तीन तलाक: अमित शाह के बयानों का मतलब

नई दिल्‍ली।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट ने ठीक उसी प्रकार जलेबी छानी है, जैसे कि मजीठिया मामले में किया था। आखिर जिन्‍होंने इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है, भला उनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या किया है ? यह अलग बात है कि मोदी और शाह उसकी वाहवाही लूटने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इन्‍हीं मुद्दों पर हमने फेसबुक के कुछ मित्रों की राय एकत्र की है।

इन्हें कौन देगा न्याय?

जो मुस्लिम ट्रिपल-तलाक पर आज आये फैसले का स्वागत है, पर इस फैसले से उत्साहित होकर जो हिन्दू नाच एवं इतरा रहे हैं उन्हें हिन्दुओं में पत्नी को छोड़ने के बढ़ रहे रिवाज पर भी अदालत में बहस करानी चाहिए। मैं अनगिनत बेबस हिन्दू युवतियों को देख रहा हूं कि वे बिना तलाक पति से अलग रहने को विवश हैं। और अदालत और पुलिस उनकी कोई मदद नहीं कर पा रही है। (राय तपन भारती की फेसबुक वाल से साभार)

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क्या सचमुच मुस्लिम महिलाओं को “मुक्ति” मिल गई?

अभी सरकार को बहुत कुछ करना है। अगले सत्र में देखिए, संसद के ज़रिये कैसा क़ानून बनता है। सरकार से ज़्यादा इस देश के मुस्लिम समाज को सुधार “Reforms” के लिए आगे आना होगा। क्या दारुल क़ज़ा ( इस्लामिक कोर्ट ) को बंद कराना अगले अभियान का हिस्सा होगा?  चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति केहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर क्यों तीन तलाक़ के समर्थन में थे?  उनके तर्कों को समझने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान समेत दुनिया के 22 मुसलमान देश हैं,  जहां ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित है। पाकिस्तान ने भारत से अलग होने के नौ साल बाद, 1956 में ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया था। मगर,  इस इस्लामिक देश में औरतों पर ज़ुल्म रुका नहीं। क्योंकि पाकिस्तान का मुस्लिम समाज औरतों पर सितम को मूकदर्शक होकर देखता रहा।

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने बहुत दूर की सोचकर हिदायत दी है कि इसे राजनीतिक उपलब्धि और प्रोपेगंडा का हिस्सा न बनाए। मगर, जोश में इसे कोई मान रहा है क्या? जश्न और पटाख़े के शोर में वैसे लोग निशाने पर हैं, जो इसके पक्ष में नहीं थे। अमित शाह के ताज़ा बयान को ही देख लीजिए। बीजेपी अध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की कोई परवाह नहीं। “प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी की वजह से ऐसा हुआ”,  अमित शाह के बयानों से यही बात निकल रही है! (पुष्‍परंजन की फेसबुक वाल से साभार)

अभिशेक रंजन लिखते हैं-तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफ़्ती मोकर्रम से बात हुई। उनके मुताबिक़ मुस्लिम औरतों को दीन का इल्म नहीं है,  इसलिए वे अदालत के फ़ैसले से खुश हैं, जबकि यह फैसला शरीयत के ख़िलाफ़ है।

सत्‍यप्रकाश चौधरी लिखते हैं- अब सरकार को एक कलमबंद मुसलिम विवाह कानून की ओर बढ़ना चाहिए। समान नागरिक संहिता सिर्फ मसले बढ़ाएगी। समान नागरिक संहिता की पहली बाधा होगी कि किसके साथ शादी जायज है। एक हिंदू बोलेगा एक गोत्र में भी नहीं,  दूसरा बोलेगा मामा-भांजी में भी सही।

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खतौली रेल हादसे पर सरकार की थू-थू : टूटे ट्रैक पर तेज़ गाड़ी चलाने में माहिर हैं मोदी जी

मुजफ्फरनगर।

रेल भाड़े के रूप में सरकार भले ही लोगों की चमड़ी उधेड़ ले रही हो, रेल टिकट निरस्‍त कराने पर लोगों की जेब काट ले रही हो, लेकिन उसे रेलवे सुरक्षा की कोई परवाह नहीं है। जब से केंद्र में भाजपा सरकार आई है, कभी बुलेट ट्रेन तो कभी टेल्‍गो ट्रेन का सपना दिखाकर जुमले ही छोड़े जा रहे हैं। रेलवे का कोई भला नहीं हो पाया है। उलटे रेलवे को निजी हाथों में बेचने का कुचक्र अलग से रचा जा रहा है। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। आप भी जानें कौन क्‍या लिख रहा है।

बस एक बुलेट ट्रेन चाहिए, बाक़ी रेल यात्री जाएँ भाड़ में-पुष्‍प रंजन

भारतीय रेल का बेड़ा उसी दिन से ग़र्क़ होना आरम्भ हो गया था, जिस दिन उसे आम बजट से जोड़ कर संसद में सवाल-जवाब से दूर रखा गया। एशिया में चीन के बाद सबसे बड़ा और दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेल नेटवर्क को एक ढीले-ढाले व्यक्ति के हवाले कर दिया गया है। विश्व में सबसे अधिक यात्री भारतीय रेल से सफर करते हैं। मगर, रेल सुधार की गति खरामा-खरामा है। अब भी इंडियन रेल की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा है। जबकि,  दुनिया के 22 देशों में हाई स्पीड रेल ट्रैक पर ट्रेन न्यूनतम 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही है।

सवा अरब के इस देश में अंग्रेज़ों के ज़माने के बने अधिकांश रेल ट्रैक और पुल भगवान भरोसे हैं। यात्रियों की जेब, सफाई और सुरक्षा के नाम पर तबीयत से काटी जा रही है। सच सामने आने पर थू-थू भी होती है, पर नेता और इनके भक्त श्वान मुद्रा में देह झाड़कर चल देते हैं, या फिर ठीकरा पिछले रेलमंत्रियों पर फोड़ देते हैं। स्वयंघोषित “वर्ल्ड लीडर” मोदी को इंडियन रेल की दुर्गति नहीं दिखती क्या? उन्हें बस अहमदाबाद-मुंबई रूट पर बुलेट ट्रेन चाहिए,  बाक़ी रेल यात्री जाएँ भाड़ में!

लो जी, हो गई कार्रवाई !

प्राचीन काल में हत्या के दोषी राजा को मृत्युदंड के वास्ते उसकी शक्ल का एक पुतला बनाकर उसे फांसी पर लटका दिया जाता था,  ताकि प्रजा को लगे कि न्याय हो रहा है। मेंबर रेलवे बोर्ड, उत्तर रेलवे के जीएम को तत्काल प्रभाव से छुट्टी  और चार आला अधिकारियों का निलंबन क्या कुछ इसी तरह की कवायद है?  वो जो खतौली में जीआरपी ने अज्ञात लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज़ किया है,  उसमें इन “ज्ञात वीआईपी अभियुक्तों” के नाम नहीं हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस अपराध के लिए जवाबदेह हैं।

इससे तो अच्छा तानाशाह व्यवस्था वाले चीन और उत्तर कोरिया को मानिए, जहाँ ऐसे अपराध के लिए सीधा जेल है। और उस विभाग के मंत्री तक नहीं बक्शे जाते ! वो तो शुक्र मनाएं कि समय पर सारे साक्ष्य मिल गए, जिससे रेलवे की लापरवाही साबित हुई, वरना मुज़फ्फरनगर, मेरठ  और खतौली से एक समुदाय विशेष के जाने कितने युवक उठा लिए जाते। स्थानीय लोगों की जागरूकता, बिना डर के बयान देने, और बहुत हद तक मिडिया द्वारा सच के साथ खड़े रहने के कारण कई ज़िंदगियाँ फ़र्ज़ी जांच के नाम पर तबाह होते-होते बची हैं !

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प्रमोद शुक्‍ला की फेसबुक वाल पर मिला- प्रभू के के आने पर उम्मीद बंधी थी कि कुछ नया होगा, टिकट ब्लैक पर रोक लगेगी, पर ये तो सबसे बड़ा ब्लैकिया निकला। तत्काल और प्रीमियम तत्काल से कमाई के चक्कर में ट्रेन की बोगियाँ खाली दौड़ रही हैं। अब मुनाफाखोरी की रौ में रोलिग टिकट यानि जैसे जैसे ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाएगी किराया ऑटोमेटिक दो गुना, चार गुना या छह गुना हो जाएगा। जो सबसे ज्यादा किराया देने को तैयार होगा बर्थ उसी को मिलेगी। रिपेरिंग में भी घेटाला, टायलेट के दरवाजे चौखट से छोटी साइज के कि बाहर से भीतर का सब कुछ दिखता है। मोबाइल चार्जिंग सॉकेट के अन्दर कनेक्शन टर्मिनल ही गायब है। -विक्रम सिंह भदौरिया

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अपनी फेसबुक वाल पर अरुण माहेश्‍वरी लिखते हैं- टूटे ट्रैक पर तेज़ रफ़्तार / इसको कहते मोदी सरकार। मिशन इनका गाल बजाना / झूठी बातों का व्यापार।

अमित शाह का अपेक्षित बयान : “रेल दुर्घटना होती रही है, हो रही है और होगी।” टूटे ट्रैक पर तेज़ गाड़ी चलाने में मोदी जी माहिर हैं ! रेल बजट को केंद्रीय बजट में मिला कर मोदी जी ने रेलवे पर अपने और जेटली के दोहरे निकम्मेपन को लाद दिया है। दुर्घटनाएँ तो होंगी ही।

प्रमोद पटेल लिखते हैं- हादसों से सबक नहीं लेते जिम्मेदार। ट्रेन हादसे में मरने वाले लोगों के लिए दुआ करेंगे कि भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। अगर दिल में थोड़ा सा दर्द है तो ॐ शांति लिखें।

अमिताभ अग्निहोत्री लिखते हैं- प्रभु जी नहीं चल पा रही है तो छोड़ दीजिए।

कल्‍याण कुमार लिखते हैं- रेलवे को चलाने के लिए हार्ड वर्किंग नहीं बल्कि स्मार्ट वर्किंग चाहिए… ईमानदार को ईनाम और बेईमान की विदाई ही रास्ता…त्वरित फैसला करो…

आकाशवाणी ने क्‍यों प्रसारित नहीं किया माणिक का यह भाषण

समाचार सार-

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का वह भाषण जिसे भारत के संघीय ढांचे के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर आकाशवाणी ने प्रसारित करने से इनकार कर दिया। आप भी जानें कि ऐसा क्‍या है भाषण में।

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त्रिपुरा के प्रियजनो,

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सबका अभिनंदन और सबको शुभकामनाएं। मैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों की अमर स्मृतियों को श्रद्धांजलि देता हूँ। उन स्वतंत्रता सेनानियों में जो आज भी हमारे बीच मौजूद है उन सबके प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ।

स्वतंत्रता दिवस को मनाना कोई आनुष्ठानिक काम भर नहीं है। इसके ऐतिहासिक महत्व और इस दिन के साथ जुड़ी भारतवासियों की गहरी भावनाओं के चलते इसे राष्ट्रीय आत्म-निरीक्षण के एक महत्वपूर्ण उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए।

इस स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर हमारे सामने कुछ अत्यंत प्रासंगिक,  महत्वपूर्ण और समसामयिक प्रश्न उपस्थित हैं। विविधता में एकता भारत की परंपरागत विरासत है। धर्म निरपेक्षता के महान मूल्यों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट बनाए रखा है। लेकिन आज धर्म-निरपेक्षता की इसी भावना पर आघात किए जा रहे हैं। हमारे समाज में अवांछित जटिलताएं और दरारें पैदा करने के षड़यंत्र और प्रयत्न किए जा रहे हैं।

धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर,  भारत को एक खास धर्म पर आधारित देश में बदलने और गाय की रक्षा के नाम पर उत्तेजना फैला कर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर हमला किया जा रहा है। इनके कारण अल्प-संख्यक और दलित समुदाय के लोगों पर हमले हो रहे हैं। उनके बीच सुरक्षा का भाव ख़त्म हो रहा है। उनके जीवन में भारी कष्ट हैं। इन नापाक रुझानों को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है,  न बर्दाश्त किया जा सकता है।

ये विभाजनकारी प्रवृत्तियां हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के उद्देश्यों,  स्वप्नों और आदर्शों के विरुद्ध हैं। जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया,  उल्टे उसमें भितरघात किया, जो अत्याचारी और निर्दयी अंग्रेज़ लुटेरों के सहयोगी थे और राष्ट्र-विरोधी ताक़तों से मिले हुए थे, उनके अनुयायी अभी विभिन्न नामों और रंगों की ओट में भारत की एकता और अखंडता पर चोट कर रहे हैं।

प्रत्येक वफ़ादार और देशभक्त भारतवासी के आज एकजुट भारत के लिए और इन विध्वंसक साज़िशों और हमलों को परास्त करने के लिए शपथ लेनी चाहिए। हम सबको मिल कर संयुक्त रूप में अल्प-संख्यकों,  दलितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने और देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

 

आज ग़रीबों और अमीरों के बीच का फर्क तेज़ी से बढ़ रहा है। मुट्ठी भर लोगों के हाथ में राष्ट्र के विशाल संसाधान और संपदा सिमट रहे हैं। आबादी का विशाल हिस्सा ग़रीब है। ये लोग अमानवीय शोषण के शिकार हैं। उनके पास न भोजन है,  न घर,  न कपड़ें,  न शिक्षा,  न चिकित्सा और न निश्चित आय के रोजगार की सुरक्षा। यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विपरीत है।

इन परिस्थितियों के लिए हमारी आज की राष्ट्रीय नीतियां सीधे ज़िम्मेदार हैं। इन जन-विरोधी नीतियों को ख़त्म करना होगा। लेकिन यह काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता। इसके लिए वंचित और पीड़ित जनों को जागना होगा, आवाज उठानी होगी और निर्भय हो कर सामूहिक रूप से बिना थके प्रतिवाद करना होगा। हमारे पास निश्चित तौर पर ऐसी वैकल्पक नीति होनी चाहिए जो भारत के अधिकांश लोगों के हितों की रक्षा कर सके।

इस वैकल्पिक नीति को रूपायित करने के लिए वंचित,  पीड़ित भारतवासियों को इस स्वतंत्रता दिवस पर एकजुट होकर एक व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन शुरू करने की प्रतिज्ञा करनी होगी। बेरोज़गारी की बढ़ती हुई समस्या ने हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में निराशा और हताशा के भाव को पैदा किया है। एक ओर लाखों लोग अपना रोजगार गंवा रहे हैं,  तो दूसरी ओर करोड़ों बेरोज़गार नौजवान काम की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके लिए मृग मरीचिका की तरह है।

राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बिना बदले इस विकराल समस्या का समाधान संभव नहीं है। यह नीति मुट्ठी भर मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट के स्वार्थ को साधती है। भारत की आम जनता की क्रय शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हो रही है। इसीलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर छात्रों,  नौजवानों और मेहनतकशों को इन विनाशकारी नीतियों को बदलने के लिए सामूहिक और लगातार आंदोलन छेड़ने का प्रण करना होगा।

केंद्र की सरकार की जन-विरोधी नीतियों की तुलना में त्रिपुरा की सरकार अपनी सीमाओं के बावजूद दबे-कुचले लोगों के उत्थान पर विशेष ध्यान देते हुए सभी लोगों के कल्याण की नीतियों पर चल रही है। यह एक पूरी तरह से भिन्न और वैकल्पिक रास्ता है। इस रास्ते ने न सिर्फ त्रिपुरा की जनता को आकर्षित किया है बल्कि देश भर के दबे हुए लोगों में सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है।

त्रिपुरा में प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह सहन नहीं हो रहा है। इसीलिए शांति, भाईचारे और राज्य की अखंडता को प्रभावित करने के लिए जनता के दुश्मन एक के बाद एक साज़िशें रच रहे हैं। विकास के कामों को बाधित करने की भी कोशिश चल रही है। इन नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को अलग-थलग करना होगा।

इसी पृष्ठभूमि में, स्वतंत्रता दिवस पर, त्रिपुरा के सभी शुभ बुद्धिसंपन्न, शांतिप्रिय और विकासकामी लोगों को इन विभाजनकारी ताक़तों के खिलाफ आगे आने और एकजुट होकर काम करने का संकल्प लेना होगा।

-अरुण माहेश्‍वरी की फेसबुक वाल से साभार।

यह आने वाले तूफान का संकेत

समाचार सार-

अखबार मालिक शांत हैं, लेकिन कर्मचारी प्रताड़ित। यह आने वाले तूफान का संकेत भर है। उधर मजीठिया क्रांतिकारी गुपचुप अपनी तैयारी में लगे हैं। जैसे ही कोई एक कर्मचारी मजीठिया भुगतान हासिल करेगा, समूचे समाचार पत्र जगत में तूफान खड़ा हो जाएगा।

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रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

जब से देश के प्रधानमंत्री मोदी जी बने हैं, देशवासियों में उनका नारा अच्छे दिन आएंगे ज्यादा ही चर्चा में है। आये मौकों पर मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल चाहे व्यंग्य के रूप में या फिर अच्छे रूप में हर कोई करता ही है। बुरा हुआ तो सभी बोल पड़ते हैं, लो आ गए अच्छे दिन। जब कुछ अच्छा होता है तो यह भी कहते हैं कि हमने पहले ही कहा है या कहते आ रहे हैं कि अच्छे दिन आएंगे। लेकिन हम मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल अखबार कर्मियों के लिए कर रहे हैं। हो सकता है कि अख़बार कर्मियों को मेरी यह बात मोदी जी की ही बात लगे यानी हवाबाजी नजर आये, पर यह सौ प्रतिशत सही है और मैं फिर से यही बात दोहरा रहा हूँ कि अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन आएंगे और यह वक़्त बताएगा, जो बहुत जल्द आने वाला है।

हम यह भी बताते आ रहे हैं कि अख़बार मालिकानों को आजकल यही चिंता सता रही है कि उन्हें कैसे इस मजीठिया की देनदारी से मुक्ति मिले।उनके लोग, वे खुद और उनके वकील इसी काम में दिन रात जुटे रहते हैं कि ऐसा क्या किया जाये कि मजीठिया की देनदारी से बचा जाए। मालिकान माननीय सुप्रीम कोर्ट से 19 जून 2017 को आये फैसले के बाद से ही परेशान हैं और इससे बचने का रास्ता तलाश रहे हैं। हम यह भी बता चुके हैं कि मालिकान अभी कोई ऐसा सबूत वर्कर को नहीं देना चाहते जिससे उनकी कोर्ट में फिर से किरकिरी हो और इस बार कोर्ट में कुछ ऐसा हुआ तो उनका बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा। माननीय कोर्ट यह साफ कह चुका है कि हम मालिकानों को एक मौका दे रहे हैं।यही वजह है कि कुछ अख़बार मालिकों ने अभी तक वर्करों की सालाना तनख्वाह नहीं बढ़ाई है। कुछ ने थोड़ा बहुत दिया है तो वह मजीठिया के हिसाब से नहीं है। कुछ ने सैलरी स्लीप देना बंद कर दिया है तो कुछ ने ऑन लाइन रिसिप्ट देना शुरू किया है। अब आगे देखने वाली बात यह होगी कि अख़बार मालिकान और उनके प्रबंधक और क्या क्या करते हैं मजीठिया की देनदारी से बचने के लिए।

दूसरी ओर अख़बार के वर्कर हैं जो मालिकानों की तमाम बाधाओं को दरकिनार कर और बेकार मान अपने काम में जुटे हैं। जिस तरह मालिकान खुद को बचाने में जुटे हैं, वैसे ही वर्कर मालिकानों को फिर से केस में कैसे फंसाया जाये, इस जुगत में लगे हैं। वर्कर मालिकानों से पैसा लेने में कुछ वक्त लगने की बात से अनजान नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरा यकीन है कि उनका पैसा मालिक देगा जरूर, चाहे हंस के दे,चाहे रो के।तो मोदी जी का नारा देश में सच साबित हो या न हो, पर अख़बार वर्करों के लिए उनका नारा अच्छे दिन आएंगे, जरूर सच होगा। यह बात अब निचली अदालतों में भी दिख रही है और जिन केसों में कोई कानूनी बाधा नहीं है, उनका काम सही तरह से चल रहा है। कुल मिलाकर सभी अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन जरूर आएंगे।

जानें, कृष्‍ण को समग्रता से कैसे समझा जा सकता है

सार तत्‍व-कृष्ण का जीवन एक अजीब विरोधाभासी-सा लगता है। एक ओर कमाल की आसक्ति है। दूसरी ओर कमाल की अनासक्ति। लेकिन वह विरोधाभास दूर से ही नजर आता है। वह आभास भर को ही है। कृष्ण के काम करने का ढंग ही निराला है। जानें, कृष्‍ण को समग्रता से कैसे समझा जा सकता है।

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राजीव कटारा की फेसबुक वाल से साभार।
नीत्शे एक ऐसा देवता तलाश रहे थे, जो नाच-गा सके। यानी जीवन से भरपूर एक देवता। एक ऐसा देवता, जो मनुष्य की पहुंच में हो। देवता हो, लेकिन हो मानुष। अगर कोई देवता मानुष जैसा होगा, तो उसे हंसना और रोना भी होगा। उसे काम भी करना पड़ेगा।
अपने यहां वैसा देवता तलाश नहीं पाए थे नीत्शे। कृष्ण पर सोचते हुए अक्सर नीत्शे की परिभाषा में फिट होने वाले देवता की याद आती है। सचमुच भरपूर जीवन जीने वाले देवता हैं कृष्ण। और एक भरा-पूरा जीवन वही जी सकता है, जो अपने जीवन को ही कर्मभूमि बना ले। उस लिहाज से कृष्ण बेजोड़ हैं। कर्मयोगी हैं कृष्ण। कृष्ण का पर्याय हो गया है कर्मयोग। कृष्ण जीवन भर काम करते नजर आते हैं। काम ही काम जैसे उनका जीवन हो। और काम भी किस तरह करते हैं वह? अनासक्त कर्म। यानी काम करो, बाकी सब भूल जाओ। यहां तक कि फल की भी इच्छा मत करो। कर्मण्येवाधिकारस्ते…।
कृष्ण का जीवन एक अजीब विरोधाभासी-सा लगता है। एक ओर कमाल की आसक्ति है। दूसरी ओर कमाल की अनासक्ति। लेकिन वह विरोधाभास दूर से ही नजर आता है। वह आभास भर को ही है। कृष्ण के काम करने का ढंग ही निराला है। वह जब कोई काम करते हैं, तो जबर्दस्त आसक्त नजर आते हैं। उस काम को वह पूरे मन से करते हैं। काम पूरा होते ही वह अनासक्त हो जाते हैं। वह जो भी करते हैं उसमें गजब की आसक्ति दिखती है। उसे करते ही वह उससे अलग-थलग हो जाते हैं। कभी-कभी इसीलिए वह क्षणवादी भी दिखलाई पड़ते हैं। एक पल को अपने पूरेपन में जीते हैं। लेकिन उससे चिपके नहीं रह जाते। यही वजह है कि उनके यहां कोई वापसी नहीं है। लेकिन किसी भी पल का कोई अधूरापन भी नहीं है। यह कोई कर्मयोगी ही कर सकता है। यही क्या अपने आज में जीना नहीं है?

मजीठिया के लिए मालिक डाल डाल, वर्कर पात पात

समाचार सार-वर्कर को पूरा भरोसा है कि मजीठिया की राह में रोड़ा अटकाने वाले को अब माननीय सुप्रीम कोर्ट नहीं छोड़ेगा। इस बात का डर अख़बार मालिकानों को भी सता रहा है। अखबार मालिक अाैर वर्कर किस प्रकार डाल-डाल अाैर पात-पात हैं, जानें इसका सटीक विश्लेषण।

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रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

अखबार मालिकानों को आजकल सोते जागते यही चिंता सता रही है कि कैसे इस मजीठिया के भूत से पीछा छुड़ाया जाए। उनके प्यादे और वकील इसी काम में जुटे रहते हैं कि ऐसा क्या करें कि मजीठिया की देनदारी से बचा जा सके। यही वजह है कि कुछ अख़बार मालिकों ने अभी तक वर्करों की सालाना तनख्वाह जो जून में हर साल बढ़ती थी, अभी तक नहीं बढ़ाई है। कुछ ने थोड़ा बहुत दिया है तो वह मजीठिया के हिसाब से नहीं है। कुछ ने सैलरी स्लिप देना बंद कर दिया है तो कुछ ने ऑन लाइन रिसिप्ट देना शुरू किया है। अब आगे देखने वाली बात यह होगी कि अख़बार मालिकान और किस स्तर तक गिर सकते हैं देनदारी से बचने के लिए और क्या क्या खेल कर सकते या करते हैं।
दूसरी ओर वर्कर हैं कि वे भी अपनी धुन में मस्त हैं। वे भी वकीलों के साथ मिलकर मालिकों की ऐसी की तैसी करने की सोच रहे हैं। वर्कर को पता है कि जीत उनकी सुनिश्चित है और पैसा भी मिलना तय है, वह भी सूद के साथ। मालिकान भी इस बात को माने बैठे हैं कि जो वर्कर केस में थे या जाएंगे, उन्हें उनको पैसा मजीठिया के हिसाब से देना ही होगा। लेकिन वे आगे वर्करों को ऐसा कुछ सबूत नहीं देना चाहते हैं कि वे कोर्ट में फिर से जाएँ और इस बार मालिकानों की पुंगी बजे। कुल मिलाकर मालिक और वर्कर तू डाल डाल, मैं पात पात वाला खेल खेल रहे हैं और दोनों इस काम में यानी मजीठिया के हिसाब से पैसा लेने और बचाने के खेल में अपनी ताकत लगा रहे हैं।
यह सभी को पता है कि मालिकान के लिए 19 जून 2017 का दिन ऐसा आया, जिसने उन्हें ज़िन्दगी भर के लिए परेशानी से जोड़ दिया। मालिकानों के लिए इस मजीठिया रूपी परेशानी से निजात पाना आसान नहीं है और अगर वे कुछ तरकीब निकालते भी हैं, तो उसके खतरे भी बड़े हैं, जो उनकी ज़िन्दगी बरबाद कर सकते हैं। चूँकि मजीठिया की आग पूरे देश में लग गई है। अब वर्कर केस करने से नहीं चूक रहे हैं।
सभी को पता है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश जो आया है, उसमें स्पष्ट है कि ठेके पर रखे गए वर्कर को भी मजीठिया का लाभ मिलना है। रिटायर्ड वर्कर को भी बोनस के रूप में अच्छी खासी रकम मिलेगी, जो 2008 से लेकर आज की तारीख में रिटायर होंगे या हुए हैं।यही वजह है कि अब जहाँ ठेके पर रखे गए वर्कर केस कर रहे हैं, वहीं देश भर के रिटायर्ड लोग भी मजीठिया के लिए क्लेम लगा रहे हैं।
देखें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जब से मजीठिया को लेकर फैसला सुनाया है, मालिकानों की बात सुनने वाले सरकारी अफसर और नेता जी अब वर्करों को पैसा दिलाने की बात करने लगे हैं। देश के श्रम मंत्री ने भी अख़बार के दफ्तरों में मजीठिया को लागू कराने के लिए राज्य सरकारों से कहा है और राज्यों के मंत्री भी यह बात कहने लगे हैं। वैसे ये सारे मंत्री अगर चाहें, तो अख़बार मालिकानों की क्या बिसात कि वे वर्करों का पैसा न दें या मजीठिया वेज बोर्ड लागू न करें। मंत्री चाह लें तो इनकी पैंट गीली हो जाये, लेकिन ऐसा करना उनके लिए थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि नेता जी सिर्फ बोलते हैं, कुछ करते नहीं। अगर कर दिया, तो नेता कैसा? पर वर्कर को पूरा भरोसा है कि मजीठिया की राह में रोड़ा अटकाने वाले को अब माननीय सुप्रीम कोर्ट नहीं छोड़ेगा। इस बात का डर अख़बार मालिकानों को भी सता रहा है।

भारत जाेड़ाे के नारे पर सवाल

समाचार सार-प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी के भारत जाेड़ाे के नारे पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जानिए क्या हैं पीएम के नारे पर अापत्तियां। जाति धर्म की राजनीति पर चरण  सिंह राजपूत की खास टिप्पणी।

प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बोल रहे हैं कि अब भारत छोड़ो नहीं बल्कि भारत जोड़ो का नारा देना है। बिल्कुल प्रधानमंत्री जी। भारत को जोड़ना है पर इस बात पर जनता को कम आप लोगों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के एजेंडे पर काम कर रहे हो। मुस्लिमों और दलितों को टारगेट बना रहे हो। जाति धर्म की राजनीति कर रहे हो। संविधान से सोसलिस्ट शब्द हटा रहे थे और अब संविधान बदलने की तैयारी में हो। लोगों पर अपना एजेंडा थोप रहे हो और कह रहे हो कि भारत जोड़ो का नारा देना है। प्रधानमंत्री जी और कितना बेवकूफ बनाओगे लोगों काे। सच्चाई तो यह कि अगस्त क्रांति का आप लोगों ने तब भी विरोध किया था और अब चाह रहे हो कि लोग अगस्त क्रांति को भूल जाएं। आजादी की कीमत भूल जाएं। क्योंकि आजादी में आप लोगों का तो कोई योगदान है नहीं। हम लोग अगस्त क्रांति को भूलने नहीं देंगे। भारत छोड़ो आंदोलन को भूलने नहीं देंगे। शहीदों की शहादत को भूलने नहीं देंगे। हम कहते हैं देश को बर्बाद करने वालों भारत छोड़ो। देश से गद्दारी करने वालों भारत छोड़ो। संविधान विरोधी तत्व भारत छोड़ो। हम जोड़ेंगे देश को। भाईचारे से। त्याग बलिदान और समर्पण भावना से। लोगों की जान लेकर नहीं बल्कि बचाकर। देश में नफरत का माहौल बनाकर नहीं बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द का माहौल बनाकर।
(लेखक सोसलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्य अाैर फाइट फॉर राइट संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)