उन्‍हें नहीं दिखते दैनिक जागरण के दूसरे पाप

श्रीकांत सिंह।

ऐसे नेताओं को आप क्‍या कहेंगे, जिन्‍हें दैनिक जागरण के दूसरे पाप नहीं दिखते। ये नेता हैं- दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और केजरीवाल की दुलत्‍ती खाकर बागी हुए कपिल मिश्रा। इन्‍हें पत्रकारिता पर उस समय संकट नहीं दिखा जब दैनिक जागरण अपने असहाय कर्मचारियों पर अत्‍याचार किए जा रहा था और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए आज भी पत्रकारों का हक मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं कर रहा है। इस संदर्भ में दैनिक जागरण ने अपने 11 अप्रैल 2018 के अंक में एक खबर भी प्रकाशित की है, जिसकी कटिंग यहां संलग्‍न है।

जब आम आदमी पार्टी की सरकार के विधायकों ने दिल्ली विधानसभा में दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ खबरों पर आपत्ति जताई और मामले को विधानसभा की विशेषाधिकार समिति को सौंपने की मांग की तो उक्‍त सभी नेताओं को पत्रकारिता पर संकट नजर आने लगा। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी मांग को गंभीरता से लिया और मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया है।

दैनिक जागरण में कार्यरत एक कर्मचारी ने नोएडा स्थित कार्यालय का पूरा सीन हमारे साथ शेयर किया जो इस प्रकार है-सुधीर मिश्रा एक चपरासी समेत दो लोगों को साथ लेकर 11 अप्रैल को ही कार्यालय में रातभर जमे रहे और सुबह नौ बजे तक कुछ कागजात की फोटो कॉपी निकालते रहे। लीगल स्‍टाफ के सदस्‍य मनोज दुबे और राजेंद्र दुबे अपने वकीलों के साथ नोएडा यूनिट के मीटिंग हाल में कंपनी के कई दिग्‍गजों मालिक संजय गुप्‍ता, मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव, राजनीतिक संपादक प्रशांत मिश्रा के साथ 12 अप्रैल को मीटिंग हाल में माथापच्‍ची करते रहे।

भयभीत मुद्रा बनाए स्‍थानीय संपादक विष्‍णु त्रिपाठी ने तो मीटिंग हाल में पहले ही पहुंच कर अपना स्‍थान ग्रहण कर लिया था। एसी चालू होने के बावजूद सभी के चेहरे पर पसीने की कुछ बूंदें नजर आ रही थीं। सभी इस बात से चिंतित थे कि कहीं दिल्‍ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति मालिक संजय गुप्‍ता को तलब न कर ले। हालत यह हो गई कि लेबर आफिस में 12 अप्रैल के एक मामले की सुनवाई में भी दैनिक जागरण से कोई नहीं पहुंचा।

विपक्षी पार्टियों का सर्वनाश इसलिए हो रहा है, क्‍योंकि उन्‍हें विरोध करने के लिए जनहित के मुद्दे नहीं मिलते और वे अपना राजनीतिक उल्‍लू सीधा करने में लगी रहती हैं। तभी उन्‍हें सिर्फ इस मामले में लोकतंत्र की हत्या नजर आ रही है।

कपिल मिश्रा ने तो विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिखा था, लेकिन मजीठिया लागू कराने के लिए उन्‍होंने कभी भी कोई पत्र नहीं लिखा। उन्‍होंने कहा कि दैनिक जागरण अखबार के खिलाफ दिल्ली विधानसभा में अवमानना का प्रस्ताव जायज नहीं है। तो क्‍या दैनिक जागरण का सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताना जायज है… वाह रे कपिल‍ मिश्रा…तू भी क्रांतिकारी बनने के लिए मार करता है। शेम शेम…।

दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है। यह सरकार प्रेस की आजादी पर हमला कर रही है। दिल्ली में आपातकाल की तरह हालात हैं। गुप्‍ताजी, आप भी जाति के आधार पर फिसल रहे हैं। दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्‍ता ने पत्रकारिता को जिस तरह आपातकाल के हवाले कर दिया है, काश आपको भी उसका अहसास होता।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। मनोज जी, आप हर दिल अजीज गायक हैं, लेकिन आपकी संवेदना कभी भी लाचार पत्रकारों के पक्ष में व्‍यक्‍त नहीं हुई। उनके दुख दर्द पर एक गाना भी गा देते तो हम मान लेते कि आप पत्रकारों और पत्रकारिता का सम्‍मान करते हैं। जिनके बल पर आप राजनीति में उतरे हो, वही मां सरस्‍वती आपको कभी माफ नहीं करेंगी।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने भी इस मामले को लेकर केजरीवाल सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि दिल्ली सरकार में बैठे लोग अखबारों में अपने मन माफिक खबरें छपवाना चाहते हैं। सरकार ने प्रेस की आजादी पर हमला किया है। हम इसके खिलाफ एडिटर्स गिल्ड और कोर्ट में भी जाएंगे। माकन जी, आपकी ही पार्टी की सरकार की ओर से जारी मजीठिया वेतनमान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्‍बल, सलमान खुर्शीद और अभिषेक मनु सिंघवी लगातार मालिकों के शोषण के पैरोकार बने रहे। क्‍या यह सब आपको याद दिलाने की जरूरत है… इन नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना होगा और चुनावों में इन्‍हें माकूल जवाब दिए जाने की जरूरत है।

Advertisements

सीएम नीतीश के काफिले पर क्‍यों हुआ हमला

बक्सर।

विकास कार्यों में भेदभाव का आरोप लगाकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काफिले पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया। पथराव में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए और सीएम को किसी तरह वहां से सुरक्षित निकाला जा सका। वह विकास समीक्षा यात्रा के लिए बक्सर जिले के नंदन गांव पहुंचे थे। पिछली बार भी सीएम नीतीश की विकास समीक्षा यात्रा के दौरान चौसा में कुछ ऐसा ही हुआ था।

कुछ असामाजिक तत्वों ने सीएम के कारकेड पर हमला कर दिया और जमकर पत्थरबाजी की, जिससे काफिले में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और गाड़ी लेकर भाग खड़े हुए। इस घटना में कई सुरक्षाकर्मी घायल हो गए।

गांव के ही चमटोली के लोगों का कहना था कि विकास केवल मुख्यमंत्री को दिखाने के लिए हुए, गांव के ही दूसरे इलाकों में कुछ नहीं हुआ। विरोध दायरे में था,  अचानक काफिले पर कुछ असामाजिक तत्व पत्थर चलाने लगे। आधा साइज के ईंट चलने से कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। काफिले में भगदड़ की स्थिति मच गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि सात निश्चय कार्यक्रम के तहत गांव में कोई काम नहीं हुआ। इसी को लेकर ग्रामीण विरोध जता रहे थे और सीएम को गांव लाने की मांग कर रहे थे। घटना के बाद सीएम नीतीश कुमार को गांव से सुरक्षित निकालकर वहां से दो किलोमीटर दूर एक फॉर्म पर ले जाया गया, जहां उन्‍होंने सभा को संबोधित किया।

सीएम को अहिनौरा में गार्ड ऑफ आनर दिया गया, जिसके बाद सीएम ने अपना भाषण पढ़ना शुरू किया और कहा कि जिस शादी में दहेज लिया जाता हो उस शादी में ना जाएं। उन्होंने दहेज और बाल विवाह को समाज से खत्म करने की बात कही।

उन्होंने लोगों से वादा किया कि जो भी वादा किया है वो पूरा करेंगे। इतना कहना था कि लोगों ने उन्हें काला झंडा दिखाया और अपना विरोध प्रकट किया। वहीं इससे पहले महादलित महिलाओं ने सीएम के काफिले को रोकने की भी कोशिश की थी।

एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल का दर्शन

श्रीकांत सिंह।

गुजरात विधानसभा चुनाव आज यानी 17 दिसंबर 2017 को एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल के बीच त्रिशंकु की भांति लटका हुआ है। चुनावी भविष्‍यवाणी करने में कुछ पत्रकारों को छोड़ दें तो ज्‍यादातर भाजपा के पक्ष में ईवीएम की तरह विनम्र, अतिविनम्र और विनम्राधिराज बने हैं। जयशंकर प्रसाद के एक नाटक का संदर्भ लें तो उसमें लिखा है-‘सीधे तने पर्वत के चरणों में कमजोर और लचकदार लताओं को लोटना ही चाहिए।’ ये कमजोर और लचकदार लताएं आज की पत्रकारिता की ओर संकेत करती हैं जिसकी वजह से कभी कभी एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल में उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुव का अंतर सामने आता है। भारत में केजरीवाल के मुख्‍यमंत्री बनने और अमेरिका में डोनाल्‍ड ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने में एक्जिट पोल धोखा खा गए थे। शायद यही वजह रही होगी कि ट्रंप ने अमेरिका के पत्रकारों को फेकू पत्रकार करार दिया था।

दरअसल, एक्जिट पोल के दर्शन की बात करें तो यह उस दशा को दर्शाता है जो हमारे मन की हालत होती है। हमारा मन सत्‍तारूढ़ पार्टी का इतना गुलाम हो चुका होता है कि उसके विरोध में कुछ सोचता ही नहीं। जैसे वैशाख नंदन को वैशाख में सबकुछ हरा-हरा दिखता है वैसे ही आज तमाम पत्रकारों को भाजपा में कोई दोष नजर नहीं आ रहा है। हर कोई अपने आंकड़े में भाजपा को जिताता नजर आता है। किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा भी हो सकती है। अनुमान लगाने में आखिर इतना बड़ा जोखिम कौन उठाए। इसीलिए मैंने भी न तो त्रिशंकु का अनुमान लगाया है और न ही किसी पार्टी विशेष के सत्‍ता में आने का। मैंने साफ-साफ कह दिया है-‘मेरे पास डेढ़ सौ सीटें हैं, जिन्‍हें किसी पार्टी को देना नहीं चाहता। भाजपा को इसलिए नहीं कि उसने उस लायक काम नहीं किया है और विपक्ष को इसलिए नहीं कि वह उतना सक्षम नहीं बन पाया है। ये है एक्जिट पोल का दर्शन।’

हमारे पत्रकारों से कहीं ज्‍यादा सटीक दर्शन जनता यानी मतदाताओं के पास होता है। इसीलिए वे समय समय पर पत्रकारों को चौंकाते रहते हैं। अपने अंदर का हाल किसी पत्रकार को नहीं बताते। बताते वही हैं जो पत्रकार सुनना चाहते हैं और सत्‍ता के समर्थन में भविष्‍यवाणी करना चाहते हैं। मुझे उन पत्रकारों के चिंतन पर कोफ्त होती है जो जनता तो दूर, पत्रकारों के ही हक मजीठिया को दिलाने में नखरे दिखा रही भाजपा को दूध की धुली बताते नहीं थकते और ऊपर से महान होने का आडंबर ओढ़ लेते हैं कि वे इतने महान हैं कि अपने हक की चर्चा भी नहीं करना चाहते। लेकिन सैलरी दस दिन लेट हो जाए तो घोर निराशा में डूबने लगते हैं। ऐसे पत्रकारों की भविष्‍यवाणियां हमेशा सच होंगी, इसमें संदेह की गुंजाइश बनी रहेगी। क्‍योंकि परिवर्तन का पहिया कब घूम जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर युग चाहे वह इंदिरा गांधी का रहा हो या राजीव गांधी का, या वर्तमान प्रात: स्‍मरणीय अथवा निंदनीय नरेंद्र मोदी का, भक्‍त पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी कुकुरमुत्‍ते की तरह उगती रही है। यह कुकुरमुत्‍ता युग अजर और अमर है। जब जब चुनावी बारिश होगी, इसे उगने से कोई रोक नहीं सकेगा। बजाय इस पर भरोसा करने के, आप अपने अंदर की आवाज सुनने का प्रयास करेंगे तो कभी गच्‍चा नहीं खाएंगे।

डरावना डेरा या राजनीति

डेरा सच्‍चा सौदा, गुरमीत राम रहीम, कार्रवाई, मीडिया, राजनीति, हिंसा, धर्म और सेवा आदि अनेक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर विचारों की भरमार है। लेकिन कुछ विचार लोगों की आंखें खोल देते हैं। यहां हम उन्‍हीं कुछ चुने हुए विचारों को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

प्रमोद शुक्‍ला लिखते हैं-मित्रों, साथी विजय राज सिंह का यह विचार भी महत्वपूर्ण है, आप इससे सहमत या असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, पर पहले इस विचार की गहराई को समझने की जरूरत है।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

रामरहीम ने रेप और हत्या समेत जितने अपराध किये/करवाए, चाहे अब ज़ाहिर या अभी भी गुप्त, सब गलत हैं।

न्यायालय ने जो फैसला दिया, उसका समर्थन करते हैं। पर साथ ही, उनका डेरा हर कहीं खुलना चाहिए, खासकर बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, केरल आदि, ताकि धर्म बना रहे। हिन्दू “दलितों” गरीबों, और पिछड़ों का जितना कल्याण इनका डेरा करता आया है, मिशनरी या वक्फ क्या, कोई नहीं करता। सरकार तक उनको सिर्फ वोटबैंक मानती है, सरकार बना पाने के सौदे के तौर पर आरक्षण बना रहने देती है, थोड़ा बढ़ा भी देती है। बिलकुल घपलेबाज़ी है उस सौदे में।

सच्चा सौदा इन (“दलितों” आदि) का सिर्फ डेरा के साथ है। वह इनको पालते हैं, यह धर्म को। इसी को “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहा गया है। हमारी दृष्टि में, हिंदुत्व में डेरा का यह अमूल्य योगदान है। न सिर्फ वह हिन्दुओं को कन्वर्ट होने से रोकने में अच्छा काम कर रहे हैं, बल्कि सिखों और हिन्दुओं को वैसे ही एक मानते हैं जैसे बिलकुल शुरुआत में था। साथ ही, यह जहां एक तरफ “सर्व धर्म सम भाव” के जरिये “सहिष्णुता” ले कर चलते हैं, वहीं उस अधूरे श्लोक को “धर्म हिंसा तथैव च” से पूरा कर सनातन का पूरा स्वरूप प्रकट करते हैं।

फैसला आने पर जो हिंसा डेरा ने किया, वह सरासर गलत है, और अगर नुकसान की भरपाई सम्पत्ति के जाब्ते से होना तय हुआ है, तो प्रार्थना है कि बिलकुल वैसा ही हो, उस आदेश के खिलाफ डेरा हर अपील पर हारे। मगर मूल उद्देश्य का बना रहना जरूरी है। यह डेरा न सही, कोई और सही। भांगड़ा, ढाबे और तंदूरी की ही तरह यह पंजाबी चीज भी उतनी ही अखिल-भारतीय हो।

दिलीप सी मंडल की यह प्रस्‍तुति लाजवाब है- क्या अजीब संयोग है। राम रहीम को जिस हेलीकॉप्टर में जेल ले जाया गया, वह वही हेलीकॉप्टर था, जिस पर बैठकर नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव प्रचार किया था। यानी ऑगुस्टा वेस्टलैंड AW139 हेलीकॉप्टर। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अब एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं।

राजेश चंद्रा लिखते हैं- ये आरएसएस भाजपा के बलात्कार सेनानी हैं। हिन्दू साध्वियों का बलात्कार करने वाले गुरमीत राम रहीम को न्याय दिलाने के लिये भारतीय सेना से लड़ रहे हैं।

आलोक नंदन लिखते हैं- अंधा और बेतरतीब नेतृत्व विध्वंस के सिवा आपको कुछ नहीं दे सकता…व्यवस्था स्थापित करने की न्यूनतम क्रूरता सीमा क्या है ? और इसको तय करने का अधिकार किसे है ? ………

पुष्‍परंजन लिखते हैं- लम्बी ज़ुबान वाले साक्षी महाराज से सोच समझ कर बयान दिलवाया गया! बदज़ुबानी में पीएचडी कर चुके साक्षी महाराज के ज़रिये दो काम हुआ है। एक, न्यायपालिका को धमकाना। दूसरा, डेरा समर्थक वोट बैंक को यह बताना कि बीजेपी की इच्छा के विरुद्ध यह निर्णय हुआ है।

कोर्ट चाहे तो मानहानि ही नहीं, अदालत को धमकाने के मामले में महाराज जी को एक बार फिर तिहाड़ भेज सकती है। यों,  बलात्कार के आरोप वाले मामले आते हैं तो साक्षी महाराज का अगस्त 2000 वाला पुराना दर्द उखड आता है। बलात्कार के मामले में तिहाड़ रिटर्न हैं साक्षी महाराज।

सवाल यह है कि क्या इस देश में सभी अपराधियों को सरकार गेस्ट हाउस उपलब्ध कराती है? तो फिर इस बलात्कारी बाबा को अम्बाला जेल के बदले, गेस्ट हाउस देकर दामाद जैसा ट्रीटमेंट किस बिना पर? सीबीआई कोर्ट से निकला तो पुलिस गार्ड ऑफ़ ओनर के अंदाज़ में खड़ी थी। अपराधी घोषित होने के बाद भी बाबा वीवीआईपी है। हेलीकॉप्टर से गेस्ट हाउस पधारे।

मोदी-खट्टर सरकार को 30 लोगों के मरने 300 के घायल होने से अधिक चिंता बलात्कारी बाबा को आरामदेह सुविधाएँ देने की है ! ऐसा लचर और लिजलिजा मुख्यमंत्री पूरे जीवन में मैंने नहीं देखा। इस शख्स ने एक बार भी हिंसा फ़ैलाने वाले गुरमीत के गुंडों का नाम नहीं लिया। पूरे बयान में यह थकेला मुख्यमंत्री “कुछ लोग”-” कुछ लोग ” करता रहा !

भारत जाेड़ाे के नारे पर सवाल

समाचार सार-प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी के भारत जाेड़ाे के नारे पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जानिए क्या हैं पीएम के नारे पर अापत्तियां। जाति धर्म की राजनीति पर चरण  सिंह राजपूत की खास टिप्पणी।

प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बोल रहे हैं कि अब भारत छोड़ो नहीं बल्कि भारत जोड़ो का नारा देना है। बिल्कुल प्रधानमंत्री जी। भारत को जोड़ना है पर इस बात पर जनता को कम आप लोगों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के एजेंडे पर काम कर रहे हो। मुस्लिमों और दलितों को टारगेट बना रहे हो। जाति धर्म की राजनीति कर रहे हो। संविधान से सोसलिस्ट शब्द हटा रहे थे और अब संविधान बदलने की तैयारी में हो। लोगों पर अपना एजेंडा थोप रहे हो और कह रहे हो कि भारत जोड़ो का नारा देना है। प्रधानमंत्री जी और कितना बेवकूफ बनाओगे लोगों काे। सच्चाई तो यह कि अगस्त क्रांति का आप लोगों ने तब भी विरोध किया था और अब चाह रहे हो कि लोग अगस्त क्रांति को भूल जाएं। आजादी की कीमत भूल जाएं। क्योंकि आजादी में आप लोगों का तो कोई योगदान है नहीं। हम लोग अगस्त क्रांति को भूलने नहीं देंगे। भारत छोड़ो आंदोलन को भूलने नहीं देंगे। शहीदों की शहादत को भूलने नहीं देंगे। हम कहते हैं देश को बर्बाद करने वालों भारत छोड़ो। देश से गद्दारी करने वालों भारत छोड़ो। संविधान विरोधी तत्व भारत छोड़ो। हम जोड़ेंगे देश को। भाईचारे से। त्याग बलिदान और समर्पण भावना से। लोगों की जान लेकर नहीं बल्कि बचाकर। देश में नफरत का माहौल बनाकर नहीं बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द का माहौल बनाकर।
(लेखक सोसलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्य अाैर फाइट फॉर राइट संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों

श्रीकांत सिंह। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि गैरकानूनी काम करने वाली कंपनियों पर कडी कार्रवाई होगी। तीन लाख ऐसी कंपनियां हैं जो आर्थिक लेनदेन के मामले में शक के घेरे में हैं और एक लाख कंपनियों का पंजीकरण निरस्‍त कर दिया गया है। ऐसा फैसला राजनीतिक गुणा भाग करने वाले नहीं, राष्‍ट्र के लिए जीने वाले ही कर सकते हैं। मैं मोदी जी से यह पूछना चाहता हूं-आप अखबार मालिकों के मामले में कब राजनीतिक गुणा भाग लगाना बंद करेंगे। कुछ गिने चुने अखबार मालिक न केवल गैरकानूनी काम कर रहे हैं, मजीठिया अवमामनना मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर देश की सर्वोच्‍च अदालत का अपमान भी कर रहे हैं।

पिछले दिनों मैंने दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव से फोन पर मजीठिया वेतनमान लागू करने का आग्रह किया तो वह सरासर झूठ बोल गए और कहा कि दैनिक जागरण में मजीठिया वेतनमान पहले से लागू है। मतलब साफ है कि वे मजीठिया वेतनमान नहीं देना चाहते हैं, भले इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने आइने की तरह साफ कर दिया है।

मोदी जी, ये अखबार मालिक जिन लोगों के साथ अत्‍याचार कर रहे हैं, वे गरीब लोग ही हैं। आपकी परिभाषा में गरीब कौन है, यह समझ से परे है। अभी तक किसी अखबार मालिक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। किसी अखबार का पंजीकरण भी निरस्‍त नहीं किया गया है। आप राष्‍ट्र के लिए जीने मरने की कसम खा चुके हैं तो सबसे पहले इन मुनाफाखोर अखबार मालिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराएं, भले ही वे भाजपा और आपका गुणगान क्‍यों न करते हों।

आपकी नजर में यदि राष्‍ट्रवाद अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना है तो अपने विरोधियों की कंपनियों को चुन चुन कर बर्बाद कर दीजिए और अखबार मालिकों के अत्‍याचार को फलने फूलने दीजिए। आप सरकार में हैं, सत्‍ता आपके हाथ में है। आप किसी को भी कुचल दें और किसी को भी बचा दें, इस पर फिलहाल आपका अख्तियार है। फिर आप राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों रच रहे हैं।

पत्रकारिता है कहां…

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता पर हमले हो रहे हैं। ऐसा हमने सुना है। यह भी सुना है कि उससे प्रेस क्‍लब वाले पत्रकार काफी खफा हैं। क्‍यों, एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर संकट आन पडा है। यह भी ताना मारा जा रहा है प्रणय राय ने मजीठिया वेतनमान के बारे में सुना तक नहीं है। हालांकि एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने मजीठिया वेतनमान पर काफी कुछ चर्चा की है। और यह भी कहा जा रहा है कि प्रेस की आजादी के लिए हमें एकजुट होना चाहिए खासकर एनडीटीवी के मामले में क्‍योंकि उसने सरकार की गलत नीतियों पर काफी कुछ उंगली उठाई है। ये सारी बातें अपनी जगह ठीक हैं पर पत्रकारिता है कहां।

पहले पत्रकारिता का मतलब समझने की कोशिश करें। पत्रकारिता का सीधा सा मतलब है सरकार की जवाबदेही को सामने लाना। सरकार के फैसलों पर उठने वाले सवाल मंत्रियों के सामने लाना और उनके जवाब को जनता के सामने लाना। लेकिन सरकार के मंत्री जवाब देने के लिए तैयार कहां होते हैं। मध्‍य प्रदेश के मंदसौर मामले पर केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सवालों के जवाब देने के बजाय किस प्रकार बाबा रामदेव के साथ योग की टांग तोडते नजर आए, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुझे याद है, जब मैंने नरेंद्र मोदी को पहली बार टीवी पर बकैती करते देखा था। उनसे गोधरा पर सवाल पूछे जा रहे थे, जिसके जवाब में वह गुजरात के किसानों की बात कर रहे थे। खैर। आज तो यह प्रचलित है कि मोदी जी से मिलने का मतलब है मंगल ग्रह पर जाने जैसा मुश्किल काम। यह अलग बात है कि विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज कहती हैं कि यदि कोई मंगल ग्रह पर फंसा है तो उसे भी वह बचा लेंगी।

कुल मिलाकर एक आम पत्रकार और सरकार के बीच संवाद समाप्‍त हो चुका है। ऐसे में हमारा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि पत्रकारिता समाप्‍त हो चुकी है। इस पर कुछ लोग बडे गर्व से कहते पाए जाते हैं कि पत्रकारिता थी ही कब। मतलब यह कि पत्रकारिता शुरू से ही पिकनिक मनाने का स्‍थल मात्र रही है, जिसके आयोजन प्रयोजन का संबंध संपादक नामक संस्‍था से हुआ करता रहा है। अब तो इस व्‍यवस्‍था से संपादक भी विदा हो गया है।

तो यह मान लिया जाए कि एस निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, एचके दुआ और टीएन नाइन कभी पत्रकारिता के बडे नाम भले ही रहे हों, लेकिन वे पत्रकारिता की दुकान के काउंटर पर बैठकर ग्राहकों को निपटाते रहे हैं। इन लेागों ने पत्रकारिता में अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, बरखा दत्त, राजदीप सारदेसाई, तरुण तेजपाल, सुभाष गोयल, संजय गुप्ता, शोभना भरतिया जैसे कई लोगों और यहां तक कि प्रणय जेम्स रॉय जैसे लोगों को पत्रकारिता का उपयोग और उपभोग करने पर कभी नहीं टोका और तेजी से पत्रकारिता की गिरती साख और वहां काम कर रहे लोगों की खराब हालत पर कभी चिंता जताने की जरूरत महसूस नहीं की।

इसलिए प्रेस की आजादी क्या है, इस पर साफ-साफ बात होनी चाहिए। अगर ट्वीटर से ज्ञान प्राप्‍त कर उसे परोसना ही पत्रकारिता है, उस पर कोई सवाल-जवाब न किया जाना ही पत्रकारिता है तो पत्रकारिता पर संकट कहां है। कोई भी ट्वीटर की एक झलक देखकर सोशल मीडिया के जरिये पत्रकारिता के झंडे गाड सकता है और नामी गिरामी पत्रकार बन सकता है। सवाल वहीं पर जग रहा है, जहां जवाब नींद में है। नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।