पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश

मजीठिया वेतनमान लागू करके देश की सभी समस्‍याओं का समाधान किया जा सकता है। पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश लंबे समय से चली आ रही है। उन्‍हें आज तक कोई भी वेतनमान नहीं दिया गया। यही वजह है कि टुच्‍चे टुच्‍चे लोग पत्रकारों को अपने हिसाब से घुमा लेते हैं। और जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अखबार के मालिकों और सरकारों का गठजोड़ लंबे समय से चला आ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गठजोड़ को शिखर पर पहुंचा दिया है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट से भी पत्रकारों को न्‍याय नहीं मिल पा रहा है। सरकार यदि इच्‍छा शक्ति का उचित प्रदर्शन करती तो पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान कब का मिल गया होता और उन्‍हें सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर नाक न रगड़नी पड़ती। अब आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री इसमें क्‍या कर सकते हैं… कानून की बात करें तो जो मुझे मोटामोटी जानकारी है, उसके अनुसार जो व्‍यवस्‍था अखबार मालिकों के लिए सरकारी विज्ञापन और कोटे के कागज की व्‍यवस्‍था करती है, उसी व्‍यवस्‍था में पत्रकारों के लिए वेतनमान की भी व्‍यवस्‍था है।

इस व्‍यवस्‍था को अव्‍यवस्थित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अखबार मालिकों के साथ खड़े नजर आते हैं। वह बिजली के लिए तो ईद, दीपावली और होली की चर्चा करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि मजीठिया वेतनमान हिंदू पत्रकार को चाहिए तो मुसलिम पत्रकार को भी। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो जाएं तो इन राजनीतिबाजों के होश ठिकाने लग जाएंगे। स्‍वच्‍छ पत्रकारिता और स्‍वच्‍छ राजनीति के लिए मजीठिया वेतनमान का लागू होना जरूरी है। उसके लिए सरकार अखबार मालिकों का सरकारी विज्ञापन और कोटे का कागज बंद करके उन्‍हें रास्‍ते पर ला सकती है। जब तक अखबार मालिकों को रास्‍ते पर नहीं लाया जाएगा, समाज और देश के विकास की कल्‍पना तक नहीं की जा सकती।

सारे भ्रष्‍टाचार और अपराधों की जड़ में कहीं न कहीं अखबार मालिकों की मनमानी काम करती है। क्‍योंकि उन्‍होंने पत्रकारिता को कुंद बना दिया है। उम्‍मीद है कि मोदी जी इस दिशा में अवश्‍य इच्‍छाशक्ति दिखाएंगे। महिमामंडन के मोह में उन्‍हें अखबार मालिकों की गुलामी करने से बाज आना चाहिए। दिल्‍ली और बिहार के चुनावों में दैनिक जागरण ने उनका महिमामंडन तो किया, लेकिन परिणाम क्‍या हुआ…भाजपा चुनाव हार गई। इसलिए महिमामंडन का कोई मतलब नहीं होता। ये तो पब्लिक है, सब जानती है। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो रहे हैं। इसलिए मोदी जी को महिमामंडन की बैसाखी का परित्‍याग कर देना चाहिए और मजीठिया वेतनमान लागू कराने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

Advertisements

नवधा अंधभक्ति

प्रथम करहु गुंडन कर संगा। दूसरि चरित बनाइ कुरंगा।।
तीसरि जन चारण बनि जावा। चौथी निज सम्मान गंवावा।।
पंचम कर सज्जन कर निंदा। मुर्दा हो अथवा हो जिंदा।।
छठी होइ दुर्जन कर पूजा। कलजुग माहि उपाय न दूजा।।
सप्तम जन चापलूस कहावा। अष्टम यह मत सबहि सुनावा।।

नवम लात नित खाइके, उफ न करहिं मन माहिं।
दुर्जन प्रेमी ते नर, अंधभक्त कहि जाहिं।। (दोहा-420)

श्रीकांत व‍िरचित अरामायण से साभार  

रियल एस्टेट बन गए अखबार घराने

नई तकनीक के कारण कई विभाग ही खत्म हो गए, मालिकों का विज्ञापन और प्रसार पर जोर भाग-3

टाइम्सं ऑफ इंडिया का कहना कि “ALREADY.IMPLEMENTATION OF THE LATEST WAGE BOARD RECOMMENDATIONS HAS BLED A NUMBER OF PRINT COMPANIES TO THE POINT OF SICKNESS.”

पिछली कड़ी में आपने देखा कैसे झूठ को सच साबित करने की कोशिश की गई। 58 प्रतिशत श्रम बोझ की हकीकत ये है कि कंप्यूटीकरण और नई तकनीक आने के बाद इन अखबारों ने कई विभागों को बंद कर उनका काम एक विभाग के कर्मचारियों को दे दिया है। मसलन संपादकीय, प्रशासनिक, मुद्रण और प्रसार एवं विज्ञापन विभाग के श्रम शक्ति में व्यापक फेर-बदल और कटौती की गई है।

अखबारों में पेजमेकर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर खत्म कर दिए गए हैं। अब इनका बहुत सारा काम सब एडिटर को करना पड़ता है। लगभग सभी अखबरों में, उदाहरण के लिए सब एडिटर खबरों का संपादन, करके पेज तैयार करता है और फिर उसका प्रूफ भी ठीक करता है। इस तरह कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी संख्या का प्रयोग अखबार वाले दूसरे कामों में कर रहे हैं या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मशीन के लोगों के वेतन में संपादकीय की तरह कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। बाकी प्रसार और विज्ञापन के साथियों के वेतन के बारे में कोई नहीं पूछता क्योंकि वे अपने को कमाऊ पूत कहते हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया कह रहा है कि विज्ञापन और प्रसार में भारी गिरावट आई है। हमारा कहना है कि विज्ञापन और प्रसार में कमी का रोना रोकर आम लोगों की सहानुभूति लेने की कोशिश की जा रही है। इसकी पुष्टि आरएनआई और एबीसी और रीडर सर्वे से की जा सकती है। हर साल ये अखबार रीडर सर्वे छाप कर वाहवाही लूटते रहे हैं। वैसे ये भी भारतीय चुनावों के दौरान ओपिनियन पोल जैसा ही है। इसके अलावा तकनीकी विकास के कारण समाचार संग्रह के खर्च में कई गुना कमी आई है जिसके कारण भारतीय अखबारों की मुद्रण क्षमता और गुणवत्ता में काफी वृद्धि और विस्तार हुआ है।

जहां तक राजस्व में कमी आने की बात है, यह भी भ्रामक है। मजीठिया वेतन बोर्ड के अनुसार सकल राजस्व की गणना समाचार पत्र के सभी तरह के स्रोतों से प्राप्त राजस्व‍ और उनमें लगी पूंजी के अनुसार होगी। इस तरह उदाहरण के लिए राजस्थान पत्रिका के राजस्व की गणना उसके सभी तरह के व्यवसाय से प्राप्त आय को मिलाकर की जाएगी। इसमें रियल एस्टेट से लेकर दूसरे जितने धंधे इस समूह के मालिक करते हैं सभी का कुल उनका सकल राजस्व में शामिल होगा। (देखें मजीठिया वेज बोर्ड रिपोर्ट का पृष्ठ– 67, अध्याय- XIX की धारा-I की उपधारा- 5)

हिन्दुस्तान टाइम्स में कोई वेतन बोर्ड का कर्मचारी नहीं

मजीठिया के कारण 2.9 गुना बढ़ना था वेतन, बढ़ा कितना ….? भाग-2

टाइम्स ऑफ इंडिया का कहना कि “ALREADY .IMPLEMENTATION OF THE LATEST WAGE BOARD RECOMMENDATIONS HAS BLED A NUMBER OF PRINT COMPANIES TO THE POINT OF SICKNESS.”02

पिछली कड़ी में आपने देखा हिन्दुस्तान टाइम्स ने मजीठिया वेतनमान अपने यहां लागू नहीं किया क्योंकि एचटी प्रबंधन की नजर में उसके यहां कोई वेज बोर्ड का कर्मचारी है ही नहीं। इसलिए मजीठिया वेज बोर्ड के कारण उसका खून चूसे जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

इस अखबार के बारे में यह कहना जरूरी है कि प्रबंधन ने अपना वेतनमान बना रखा है। इसके यहां प्रशिक्षु पत्रकारों और नियमित पत्रकारों के वेतन में सिर्फ पांच हजार का ही अंतर है। हिन्दू का दावा है कि उसके सभी कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन एवं अन्य सुविधाएं दी जा रही हैं। इसकी हकीकत की जांच की जानी चाहिए क्योंकि खबर है कि खानापूर्ति के लिए वहां कुछ ही को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन एवं अन्य सुविधाएं दी जा रही हैं।

इस भाग में हम आपको फिर से मजीठिया वेज बोर्ड की श्रेणियों और संशोधित वेतन की तालिका पेश करेंगे। लेकिन इससे पहले यह कि मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट में अखबारों की माली हालत को देखते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि ये बोझ ये बर्दाश्त कर सकते हैं।

सिफारिश के अनुसार श्रेणी-I से लेकर श्रेणी-IV के अखबारों के कर्मचारियों के बेसिक वेतनमान में इससे करीब 2.90 से 3.20 गुना बढ़ोतरी हेागी और श्रेणी- V से लेकर श्रेणी-VIII के अखबारों के कर्मचारियों के बेसिक वेतनमान में इससे करीब 2.80 से 3.08 गुना बढ़ोतरी होगी।( देखें मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट का पृष्ठ 72)

वैरिएबल के साथ बेसिक वेतन में 2.90 से 3.20 और 2.80 से 3.08 गुना की बढ़ोतरी होनी थी। लेकिन जहां भी सिफारिश लागू की गई वेतन 100 फीसदी से भी कम बढ़ा। (पीटीआई का उदाहरण सामने है।)

अब पूरे देश का हाल देखिए- मजीठिया वेतनमान, असम ट्रिब्यून ,ट्रिब्यून, आनंद बाजार पत्रिका में पूरी तरह लागू किए जाने की चर्चा है। हकीकत ये है कि ट्रिब्यून में ठेके पर रखे गए कर्मचारियों को इसका पूरा लाभ नहीं दिया गया। अन्य किसी भी अखबार ने मजीठिया वेतमान को अपने यहां लागू नहीं किया। इन अखबारों में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला (आंशिक) , नवभारत टाइम्स्, जनसत्ता, प्रभात खबर, नवभारत, नई दुनिया,सकाल, दिव्य भास्कर,आज, इंडियन एक्सप्रेस, लोकमत समाचार आदि देश के बड़े अखबार समूहों ने इसे लागू करने की जरूरत नहीं समझा। इनमें कुछ ऐसे भी अखबार हैं जो आजादी के बाद से किसी भी वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं किया। (आरटीआई आवेदन के जवाब में रोजगार एवं श्रम मंत्रालय ने यह जानाकरी दी है।) इनमें प्रमुख रूप से दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और सकाल जैसे बहुसंस्करण वाले समूहों का नाम उल्लेखनीय है। ( मजीठिया वेज बोर्ड न लागू करने के आरोप में सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे अवमानना के केस 411/ 2014, अभिषेक राजा एवं अन्य बनाम संजय गुप्ता के मामले में दायर हलफनामों तथा सबूतों को देखें)

इनमें कुछ अखबारों ने अपने कर्मचारियों से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों में उल्लेखित 20जे का हवाला देकर कहा है कि उन्होंने अपने यहां वेज बोर्ड को लागू कर दिया है। (यह कानूनी पहलू है, इस पर चर्चा आगे होगी।) इनमें प्रमुख रूप से दैनिक जागरण, दैनिक भास्करऔर राजस्थान पत्रिका जैसे बहुसंस्करण वाले समूहों का नाम उल्ले्खनीय है। इतना ही नहीं श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने एक आरटीआई आवेदन के जवाब में 11 जुलाई 2012 को यह स्पष्ट कर दिया है कि गठित किसी भी आयोग की सिफारिशों को लागू कराने की जिम्मेदारी राज्य की है और इस मामले में कोई सर्वे या रिपोर्ट तैयार नहीं कराई गई है।

अब सवाल उठता है कि जब किसी अखबार ने मजीठिया वेतनमान को लागू ही नहीं किया तो उनका खून कैसे बहा….?  दूसरी बात यह कि सिफारिश में साफ किया गया है कि बेसिक वेतन में 2.90 से 3.20 और 2.80 से 3.08 गुना की बढ़ोतरी होनी थी। और टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार बढ़ा सिर्फ 40- 50 फीसदी और वह भी एकदम झूठ।

यह भाग अधिक विस्तृत हो गया है। इसलिए इस भाग को दो उपभागों में बांट कर अगली कडि़यों के रूप में पेश किया जा रहा है। इन उपभागों में टाइम्स ऑफ इंडिया के इस दावे को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के आलोक में अन्य अखबारों में मिल रहे वेतन की तुलना में परीक्षण करेंगे।

 

वेलेंटाइंस डे और गिरफ्तारियां

श्रीकांत सिंह

वेलेंटाइंस डे और गिरफ्तारियां। इनमें कोई न कोई संबंध जरूर है। तभी तो फिल्‍मी गीत लिखा गया था-कैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी…जी हां। इस मुबारक मौके पर दो गिरफ्तारियों की चर्चा आम है। आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में शशिकला नटराजन उर्फ चिनम्‍मा गिरफ्तारी की चौखट पर पहुंच गई हैं तो एक्जिट पोल प्रकाशित करने के आरोप में जागरण डॉट कॉम के संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

शेखर की गिरफ्तारी के संदर्भ में जागरण की ओर से कहा गया है- ‘डिजिटल इंग्लिश प्लेटफॉर्म के अलावा एग्जिट पोल से संबंधित खबर दैनिक जागरण अखबार में नहीं छापी गई। इंग्लिश वेबसाइट पर एग्जिट पोल से जुड़ी एक खबर अनजाने में डाली गयी थी,  इस भूल को फौरन सुधार लिया गया और संज्ञान में आते ही वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से संबंधित न्यूज रिपोर्ट को तुरंत हटा दिया गया था।’ सवाल यह है कि जागरण की ओर से अनजाने में कितने अपराध किए जाएंगे…माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना क्‍या जागरण प्रबंधन अनजाने में कर रहा है…सैकड़ों कर्मचारियों को एक झटके में क्‍या अनजाने में संस्‍थान से बाहर कर दिया गया…एनआरएचएम घोटाले में जागरण की संलिप्‍तता क्‍या अनजाने में हुई…जागरण की जम्‍मू यूनिट में क्‍या मादक द्रव्‍यों की तस्‍करी अनजाने में कराई जा रही थी।

जागरण के अपराधों की लिस्‍ट बड़ी लंबी है, लेकिन पहली गिरफ्तारी भले ही शशांक शेखर के साथ साजिश का एक नजीजा हो, लेकिन इससे मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू कराने के लिए संघर्षरत कर्मचारी उत्‍साहित हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि पुलिस दैनिक जागरण के प्रधान संपादक व मालिक संजय गुप्‍ता के घर भी पहुंची थी, लेकिन वह मौके पर नहीं मिले। 23 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया अवमानना मामले की सुनवाई है। इस बार सुनवाई से पहले ही जागरण के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। आपको याद होगा कि दुखी कर्मचारियों ने जागरण प्रबंधन और उसका साथ देने वाले पीएम नरेंद्र मोदी को बददुआ दी थी कि उनका हर कदम उलटा पड़े और वे असफलता के गर्त में गिर जाएं। उसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा है। बददुआ के ठीक बाद पीएम मोदी मैन ऑफ टाइम मैगजीन बनते बनते रह गए और चुनाव में उनकी नोटबंदी की साजिश नाकाम साबित हुई। चुनाव प्रभावित कराने का कलंक जो लगा सो अलग। आज नोटबंदी पर उठ रहे सवालों का एक भी जवाब केंद्र सरकार की ओर से नहीं आया है।

शशिकला नटराजन की गिरफ्तारी के मामले से साजिश की बू आ रही है, क्‍योंकि भाजपा पन्‍नीर सेल्‍वम के सहारे तमिलनाडु की राजनीति में अपना प्रभाव जमाना चाहती है, लेकिन पन्‍नीर सेल्‍वम को एआईडीएमके से हटा दिया गया है। अब मामला तमिलनाडु के राज्‍यपाल और एआईडीएमके के समर्थन पर फंसा है। पन्‍नीर सेल्‍वम यदि समर्थन के अभाव में किनारे लग जाते हैं तो यहां भी भाजपा को बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है। बची खुची कसर विधानसभा चुनाव के परिणाम पूरी कर सकते हैं। ये तो इंतहाए राजनीति है, रोता है क्‍या। आगे आगे देखिए होता है क्‍या।

जानें, ‘जागरण’ कैसे चलाता है ‘धंधा’

धंधे की बलिबेदी पर कुर्बान कर दिए गए शशांक शेखर त्रिपाठी  

श्रीकांत सिंह

एक अखबार के रूप में दैनिक जागरण समाप्‍त हो चुका है। लगातार उसका सर्कुलेशन गिर रहा है। विज्ञापन का भी प्रवाह थम गया है। आधे तिहाई दाम पर विज्ञापन बुक किए जाते हैं। एक सूत्र की मानें तो पहले जो विज्ञापन 90 लाख रुपये के होते थे, उन्‍हें 90 हजार में भी छाप दिया जाता है। विज्ञापनदाता भी समझ गए हैं कि जागरण अब फर्जीवाड़े का अड्डा बन चुका है। तो इस आधार पर जागरण जिंदा है। क्‍योंकि अब फर्जीवाड़ा उसका धंधा है। अपने इसी फर्जीवाड़े को चलाते रहने के लिए जागरण प्रबंधन ने जबरन शशांक शेखर त्रिपाठी को बलि का बकरा बना दिया है। जागरण के किसी भी संपादक की क्‍या मजाल जो प्रबंधन की इच्‍छा के बगैर कुछ भी छाप सके।

बता दें कि शशांक शेखर त्रिपाठी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, जो आज तक, दैनिक हिंदुस्‍तान और दैनिक जागरण में समय-समय पर वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं। उन्‍होंने एक जमाने में वर्तमान स्‍टेट प्रभारी विष्‍णु प्रकाश त्रिपाठी को नौकरी भी दी थी। उनसे इतनी बड़ी गलती हो सकती है, यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। उनसे गलती कराई गई है। इसलिए इस गलती के लिए सीधे तौर पर संजय गुप्‍ता जिम्‍मेदार हैं। अपने लोगों को फंसाने का जाल बिछाने के लिए ही जागरण में पिछले कुछ दिनों से स्‍टेट प्रभारियों के नाम प्रिंट लाइन में छपने लगे हैं। यह सब धंधा चलाने के लिए जागरण प्रबंधन ने किया है। वैसे यह बात भी गले से नीचे नहीं उतर रही है कि शशांक शेखर त्रिपाठी को हटा ही दिया जाएगा। जागरण प्रबंधन चुनाव आयोग को मूर्ख बनाने के लिए भी कोई नाटक रच सकता है क्‍योंकि नाराज प्रदेश सरकारों को मनाने के लिए पहले भी ऐसा होता आया है। अब अगला शिकार कौन होगा, यह देखने वाली बात होगी, क्‍योंकि पांच ऐसे तरीके हैं जिनका इस्‍तेमाल कर प्रत्याशियों और पार्टियों से वसूली की जाती है।

  1. विज्ञापन के रूप में चंदा देने के लिए प्रत्‍याशियों पर दबाव बनाया जाता है, जिसके लिए विज्ञापन विभाग नहीं रिपोर्टरों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  2. खबरनुमा विज्ञापन के रूप में भी जमकर वसूली की जाती है। कभी कभी तो बड़े आकार में इंटरव्‍यू भी प्रकाशित किए जाते हैं।
  3. खबर के रूप में वसूली करने के लिए भी जागरण प्रबंधन ऐसे भोले भाले रिपोर्टर नियुक्‍त करता है जो उसके धंधे को आगे बढ़ा सकें। जो रिपोर्टर अपना जमीर बचाने के लिए वसूली नहीं कर पाता, उसे तुरंत हटा दिया जाता है।
  4. चुप रहने के रूप में- मतलब प्रत्याशी के बारे में न नेगेटिव न पॉज़िटिव, कोई खबर नहीं चलाई जाएगी।
  5. केवल सकारात्मक खबर छापने के रूप में जागरण का धंधा बहुत पुराना है। इसके लिए जागरण में महिमा मंडन की प्रतिभा विकसित की गई है, जिसके तहत फुल पेज के इंटरव्‍यू प्रकाशित किए गए हैं।

धंधे का एक और तरीका है जो टीवी में खूब लोकप्रिय है, ‘कम्प्लीट पैकेज’। इसके तहत चुनाव के दौरान पार्टी को मुश्किल सवालों से बचाया जाता है। पर यह डील चुनाव से साल-छह महीने पहले हो जाती है, जिसे चैनल का रुझान कहा जाता है। रुझान का सबसे चर्चित मॉडल है, मुश्किल सवालों के वक्त उस पार्टी को या उससे जुड़े प्रतिनिधि को ब्रेक के बाद दिखाया जाना। आमतौर पर दर्शक ब्रेक से पहले ही मुश्किल सवालों और उसपर प्रतिनिधि की ओर से आयी राय सुनकर अपना मिजाज बना लेता है।

इसका दूसरा फॉर्म है टीवी डिबेट। जिस पार्टी या प्रतिनिधि से पैसा लिया गया है उसके पक्ष के तीन पैनलिस्ट बैठाना और जिससे नहीं लिया है उसके सबसे कमजोर लोगों को बुलाना या 3 के मुकाबले 1 को बुलाना।

दैनिक जागरण के न्यूज पोर्टल जागरण डॉट कॉम ने जिस तरह यूपी इलेक्शन के पहले चरण के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित कर आचार सहिता की धज्जियां उड़ाई थीं, उसके बाद चुनाव आयोग की ओर से सख्त एक्शन होना लाजिमी था।

एक्जिट पोल को लेकर जागरण मैनेजमेंट ने वेबसाइट के संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी को साइडलाइन कर उनकी जगह फिलहाल नोएडा ऑफिस में डिप्टी एडिटर फीचर की जिम्मेदारी संभाल रहे कमलेश रघुवंशी को दी है। कमलेश रघुवंशी ढाई दशक से अधिक समय से जागरण परिवार का हिस्सा हैं। लखनऊ, जागरण से अपनी पारी शुरू करने वाले कमलेश दिल्ली और पंजाब में बतौर स्थानीय संपादक कार्य कर चुके हैं। फीचर विभाग की जिम्मेदारी उन्होंने पिछले साल संभाली है। उससे पहले वे रांची में बतौर झारखंड  स्टेट हेड के तौर पर जागरण का नेतृत्व कर रहे थे। वे फीचर के साथ-साथ ऑनलाइन का प्रभार भी संभालेंगे।

टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय की सच्चाई-एक

संस्करणों के बंद होने का सच 

मजीठिया मंच

बिहार, झारखंड, दिल्ली और दक्षिण भारतीय शहरों में हाल में शुरू हुए अखबारों के संस्कंरण क्या‍ विस्तार नहीं है? टाइम्स ऑफ इंडिया कहता है- पिछले पांच वर्षों से बड़े दैनिक अखबारों के संस्करण बंद हो रहे हैं, कर्मचारियों पर खर्च बढ़ा है और इसलिए इन्होंने अपना विस्तांर मजबूरन रोक रखा है।

हकीकत क्या है…
टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऐसे एक भी अखबार के बंद होने की न तो सूची पेश की है और न कारण। हां उसका इशारा अपने प्रतिद्वंद्वी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के पिछले दिनों इंदौर, भोपाल और रांची के संस्करणों के बंद किए जाने की ओर है। इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता के कुछ संस्करण बंद हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है केवल हिन्दुास्तान टाइम्स और एक्सप्रेस ही अखबार नहीं है। इस दौरान दर्जनों अखबार नई दिल्ली और देश भर के कई राजधानी और छोटे-बड़े शहरों में उग आए हैं। बड़े अखबारों के संस्करण शहर के आधार पर छापे जा रहे हैं। कुछ उदाहरण यहां पेश हैं।

देशबंधु ,राजस्थान पत्रिका, दक्कन हेराल्डे के अलावा अन्य दक्षिण भारत के कुछ अखबार दिल्ली में छपने लगे हैं। स्टेटसमैन बंद नहीं हुआ है, नेशनल हेराल्ड कोई भी परिस्थिति हो लेकिन फिर से शुरू हो गया है। राष्ट्री्य सहारा का हाल बेहाल है लेकिन छपना जारी है, भले ही कर्मचारियों को वेतन न देने के लिए पैसा न हो उसके पास लेकिन तिहाड़ जेल में बंद अपने मालिक की तीमारदारी में कोई कमी नहीं की जा रही है।

इतना ही नहीं, राजस्थान पत्रिका के कई संस्करण दक्षिण भारत के कई शहरों में शुरू किए गए हैं। कहने का मतलब पिछले पांच वर्षों में कुछ बड़े दैनिकों के एकाधिकार पर हमला हुआ है और बड़े पैमाने पर (चाहे कारण जो रहे हों अखबारों का विस्तार हुआ है। सबूत के तौर पर आरएनआई की रिपोर्ट को लिया जा सकता है। जिस अखबार के संस्करणों के बंद होने की बात की जा रही है उसी अखबार समूह के हिन्दी के अखबार ने उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में कई नए संस्करण शुरू किए हैं। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर जैसे अखबारों ने बड़े पैमाने पर इस दौरान अपना विस्तार किया है। प्रभात खबर भी झारखंड से निकल कर बिहार के कई शहरों से छपने लगा है। दैनिक अखबारों की यह प्रगति और विस्तार टाइम्स ऑफ इंडिया को क्यों नहीं दिखाई पड़ रही, इसका हमें कारण खोजना चाहिए।

विस्तार के एक और पहलू पर हमें गौर करना चाहिए। इन सभी अखबारों के मालिकों ने बड़े पैमाने पर इंटरनेट संस्करण शुरू किए हैं। कुछ तो मजीठिया वेज बोर्ड से बचने के लिए भी और अधिक तकनीकी विकास की मजबूरी के कारण भी। साथ ही इन अखबारों ने कई तरह के अन्य गैर अखबारीय धंधे भी शुरू किए हैं और अपने अखबारीय कर्मचारियों को इन नई कंपनियों में भर्ती दिखा रहे हैं। (मजीठिया वेज बोर्ड न लागू करने के आरोप में सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे अवमानना के केस 411/ 2014, अभिषेक राजा एवं अन्य बनाम संजय गुप्ता के मामले में दायर हलफनामों तथा सबूतों से भी हमारे तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया को यह विस्तार न जाने क्यों नजर नहीं आ रहा।