अभी जीएसटी लागू ही नहीं हुआ तो दाम कैसे घट बढ़ सकते ?

श्रीकांत सिंह।

खबरों में जब भक्ति आ जाती है तो पत्रकारिता का कबाड़ा निकल जाता है। अभी जीएसटी लागू नहीं हुआ है, लेकिन हमारे देश के डिजिटल पत्रकार वस्‍तुओं के दाम घटाने बढ़ाने में लग गए हैं। उनके कारनामे समय समय पर सामने आते रहते हैं। कभी उन्‍हें दो हजार के नोट में चिप नजर आ जाती है तो कभी भारतीय सेना पाकिस्‍तान के सैनिक को मार कर आ जाती है। भारतीय सेना जब उसका खंडन करती है तो उनकी खबरों की भद्द पिट जाती है। कभी कभी तो वे लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे डलवा देते हैं।

पहले तो आल्‍हा में आल्‍हा ऊदल की बहादुरी का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन होता था, लेकिन अब न्‍यूज चैनल आल्‍हा गाने पर उतर आए हैं। सेना की तोपों को लेकर ये भारतीय सेना की बहादुरी का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, जैसे पत्रकारिता में वीर गाथा काल आ गया हो। आप इस लिंक पर क्लिक कर देखें किस प्रकार खबरों का कबाड़ा बनाया जा रहा है।

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तभी तो मीडिया को कहा जाता है पालतू

श्रीकांत सिंह।

गूगल समाचार पर मंगलवार को एक ऐसी खबर चली जिसने मीडिया जगत को शर्मसार कर दिया। हालांकि बाद में इस खबर को सुधार लिया गया। खबर यह थी कि राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके नजदीकियों के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छोपेमारी की, लेकिन इस खबर को कुछ इस तरह से चलाया गया कि लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे।

इस पर लालू ने तपाक से ट्वीट कर दिया कि हमारे वे 22 ठिकाने गिनाओ। लालू का वह ट्वीट यहां दिया जा रहा है, जो मीडिया की भद्द पीटने के लिए काफी है।

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दूर से ही दिखने लगा है राजनीतिक संकट

श्रीकांत सिंह

हिंदुओं की एकता के नाम पर बडी मुश्किल से देश की जनता एकजुट हुई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी मिलकर उसी जनता का भरोसा तोड रहे हैं। गरीबों की गैस सब्सिडी बंद है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इंडियन ऑयल और पीएमओ तक शिकायत करने का कोई असर नहीं हो रहा है। दिल्‍ली और यूपी में मेट्रो ट्रेन के किराये में बेतहासा इजाफा किया जा रहा है। यही तो एक जनहितकारी और पर्यावरण को अनुकूल बनाने वाली व्‍यवस्‍था थी, जिसे धंधे पर लगाया जा रहा है। मेट्रो के किराये में एकायक इतना इजाफा कर दिया गया है कि अब हालत यह है कि लोग अपनी कार सडकों पर लाने की सोचने लगे हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत का भी कोई लाभ जनता को नहीं मिल रहा है। पुलिस आज भी लोगों के एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। कानून व्‍यवस्‍था की हालत खराब है। सरकार मजदूरों की नहीं, मालिकों की बात सुन रही है। लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं है। सरकार सोच रही है कि विपक्ष तो समाप्‍त ही हो गया और मीडिया पालतू हो गया है। अब चाहे कोई काम करें या नहीं, अकंटक राज करेंगे।

ऐसा सोचना सरकार और भाजपा दोनों के लिए आत्‍मघाती होगा। अब यदि जनता का भरोसा टूट गया तो जनता मान लेगी कि तिकडम से उसे मूर्ख बनाया गया है। ऐसी हालत में क्षेत्रीय दलों का उदय फिर होने लगेगा और किसी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में आक्रोश का माहौल बनने लगा है। राजनीतिक संकट दूर से ही दिखाई पडने लगा है।

हम वह समूह हैं जो यशोगान करने वाले मीडिया को 4th pillar का हिस्‍सा नहीं मानते

आज हम आपको 4th pillar के बारे में एक खास बात बताना चाहते हैं। आपने जिस उत्‍साह के साथ खबरें शेयर की, उससे यही पता लगता है कि आप लीक से हटकर कुछ व्‍यक्‍त करना चाहते हैं। लेकिन सिर्फ खबरें शेयर करने से लीक से हटकर कुछ होने वाला नहीं है। सीधे-सीधे खबरें शेयर करके आप वही कर रहे हैं, जो मीडिया जगत की कचरा टीम कर रही है। हमारा काम किसी भी सरकार का यशोगान करना नहीं है। दुर्भाग्‍य से जिसे हम मीडिया कहते हैं, उसके अधिकतर घटक यशोगान में ही लगे रहते हैं। हम वह समूह हैं जो यशोगान करने वाले मीडिया को 4th pillar का हिस्‍सा नहीं मानते। हमें तो ऐसे समाचारों का विश्‍लेषण शेयर करना है, जिनके जरिये मीडिया ने खुदगर्जी दिखाई है, स्‍वार्थ साधा है और आम जनता का बहुत ही नुकसान किया है। इस ग्रुप की गंभीरता को न समझ पाने के कारण कुछ लोग ग्रुप से चले गए और कुछ को हटाना आवश्यक हो गया। अरे भाई हम चुनाव में नहीं जा रहे हैं कि हमें समर्थकों की कोई जरूरत है। हम तो विरले लोग हैं जो दीन दुनिया की फिक्र करते हैं। इससे हमें कोई लाभ नहीं होने वाला है। हम यह सब इसलिए कर रहे हैं कि उससे आत्‍मसंतोष मिलता है। क्‍योंकि-जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान। अगर हमने कुछ लीक से हटकर न किया तो हमारी पहचान लुप्‍त हो जाएगी। हम धूल में मिल जाएंगे। और इस दुनिया में इस बात को कोई प्रमाण ही नहीं बचेगा कि हम पैदा भी हुए थे। इसलिए आज हमें संकल्‍प लेना चाहिए कि हम उन्‍हीं बातों को शेयर करेंगे जो मीडिया की खुदगर्जी की पोल खोलती हों। मीडिया में ऐसी खबरों का अंबार लगा होता है, जिनकी हम आसानी से पोल खोल सकते हैं। बस जरूरत है एक नए दृष्टिकोण की। आशा है आप सहयोग बनाए रखेंगे और इस मंच पर कुछ नया कर दिखाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

नई दिल्‍ली।

सुप्रीम कोर्ट में पिछले तीन वर्षों से चल रही मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले में सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई और अदालत ने अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। हालांकि कोर्ट ने फैसला सुनाने की तारीख अभी तय नहीं की है, लेकिन सुनवाई के मौके पर अदालत में उपस्थित अखबार कर्मचारियों के जोश और उत्‍साह से एक सकारात्‍मक संकेत जरूर मिल रहा है।

दोनों पक्षों, मीडिया संस्थानों और अखबारों के पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर जारी सुनवाई पूरी होने की घोषणा कर दी और कहा कि फैसले को सुरक्षित रख लिया गया है।

पत्रकारों-गैरपत्रकारों की ओर से केस की पैरवी कर रहे एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विश, उमेश शर्मा व परमानंद पाण्डे  एवं याचिकाकर्ताओं के अन्‍य वकीलों ने अदालत में दलील दी और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी देश भर के ज्‍यादातर अखबार मालिक अपने पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों को वेजबोर्ड के अनुरूप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। उलटे वेजबोर्ड के अनुसार वेतन की मांग करने वाले कर्मचारियों को टर्मिनेट, संस्पेंड और ट्रांसफर करके परेशान किया जा रहा है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने,  मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और परेशान किए गए कर्मचारियों को राहत दिलाने की गुहार लगाई है।

मीडिया संस्थानों का पक्ष रखने वाले वकीलों ने मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधान 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी स्वेच्छा से बेजबोर्ड के अनुसार वेतन न लेने की लिखित सहमति दे चुके हैं। मीडिया संस्थानों ने न तो कोई अवमानना की है और न ही कर्मचारियों पर दबाव बना कर उन्‍हें परेशान किया है।

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई पूरी होने की घोषणा की और फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया। सुनवाई के मौके पर देश भर से बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

यह है मामला

देश भर के अखबारों में कार्यरत पत्रकारों और गैरपत्रकारों का वेतनमान तय करने के लिए 2008 में जस्टिस जेआर मजीठिया की अध्‍यक्षता में गठित मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधानों को अखबार मालिकों ने लागू नहीं किया और उलटे उसकी संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए जहां उन्‍हें बुरी तरह हारना पड़ा। 7 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश कर्मचारियों के पक्ष में आ गया। मगर अदालत के आदेश के बावजूद ज्‍यादातर अखबार मालिकों ने वेजबोर्ड को लागू नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर अपने कर्मचारियों को परेशान करना शुरू कर दिया। अंतत: अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का मामला दायर कर दिया। अदालत की अवमानना मामले में पहला और प्रमुख मामला अवमानना वाद (सिविल) 411/2014 शोषण करने वालों के सिरमौर अखबार दैनिक जागरण के खिलाफ अभिषेक राजा एवं अन्‍य बनाम संजय गुप्‍ता दायर हुआ। उसके बाद तो सुप्रीम कोर्ट में अवमानना मामलों की भरमार लग गई और देश भर के करीब छह हजार अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पत्रकार व गैरपत्रकार कर्मियों को वेतनमान,  एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ जो लाखों रुपये में बनता है, देने के आदेश पहले ही दिए जा चुके हैं। लेकिन अखबार मालिक तमाम तिकड़मों के सहारे इस आदेश का पालन करने से बचते रहे। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका,  दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण,  अमर उजाला,  हिन्दुस्तान टाइम्स,  नवभारत टाइम्स,  पंजाब केसरी जैसे सैकड़ों अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया है। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए। जिन कर्मचारियों ने उनकी बात नहीं मानी, उन्‍हें स्थानांतरित और बर्खास्‍त करके परेशान किया गया। इस कानूनी लड़ाई में देश भर के हजारों अखबार कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। उम्‍मीद है कि अब उन्‍हें जल्‍द ही राहत मिलेगी।

नारद मोह के घेरे में पत्रकारिता

श्रीकांत सिंह

नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।

मजीठिया अवमानना मामला सुप्रीम कोर्ट में लटक गया है। कुछ अखबारों की आरसी कट रही है, लेकिन दैनिक जागरण का मालिक छुट्टा घूम रहा है। बदहाल पत्रकारों की परवाह सुप्रीम कोर्ट को तो है ही नहीं। एकाध को छोड बाकी सुप्रीम कोर्ट के सभी वकील मस्त हैं। मामले को सुप्रीम कोर्ट में मेंशन करने की कोई जुर्रत तक नहीं कर रहा है। डर है कि कहीं जज साहब डांट कर भ्गा न दें।

तभी तो शरद यादव कहते हैं कि आज के दौर में पत्रकारिता की शवयात्रा निकाली जा रही है। लोकतंत्र चंद लालाओं की मुट्ठी में कैद है। खुश होकर तालियां बजाओ। मोदी जी का साम्राज्य बढता जा रहा है। राम राज्य नजदीक आ गया है। यह अलग बात है कि नारद नारायण की चौखट पर दम तोड रहे हैं। पत्रकारिता को नारद मोह ने घेर रखा है। देखते जाइए कि नारद मोह का क्या परिणाम होता है।

चिंता में डाल गए शरद यादव के अमृत वचन

श्रीकांत सिंह

पत्रकारिता जिस तेजी से पालतू हो रही है, उस पर उतनी तेजी से चिंता नहीं जताई जा रही है। समाज और देश दुनिया के लिए फिक्रमंद माने जाने वाले पत्रकारों की नई पीढी से ज्यादा उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि उसका रास्ता खुदगर्जी के टी-प्वाइंट पर बंद होता है। मेरे पास भी व्यावहारिक होने के दबावपूर्ण सुझाव आ रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्यों खुदगर्जी गले से नीचे नहीं उतर पा रही है।

इसी माहौल में पत्रकारिता पर जदयू नेता शरद यादव के अमृत वचन कानों में मधु घोल गए। उनकी तारीफ करनी ही पडेगी। इसलिए नहीं कि वह उस मजीठिया वेजबोर्ड की वकालत करते नजर आए, जिसका लाभ मुझे भी मिलना है। इसलिए भी कि वह चुनाव सुधार और लोकतंत्र पर मडरा रहे संकट की ओर भी इशारा कर गए हैं।

पत्रकारों के लिए गठित होने वाला वेजबोर्ड एक वर्ग विशेष के लिए राहत का पैकेज मात्र नहीं माना जाना चाहिए। यह तो लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक कवच भी है। यह पत्रकारिता और पत्रकार को पालतू बनने से बचा सकता है। इसलिए पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड एक तरह से समूचे समाज के लिए राहत का पैकेज है। ऐसा समझ कर समाज का हर वर्ग पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन दिए जाने के समर्थन में आगे नहीं आएगा तो यह तय है कि हम एक दूसरे तरह की गुलामी की जंजीर में जकड लिए जाएंगे।