दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मारपीट

सेवा में,

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदय, नोएडा।

 

विषय: दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मेरे साथ मारपीट और 36 हजार रुपये गायब करने के संबंध में तथा प्राथमिकी दर्ज न किए जाने के संबंध में 

 

महोदय,

मैं दैनिक जागरण में मुख्‍य उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं। संस्‍थान के एचआर मैनेजर आर कुमावत ने मुझे दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्‍त के एक आदेश के संदर्भ में तबादला वापसी के लिए नोएडा के डी-210 सेक्टर-63 स्थित कार्यालय में बुलाया था। हाल में किए गए सभी तबादलों की वापसी और प्रबंधन द्वारा उत्‍पीड़न न किए जाने का लिखित आश्‍वासन दिया गया था। उनसे मिलने के लिए मैं 10 फरवरी 2015 को सायं लगभग पांच बजे जब कार्यालय पहुंच कर प्रवेश के लिए फिंगर पंच किया तो संस्‍थान के सुरक्षा गार्डों ने मुझ पर हमला बोल दिया और धक्‍कामुक्‍की करने लगे।

मैंने इस अप्रत्‍याशित व्‍यवहार का कारण जानना चाहा तो सुरक्षा गार्डों ने कहा कि यह एचआर मैनेजर आर कुमावत का आदेश है। इसी बीच मेरी जेब में रखे 36 हजार रुपये गायब हो गए। मैंने जब आर कुमावत से बात करने का प्रयास किया तो उन्‍होंने फोन नहीं उठाया। मैंने तुरंत एसएमएस के जरिये उन्‍हें घटना की जानकारी दी, लेकिन उन्‍होंने कोई गंभीरता नहीं दिखाई। इस पर मैंने 100 नंबर डायल कर पुलिस सहायता मांगने का प्रयास किया तो मुझे धमकाने के लिए कुछ लोग मेरे वाहन के पास आ गए और उन्‍होंने मुझे जान से मारने की धमकी दी। पुलिस पीसीआर-47 जब लगभग साढ़े छह बजे मौके पर पहुंची तो इस बीच मेरे साथ धक्‍कमुक्‍की करने वाले वे लोग वहां से खिसक चुके थे।

पीसीआर पुलिस ने पूछताछ के लिए आर कुमावत को बुलवाया, लेकिन वह कार्यालय से बाहर नहीं आए। उन्‍हें मोबाइल फोन से जब मैंने काल किया और पुलिस आने की बात बताई तो वह पुलिस को ही बुरा-भला कहने लगे और मामले की जांच में कोई सहयोग नहीं किया। सुरक्षा गार्डों ने कार्यालय के गेट को भीतर से बंद कर लिया था। इस पर पुलिस को पूछताछ के बगैर लौटना पड़ा। पूरी घटना की तसदीक दैनिक जागरण कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज से भी की जा सकती है। सीसीटीवी कैमरों की फुटेज मेरी शिकायत की पुष्टि करने में भी मददगार होगी।

दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर आर कुमावत के खिलाफ हमला कराने, छिनैती कराने, कार्यालय में प्रवेश करने से रोकने और जान से मारने की धमकी देने की शिकायत मैंने पुलिस से की है लेकिन अब तक इस मामले में कोर्ठ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। मुझे आशंका है कि एचआर मैनेजर आर कुमावत के खिलाफ कार्रवाई न की गई तो दैनिक जागरण प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन देने से बचने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। इस प्रकार जागरण प्रबंधन से मुझे जान और माल का खतरा है। आशा है मेरी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

यह बताना जरूरी है कि दैनिक जागरण प्रबंधन की गुंडागर्दी के विरोध में 8 फरवरी 2015 को जागरण कर्मचारियों ने काम बंद कर दिया था। उस समय काम निकालने के लिए जागरण प्रबंधन ने कर्मचारियों के साथ जो समझौता किया था, उसी के तहत मुझे बातचीत के लिए बुलाया गया था, लेकिन समझौता तोड़ते हुए मुझ पर हमला करा दिया गया।

भवदीय

श्रीकांत सिंह पुत्र स्‍व. सीता राम सिंह

बी-31, सेक्‍टर-12, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर। फोन-9911124356

Related Person & Contact Number

Mr. Neetendra Shrivastav (GM. Dainik Jagran, Noida)-9810377167

Mr. Ramesh Kumar Kumawat (HR Manager, Dainik Jagran, Noida)-9650790123, 9810278955

Mr. Vishnu Prakash Tripathi (Editor, Delhi& NCR)-9810109481

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उत्‍तर प्रदेश शासन के अधिकारियों ने न तो ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के पत्र पर कोई संज्ञान लिया और न ही उपश्रमायुक्‍त कार्यालय में कराए गए समझौते को दैनिक जागरण प्रबंधन ने माना। समझौते की प्रति यहां अपलोड है।

 

कार्रवाई तो दूर, एसएसपी ऑफिस में गायब हो जाता है डीएम का पत्र

 

डीएम ऑफिस से एसएसपी कैंप कार्यालय की दूरी कुल 10 कदम होगी, लेकिन इस दूरी तक डीएम की चिट्ठी पहुंचना तो दूर, दो बार गायब हो चुकी है। यह तो एक उदाहरण मात्र है, इसी प्रकार गौतमबुद्धनगर के न जाने कितने फरियादी आए दिन पुलिस से निराश हो रहे होंगे। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार पुलिस अधिकारी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को फेल करने में लगे हैं।

दैनिक जागरण के मुख्‍य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने 24 फरवरी 2015 को नोएडा के सेक्‍टर-26 स्थित वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कैंप कार्यालय में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। ततकालीन पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह ने मामले की जांच का आदेश दिया था और उस समय के दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर श्री रमेश कुमावत को बुलाकर पूछताछ की गई थी। उसके बाद मामला ठंडे बस्‍ते में चला गया।

तीन एसएसपी आए और गए, लेकिन मामला ठंडे बस्‍ते में ही पड़ा रहा। जबकि ततकालीन दूसरे अधिकारी कहते रहे-दैनिक जागरण के खिलाफ कार्रवाई करने की मेरी औकात नहीं है। आप अदालत जाएं, तभी मामला दर्ज हो सकता है। अंत में थक हारकर उन्‍होंने ततकालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश भी दिया, लेकिन एसएसपी आफिस में बताया गया कि वहां ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं है। पिछले 21 अप्रैल को उन्‍होंने दोबारा जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की और उनसे फिर पत्र (डिस्‍पैच नंबर-3004/एचडी 4117-21-04-17) लिखवाया। इस बार उन्‍होंने पत्र की फोटो कॉपी भी ले ली। जैसी कि आशंका थी-जिलाधिकारी का पत्र न मिलने की बात दोबारा बता दी गई। उस पत्र को यहां अपलोड भी किया जा रहा है।

इससे पहले भी उन्‍होंने ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से मेल के जरिये संपर्क किया था, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन उस समय भी अधिकारियों ने आदेश को ठंडे बस्‍ते में डाल दिया था। इसके अलावा आरटीआई के जरिये भी उन्‍होंने एफआईआर की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी, जिसका गोलमोल जवाब दे दिया गया था।

अब हालत यह है कि गूगल करेंगे तो वहां आपको गौतमबुद्धनबर के एसएसपी का कोई फोन नंबर नहीं मिलेगा। इस हालत में आखिर अपराध पर नियंत्रण कैसे और क्‍यों हो पाएगा। पुलिस अधिकारी इसी तरह से अन्‍यायी दैनिक जागरण प्रबंधन के अपराधों को इग्‍नोर करेंगे तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश कैसे मानेगा और अपने कर्मचारियों को प्रताडि़त करने से कैसे बाज आएगा। इस मुद्दे पर जनमत तैयार न किया गया और उसे मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के समक्ष न रखा गया तो आम जनता इसी प्रकार उत्‍पीड़न और अन्‍याय झेलने को बाध्‍य होगी।

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अभी जीएसटी लागू ही नहीं हुआ तो दाम कैसे घट बढ़ सकते ?

श्रीकांत सिंह।

खबरों में जब भक्ति आ जाती है तो पत्रकारिता का कबाड़ा निकल जाता है। अभी जीएसटी लागू नहीं हुआ है, लेकिन हमारे देश के डिजिटल पत्रकार वस्‍तुओं के दाम घटाने बढ़ाने में लग गए हैं। उनके कारनामे समय समय पर सामने आते रहते हैं। कभी उन्‍हें दो हजार के नोट में चिप नजर आ जाती है तो कभी भारतीय सेना पाकिस्‍तान के सैनिक को मार कर आ जाती है। भारतीय सेना जब उसका खंडन करती है तो उनकी खबरों की भद्द पिट जाती है। कभी कभी तो वे लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे डलवा देते हैं।

पहले तो आल्‍हा में आल्‍हा ऊदल की बहादुरी का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन होता था, लेकिन अब न्‍यूज चैनल आल्‍हा गाने पर उतर आए हैं। सेना की तोपों को लेकर ये भारतीय सेना की बहादुरी का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, जैसे पत्रकारिता में वीर गाथा काल आ गया हो। आप इस लिंक पर क्लिक कर देखें किस प्रकार खबरों का कबाड़ा बनाया जा रहा है।

तभी तो मीडिया को कहा जाता है पालतू

श्रीकांत सिंह।

गूगल समाचार पर मंगलवार को एक ऐसी खबर चली जिसने मीडिया जगत को शर्मसार कर दिया। हालांकि बाद में इस खबर को सुधार लिया गया। खबर यह थी कि राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके नजदीकियों के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छोपेमारी की, लेकिन इस खबर को कुछ इस तरह से चलाया गया कि लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे।

इस पर लालू ने तपाक से ट्वीट कर दिया कि हमारे वे 22 ठिकाने गिनाओ। लालू का वह ट्वीट यहां दिया जा रहा है, जो मीडिया की भद्द पीटने के लिए काफी है।

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दूर से ही दिखने लगा है राजनीतिक संकट

श्रीकांत सिंह

हिंदुओं की एकता के नाम पर बडी मुश्किल से देश की जनता एकजुट हुई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी मिलकर उसी जनता का भरोसा तोड रहे हैं। गरीबों की गैस सब्सिडी बंद है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इंडियन ऑयल और पीएमओ तक शिकायत करने का कोई असर नहीं हो रहा है। दिल्‍ली और यूपी में मेट्रो ट्रेन के किराये में बेतहासा इजाफा किया जा रहा है। यही तो एक जनहितकारी और पर्यावरण को अनुकूल बनाने वाली व्‍यवस्‍था थी, जिसे धंधे पर लगाया जा रहा है। मेट्रो के किराये में एकायक इतना इजाफा कर दिया गया है कि अब हालत यह है कि लोग अपनी कार सडकों पर लाने की सोचने लगे हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत का भी कोई लाभ जनता को नहीं मिल रहा है। पुलिस आज भी लोगों के एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। कानून व्‍यवस्‍था की हालत खराब है। सरकार मजदूरों की नहीं, मालिकों की बात सुन रही है। लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं है। सरकार सोच रही है कि विपक्ष तो समाप्‍त ही हो गया और मीडिया पालतू हो गया है। अब चाहे कोई काम करें या नहीं, अकंटक राज करेंगे।

ऐसा सोचना सरकार और भाजपा दोनों के लिए आत्‍मघाती होगा। अब यदि जनता का भरोसा टूट गया तो जनता मान लेगी कि तिकडम से उसे मूर्ख बनाया गया है। ऐसी हालत में क्षेत्रीय दलों का उदय फिर होने लगेगा और किसी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में आक्रोश का माहौल बनने लगा है। राजनीतिक संकट दूर से ही दिखाई पडने लगा है।

हम वह समूह हैं जो यशोगान करने वाले मीडिया को 4th pillar का हिस्‍सा नहीं मानते

आज हम आपको 4th pillar के बारे में एक खास बात बताना चाहते हैं। आपने जिस उत्‍साह के साथ खबरें शेयर की, उससे यही पता लगता है कि आप लीक से हटकर कुछ व्‍यक्‍त करना चाहते हैं। लेकिन सिर्फ खबरें शेयर करने से लीक से हटकर कुछ होने वाला नहीं है। सीधे-सीधे खबरें शेयर करके आप वही कर रहे हैं, जो मीडिया जगत की कचरा टीम कर रही है। हमारा काम किसी भी सरकार का यशोगान करना नहीं है। दुर्भाग्‍य से जिसे हम मीडिया कहते हैं, उसके अधिकतर घटक यशोगान में ही लगे रहते हैं। हम वह समूह हैं जो यशोगान करने वाले मीडिया को 4th pillar का हिस्‍सा नहीं मानते। हमें तो ऐसे समाचारों का विश्‍लेषण शेयर करना है, जिनके जरिये मीडिया ने खुदगर्जी दिखाई है, स्‍वार्थ साधा है और आम जनता का बहुत ही नुकसान किया है। इस ग्रुप की गंभीरता को न समझ पाने के कारण कुछ लोग ग्रुप से चले गए और कुछ को हटाना आवश्यक हो गया। अरे भाई हम चुनाव में नहीं जा रहे हैं कि हमें समर्थकों की कोई जरूरत है। हम तो विरले लोग हैं जो दीन दुनिया की फिक्र करते हैं। इससे हमें कोई लाभ नहीं होने वाला है। हम यह सब इसलिए कर रहे हैं कि उससे आत्‍मसंतोष मिलता है। क्‍योंकि-जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान। अगर हमने कुछ लीक से हटकर न किया तो हमारी पहचान लुप्‍त हो जाएगी। हम धूल में मिल जाएंगे। और इस दुनिया में इस बात को कोई प्रमाण ही नहीं बचेगा कि हम पैदा भी हुए थे। इसलिए आज हमें संकल्‍प लेना चाहिए कि हम उन्‍हीं बातों को शेयर करेंगे जो मीडिया की खुदगर्जी की पोल खोलती हों। मीडिया में ऐसी खबरों का अंबार लगा होता है, जिनकी हम आसानी से पोल खोल सकते हैं। बस जरूरत है एक नए दृष्टिकोण की। आशा है आप सहयोग बनाए रखेंगे और इस मंच पर कुछ नया कर दिखाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

नई दिल्‍ली।

सुप्रीम कोर्ट में पिछले तीन वर्षों से चल रही मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले में सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई और अदालत ने अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। हालांकि कोर्ट ने फैसला सुनाने की तारीख अभी तय नहीं की है, लेकिन सुनवाई के मौके पर अदालत में उपस्थित अखबार कर्मचारियों के जोश और उत्‍साह से एक सकारात्‍मक संकेत जरूर मिल रहा है।

दोनों पक्षों, मीडिया संस्थानों और अखबारों के पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर जारी सुनवाई पूरी होने की घोषणा कर दी और कहा कि फैसले को सुरक्षित रख लिया गया है।

पत्रकारों-गैरपत्रकारों की ओर से केस की पैरवी कर रहे एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विश, उमेश शर्मा व परमानंद पाण्डे  एवं याचिकाकर्ताओं के अन्‍य वकीलों ने अदालत में दलील दी और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी देश भर के ज्‍यादातर अखबार मालिक अपने पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों को वेजबोर्ड के अनुरूप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। उलटे वेजबोर्ड के अनुसार वेतन की मांग करने वाले कर्मचारियों को टर्मिनेट, संस्पेंड और ट्रांसफर करके परेशान किया जा रहा है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने,  मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और परेशान किए गए कर्मचारियों को राहत दिलाने की गुहार लगाई है।

मीडिया संस्थानों का पक्ष रखने वाले वकीलों ने मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधान 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी स्वेच्छा से बेजबोर्ड के अनुसार वेतन न लेने की लिखित सहमति दे चुके हैं। मीडिया संस्थानों ने न तो कोई अवमानना की है और न ही कर्मचारियों पर दबाव बना कर उन्‍हें परेशान किया है।

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई पूरी होने की घोषणा की और फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया। सुनवाई के मौके पर देश भर से बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

यह है मामला

देश भर के अखबारों में कार्यरत पत्रकारों और गैरपत्रकारों का वेतनमान तय करने के लिए 2008 में जस्टिस जेआर मजीठिया की अध्‍यक्षता में गठित मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधानों को अखबार मालिकों ने लागू नहीं किया और उलटे उसकी संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए जहां उन्‍हें बुरी तरह हारना पड़ा। 7 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश कर्मचारियों के पक्ष में आ गया। मगर अदालत के आदेश के बावजूद ज्‍यादातर अखबार मालिकों ने वेजबोर्ड को लागू नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर अपने कर्मचारियों को परेशान करना शुरू कर दिया। अंतत: अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का मामला दायर कर दिया। अदालत की अवमानना मामले में पहला और प्रमुख मामला अवमानना वाद (सिविल) 411/2014 शोषण करने वालों के सिरमौर अखबार दैनिक जागरण के खिलाफ अभिषेक राजा एवं अन्‍य बनाम संजय गुप्‍ता दायर हुआ। उसके बाद तो सुप्रीम कोर्ट में अवमानना मामलों की भरमार लग गई और देश भर के करीब छह हजार अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पत्रकार व गैरपत्रकार कर्मियों को वेतनमान,  एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ जो लाखों रुपये में बनता है, देने के आदेश पहले ही दिए जा चुके हैं। लेकिन अखबार मालिक तमाम तिकड़मों के सहारे इस आदेश का पालन करने से बचते रहे। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका,  दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण,  अमर उजाला,  हिन्दुस्तान टाइम्स,  नवभारत टाइम्स,  पंजाब केसरी जैसे सैकड़ों अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया है। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए। जिन कर्मचारियों ने उनकी बात नहीं मानी, उन्‍हें स्थानांतरित और बर्खास्‍त करके परेशान किया गया। इस कानूनी लड़ाई में देश भर के हजारों अखबार कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। उम्‍मीद है कि अब उन्‍हें जल्‍द ही राहत मिलेगी।

नारद मोह के घेरे में पत्रकारिता

श्रीकांत सिंह

नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।

मजीठिया अवमानना मामला सुप्रीम कोर्ट में लटक गया है। कुछ अखबारों की आरसी कट रही है, लेकिन दैनिक जागरण का मालिक छुट्टा घूम रहा है। बदहाल पत्रकारों की परवाह सुप्रीम कोर्ट को तो है ही नहीं। एकाध को छोड बाकी सुप्रीम कोर्ट के सभी वकील मस्त हैं। मामले को सुप्रीम कोर्ट में मेंशन करने की कोई जुर्रत तक नहीं कर रहा है। डर है कि कहीं जज साहब डांट कर भ्गा न दें।

तभी तो शरद यादव कहते हैं कि आज के दौर में पत्रकारिता की शवयात्रा निकाली जा रही है। लोकतंत्र चंद लालाओं की मुट्ठी में कैद है। खुश होकर तालियां बजाओ। मोदी जी का साम्राज्य बढता जा रहा है। राम राज्य नजदीक आ गया है। यह अलग बात है कि नारद नारायण की चौखट पर दम तोड रहे हैं। पत्रकारिता को नारद मोह ने घेर रखा है। देखते जाइए कि नारद मोह का क्या परिणाम होता है।