सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत

श्रीकांत सिंह

समाज में सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत है। सेना के एक सिपाही का वीडियो बना कर उसे वायरल कर देना; खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपने पर मुंबई के विले पार्ले स्थित खादी भंडार के कर्मचारियों का विरोध करना और बाहर आकर प्रदर्शन भी करना; भारतीय रिज़र्व बैंक के कर्मचारियों का भी गवर्नर उर्जित पटेल को पत्र लिखकर संस्थान की स्वायत्तता और गरिमा से खिलवाड़ न होने देने के लिए आगाह करना आदि ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि लोग संस्‍थानों की मनमर्जी सहने के लिए अब तैयार नहीं हैं। उसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।

कुछ इसी तरह की मनमर्जी का विरोध मीडिया संस्‍थानों खासतौर पर प्रिंट मीडिया में हुआ है। अखबार मालिक इन दिनों बिचौलियों पर अपनी मुनाफाखोरी लाद रहे थे, जिसके विरोध में लोगों ने नौकरियां छोड़ी तो तमाम लोग मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों का क्रियान्‍वयन न किए जाने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन किए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। जाहिर है कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति संजीदा है। इसलिए भय दिखाकर शासन करने वालों को अब चिंतित हो जाना चाहिए।

प्रिट मीडिया की एक चिंता रही है कि आने वाले दिनों में कागज की किल्‍लत की वजह से मीडिया का प्रिंट स्‍वरूप समाप्‍त हो जाएगा। लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ी चिंता का विषय उनका यह अहंकार है कि वे ही जनमत तैयार करते हैं। आपको बता दें कि ज्‍यादातर लोग अखबार नहीं पढ़ते। ऐसे लोगों की संख्‍या कम नहीं है जो टीवी भी नहीं देखते। लेकिन ये मीडिया संस्‍थान सरकार और नेताओं पर अपनी धौंस जमाते रहते हैं, क्‍योंकि वहीं से इनकी मुनाफाखोरी का रास्‍ता निकलता है।

हमारे देश की संस्‍थाएं मीडिया घरानों की कुछ इस तरह से गुलाम हैं कि वर्षों बीत गए, लेकिन प्रिंट मीडिया के पीडि़तों को न्‍याय नहीं मिल सका। आगे भी न्‍याय में देरी करने की प्रवृत्ति जारी है। यह प्रवृति इतनी घातक है कि लोगों का न्‍यायपालिका से भी विश्‍वास उठता जा रहा है। सरकार है कि उसे इसकी कोई चिंता ही नहीं है। इसलिए वह दिन दूर नहीं जब लोग न्‍यायपालिका का भी सम्‍मान करना बंद कर देंगे। यह बहुत ही घातक स्थिति होगी, क्‍योंकि लोग त्‍वरित न्‍याय के लिए खुद ही निपटना शुरू कर देंगे।

कानून का राज बनाए रखने के लिए न्‍यायपालिका को अपने कर्तव्‍यों के प्रति संजीदा होना होगा। कितनी अजीब बात है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश का उल्‍लंघन सहना पड़ रहा है। पता कीजिए कि यह सब कौन करा रहा है; क्‍यों करा रहा है; क्‍या परिणाम होगा इसका। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मजीठिया मामले को पेंडिंग में डाल दिया गया है। आखिर क्‍यों… क्‍या अखबारों में काम कर रहे लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है कि वे इतना लंबा इंतजार कर पाएंगे। मानवीय आधार पर सुप्रीम कोर्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्‍योंकि लोग अब भयभीत रहने के लिए राजी नहीं हैं। डर के आगे जीत का रहस्‍य लोग समझ गए हैं।

मोदी ने भारत को 1970 के दशक में धकेल दिया

नोटबंदी पर लिखा पत्रकार बरखा दत्त का लेख हुआ वायरल

जनता का रिपोर्टर से साभार

पत्रकार बरखा दत्त ने वॉशिंगटन पोस्ट में एक लेख लिखा है। बरखा दत्त के मुताबिक, बीजेपी के मार्केटिंग कंसलटेंट सुनील अलघ ने कहा, भारत में कुछ ज्यादा ही डेमॉक्रेसी है, इसलिए मुश्किल फैसले नहीं लिए जाते। उनका यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले पर आया था।

नोटबंदी और इससे उपजी परेशानी पर बरखा अपना विशेलेषण करते हुए लिखती है कि पीएम मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट अमान्य कर दिए। एेसे देश में जहां करीब 90 प्रतिशत ट्रांजेक्शंस कैश में होती हैं, वहां सिर्फ 4 घंटों पहले यह सूचना दी गई थी। इसका मकसद था कि टैक्स चोर को समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं उसे खत्म करना। लेकिन खराब संपर्क और प्लानिंग के कारण लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ा।

इसके बाद बरखा 1971 को याद करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषण और पीएम मोदी के भाषण में सामान्तर विषय पर बात करते हुए कहती है कि नरेंद्र मोदी का नोटबंदी फैसला और केंद्र के पास सारी ताकत कई मायनों में 1970 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाता है। नरेंद्र मोदी का यह नोटबंदी का फैसला 1969 में इंदिरा द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के जैसा ही है।

मोदी ने नए साल की पूर्व संध्या पर जो भाषण दिया था, उसमें कुछ नारे इंदिरा के 1971 में दिए गए नारों जैसा था। उस समय इंदिरा ने कहा था, वह कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने कहा, वह कहते हैं मोदी को हटाओ, मैं कहता हूं भ्रष्टाचार हटाओ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बरखा लिखती हैं कि नरेंद्र मोदी ने 50 दिन मांगे थे, लेकिन 2 महीने बीत जाने के बाद हमें पूछना चाहिए कि आखिर इस फैसले से हासिल क्या हुआ। अॉल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ने कहा कि राजस्व में 50 प्रतिशत और लघु उद्योगों की नौकरियों में 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी से जो लक्ष्य हासिल किया जाना था वह तो अब साफ नहीं हुआ। अगर मसकद सिस्टम से काला धन हटाना था तो वह भी नहीं हुआ। सिर्फ 6 से 10 प्रतिशत पैसा ही काले धन के रूप में सामने आया। दूसरी चीज सारे बंद हुए नोट वापस सिस्टम में आ गए।

गणतंत्र दिवस के बहाने

श्रीकांत सिंह

जैसा कि शब्‍द से ही स्‍पष्‍ट है-गण का मतलब समूह और तंत्र का मतलब तार। इस तार में बड़ी ताकत है। यह संवाहक का काम करता है। इसमें बिजली डाल दी जाए तो यह बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देता है। चुंबकीय तरंगें डाल दी जाएं तो उन्‍हें भी यह देश के कोने-कोने में पहुंचा देता है। तकनीकी विकास ने तंत्र यानी तार को भी बीच से हटा दिया है। इसी नियम पर हम टीवी, मोबाइल फोन, इंटरनेट आदि चलाते हैं। तार का काम अब तरंगें करने लगी हैं। राजतंत्र में यही तार राजा के पास होता था। संपूर्ण तंत्र को राजा अपने बाहुबल से हासिल करता था। इसीलिए वीरभोग्‍या वसुंधरा का नियम चलता था।

जाने माने कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा था-वीरता जब भागती है तो राजनीति और छल छंद की धूल उड़ती है। और आज यही हो रहा है। गणतंत्र शब्‍द से गण भी गायब है। आज तरंगें, लहरें, हिलोरें आदि चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। अब गण के रूप में जनता के प्रतिनिधि गायब हैं। एक व्‍यक्ति जिसे धन बल से तरंगित कर दिया गया, हर जगह उसी का बोलबाला है। नियम, कानून, संविधान आदि का कोई मतलब नहीं रह गया है। एक ही व्‍यक्ति के मन की बात ने नियम, कानून, संविधान आदि का रूप ले लिया है। और हम हैं कि प्रमादवश उसी की जयजयकार किए जा रहे हैं।

दरअसल, इसके कारण बहुत ही गहराई में हैं। आप तरह-तरह की तकनीक से सम्‍मोहित किए जा रहे हैं, जिसका आपको पता भी नहीं चल रहा है। और उसका परिणाम यह हो रहा है कि एक व्‍यक्ति विशेष को अहैतुक समर्थन मिल रहा है। अहैतुक का मतलब अकारण समर्थन मिल रहा है। आप अपनी मूर्छा तोड़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि जिस व्‍यक्ति के नाम का आप जप कर रहे हैं, उसने देश, समाज और आपके लिए कुछ भी नहीं किया है। वह मात्र सम्‍मोहन का सौदागर है जो आपके पैसों पर ऐश कर रहा है। बईमानी वह कर रहा है और बेईमान आपको बता रहा है।

देश के लोगों में मूर्छा की यह स्थ्‍िाति बहुत घातक है। इसने चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर दिया तो हालात और भी घातक हो जाएंगे। शीघ्र ही आपकी मूर्छा न टूटी तो बहुत देर हो जाएगी। जो व्‍यक्ति यह कहता है-मित्रो, हम उत्‍तर प्रदेश को गुंडामुक्‍त करना चाहते हैं। ये फर्जी मुकदमों का जो ये सिलसिला चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। ये भूमाफिया का जो आतंक चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। यही व्‍यक्ति सोहराबुद्दीन हत्‍या मामले में 25 जुलाई 2010 को गिरफ्तार हुआ था और जेल भेजा गया था। इस पर अपहरण, हत्‍या, हत्‍या की साजिश, सबूतों से छेड़छाड़, महिलाओं के फोन टेप करने और एक्‍जार्शन (सरकारी पद का दुरुपयोग कर धन संपत्ति हड़पने) के आरोप लगे हैं। तो भला यह आदमी कैसे उत्‍तर प्रदेश को गुंडों से मुक्‍त करा पाएगा।

इसी की तरह का एक और व्‍यक्ति है जो आज कल आपके पास वोट की भीख मांगने जा रहा है। उस पर 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें दो धर्मों के लोगों को लड़ाना, हत्‍या की धमकी देना, हत्‍या की साजिश, हत्‍या करना, मारपीट करना, धर्मों का मजाक उड़ाना, धोखाधड़ी, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना, फर्जी दस्‍तावेज तैयार करना, चोरी, डकैती और दंगे करवाना आदि प्रमुख हैं।

आश्‍चर्य है कि इन पर दंगे के मामले चल रहे हैं और इनका दावा है कि ये उत्‍तर प्रदेश को दंगामुक्‍त प्रदेश बनाएंगे। तो आपके पास ऐसे लोग वोट मांगने जाएं तो उनकी जन्‍म कुंडली किसी काबिल ज्‍योतिषी से जरूर दिखा लेना। जब कुंडली का मिलान विवाह में आवश्‍यक बताया जाता है तो आपके भविष्‍य का विधाता बनने का दावा करने वालों की कुंडली क्‍यों न परख ली जाए। आप इन्‍हें इसलिए वोट न दे देना कि ये देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों में गिने जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों की संख्‍या नौ से कहीं ज्‍यादा हो सकती है, क्‍योंकि उनकी गणना अभी व्‍यवस्थित रूप से नहीं की गई है। कुछ अखबारों और टीवी न्‍यूज चैनलों के मालिक भी मोदी जी के रत्‍नों में शामिल हैं क्‍योंकि वे बिना शर्त मोदी जी का यशोगान करते हैं। ऐसे अखबारों और चैनलों की खबरों पर आप नजर डालें तो आपको कोई प्रमाण नहीं ढूंढना पड़ेगा।

दैनिक जागरण अखबार यह दावा करता है कि वह दुनिया में सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है। उसका सर्कुलेशन चेक करने के लिए मोदी जी सारा जग घूम आए और पाया कि इस जैसा अखबार कोई नहीं है। शायद इसीलिए इस अखबार के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाकर मोदी जी कृत कृत्‍य होते रहते हैं। इस अखबार के मालिक, प्रधान संपादक, सीईओ आदि आदि श्री संजय गुप्‍ता हैं।

बड़े ज्ञानी किस्‍म के आदमी लगते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने एक बार फरमान जारी किया था कि अब दैनिक जागरण स्‍वतंत्रता दिवस समारोह नहीं मनाएगा। क्‍योंकि स्‍वतंत्रता मुनाफाखोरी के रास्‍ते की सबसे बड़ी बाधा है। उन्‍होंने कहा था कि अब दैनिक जागरण के लोग गणतंत्र दिवस समारोह मनाएंगे, क्‍योंकि इसी दिन देश का संविधान लागू हुआ था। और अब जागरण में नियमों पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। फिर क्‍या था। धड़ाधड़ ऐसे नियम बनाए जाने लगे जो मुनाफाखोरी को आगे ले जा सकते थे और कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता छीन सकते थे। उन्‍हीं नियमों ने न जाने कितने निष्‍ठावान कर्मचारियों को भूतपूर्व बना दिया। अब मजीठिया वेजबोर्ड के नियम का पालन करने की बारी आई तो माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी पहाड़ा पढ़ाने लगे हैं। तो कुल मिलाकर गणतंत्र दिवस के बहाने यही कहना था-गणतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है इस देश में। अगर कुछ है तो वह है मोदी जी का नवरत्‍नतंत्र। इसी के इंद्रजाल में जनता छटपटा रही है। किसी को कुछ समझ में नहीं आता कि मोदी जी ईमानदार हैं या बेईमान, देवता हैं या राक्षस, राम हैं या रावण, महान हैं या धनवान, साधू हैं या सवादू, फकीर हैं या अमीर, काबिल हैं या रईस आदि आदि।

परिवारवाद और दलबदलुओं के चक्रव्‍यूह में भाजपा

श्रीकांत सिंह

वंशवाद या परिवारवाद शासन की वह पद्धति है जिसमें एक ही परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते जाते हैं। वंशवाद, भाई-भतीजावाद का जनक और इसका एक रूप है। ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र में वंशवाद के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर भी अनेक देशों में अब भी वंशवाद का प्रभुत्‍व है। वंशवाद, निकृष्टतम कोटि का आरक्षण है। यह राजतंत्र का एक सुधरा हुआ रूप कहा जा सकता है। वंशवाद, आधुनिक राजनैतिक प्रगतिशीलता के विरुद्ध है।

वंशवाद की कई हानियां हैं जिससे नए लोग राजनीति में नहीं आ पाते। वंशवाद सच्चे लोकतंत्र को मजबूत नहीं होने देता। अयोग्य शासक देश पर शासन करते हैं जिससे प्रतिभातंत्र के बजाय मेडियोक्रैसी को बढ़ावा मिलता है। समान अवसर का सिद्धांत पीछे छूट जाता है। ऐसे कानून एवं नीतियां बनाई जाती हैं जो वंशवाद का भरण-पोषण करती रहती हैं। आम जनता में कुंठा की भावना घर करने लगती है। दुष्प्रचार, चमचातंत्र, धनबल एवं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता है ताकि जनता का ध्यान वंशवाद की कमियों से दूर रखा जा सके। जनता में स्वतंत्रता की भावना की कमी बनी रहती है। देश की सभी प्रमुख संस्थाएं पंगु बनाकर रखी जाती हैं।

भारत में वंशवाद अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। इस मामले में नेहरू खानदान सबसे प्रमुख है जिसमें जवाहर लाल नेहरू,  इंदिरा गांधी,  राजीव गांधी,  सोनिया गांधी और राहुल गांधी सत्ता का आनंद उठाते रहे हैं। इसके अलावा छोटे-मोटे कुछ और भी उदाहरण हैं जैसे बाल ठाकरे द्वारा शिवसेना में परिवारवाद को बढ़ावा देना,  लालू यादव,  शरद पवार, शेख़ अब्दुल्ला,  फ़ारुख़ अब्दुल्ला,  उमर अब्दुल्ला परिवार,  माधवराव सिंधिया परिवार,  मुलायम सिंह यादव आदि भी इसे प्रोत्साहित करते आए हैं।

भाई-भतीजावाद अथवा नेप्टोइज्म दोस्तवाद के बाद आने वाली एक राजनीतिक शब्दावली है जिसमें योग्यता को नजर अंदाज करके अयोग्य परिजनों को उच्च पदों पर आसीन कर दिया जाता है। नेप्टोइज्म शब्द की उत्पत्ति कैथोलिक पोप और बिशप द्वारा अपने परिजनों को उच्च पदों पर आसीन कर देने से हुई। बाद में इस धारणा को राजनीति, मनोरंजन, व्यवसाय और धर्म संबंधी क्षेत्रों में भी बल मिलने लगा।

परिवारवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी अब परिवारवाद से अछूती नहीं रह गई है। सत्‍ता की लालसा में पीएम मोदी की नसीहत काम न आई और यह पार्टी भी परिवारवाद के चक्रव्‍यूह में घिर गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले ही नसीहत दी थी कि पार्टी नेता अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट न मांगें लेकिन चुनावों के लिए टिकट बंटवारे में परिवारवाद धड़ल्‍ले से चला है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 के लिए उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की उसमें जमकर ‘अपनों’ को टिकट बांटे गए। मजेदार बात यह रही कि भाजपा ने पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने वाले कई ऐसे नेताओं को विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है, जो पार्टी में परिवारवाद और दलबदलुओं को तरजीह दिए जाने के हालात को बयां करते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह को अतरौली से टिकट दिया गया है, लेकिन केंद्रीय मंत्री एवं उत्तरप्रदेश के दिग्गज नेता राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह के नाम पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है क्योंकि इस सूची में पंकज सिंह का नाम नहीं है।

उत्तर प्रदेश की पहली लिस्ट में सबसे ज्यादा मेहरबानी पार्टी ने दलबदलुओं पर दिखाई है। बलदेव सीट पर लोक दल से आए पूरन प्रकाश को टिकट मिला है। महज 24 घंटे पहले सपा छोड़कर पार्टी में आई पक्षालिका सिंह को भाजपा ने बाह से पार्टी प्रत्याशी बनाया है। बसपा से पाला बदलकर भाजपा में शामिल हुए महावीर राणा को बेहट से और धर्मसिंह सैनी को नकुट से उम्मीदवारी दी गई है।

गंगोह से कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले प्रदीप चौधरी को और नहटोर से ओम कुमार को टिकट मिला है। ओम बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। इसके अलावा बसपा से आए अरविंद गिरि, रोमी साहनी,  बाला प्रसाद अवस्थी और रोशन लाल वर्मा को भी भाजपा ने टिकट दिया है।

उत्तराखंड में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र सौरभ बहुगुणा को टिकट दिया है जो कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए। भाजपा में शामिल होने वाले प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यशपाल आर्य और उनके पु़त्र संजीव आर्य को टिकट दिया गया है। इसके अलावा केदार सिंह रावत को भी पार्टी ने टिकट दिया है। पार्टी ने पूर्व सांसद सतपाल महाराज को भी टिकट दिया है जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। भाजपा ने रानीखेत से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट को टिकट दिया है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की पु़त्री रितू खंडूरी भूषण को टिकट दिया गया है।

केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने पार्टी मुख्यालय में उम्मीदवारों का ऐलान किया था। यूपी के लिए कुल 149 उम्मीदवारों की घोषणा की गई तो उत्तराखंड के लिए कुल 64 उम्मीदवारों के नामों की सूची जारी की गई है। भाजपा की इस सूची से पार्टी परिवारवाद और दलबदलुओं के चक्रव्‍यूह में फंसी नजर आ रही है। दरअसल, किसी भी पार्टी में जब इस तरह के रवैये को बढ़ावा मिलता है तो वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे कार्यकर्ता निराश और हताश होते हैं, जिससे पार्टी को चुनाव में भितरघात का सामना करना पड़ता है।

चरखा चर्चा में, साइकिल परिचर्चा में

चरखा आर्थिक उत्‍पाद का साधन है तो साइकिल आर्थिक बचत का

श्रीकांत सिंह

भारतीय राजनीति में आज उस चरखे पर चर्चा और साइकिल पर परिचर्चा हो रही है जिसे हम तकनीकी विकास के दौर में बहुत पीछे छोड़ आए थे। चरखा सौ साल पहले अस्तित्‍व में आया था तो साइकिल का आविष्‍कार लगभग पौने दो सौ साल पहले हुआ था। वैसे, इन्‍हें नोटबंदी के दौर में याद किया जाना चाहिए था, क्‍योंकि चरखा आर्थिक उत्‍पाद का साधन है तो साइकिल आर्थिक बचत का। चरखा एक कैशलेस व्‍यवस्‍था भी है। चरखे से सूत कात कर गांधी आश्रम में जमा किया जाता है तो वहां से बिना नकदी के कपड़ा मिल जाता है। कपड़े के अलावा दूसरे सामान भी सूत के बदले मिलते हैं।

a02लेकिन आज जिस संदर्भ में चरखा और साइकिल की चर्चा हो रही है, वह शुद्ध रूप से राजनीतिक है। चरखा इसलिए चर्चा में है कि जो महाशय चरखा नहीं चलाते उनकी फोटो कैलेंडर और डायरी में छप गई और जिन्‍होंने साइकिल चलाकर लोगों का दिल जीता, उन्‍हीं को साइकिल चुनाव निशान के लिए चुनाव आयोग में भटकना पड़ा।

खैर, फोटो छपने की फजीहत होने पर पीएमओ नाराज है तो साइकिल चुनाव निशान मिल जाने पर उत्‍तर प्रदेश के सीएम खुश। उत्‍तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड चुनावी माहौल की गर्मी के सामने बौनी नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश गुट के समर्थकों की मनोदशा एक प्रसिद्ध विज्ञापन की लाइन ‘चले हवा की चाल हीरो साइकिल’ जैसी हो गई है।

दरअसल, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के 2017 के कैलेंडर में कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने कई लोगों को चौंका दिया है। केवीआईसी डायरी के नए साल के कैलेंडर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगी है। जहां इस कैलेंडर पर आपत्ति जताई जा रही है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि पहले भी कई बार केवीआईसी के किसी सामान पर महात्मा गाँधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर डायरी पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी।

तुषार गांधी
तुषार गांधी

प्रतिक्रिया में महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। वहीं भाजपा ने सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। तुषार गाँधी ने कहा-हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। ऐसा कैसे कर सकते हो, कुछ तो शर्म किया करो।

अनिल विज
अनिल विज

बवाल तब मचा जब हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने कहा कि जिस दिन से नोटों पर गांधी की तस्‍वीर लगी है तब से रुपये की कीमत गिरने लगी है। हालांकि विवाद होने के बाद उन्‍होंने बयान वापस ले लिया। वहीं भाजपा ने भी अपने आप को इस बयान से किनारे कर लिया है। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। पार्टी का इससे लेना-देना नहीं है। अपने बयानों को लेकर अक्‍सर विवादों में रहने वाले हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा, गांधी जी के नाम से खादी पेटेंट थोड़े ही हो गया। जब से खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ गया खादी डूब गई।

चर्चित साहित्‍यकार उदय प्रकाश के शब्‍दों में, चरखे से सूत कातना पूँजी और मशीनी टेक्नोलॉजी की तानाशाही का अहिंसावादी, विनम्र, एकाग्र और मानवीय प्रतिरोध था। वहीं चर्चा में रहने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है। कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था। कोई उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है। मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिए गए और खलनायक की तरह दिखाए जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं। इसका स्वागत होना ही चाहिए।

शंभूनाथ शुक्‍ल की फेसबुक वाल कहती है-न वो चरखा समझे न ये समझे। चरखा तो बापू ही समझते थे और चरखे का मतलब कोई सूत कातना भर नहीं था। चरखा एक विचार था और खादी उसका प्रतिफलन। बापू ने न सिर्फ चरखा कातना सिखाया बल्कि नमक बनाना और साबुन बनाना भी। जरा थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि पचास साल पहले हर गांव में जो ऊसर होता था उसकी मिट्टी से कपड़े धोए जाते थे और महुआ से साबुन तथा तेल व घी।

मगर उस विचार को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा जब गांधी जी जिंदा थे और उन्होंने चरखे से स्वावलंबन सिखाया। मेरी चाची, जो अब लगभग 90 साल की हैं आज भी जब समय मिलता है तब चरखा कातती हैं और अपने ही एकमात्र पेड़ महुआ के फूल चैत में लगन से बिनती हैं और उससे बनता है साबुन तथा घी। आज भी वे तालाब में अपने कपड़े ऊसर की मिट्टी से ही धोती हैं। उन्होंने न कभी सनलाइट खरीदा न लाइफबॉय और न ही आज का घड़ी।

उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को विरासत में साइकिल चुनाव निशान समेत समूची विरासत मिलने पर तमाम लोग फूले नहीं समा रहे हैं। संत राम यादव के मुताबिक चुनाव आयोग ने सोमवार को सपा में पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही खींचतान पर विराम लगाते हुए इसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दिया है। इसका अर्थ यह हुआ कि अखिलेश अब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनके नेतृत्व और साइकिल चुनाव चिन्ह के साथ पार्टी उत्तर प्रदेश के चुनावों में उतरेगी।

जितेंद्र भारद्वाज के शब्‍दों में-पिता की विरासत को कौन संभालता है…पुत्र। वही अखिलेश ने किया है। फर्क इतना सा है कि विरासत सौंपने की रस्म अपनों के बीच न होकर चुनाव आयोग में पूरी हुई।

शंभूनाथ शुक्‍ल कहते हैं-सबसे ज्यादा संतुष्ट मेरा नाती है। टीवी पर जैसे ही सुना कि अखिलेश को मिली साइकिल तो वह उछलने लगा। बोला इसका मतलब अखिलेश भैया सरकार बनते ही मुझे फ्री में साइकिल देंगे। अब उसका तो वोट नहीं है पर वह अपने उछाह में जीत लायक वोट तो दिला ही देगा। एसके यादव की प्रतिक्रिया भी एक संकेत दे रही है। इधर अखिलेश को साइकिल मिली, उधर एटीएम से निकासी सीमा बढ़ा कर 10 हज़ार रुपये कर दी गई।

अब उत्‍तर प्रदेश के चुनावी दंगल में दो दो हाथ करने के लिए राजनीतिक दलों की सेनाएं तैयार हैं। एक पार्टी कलह पर कमल खिलाने को उत्‍सुक है तो दूसरी पार्टी के लिए चलती का नाम साइकिल है। तीसरी का दावा है-दलित और मुस्लिम हाथी के साथी। मतदाता तो अभी मजे ले रहे हैं, क्‍योंकि अब रिमोट उनके हाथ में है। चुनाव का हर स्‍टेज गेम का स्‍टेज बन गया है। हर स्‍टेज उन्‍हीं को पार करना है।

चरखा पर चरचा: हंगामा है क्‍यूं बरपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बचकानी हरकत पर लोग हंगामा कर रहे हैं। बचकानी हरकत इसलिए कि जैसे राष्‍ट्रीय पर्वों पर बच्‍चे महात्‍मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों की वेशभूषा में अपने स्‍कूल के कार्यक्रम में शामिल होते हैं, ठीक उसी अंदाज में मोदी जी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर व डायरी में नजर आ रहे हैं। बात तब और बढ़ गई जब हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने महात्‍मा गांधी के बारे में विवादित बयान दे दिया।

दरअसल, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के 2017 के कैलेंडर में कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने कई लोगों को चौंका दिया है। केवीआईसी डायरी के नए साल के कैलेंडर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगी है। जहां इस कैलेंडर पर आपत्ति जताई जा रही है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि पहले कभी भी केवीआईसी के किसी सामान पर महात्मा गाँधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर डायरी पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी।

हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने ने कहा कि जिस दिन से नोटों पर गांधी की तस्‍वीर लगी है तब से रुपये की कीमत गिरने लगी है। हालांकि विवाद होने के बाद उन्‍होंने बयान वापस ले लिया। वहीं भाजपा ने भी अपने आप को इस बयान से किनारे कर लिया है। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। पार्टी का इससे लेना-देना नहीं है। अपने बयानों को लेकर अक्‍सर विवादों में रहने वाले हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा, गांधी जी के नाम से खादी पेटेंट थोड़े ही हो गया। जब से खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ गया खादी डूब गई। खादी उठ ही नहीं पाई। गांधी का ऐसा नाम है जिस दिन से नोट पर चिपक गए, उस दिन से नोट की कीमत गिर गई। तो अच्‍छा किया है गांधी की तस्‍वीर हटा के मोदी के चित्र को लगा दिया गया है। मोदी ज्‍यादा बेटर ब्रैंड नेम है। मोदी का नाम लगने से खादी की सेल 14 प्रतिशत बढ़ी है।

जब उनसे पूछा गया कि आपकी सरकार ने जो नए नोट छापे हैं उनमें भी गांधी की तस्‍वीर है। इस पर विज ने जवाब दिया कि धीरे-धीरे हट जाएंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि कैलेंडर पर बापू की तस्वीर होनी ही चाहिए। यह कहना गलत होगा कि बापू की तस्वीर को पीएम मोदी ने रिप्लेस कर दिया है।

वहीं महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। वहीं भाजपा ने सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। तुषार गाँधी ने कहा-हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। ऐसा कैसे कर सकते हो, कुछ तो शर्म किया करो। टीवी पर ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई बुराई नहीं होती है।

उन्‍होंने कहा कि जिस तरह से भ्रष्ट राजनेता पैसे का इस्तेमाल गलत कार्यों के लिए करते हैं, उससे पहले अच्छा होगा बापू नोट से हटा दिए जाएं। पीएम नरेंद्र मोदी पॉलीवस्त्रों के प्रतीक हैं जबकि बापू ने अपने बकिंगम पैलेस के दौरे के दौरान खादी पहनी थी न कि 10 लाख रुपये का सूट। आप हाथ में चरखा लेकर बापू के हत्यारे नाथूराम को दिल में बसाकर दोनों कार्य नहीं कर सकते हो।

चर्चित साहित्‍यकार उदय प्रकाश के शब्‍दों में, चरखे से सूत कातना पूँजी और मशीनी टेक्नोलॉजी की तानाशाही का अहिंसावादी, विनम्र, एकाग्र और मानवीय प्रतिरोध था। वहीं चर्चा में रहने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है। कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था। कोई उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है। मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिए गए और खलनायक की तरह दिखाए जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं। इसका स्वागत होना ही चाहिए।

शंभूनाथ शुक्‍ल की फेसबुक वाल कहती है-न वो चरखा समझे न ये समझे। चरखा तो बापू ही समझते थे और चरखे का मतलब कोई सूत कातना भर नहीं था। चरखा एक विचार था और खादी उसका प्रतिफलन। बापू ने न सिर्फ चरखा कातना सिखाया बल्कि नमक बनाना और साबुन बनाना भी। जरा थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि पचास साल पहले हर गांव में जो ऊसर होता था उसकी मिट्टी से कपड़े धोए जाते थे और महुआ से साबुन तथा तेल व घी। मगर उस विचार को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा जब गांधी जी जिंदा थे और उन्होंने चरखे से स्वावलंबन सिखाया। मेरी चाची, जो अब लगभग 90 साल की हैं आज भी जब समय मिलता है तब चरखा कातती हैं और अपने ही एकमात्र पेड़ महुआ के फूल चैत में लगन से बिनती हैं और उससे बनता है साबुन तथा घी। आज भी वे तालाब में अपने कपड़े ऊसर की मिट्टी से ही धोती हैं। उन्होंने न कभी सनलाइट खरीदा न लाइफबॉय और न ही आज का घड़ी।

प्रतिक्रिया स्‍वरूप राम सागर का कहना है-बड़ा अच्छा लगता है जब कोई गाँव,  देहात की बात करता है, विशेष कर गुजरे जमाने की, उस जमाने के रहन-सहन और रीति-रिवाजों की। बड़े दुख की बात है कि 15-20 वर्षों में आपकी चाची की पीढ़ी न रहेगी तो उस जमाने के क्रियाकलाप आप जैसों की पीढ़ी के लिए केवल यादें बन कर ही रह जाएंगी। हमारी प्राचीन जीवनशैली पर सम्भवतः न पुस्तकें ही लिखी जा रही हैं और न ही फिल्में बन रही हैं। कुछ पुरानी फिल्मों में प्राचीन ग्राम्य जीवनशैली के थोड़े-बहुत दर्शन होते हैं। उनमें से कुछ नाम हैं – दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, सौदागर (अमिताभ बच्चन, नूतन, पद्मा खन्ना अभिनीत), शोले। और भी ऐसी कुछ फिल्में होंगी। आप और आपके पाठक मुझसे अधिक जानते होंगे। काश नई पीढ़ी में कुछ फिल्म निर्माता अपने देश की पुरानी ग्राम्य जीवनशैली और सांस्कृतिक धरोहरों को फिल्मों के माध्यम से संजो पाते।

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नोटबंदी को छलावा मानते हैं लोग   

देश के पांच राज्‍यों के चुनाव में भाजपा सर्जिकल स्‍ट्राइक और विकास के मुद्दे पर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास करेगी, लेकिन नोटबंदी के रूप में केंद्र की भाजपा सरकार ने जो सर्जिकल स्‍ट्राइक देश के लोगों पर की है उसे लोग छलावा मानते हैं। नोटबंदी पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का बयान देर से आया, लेकिन दुरुस्त आया है। राष्ट्रपति पद की मर्यादा और कूटनीति दोनों एक साथ निभाते हुए आखिरकार प्रणब मुखर्जी ने नोटबंदी पर कहा है कि इससे गरीबों की परेशानियां बढ़ी हैं। एक तरह से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले को नादानी करार देते उसके दुष्परिणामों से भी आगाह कर दिया है। प्रणब मुखर्जी लंबे वक्त तक वित्तमंत्री भी रहे हैं। इस नाते वे देश की अर्थव्यवस्था से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि एक नकदी प्रधान अर्थव्यवस्था में कैशलेस तरीके एक अव्यावहारिक अवधारणा और एक व्यक्ति विशेष की सनक भर है। राष्ट्रपति के इस बयान पर अब पपेट्स (काल भक्त) के कमेंट्स आएंगे ही।…पर ध्यान दें देश में राष्ट्रपति का पद सर्वाधिक गरिमामयी है।

अरुण माहेश्‍वरी की फेसबुक वाल का संदर्भ लें तो नोटबंदी के छल का जवाब चाहिए ! टेलीविजन चैनलों से प्रसारित किया जा रहा यह तथ्य अगर सच है कि नोटबंदी के बाद 500 और 1000 रुपये के पुराने 97 प्रतिशत नोट बैंकों में वापस गए हैं तो कहना होगा, हमारे प्रधानमंत्री ने लगभग दो महीनों तक करोड़ों लोगों को बैंकों के सामने क़तारों में घंटों खड़े रखने, सवा सौ के क़रीब लोगों की मौत का कारण बनने, पूरी अर्थ-व्यवस्था को चौपट कर देने, लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी छीन लेने का एक महाअपराध किया है। उन्होंने पूरे राष्ट्र को बरगलाया कि वे इसके ज़रिये काला धन के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उल्टे,  दूसरे सभी तथ्य यह बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने भारत के आम लोगों को कुछ बड़ी पेमेंट कंपनियों को अपनी ख़रीद में से कुछ कमीशन अदा करने के लिए ज़ोर-ज़बर्दस्ती मजबूर किया है। अब तो इसमें विदेशी कंपनियों का हाथ होने की बात भी कही जाने लगी है।

हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री अपनी इस भारी भूल को कभी नहीं स्वीकारेंगे और न ही सताए गए लोगों से कभी माफ़ी माँगेंगे। वे न कभी संसद में इस विषय पर सवालों का जवाब देंगे,  न किसी संवाददाता सम्मेलन का सामना करेंगे। उनके पास अपार शक्ति और संपदा है। वे तमाम भ्रष्ट उपायों से जमा की गई भीड़ और ख़रीद लिए गए चैनलों से एकतरफ़ा भाषणबाज़ी का नाटक करते रहेंगे। अब ज्यादा समय नहीं है। प्रधानमंत्री को पूरे देश के साथ किए गए नोटबंदी के इस छल का जवाब देना ही होगा।

इलाहाबाद से दुर्गा कहते हैं, 15 लाख करोड़ तो कुल नोट थे। उसमें सब का सब जमा हो गया। अब अगर 5 लाख करोड़ नकली नोट बाहर हुए तो कुल जमा तो 10 लाख करोड़ हुआ जबकि शुरू के दो हफ्ते में ही 8 लाख करोड़ जमा हो गए थे और यह खुद आरबीआई का जाहिर किया आकड़ा है।

अजय कुमार कहते हैं, 1000,500 के नोट नहीं चलेंगे जबकि 500, 2000 के नए नोट चलाएंगे। इसके पीछे जनता को ये बताया जा रहा है कि काला धन वापस आएगा लेकिन हम आप को बता दें कि देश का 95% काला धन देश के रियल स्टेट, गोल्ड, डायमंड, विदेशी मुद्रा के रूप में विदेशों में ज़मा है। ये तो आने से रहा, अब बचता है 5% जो नकद है। अब ये जानना जरूरी हो जाता है कि ये सब किसका है तो बता दें कि ये वर्तमान मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों, पूर्व नेता, वर्तमान नेता, अधिकारी एवं कर्मचारी एवं पूजीपतियो का है।
इसकी जानकारी सरकार को है कि किसके पास कालाधन है लेकिन वो कुछ नहीं करती क्‍योंकि वो स्वयं इसमें शामिल है। यही कालाधन नेताओं को चुनाव में दिया जाता है। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 2014  के लोकसभा के चुनाव में कारपोरेट जगत ने भाजपा को 700 लाख करोड़ तो कांग्रेस को 600 लाख करोड़ रुपये दिए। ये आप समझ सकते हैं कि ये कैसा पैसा है। हम कहना चाहते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट में विदेशों में कालादन ज़मा करने वाले लोगों की सूची बंद लिफाफे में दी जाती है और नाम नहीं बताया जाता। आखिर ऐसा क्यों ? इन देश के गद्दारों को देश की जनता के सामने बेनकाब क्यों नहीं किया जा रहा है ? कहीं इसमें वर्तमान सरकार के मुखिया सहित बहुत से राष्ट्रवादी नेताओं के साथ- साथ पूर्व की सरकार में शामिल लोगों के नाम तो नहीं शामिल हैं ? हमारे कर्जदार किसानों के नाम तहसील जहां उपज़िला अधिकारी होते हैं, दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में नाम पता सहित लिख दिया जाता है। तो इन गद्दारों के नाम देश की जनता के समाने क्यों नहीं लाया जाता ?

नोटबंदी के तुगलकी फरमान से लाभ एवं हानि
1.इससे थोड़े समय के लिए नकली मुद्रा पर रोक लगेगी।
2. आने वाले समय में गोल्ड एवं डायमंड की कीमतें बढ़ेंगी।
3. हमारी मुद्रा की विश्वसनीयता कम हुई दुनिया में।
4. सारा पैसा नम्बर एक में हो जाएगा क्‍योंकि ये जो भ्रष्ट लोग हैं वे कृर्षि में आय दिखाकर अपना काम बना लेंगे, लेकिन सरकार इन्हीं आकड़ों को दिखाकर किसानों की आत्महत्या का मजाक उड़ाएगी।
5. इसी आधार पर खाद, बीज एवं अन्य कृषि से जुड़ी चीजें महंगी हो जाएंगी।
6. जनता का ध्यान बुनयादी सवालों से हटाने में थोड़े समय के लिए सरकार सफल होती दिख रही है।
7. मुख्य धारा की मीडिया सरकार की चाटुकारता में लगी है। ये नहीं बता रहे हैं कि आने वाले समय में ये 2000  के नोट की वजह से कुछ ही समय में फिर इससे विकराल समस्या उत्पन्न होगी।
8. काले धन की समस्या कम नहीं होगी, बढ़ेगी ही क्‍योंकि इस पर कोई कार्य ही नहीं किया गया।
9. स्विस बैंक या अन्य विदेशी बैकों में जिन लोगों का काला धन ज़मा था सुरक्षित कर दिया।
10. पनामा लीक्स के खुलासे के बाद भी काले धन के कुबेरों को भी सुरक्षित बचा लिया।
11. ये पूर्व सरकार की कार्बन कापी है क्‍योंकि इससे पहले ये कार्य 1978 में मोरार जी देसाई सरकार जिसमें आप भी शामिल थे कर चुकी है।
12.आप ने डूबते बैंको को बचा लिया।
13. देश में भुखमरी बढ़ गई, किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार को मरने के लिए विवश किया गया।

नरेंद्र सिंह तोमर का मत है, जानते हुए भी हारने वाली लड़ाई लड़ना वाकई दिलेरी का काम हैं, लेकिन जानबूझ कर कुएं में कूद कर मौत से मोहब्‍बत का तमाशा करना एक अलग बात है। नोटों या मुद्रा के स्‍वरूप में बदलाव के मुद्दे पर विपक्षी दल कुछ ऐसा ही कर रहे हैं, यह उचित नहीं है।
कांग्रेस या भाजपा में ऊपर का लेवल कुछ और कहता व करता है, जबकि नीचे का लेवल कुछ और ही कहता व करता है। एकदम विरोधाभास और जमीन व आसमान के बीच का अंतर रहता है। अब कांग्रेस के पास न तो खोने को कुछ बचा है और न पाने को ही कुछ। हम केवल तमाशबीन हैं और अब केवल कफन बगैर दफन होते एक अतीत का अंत देख रहे हैं।