकी है। इस पर कुछ लोग बडे गर्व से कहते पाए जाते हैं कि पत्रकारिता थी ही कब। मतलब यह कि पत्रकारिता शुरू से ही पिकनिक मनाने का स्‍थल मात्र रही है, जिसके आयोजन प्रयोजन का संबंध संपादक नामक संस्‍था से हुआ करता रहा है। अब तो इस व्‍यवस्‍था से संपादक भी विदा हो गया है।

तो यह मान लिया जाए कि एस निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, एचके दुआ और टीएन नाइन कभी पत्रकारिता के बडे नाम भले ही रहे हों, लेकिन वे पत्रकारिता की दुकान के काउंटर पर बैठकर ग्राहकों को निपटाते रहे हैं। इन लेागों ने पत्रकारिता में अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, बरखा दत्त, राजदीप सारदेसाई, तरुण तेजपाल, सुभाष गोयल, संजय गुप्ता, शोभना भरतिया जैसे कई लोगों और यहां तक कि प्रणय जेम्स रॉय जैसे लोगों को पत्रकारिता का उपयोग और उपभोग करने पर कभी नहीं टोका और तेजी से पत्रकारिता की गिरती साख और वहां काम कर रहे लोगों की खराब हालत पर कभी चिंता जताने की जरूरत महसूस नहीं की।

इसलिए प्रेस की आजादी क्या है, इस पर साफ-साफ बात होनी चाहिए। अगर ट्वीटर से ज्ञान प्राप्‍त कर उसे परोसना ही पत्रकारिता है, उस पर कोई सवाल-जवाब न किया जाना ही पत्रकारिता है तो पत्रकारिता पर संकट कहां है। कोई भी ट्वीटर की एक झलक देखकर सोशल मीडिया के जरिये पत्रकारिता के झंडे गाड सकता है और नामी गिरामी पत्रकार बन सकता है। सवाल वहीं पर जग रहा है, जहां जवाब नींद में है। नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।

 

गोदी के गदेलवा और मीडिया

श्रीकांत सिंह।

गोदी का गदेला तो सुना था लेकिन गोदी का मीडिया पहली बार सुन रहा हूं। मीडिया की चुनौतियां इतनी जटिल हैं कि गोद लिए बगैर उसे बचाया नहीं जा सकता। हर मीडिया हाउस को किसी न किसी ने गोद ले रखा है। गोदी में मीडिया खुद को सेफ महसूस करता है तो मीडियाकर्मी अपनी नौकरी। और क्‍या चाहिए इस देश को। मीडियाकर्मियों की नौकरी चलती रहे और सरकार की गोद में मीडिया महफूज रहे। पत्रकारिता महफूज रहने की आखिर जरूरत ही क्‍या है।

पत्रकार अगर यह सोचते हैं कि उनके बगैर इस देश में ज्ञान नहीं बंट पाएगा तो यह उनका मुगालता है। आज ज्ञान इतना स्‍मार्ट हो गया है कि वह खुद ब खुद आपके पास पहुंच जाता है। अब मध्‍य प्रदेश के मंदसौर को ही लें तो वहां बताया जा रहा है कि कोई गोली नहीं चलाई गई, लेकिन छह किसानों के मारे जाने की जानकारी आप लोगों तक पहुंच ही गई है। तो जो लोग यह सोच रहे हैं कि मीडिया को गोद ले लेंगे तो लोग ज्ञान से वंचित रह जाएंगे, यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। मीडिया को आप अपनी तरह से चलाइए और ज्ञान आपको अपनी तरह से चलाता रहेगा।

उत्‍तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने भी खुद को गोद लेने की आग्रहपूर्ण विनती की थी, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई थी कि उनकी उमर गोद लेने की नहीं है। लोग शायद गोद का व्‍यापक मतलब नहीं समझ पाए। तभी तो उन्‍होंने अपनी अज्ञानता प्रकट कर दी। गोद का मतलब अभयदान, सुरक्षा और हर गलती पर माफी की विनती स्‍वीकार करने से है। मोदी जी दूरदर्शी हैं। वह पहले से जानते थे कि उत्‍तर प्रदेश को चलाना आसान काम नहीं है। उत्‍तर प्रदेश की जनता उन्‍हें गोद ले लेगी तो हर गलती माफ। क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के लिए तो मोदी जी गोदी के गदेलवा हैं।

गोद के विज्ञान को शायद सबसे पहले मोदी जी ने समझा। उसके बाद मीडिया वालों को इसका ज्ञान हुआ। अब मीडिया वाले गोदी में बैठने के लिए तैयार हैं। कोई किसी की गोदी में बैठ रहा है तो कोई किसी की गोदी में। आपके पास पैसा है तो आप भी किसी मीडिया हाउस को गोद ले लीजिए। क्‍या पता कब जरूरत पड़ जाए कि कोई मीडिया हाउस आपको गोद ले और आपके आर्थिक अपराधों पर मिट्टी डालने के काम आ जाए।

इसलिए गोद लिए जाने की कोई उम्र और शर्त नहीं होनी चाहिए। अब देश की इतनी बड़ी पार्टी कांग्रेस मौका पड़ने पर क्षेत्रीय दल सपा की गोद में जा बैठी। पाकिस्‍तान चीन की गोद में बैठा है। आतंकी पाकिस्‍तान की गोद में बैठे हैं। जो किसी की गोद में नहीं बैठा है, उसका नष्‍ट होना तय है। उसके विकास की कोई संभावना नहीं है। आप मानव हैं पशु नहीं कि पैदा होते ही चलने फिरने लगें। मानव की विकास यात्रा गोद से शुरू होती है और ईश्‍वर की गोद पर समाप्‍त होती है। इसलिए आपको यदि कोई गोदी मीडिया कहे तो कृपया शर्माइगा नहीं।

दरअसल, पत्रकारिता कभी नहीं कहती कि उसे गोद लिया जाए। लेकिन गोद लिए जाने की सर्वाधिक आवश्‍यकता उसी को है। आप कल्‍पना करें कि कितना जोखिम उठाकर एक रिपोर्टर जनहित की खबरों को सामने लाता है और उससे समय समय पर समाज का भला भी होता है। लेकिन उसी रिपोर्टर को जब संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई भी सामने नहीं आता। आज जो भी मदद मिल रही है, वह मीडिया हाउस को मिल रही है। लेकिन मीडिया हाउस ही पत्रकारिता नहीं है।

आज मीडिया हाउस अलग-अलग राजनीतिक दलों की सेना के अंग बन गए हैं। वे उनकी ओर से सूचना के प्रक्षेपास्‍त्र से विरोधियों पर हमले कर रहे हैं और उसकी एवज में लाभ उठाकर फल फूल रहे हैं। इस लड़ाई में अगर कोई उपेक्षित है तो वह है पत्रकार। आज पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है। उनका भविष्‍य अनिश्चितता के खतरे में है, लेकिन इस वर्ग की फिक्र किसी राजनीतिक दल को नहीं है क्‍योंकि राजनीतिक दलों ने तो मीडिया हाउस को ही गोद ले रखा है। इतने से ही उनका काम चल जाता है। फिर वे पत्रकारों की फिक्र क्‍यों करेंगे।