मोदी और जेटली को आर्थिक नीतियों का ज्ञान नहीं

अरुण माहेश्‍वरी

कल यानी 31 जनवरी को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण ने जिन तथ्यों की ताईद की है, वे हैं-

  1. नोटबंदी ने देश की अर्थ-व्यवस्था को गहरा नुक़सान पहुँचाया है। जीडीपी में वृद्धि की पिछले साल की दर 7.6 से घट कर 6.5 प्रतिशत रहेगी। इससे न काला धन पर कोई असर आया है और न जाली रुपयों पर। इसने अनौपचारिक कही जाने वाली असंगठित मज़दूरों से जुड़ी अर्थ-व्यवस्था को तबाह किया है। इससे न कैशलेस अर्थ-व्यवस्था को कोई बल मिलेगा, न डिजिटलाइजेशन को। इससे न सरकार के पास कोई अतिरिक्त धन आएगा जिससे वह कल्याणमूलक कामों में ख़र्च में कोई बढ़ोतरी कर पाएगी। इस वजह से सरकार का बजट भी प्रभावित होगा।
  2. आर्थिक सर्वेक्षण में खुले आम पिछले सत्तर साल के स्वाधीन भारत की आर्थिक उपलब्धियों को स्वीकारा गया है, जिसके बारे में मोदी कंपनी दिन रात यही कहती रहती है कि इन सभी सालों में कुछ भी नहीं किया गया है! आजादी के वक़्त भारत के सत्तर प्रतिशत लोग ग़रीबी की सीमा रेखा के नीचे थे, आज 22 प्रतिशत हैं। इससे भी बड़ी बात यह रही कि ये उपलब्धियाँ जनतंत्र के राजनीतिक ढाँचे को क़ायम रखते हुए की गई हैं।
  3. इसमें मनमोहन सिंह और चिदंबरम के वित्त मंत्री के काल की उपलब्धियों को स्वीकारा गया है, जबकि दो दिन पहले मोदी के सूचना मंत्री वैंकय्या नायडू इन्हें विफल अर्थशास्त्री कह कर इनकी निंदा कर रहे थे।
  4. कुल मिला कर यह आर्थिक सर्वेक्षण इस सचाई का बयान है कि नरेंद्र मोदी और उनके वक़ील वित्त मंत्री को आर्थिक नीतियों के बारे में रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है । ये गाल बजाने में ही उस्ताद है।

रोहित दुबे कहते हैं-नोटबन्दी से क्या लाभ होगा, ये बात सीधे सीधे आर्थिक सर्वे में भी नहीं बताई गई है। हाँ यह कह देना कि दीर्घकालीन लाभ हो सकते हैं,  यह आर्थिक विश्लेषण कम, राजनीतिक विश्लेषण आधिक लग रहा है। वो दीर्घकालिक लाभ क्या होगा, सरकार को भी नहीं पता। हाँ भविष्य में किसी भी लाभ को,  नोटबन्दी की वजह से हुआ लाभ को बताने के लिए पात्रा साहब और जेटली जी समय समय पर अपने कुतर्क देते रह सकते हैं।

इस पर अरुण माहेश्‍वरी कहते हैं-इसमें अल्पकालिक या दीर्घकालीन, किसी प्रकार के लाभ की बात नहीं कही गई है। सिर्फ और सिर्फ नुक़सान की बात कही गई है।

महेश सारस्‍वत कहते हैं-नोटबन्दी के 83 दिन के भी देश की जनता को कोई राहत नहीं आईएमएफ़ ने अपने आर्थिक सर्वे में भारत की विकास दर को 1% घटाया और खुद सरकार ने अपने बजट प्रतिवेदन में देश की औद्योगिक विकास दर में होने वाले संभावित 1% नुकसान को भी स्वीकार किया। बाकी कृषि विकास दर में भी 1% गिरावट दर्ज हुई ….!

आर्थिक_सर्वे_2017_में यह भी बताया गया है कि मोदी सरकार की नीतियों से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की वजह से बैंकों के डूबे कर्ज इस साल बढ़कर दोगुने हो गए;  सरकारी बैंकों में तो ये बढ़कर 12% हो गए। वैसे ये पूरी संख्या नहीं है क्योंकि बट्टे खाते में डाले कर्ज (write off) इसमें नहीं जोड़े जाते। इसमें से 71% सिर्फ 50 कम्पनियों द्वारा दबाए गए हैं जिन्होंने औसतन 20 हजार करोड़ दबा लिया है। सबसे बड़ी 10 कम्पनियों ने तो प्रति कम्पनी 40 हजार करोड़ रुपये दबा लिए हैं।

सर्वे में उपाय सुझाया गया है कि रिजर्व बैंक के पास 4 लाख करोड़ रुपये की फालतू पूँजी है,  उससे लेकर इसे सरकारी बैंकों को दे दिया जाए, ताकि वे इन ‘उद्यमियों’ को और बड़े कर्जे दबा लेने का मौका देकर पुरस्कृत कर सकें! जब तक ऐसा हो तब तक के लिए सरकार बजट से 70 हजार करोड़ देगी !

बीजेपी का स्टार प्रचारक दैनिक भास्कर !

भवेंद्र प्रकाश

लखनऊ। चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मीडिया ने बीजेपी के प्रचार की जिम्मेदारी संभाल ली है। सीट बंटवारे को लेकर ही बीजेपी में कलह की खबरें आ रही हैं लेकिन इससे बेपरवाह मीडिया ने बीजेपी को जीत दिलानी भी शुरू कर दी है। अभी Times Now-VMR के सर्वे ने बीजेपी को 202 सीटें दिलवाकर इसका आगाज किया ही था कि दैनिक भास्कर का होर्डिंग सामने आया है।

लखनऊ में दैनिक भास्कर ने अपनी होर्डिंगें लगाई हैं। ऐसा ही एक होर्डिंग लखनऊ के लोहिया पथ पर लगा है, जिसमें लिखा है…. न माया का जाल, न अखिलेश का क्लेश।

अखबार की लाइनों पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत ही नहीं है। बगैर कहे ही दैनिक भास्कर का यह होर्डिंग मायावती और अखिलेश को विलेन बताते हुए भारतीय जनता पार्टी का खुले तौर पर प्रचार कर रहा है।

प्रशासन ने अभी तक इस पोस्टर पर कोई संज्ञान नहीं लिया है। वहीं भाजपा की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया है। वहीं चुनाव आयोग की अभी इस होर्डिंग पर नजर नहीं गई है।

एक कहानी मैं बताता हूँ भंसाली जी…

रतन भूषण

अगर प्रेम कथा पर फिल्म बनानी है जिसमें राजस्थान हो, 1300 ईस्वी के आसपास की बात हो, राजपूत हों, अल्लाउद्दीन खिलजी हो, मेवाड़ के आसपास की ही भूमि हो तो.. एक कहानी मैं बताता हूँ भंसाली जी.. सुनिए-
मेवाड़ के पास ही जबालिपुर (वर्तमान जालौर) के सोनगरा चौहान शासक कान्हड़ देव के एक पुत्र था विरम देव, जो राजकुमार होने के साथ साथ कुश्ती का पहलवान भी था। विरमदेव बहुत ही शूरवीर योद्धा था। विरमदेव की शोहरत और व्यक्तित्व के बारे में सुनकर दिल्ली के तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा (सताई) का दिल विरमदेव पर आ गया और शहजादी ने किसी भी कीमत पर विरमदेव से शादी करने की जिद पकड़ ली और कहने लगी, “वर वरूं विरमदेव ना तो रहूंगी अकन कुँवारी” (शादी करुँगी तो विरमदेव से नहीं तो अक्षत कुँवारी रहूंगी)… बेटी की जिद, पूर्व में हुई अपनी हार का बदला लेने के लिए और अपना राजनैतिक फ़ायदा देखकर अल्लाउद्दीन खिलजी ने प्रणय प्रस्ताव भेजा लेकिन विरमदेव ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया-
“मामो लाजे भाटियां, कुल लाजे चौहान,
जे मैं परणु तुरकणी, तो पश्चिम उगे भान…”
(अगर मैं तुरकणी से शादी करूँ तो मामा भाटी कुल और चौहान कुल लज्जित हो जाएंगे और ऐसा तभी होसकता है जब सूरज पश्चिम से उगे)

इस जवाब से आगबबूला होकर अल्लाउद्दीन ने युद्ध का ऐलान कर दिया। कहते हैं कि एक वर्ष तक तुर्कों की सेना जालौर पर घेरा डाल कर बैठी रही फिर युद्ध हुआ और किले की राजपूतानियों ने जौहर किया। स्वयं विरमदेव ने 22 वर्ष की अल्पायु में ही केसरिया बाना पहन वीरगति पाई। तुर्की सेना विरमदेव का मस्तक दिल्ली ले गई और शहजादी के सामने रख दिया। कहते हैं कि शहजादी ने मस्तक से शादी की बात कही तो थाली में रखा मस्तक पलट गया, लेकिन शहजादी अडिग थी की शादी करुँगी तो विरमदेव से नहीं तो कुंवारी मर जाउंगी। अंततः शहजादी फिरोजा ने उनके मस्तक का अग्नि संस्कार कर ख़ुद अपनी माँ से आज्ञा प्राप्त कर यमुना नदी के जल में प्रविष्ट हो सती हो गई।

कैसी है कहानी…? बनाओ फिल्म अगर हिम्मत है तो… नहीं तो ‘तोफा क़ुबूल’ करवाओ। और एक बात राजस्थान के बारे में याद रहनी चाहिए।

जोहर री जागी आग अठै,
रळ मिलग्या राग विराग अठै,
तलवार उगी रण खेतां में,
इतिहास मंडयोड़ा रेता में…

बोस-डीके ये राजस्थान है, राजस्थान… जहां हाथ डालेगा जौहर और केसरिया की दास्तानें मिलेंगी… औकात होनी चाहिए सच दिखाने की।

 

नाथूराम गोडसे की भी पृष्‍ठभूमि जान लीजिए

मुकेश पंडित

संयोग कहें या विडंबना, महाभारत में भीष्म को ‘पितामह’ कहा गया है और भारत ने गांधी को अपना ‘राष्ट्रपिता’ माना है। जिस तरह भीष्म को मारने के लिए शिखंडी का इस्तेमाल किया गया था, क्या उसी तरह गांधी को मारने वाली सोच ने लडकियों की तरह पले हुए नाथूराम का इस्तेमाल किया था? क्योंकि नाथूराम नाम की भी एक कथा है। उसके जन्म पर किसी पंडित ने उसके मां-बाप को सलाह दी थी कि उसे लड़कियों की तरह पाला जाए वरना वह बचेगा नहीं। इस वजह से नाथूराम की परवरिश लड़कियों की तरह की गई। ऐसा करते समय उसे नाक में नथ भी पहनाई गई,  जिस वजह से उसका नाम नाथूराम हो गया। जनवरी, 1948 में गांधी जी की हत्या की दो कोशिशें हुई थीं। पहली बार मदनलाल पाहवा ने 20 जनवरी को उन्हें मारने की साजिश रची। दूसरी कोशिश 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे ने की थी जो सफल रही थी।

गांधी जी की हत्या के मामले में आठ आरोपी थे,  नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे,  नारायण आप्टे,  विष्णु करकरे,  मदनलाल पाहवा, शंकर किष्टैया, विनायक दामोदर सावरकर और दत्तात्रेय परचुरे। इस गुट का नौवां सदस्य दिगंबर रामचंद्र बडगे था, जो सरकारी गवाह बन गया था। ये सब आरएसएस या हिंदू महासभा या हिंदू राष्ट्र दल से जुड़े हुए थे। अदालत में दी गई रामचंद्र बडगे की गवाही के आधार पर ही सावरकर का नाम इस मामले से जुड़ा था और गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा और आरएसएस पर प्रतिबंध लग गया था। हालांकि यह आश्चर्यजनक है कि गांधी की हत्या के लगभग 28 दिन के अंदर सरदार वल्लभ भाई पटेल इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे कि आरएसएस इस हत्या के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। इसी आधार पर संघ समर्थक पटेल को अपना मानते हैं।

पर पटेल की गांधीजी के प्रति आस्था असंदिग्ध थी। उन्होंने 27 फ़रवरी 1948  में पंडित जवाहार लाल नेहरू को पत्र लिखा था,  जिसका सार था कि आरएसएस नहीं,  बल्कि विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व वाली हिंदू महासभा गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र की ज़िम्मेदार है। उन्होंने यह भी लिखा था, ‘यह सत्य है कि आरएसएस और हिंदू महासभा ने गांधी की हत्या पर मिठाई बांटी थी क्योंकि ये दोनों संगठन उनके विचारों से असहमत थे पर आरएसएस या हिंदू महासभा के किसी अन्य सदस्य का हाथ इसमें नहीं है। हालांरकि 1964  में तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने गांधी की हत्या की जांच के लिए पाठक कमीशन,  जो बाद में कपूर कमीशन कहलाया, उसका गठन किया था। जांच के बाद कपूर कमीशन ने अनेक सवाल उठाए,  जो गांधीजी की हत्या के संदेह के दायरे को घना और गहरा बनाने के लिए काफी हैं।….

तो 2019 तक बंद हो जाएंगे अखबार

मुकेश वत्स, नई दिल्ली।

आपने नहीं जाना? तो नोट करें तथ्य- पिछले चार महीनों में कोई दो हजार अखबारों को केंद्र सरकार के डीएवीपी ने विज्ञापन के लिए अमान्य किया है। संसद में बिना पीआरबी एक्ट बदले, उसमें बिना संशोधन लाए सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने अखबारों को ऐसे नए नियमों-कायदों-फंदो में फांसा है कि वे घुट कर अपने आप दम तोड़ेंगे। भारत सरकार ने याकि मोदी के पीएमओ ने जून से लेकर इस दिसंबर तक चुपचाप कार्रवाई का जो खांका बनाया है उसमें इस साल का इरादा 8 हजार अखबारों में से 4 हजार अखबारों को अमान्य बनाना है। साथ ही अखबार मालिकों पर फर्जीवाड़े की, हर साल दस तरह के चक्कर लगवाने की तलवार लटका दी है। अखबार मालिकों को रजिस्ट्रार, न्यूजपेपर के यहा सर्क्युलेकशन का प्रमाणीकरण कराने को मजबूर किया है। मतलब सरकारी दफ्तर और ‘गांधीजी’! देश के हर प्रकाशक-संपादक को हर महीने सरकारी दफ्तर में टोकन ले कर अखबार की फाईल सबमिट करनी पड़ रही है।

यदि वह वहां पटा कर चला या रिश्वत दी तो ठीक नहीं तो भारत सरकार के दिल्ली के डीएवीपी दफ्तर में रिपोर्ट पहुंचेगी कि पिछले महीने अखबार पूरे नहीं थे या सही नहीं छपे। इस रिपोर्ट से फिर तय होगा कि इस अखबार को आगे विज्ञापन देना है या नहीं! रिपोर्ट यदि नहीं भेजी, या यदि यह लिख कर आया कि अखबार ठीक नहीं है तो विज्ञापन मिलना बंद। इसमें यों नियमितता की कसौटी बहाना है। मगर आश्चर्य नहीं कि जैसे पिछले छह महीनों में चुपचाप एक के बाद एक सिकंजा कसा है वैसे आगे अखबार को ले कर यह रिपोर्ट बनने लगे कि नरेंद्र मोदी और राष्ट्रहित की खबरों में अखबार से कोई चूक तो नहीं है? अखबार सरकार विरोधी है या पक्ष का?

यह काम चुपचाप होगा। इसलिए कि सरकारी दफ्तर में बनी, या वहां से भेजी गई मासिक रिपोर्ट की जानकारी प्रकाशक को देने के लिए सरकार या पीआईबी बाध्य नहीं है। अखबार मालिक लगातार परेशानी में रहेगा। पता नहीं क्या रिपोर्ट गई, अफसर ने अखबार को कैसे जांचा? आगे विज्ञापन मिलता है या नहीं?

क्या ऐसा इमरजेंसी में हुआ? क्या यह अखबार-प्रकाशक, संपादक, पत्रकार और मीडिया का गला घोटना नहीं है? अखबार प्रकाशक, संपादक को विज्ञापन के लिए, अपने अस्तित्व के लिए ऐसे लाईन हाजिर रखने का बंदोबस्त तो इमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने भी नहीं किया था? विद्याचरण शुक्ल ने भी सूचना मंत्री रहते पीआईबी, डीएवीपी से डंडा चलाने का ऐसा खौफ पैदा नहीं किया जैसा आज नरेंद्र मोदी, उनके दफ्तर और उनके पूर्व सूचना मंत्री अरुण जेटली ने करवा कर दम लिया है!

इमरजेंसी में खबर पर रोक थी। मगर अखबार बंद कराने, प्रेस और पत्रकारों को अमान्य कराने, मीडिया को ही खत्म करने के संस्थागत काम नहीं हुए थे लेकिन नरेंद्र मोदी, उनके प्रधानमंत्री दफ्तर में बैठे जगदीश ठक्कर और गुजरात से आए मीडिया प्रबंधकों ने अरुण जेटली की सहमति से जून-जुलाई में अखबारों को, प्रेस को खत्म करने का जो चाक चौबंद बंदोबस्त किया है यदि उसका प्रतिकार नहीं हुआ, तो लिख कर रखें कि 2019 के आते-आते देश में डीएवीपी के 8 हजार में से 7000-7500 हजार अखबार बंद होंगे और जो 500 बचेंगे वे वैसे बड़े अखबार होंगे जिनकी खुद की प्रिंटिग प्रेस है और जिनके मालिकों को प्रधानमंत्री निवास बुलाकर हड़काया जा सकता है।

पर उस सिनेरिया पर बाद में। फिलहाल सरकार की बनाई व्यवस्था पर गौर करें। इसमें हर अखबार, हर प्रकाशक-संपादक को सरकार के आगे नाक रगड़ना है। जान लें कि दुनिया के किसी भी लौकतंत्र में सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह हर महीने अखबार का रिकार्ड तलब करें। सरकार, सरकारी विभाग से सर्क्युलेशन चैक कराए। हर महीने अधिकारी अखबार को जांच करके रिपोर्ट भेजे कि अखबार छपा या नहीं, सही है या नहीं! दुनिया के किसी लौकतंत्र में ( अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी की बात तो दूर पाकिस्तान में भी) यह खोजने पर मालूम नहीं हुआ कि सरकार ने विज्ञापन के बहाने, अखबार के प्रसार को जंचवाने, उसकी नियमितता पर नजर रखने के लिए सरकारी बाबूओं की दुकानदारी लगवा रखी है। विकसित लौकतंत्र में सबकुछ प्रोफेशनल बॉडीज काम करती है।

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में अफसर सेंसर अधिकारी बन कर खबर पर निगरानी रखते थे। अखबार में खबर रोकते थे मगर अखबार को बंद कराने, खत्म करने के जतन नहीं थे। मगर नरेंद्र मोदी और उनका सेटअप क्योंकि गुजराती धंधे की तासीर लिए हुए है इसलिए उसने इमरजेंसी से भी अधिक प्रभावी तरीका, नुस्खा पेट पर लात मारने का अपनाया है। इस नुस्खे के तीन उद्देश्य है- 1- छोटे और मध्यम श्रेणी के अखबारों की भीड़ खत्म हो। 2- इनको खत्म करके इनके हिस्से के बचे सरकारी विज्ञापनों को 50-60 बड़े अखबारों में बांटे। जब संख्या कम होगी, तो पैसे का बंटवारा ज्यादा होगा और मालिकों को मैनेज करना भी आसान। 3- फिर अखबारों की भीड़ से आज शहर-गांव, राजधानी में पत्रकारों की जो मान्यता प्राप्त भीड़ है उसे मिटाना तीसरा मकसद है।

अभी यदि 2 हजार अखबार डीएवीपी ने विज्ञापन देने की लिस्ट से बाहर निकाले हैं और मार्च तक हजार-दो हजार और अमान्य होंगे तो आगे ये राज्यों में भी अमान्य होंगे। फिर उससे संपादकों-पत्रकारों की मान्यता भी रद्द होगी। भारत सरकार के पीआईबी और राज्यों के डीपीआरओ में मान्यताप्राप्त पत्रकारों की आज जो हजारों की संख्या है वह सैकड़ों में सिमटेगी।

इन तीन उद्देश्यों पर पीएमओ ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय से 7 जून 2016 को आदेश संख्या एम-24013/90/2015-एमयूसी के जरिए नई विज्ञापन नीति घोषित कराई। हिसाब से यदि नई नीति बननी थी तो सभी स्टेकहोल्डर से बात करनी थी। ड्राफ्ट पर सार्वजनिक बहस करानी थी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। सीधे आदेश हुआ और अखबारों को नई नीति के अनुसार अपनी मान्यता, अपना विज्ञापन बचाने के लिए दौड़ा दिया।

ध्यान रहे भारत के अखबार संसद से पास पीआरबी एक्ट से नियंत्रित है। इस एक्ट और उसके बाद बने नियम में जो लिखा है वही कानून है। लेकिन इस सरकार ने बिना संसद में संशोधन या दुबारा कानून बनाए ही अखबार मालिको, प्रेस पर ऐसे नए नियम थौपे हंै जो सौ फीसद गैर-कानूनी बनते हैं। जैसे प्रिंटिग प्रेस को लेकर अखबार के लिए नियम है कि वह अपनी प्रेस का घोषणापत्र डीएम के आगे एक बार दे। उसका फिर अखबार के घोषणापत्र में जिक्र और प्रूफ हो। ऐसे ही प्रकाशक को सामान्य डाक से अखबार की छपी प्रति आरएनआई को भेजने का नियम है। फिर साल में एक बार अखबार के प्रसार का सालाना रिटर्न भरना होता है। इस कानून, नियम व्यवस्था के संचालन की संस्था का नाम है आरएनआई।

इस एक्ट व कायदे में अंग्रेजों के वक्त से ले कर इस पंद्रह अगस्त तक भारत के अखबार फले-फूले हुए थे। मगर मोदी सरकार ने बिना कानून बदले डीएवीपी (जिसका पीआरबी एक्ट से मतलब नहीं है) की नई विज्ञापन नीति बनवा कर प्रकाशक को इस बात के लिए मजबूर किया है कि वह अखबार की पूरी फाइल ले कर अखबार की नियमितत्ता, क्वालिटी, देश हित में होने या न होने की जांच कराने के लिए राज्य राजधानी या दिल्ली जा कर खुद सबमिट करें। और वह भी हर महीने। दूसरा यह कि वह प्रिंटिग प्रेस का तकनिकी ब्यौरा देते हुए प्रिंटर से उसकी तरफ से एफिडेविट दिलवाए कि वह उस अखबार की प्रतिदिन कितनी कॉपियां छाप रहा है तभी अखबार विज्ञापन के लिए रिन्यू होगा।

घ्यान रहे पीआरबी एक्ट में प्रेस क्या, कैसा, किस-किस अखबार को वह छापता है, किसकी कितनी प्रतियां छापने की जानकारी देने का कहीं कोई उल्लेख-नियम नहीं है। अंग्रेजों के वक्त भी व्यवस्था सिर्फ यह थी कि जिसे अखबार छापना है वह उसकी और प्रिंटिग प्रेस होने की दो घोषणाएं डीएम के सामने एक बार कर दे। तब गणेशशंकर विद्यार्थी अपने छोटे अखबार के फर्रे को प्रमाणित करने के लिए, सबमिट करने के लिए अंग्रेज डीएम के आगे हर महीने चक्कर नहीं लगाते थे। इसलिए कि अंग्रेज ब्रिटेन के लौकतंत्र को फोलो करते थे और जान ले ब्रिटेन में आज भी अखबार और उसकी विज्ञापन नीति में एक भी वह बात नहीं है जिसे मोदी के पीएमओ ने पिछले छह महीनों में बिना कानून संशोधन और बहस के बनवा दिया है।

क्यों? क्योंकि मोदी और उनके पीएमओ में गुजरात से आया स्टॉफ बारह साल यह भुगतता रहा कि अखबारों ने उन्हंे बहुत तंग किया। ये सोचते हंै कि अखबार के नाम पर सब ब्लेकमेलर हैं। फर्जी पत्रकार और उनका फर्जीवाड़ा है। कुकुरमुत्तों की तरह अखबार और पत्रकार उग आए हंै। यह ऐसी कांग्रेसी घास है जिसे जड़ से उखाड़ फेंकना है। तभी आज सचमुच गणेश शंकर विद्यार्थी की विरासत के छोटे फर्रे अखबारों के पेट पर लात मार कर, उनके गले में फंदे डाल उन्हे बंद करने का रोडमैप है। इससे अंग्रेजों के वक्त में भी सत्ता के प्यारे रहे टाईम्स आफ इंडिया जैसे हाथी अखबारों के एकाधिकार की कमाई को चार चांद लगेंगे। सरकार का मीडिया मेनेजमेंट आसान बनेगा। आखिर टाइम्स जैसे 30-40 अखबारों के विनित जैनों को पीएम हाउस बुलाकर मैनेज करना आसान है। पदम भूषण दे कर, विज्ञापन दे कर इन मालिकों को गुलाम बनाना चुटकी का काम है। मतलब भारत की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार को गणेश शंकर विद्यार्थी नहीं टाइम्स समूह के विनित जैन चाहिए। तभी अगले ढाई साल में असंख्य छोटे, मध्यम अखबार और मान्यता प्राप्त पत्रकार सिसकते हुए मरेंगे।

सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत

श्रीकांत सिंह

समाज में सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत है। सेना के एक सिपाही का वीडियो बना कर उसे वायरल कर देना; खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपने पर मुंबई के विले पार्ले स्थित खादी भंडार के कर्मचारियों का विरोध करना और बाहर आकर प्रदर्शन भी करना; भारतीय रिज़र्व बैंक के कर्मचारियों का भी गवर्नर उर्जित पटेल को पत्र लिखकर संस्थान की स्वायत्तता और गरिमा से खिलवाड़ न होने देने के लिए आगाह करना आदि ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि लोग संस्‍थानों की मनमर्जी सहने के लिए अब तैयार नहीं हैं। उसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।

कुछ इसी तरह की मनमर्जी का विरोध मीडिया संस्‍थानों खासतौर पर प्रिंट मीडिया में हुआ है। अखबार मालिक इन दिनों बिचौलियों पर अपनी मुनाफाखोरी लाद रहे थे, जिसके विरोध में लोगों ने नौकरियां छोड़ी तो तमाम लोग मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों का क्रियान्‍वयन न किए जाने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन किए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। जाहिर है कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति संजीदा है। इसलिए भय दिखाकर शासन करने वालों को अब चिंतित हो जाना चाहिए।

प्रिट मीडिया की एक चिंता रही है कि आने वाले दिनों में कागज की किल्‍लत की वजह से मीडिया का प्रिंट स्‍वरूप समाप्‍त हो जाएगा। लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ी चिंता का विषय उनका यह अहंकार है कि वे ही जनमत तैयार करते हैं। आपको बता दें कि ज्‍यादातर लोग अखबार नहीं पढ़ते। ऐसे लोगों की संख्‍या कम नहीं है जो टीवी भी नहीं देखते। लेकिन ये मीडिया संस्‍थान सरकार और नेताओं पर अपनी धौंस जमाते रहते हैं, क्‍योंकि वहीं से इनकी मुनाफाखोरी का रास्‍ता निकलता है।

हमारे देश की संस्‍थाएं मीडिया घरानों की कुछ इस तरह से गुलाम हैं कि वर्षों बीत गए, लेकिन प्रिंट मीडिया के पीडि़तों को न्‍याय नहीं मिल सका। आगे भी न्‍याय में देरी करने की प्रवृत्ति जारी है। यह प्रवृति इतनी घातक है कि लोगों का न्‍यायपालिका से भी विश्‍वास उठता जा रहा है। सरकार है कि उसे इसकी कोई चिंता ही नहीं है। इसलिए वह दिन दूर नहीं जब लोग न्‍यायपालिका का भी सम्‍मान करना बंद कर देंगे। यह बहुत ही घातक स्थिति होगी, क्‍योंकि लोग त्‍वरित न्‍याय के लिए खुद ही निपटना शुरू कर देंगे।

कानून का राज बनाए रखने के लिए न्‍यायपालिका को अपने कर्तव्‍यों के प्रति संजीदा होना होगा। कितनी अजीब बात है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश का उल्‍लंघन सहना पड़ रहा है। पता कीजिए कि यह सब कौन करा रहा है; क्‍यों करा रहा है; क्‍या परिणाम होगा इसका। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मजीठिया मामले को पेंडिंग में डाल दिया गया है। आखिर क्‍यों… क्‍या अखबारों में काम कर रहे लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है कि वे इतना लंबा इंतजार कर पाएंगे। मानवीय आधार पर सुप्रीम कोर्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्‍योंकि लोग अब भयभीत रहने के लिए राजी नहीं हैं। डर के आगे जीत का रहस्‍य लोग समझ गए हैं।

मोदी ने भारत को 1970 के दशक में धकेल दिया

नोटबंदी पर लिखा पत्रकार बरखा दत्त का लेख हुआ वायरल

जनता का रिपोर्टर से साभार

पत्रकार बरखा दत्त ने वॉशिंगटन पोस्ट में एक लेख लिखा है। बरखा दत्त के मुताबिक, बीजेपी के मार्केटिंग कंसलटेंट सुनील अलघ ने कहा, भारत में कुछ ज्यादा ही डेमॉक्रेसी है, इसलिए मुश्किल फैसले नहीं लिए जाते। उनका यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले पर आया था।

नोटबंदी और इससे उपजी परेशानी पर बरखा अपना विशेलेषण करते हुए लिखती है कि पीएम मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट अमान्य कर दिए। एेसे देश में जहां करीब 90 प्रतिशत ट्रांजेक्शंस कैश में होती हैं, वहां सिर्फ 4 घंटों पहले यह सूचना दी गई थी। इसका मकसद था कि टैक्स चोर को समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं उसे खत्म करना। लेकिन खराब संपर्क और प्लानिंग के कारण लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ा।

इसके बाद बरखा 1971 को याद करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषण और पीएम मोदी के भाषण में सामान्तर विषय पर बात करते हुए कहती है कि नरेंद्र मोदी का नोटबंदी फैसला और केंद्र के पास सारी ताकत कई मायनों में 1970 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाता है। नरेंद्र मोदी का यह नोटबंदी का फैसला 1969 में इंदिरा द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के जैसा ही है।

मोदी ने नए साल की पूर्व संध्या पर जो भाषण दिया था, उसमें कुछ नारे इंदिरा के 1971 में दिए गए नारों जैसा था। उस समय इंदिरा ने कहा था, वह कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने कहा, वह कहते हैं मोदी को हटाओ, मैं कहता हूं भ्रष्टाचार हटाओ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बरखा लिखती हैं कि नरेंद्र मोदी ने 50 दिन मांगे थे, लेकिन 2 महीने बीत जाने के बाद हमें पूछना चाहिए कि आखिर इस फैसले से हासिल क्या हुआ। अॉल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ने कहा कि राजस्व में 50 प्रतिशत और लघु उद्योगों की नौकरियों में 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी से जो लक्ष्य हासिल किया जाना था वह तो अब साफ नहीं हुआ। अगर मसकद सिस्टम से काला धन हटाना था तो वह भी नहीं हुआ। सिर्फ 6 से 10 प्रतिशत पैसा ही काले धन के रूप में सामने आया। दूसरी चीज सारे बंद हुए नोट वापस सिस्टम में आ गए।