गोदी के गदेलवा और मीडिया

श्रीकांत सिंह।

गोदी का गदेला तो सुना था लेकिन गोदी का मीडिया पहली बार सुन रहा हूं। मीडिया की चुनौतियां इतनी जटिल हैं कि गोद लिए बगैर उसे बचाया नहीं जा सकता। हर मीडिया हाउस को किसी न किसी ने गोद ले रखा है। गोदी में मीडिया खुद को सेफ महसूस करता है तो मीडियाकर्मी अपनी नौकरी। और क्‍या चाहिए इस देश को। मीडियाकर्मियों की नौकरी चलती रहे और सरकार की गोद में मीडिया महफूज रहे। पत्रकारिता महफूज रहने की आखिर जरूरत ही क्‍या है।

पत्रकार अगर यह सोचते हैं कि उनके बगैर इस देश में ज्ञान नहीं बंट पाएगा तो यह उनका मुगालता है। आज ज्ञान इतना स्‍मार्ट हो गया है कि वह खुद ब खुद आपके पास पहुंच जाता है। अब मध्‍य प्रदेश के मंदसौर को ही लें तो वहां बताया जा रहा है कि कोई गोली नहीं चलाई गई, लेकिन छह किसानों के मारे जाने की जानकारी आप लोगों तक पहुंच ही गई है। तो जो लोग यह सोच रहे हैं कि मीडिया को गोद ले लेंगे तो लोग ज्ञान से वंचित रह जाएंगे, यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। मीडिया को आप अपनी तरह से चलाइए और ज्ञान आपको अपनी तरह से चलाता रहेगा।

उत्‍तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने भी खुद को गोद लेने की आग्रहपूर्ण विनती की थी, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई थी कि उनकी उमर गोद लेने की नहीं है। लोग शायद गोद का व्‍यापक मतलब नहीं समझ पाए। तभी तो उन्‍होंने अपनी अज्ञानता प्रकट कर दी। गोद का मतलब अभयदान, सुरक्षा और हर गलती पर माफी की विनती स्‍वीकार करने से है। मोदी जी दूरदर्शी हैं। वह पहले से जानते थे कि उत्‍तर प्रदेश को चलाना आसान काम नहीं है। उत्‍तर प्रदेश की जनता उन्‍हें गोद ले लेगी तो हर गलती माफ। क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के लिए तो मोदी जी गोदी के गदेलवा हैं।

गोद के विज्ञान को शायद सबसे पहले मोदी जी ने समझा। उसके बाद मीडिया वालों को इसका ज्ञान हुआ। अब मीडिया वाले गोदी में बैठने के लिए तैयार हैं। कोई किसी की गोदी में बैठ रहा है तो कोई किसी की गोदी में। आपके पास पैसा है तो आप भी किसी मीडिया हाउस को गोद ले लीजिए। क्‍या पता कब जरूरत पड़ जाए कि कोई मीडिया हाउस आपको गोद ले और आपके आर्थिक अपराधों पर मिट्टी डालने के काम आ जाए।

इसलिए गोद लिए जाने की कोई उम्र और शर्त नहीं होनी चाहिए। अब देश की इतनी बड़ी पार्टी कांग्रेस मौका पड़ने पर क्षेत्रीय दल सपा की गोद में जा बैठी। पाकिस्‍तान चीन की गोद में बैठा है। आतंकी पाकिस्‍तान की गोद में बैठे हैं। जो किसी की गोद में नहीं बैठा है, उसका नष्‍ट होना तय है। उसके विकास की कोई संभावना नहीं है। आप मानव हैं पशु नहीं कि पैदा होते ही चलने फिरने लगें। मानव की विकास यात्रा गोद से शुरू होती है और ईश्‍वर की गोद पर समाप्‍त होती है। इसलिए आपको यदि कोई गोदी मीडिया कहे तो कृपया शर्माइगा नहीं।

दरअसल, पत्रकारिता कभी नहीं कहती कि उसे गोद लिया जाए। लेकिन गोद लिए जाने की सर्वाधिक आवश्‍यकता उसी को है। आप कल्‍पना करें कि कितना जोखिम उठाकर एक रिपोर्टर जनहित की खबरों को सामने लाता है और उससे समय समय पर समाज का भला भी होता है। लेकिन उसी रिपोर्टर को जब संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई भी सामने नहीं आता। आज जो भी मदद मिल रही है, वह मीडिया हाउस को मिल रही है। लेकिन मीडिया हाउस ही पत्रकारिता नहीं है।

आज मीडिया हाउस अलग-अलग राजनीतिक दलों की सेना के अंग बन गए हैं। वे उनकी ओर से सूचना के प्रक्षेपास्‍त्र से विरोधियों पर हमले कर रहे हैं और उसकी एवज में लाभ उठाकर फल फूल रहे हैं। इस लड़ाई में अगर कोई उपेक्षित है तो वह है पत्रकार। आज पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है। उनका भविष्‍य अनिश्चितता के खतरे में है, लेकिन इस वर्ग की फिक्र किसी राजनीतिक दल को नहीं है क्‍योंकि राजनीतिक दलों ने तो मीडिया हाउस को ही गोद ले रखा है। इतने से ही उनका काम चल जाता है। फिर वे पत्रकारों की फिक्र क्‍यों करेंगे।

 

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सहारनपुर की महाभारत का शांति पर्व   

श्रीकांत सिंह।

सहारनपुर की महाभारत के युद्ध पर्व का समापन तो हो गया, अब उसके शांति पर्व की चर्चा कर ली जाए। जरा सोचें कि छोटी-छोटी बातों के लिए हम कितना बडा नुकसान कर लेते हैं। लडाई झगडे से हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाते अलबत्‍ता उन लोगों के मनसूबे पूरे हो जाते हैं जो दूसरों के विकास से जलते हैं।

आखिर वे कौन लोग हैं जो जाटवों और राजपूतों को लडाकर अपना मतलब निकाल रहे हैं। वे कौन लोग हैं जो योगी आदित्‍यनाथ की जनकल्‍याणकारी सरकार को फेल करना चाहते हैं। वे कौन लोग हैं जिन्‍हें राजपूतों के अभ्‍युदय से जलन हो रही है। उनकी पहचान करना जरूरी है। यही जाटवों और राजपूतों को समझना है। वे ऐसे लोग हैं जो कभी लडते नहीं, सिर्फ लडाते हैं। यही उनका अमोघ हथियार है। उनके इस हथियार को फेल करना होगा। इसके लिए राजपूतों और जाटवों का जागरूक होना बहुत जरूरी है।

इतिहास की बात करें तो राजपूतों ने कभी दलितों का बुरा नहीं किया। पूर्व प्रधानमंत्री विश्‍वनाथ प्रताप सिंह एक ऐसे राजपूत नेता हुए जिन्‍होंने आरक्षण की व्‍यवस्‍था देकर दलितों का भला ही किया। इसलिए दलितों को यह समझना होगा कि उन्‍हें उपद्रव की आग में कौन लोग झोंक रहे हैं। राजपूतों को भी यह समझ विकसित करनी होगी कि उन्‍हें कभी भी उकसावे में नहीं आना है।

देश के राजपूतों और दलितों में समझ आ गई तो समाज के वे कुत्सित मानसिकता वाले लोग खुद ब खुद फेल हो जाएंगे और तब उनकी कोई भी चाल कामयाब नहीं होगी और उनके मनसूबे धरे के धरे रह जाएंगे। यह भी पता चला है कि सहारनपुर हिंसा को बढाने में उन्‍हीं कुत्सित मानसिकता के लोगों का हाथ रहा है जो राजपूतों और दलितों से जलते हैं। यही लोग मीडिया में भी हावी हैं जो समाचारों से खेल कर सामाजिक सद्भाव बिगाडते हैं। वे जाटवों को बताते हैं कि राजपूत अत्‍याचार करते हैं तो राजपूतों को भी यह कहकर भडका देते हैं कि जाटव खतरा हैं।

हमें पता चला है कि कुछ राजपूतों ने जाटव कन्‍या की शादी में सहयोग कर सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। लेकिन इस खबर को अखबारों में स्‍थान नहीं मिला, क्‍योंकि वहां समाज विरोधी तत्‍व सक्रिय हैं। ये तत्‍व सामाजिक सद्भाव नहीं बनने देना चाहते। उन्‍हें तो योगी जी से चिढ है, राजपूतों से चिढ है, जाटवों से चिढ है। ऐसे समाज विरोधी तत्‍वों की पहचान कर उनसे हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है।

 

अखबार मालिकों के धमकाने पर मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

‘पत्रकार आवाज’ से साभार।

तीन चार महीने पहले ही हिंदुस्‍तान नोएडा ने अपने मशीन के 15-16 कर्मचारियों से बर्खास्‍तगी और ग्रेच्‍युटी आदि रोकने की धमकी देकर जबरन इस्‍तीफा ले लिया और कई अन्‍य पर इस्‍तीफा देने का दबाव बनाया हुआ है। मजबूरी में इस्‍तीफा देने वाले वे साथी अब सड़क पर हैं या कोई छोटा-मोटा काम कर गुजर बसर कर रहे हैं। वहीं, भास्‍कर ने भी जबरन इस्‍तीफा लेने का अभियान चलाया हुआ है। यहां बस इतना ही अंतर है कि जिन साथियों के इस्‍तीफे लिए गए हैं उनमें से ज्‍यादातर अभी संस्‍थान में ही कार्यरत हैं। इनके इस्‍तीफों का कहां और कैसे इस्‍तेमाल होगा किसी को नहीं पता। ऐसा ही कुछ अन्‍य संस्‍थानों में भी चल रहा है या चल चुका है। ‘आज समाज’ जैसे कुछ समाचार-पत्रों में तो स्‍थायी कर्मियों को तीन साल के लिए अनुबंध पत्र दे दिए गए।

इस्‍तीफा देकर क्‍या खो रहे हैं आप

प्रबंधन एक सोची समझी नीति के तहत काम कर रहा है। उसे पता है 7 फरवरी 2014 में मजीठिया वेजबोर्ड और वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 को खत्‍म करने को लेकर सिविल पिटिशन 246/2011 के साथ सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी अन्‍य सभी याचिकाएं खारिज हो गई थीं। उसके बाद उनकी रिव्‍यू पिटिशन भी खारिज हो गई। ऐसे में उनको अपने संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड आज नहीं तो कल लागू करना ही पड़ेगा और उन्‍हें अपने कर्मियों को मजीठिया के अनुसार वेतन और एरियर का भुगतान करना ही पड़ेगा। ऐसे में व़े मजीठिया वेजबोर्ड के तहत आने वाले कर्मियों की संख्‍या में कमी करके भविष्‍य में अपने ऊपर आने वाले आर्थिक बोझ को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

यहां आने वाले बोझ शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए किया गया है, क्‍योंकि जिन कर्मियों का वह इस्‍तीफा नहीं ले पाएगा उन्‍हें उसे मजीठिया के अनुसार एरियर तो देना ही पड़ेगा वहीं,  फि‍टमेंट और प्रमोशन के अनुसार व़ेजबोर्ड के सभी लाभ देने पड़ेंगे तब तक जब तक कि वह नौकरी पर रहता है। यानी मजीठिया के अनुसार जो वेतन बनता है वो देना पड़ेगा। आपको समझाने के लिए नीचे एक उदाहरण दे रहे हैं-मजीठिया के अनुसार नवंबर 2011 में ग्रेड ए के समाचार पत्र में एक्‍स श्रेणी के शहर में भर्ती सीनियर सब एडिटर रमेश का 17,000 रुपये बेसिक के हिसाब से 37,761 रुपये मासिक वेतन बनता है, जो कि बढ़ते-बढ़ते मई 2017 में 63,163 रुपये हो जाता है। इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है।

ऐसे में रमेश का नवंबर 2011 से मई 2017 तक का औसत वेतन 25 हजार रुपये प्रतिमाह मान लिया जाए तो ऱमेश को कम से कम 15 लाख रुपये का एरियर संस्‍थान को देना पड़ेगा (इसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये के करीब रात्रि भत्‍ता और पीएफ, एलटीए आदि का अंतर शामिल नहीं है)। इसके अलावा इसका बढ़ा हुआ वेतन अर्थात कम से कम 63,163 रुपये हर माह देने पड़ेंगे और इसके अलावा न चाहते हुए भी मजीठिया के अनुसार हर साल वेतन में बढ़ोतरी और हर पांच साल में एक विशेष इंक्रीमेंट और हर दस साल में एक प्रमोशन देना पड़ेगा। प्रबंधन जानता है कि वेजबोर्ड के अंतर्गत आने वाले रमेश जैसे कर्मियों का वेतन कुछ समय बाद लाख रुपये से ऊपर पहुंच जाएगा। ऐसे में उनकी ग्रेच्‍युटी और पीएफ का एमाउंट भी बढ़ता जाएगा।

इसलिए वे जबरन इस्‍तीफा अभियान चलाए हुए हैं कि एरियर से नहीं बच सकते तो कम से कम बढ़ते हुए वेतनमान पर तो कैंची चला दी जाए। कैसे, इसे भी उदाहरण देकर समझाते हैं।

संस्‍थान ने रमेश के साथ ही उसी तिथि और पद पर भर्ती ओम से मई 2017 में जबरन इस्‍तीफा ले लिया। अब जब संस्‍थान को मजीठिया वेजबोर्ड लागू करना पड़ेगा तो रमेश अपने 15 लाख रुपये के एरियर के साथ कम से कम 21,510 के बेसिक पर 63,163 रुपये वेतनमान के रूप में प्राप्‍त करेगा (रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं)। वहीं,  ओम के हाथ लगेंगे एरियर के केवल 15 लाख रुपये। यदि कंपनी ओम को उसी पद पर नई भर्ती दिखाकर नौकरी पर रखती भी है तो,  उसका 17,000 के बेसिक के अनुसार वेतनमान 50,129 रुपये होगा (इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है)। यानी कि हर महीने कम से कम 13 हजार रुपये और पीएफ, ग्रेच्‍युटी, एलटीए, प्रमोशन आदि में नुकसान, जोकि समय के साथ-साथ तेजी से बढ़ता ही जाएगा। और यदि हिंदुस्‍तान के साथियों की तरह कंपनी उन्‍हें नौकरी पर नहीं रखती हैं तो अब आप खुद समझ सकते हैं आपका कितना बड़ा नुकसान हो रहा है।

मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

उपरोक्‍त उदाहरणों से आपको वस्‍तुस्थिति समझ में आ गई होगी। हिंदुस्‍तान के कुछ साथियों ने ग्रेच्‍युटी की मामूली सी राशि रुकने के डर से और कुछ ने अन्‍य कारणों से इस्‍तीफा दे दिया। संस्‍थान ने इस्‍तीफा लेने के बाद उन्‍हें तुरंत बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। ऐसे में इस्‍तीफा देकर क्‍या आप भी उनकी श्रेणी में आना चाहते हैं। इसलिए यदि आपसे संस्‍थान जबरन ग्रेच्‍युटी रोकने, बर्खास्‍तगी,  तबादले आदि की धमकी देकर इस्‍तीफा मांगता है तो कतई न दें और कानूनी उपायों को अपनाने की तरफ कदम बढ़ाएं।

इस स्थिति में क्‍या करें

ऐसा नहीं है सुप्रीम कोर्ट इससे अनजान है, सुनवाई के दौरान यह मुद्दा हमारे वकीलों द्वारा कई बार उठाया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2016 की सुनवाई के बाद दिए ऑर्डर में उल्‍लेख किया है… It has been brought to our notice by the learned counsels for some of the contesting parties that in case of some establishments, details of which need not be specifically mentioned herein, employees have been retrenched/terminated and in respect of certain other establishments the employees have been forced/compelled to sign undertakings which were later on used as to make out declarations that the employees do not desire to be covered by the Wage Board reommendations.

जबरन इस्‍तीफे के एक मामले का उल्‍लेख मध्‍यप्रदेश श्रमायुक्‍त द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिपोर्ट में भी है। उसमें पेज नंबर 20 पर भास्‍कर के साथी sanjay kumar chuhan के Forced Resignation का मामला इंदौर उप श्रमायुक्‍त द्वारा लेबर कोर्ट को रेफर करने का जिक्र है।

इसके अलावा कुछ अन्‍य साथियों ने भी अलग-अलग राज्‍यों में जबरन इस्‍तीफा देने के बाद उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज करवाने के साथ रिकवरी भी लगा रखी है, जिन पर सुनवाई जारी है। इसलिए हमारा उन सभी साथियों से अनुरोध है जिनका जबरन इस्‍तीफा प्रबंधन ने लिया है, वे पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं। हम जानते हैं एफआईआर दर्ज कराने में आपको कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ेगा, क्‍योंकि प्रभावशाली समाचार पत्र प्रबंधन के कारण पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर सकती है। ऐसे में यदि आपके राज्‍य में ऑनलाइन पुलिस शिकायत दर्ज कराने की सुविधा है तो वहां ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवाएं। नहीं तो केस लड़ रहे अपने साथियों से संपर्क कर उनकी मदद मांगें। इसके बाद आप रिकवरी बनवाकर और किसी कानून के जानकार से मैटर लिखवाकर डीएलसी में 17(1) और जबरन इस्‍तीफे के खिलाफ अलग-अलग केस लगवाएं। डीएलसी में दायर 17(1) की रिकवरी और इस्‍तीफे के खिलाफ लगवाए गए केस की प्रतिलिपि पर मोहर लगवाना व साइन करवाना न भूलें।

मिशन मजीठिया/भाग एक-दैनिक जागरण में बंपर वैकेंसी का राज

नई  दिल्‍ली।

दैनिक जागरण में अचानक बंपर वैकेंसी आई है, यह कदाचित आपको पता हो लेकिन शायद आप यह नहीं जानते होंगे कि जिस दैनिक जागरण ने ओवर स्‍टाफ की बात कहकर पिछले वर्ष सैकड़ों लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया उसी दैनिक जागरण को अचानक बंपर स्‍टाफ की जरूरत कैसे आन पड़ी। संस्‍थान के एक भरोसेमंद सूत्र ने बताया कि मजीठिया अवमानना का फैसला आने से उत्‍पन्‍न संकट से निपटने की तैयारी जागरण प्रबंधन अभी से कर रहा है। उसके तहत नए लोगों की भर्ती 15 हजार रुपये प्रति माह पगार के आधार पर की जाएगी। जो लोग ज्‍यादा बार्गेनिंग करेंगे उन्‍हें झूठे वादे के तहत पहले फंसा लिया जाएगा और उनके साथ मनमानी बाद में की जाएगी।

इस बात पर भरोसा करने का आधार यह है कि जागरण कभी अपने पास से कुछ नहीं देता। प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए पैसा वह अपने कर्मचारियों की सैलरी काट कर जुटाता है और पीएम मोदी के बगल में उपस्थित होकर फोटू खिंचवा लेता है। उसके जरिये कर्मचारियों पर इस बात का दबाव बनाता है कि जब देश का पीएम ही उसके साथ खड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट में उसका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता। खैर, जागरण के बारे में यह जगजाहिर है कि वह कभी अपने पास से कुछ खर्च नहीं करता। उसे यह पता है कि मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट उसकी खाल खींचने वाला है तो उसने नई भर्ती का फार्मूला निकाला है। पुराने कर्मचारियों को तो उसे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर अथवा बकाया देना ही होगा जिसमें उसे करोड़ों का चूना लगना तय है। इन करोड़ों रुपयों का खर्च वह 15 हजार रुपये प्रति माह पगार वाले नई भर्ती कर्मचारियों से निकालेगा।

दैनिक जागरण की इस तैयारी से एक बात तय है कि इस समय कार्यरत पुराने कर्मचारियों को अपनी नौकरी बिना किसी गलती के गंवानी होगी। अब यह उन कर्मचारियों को ही तय करना होगा कि वे लड़कर मरते हैं या मरने के बाद लड़ाई की तैयारी करते हैं। लेकिन दैनिक जागरण को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि नई भर्ती के जरिये वह मजीठिया से फुर्सत नहीं पा सकता। मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन देना होगा। नौकरी की गर्ज से आए नए लोग भले ही मजीठिया न मांगें, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के जुर्म में याचिका के जरिये सुप्रीम कोर्ट घसीट ले जाएंगे।

 

दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मारपीट

सेवा में,

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदय, नोएडा।

 

विषय: दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मेरे साथ मारपीट और 36 हजार रुपये गायब करने के संबंध में तथा प्राथमिकी दर्ज न किए जाने के संबंध में 

 

महोदय,

मैं दैनिक जागरण में मुख्‍य उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं। संस्‍थान के एचआर मैनेजर आर कुमावत ने मुझे दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्‍त के एक आदेश के संदर्भ में तबादला वापसी के लिए नोएडा के डी-210 सेक्टर-63 स्थित कार्यालय में बुलाया था। हाल में किए गए सभी तबादलों की वापसी और प्रबंधन द्वारा उत्‍पीड़न न किए जाने का लिखित आश्‍वासन दिया गया था। उनसे मिलने के लिए मैं 10 फरवरी 2015 को सायं लगभग पांच बजे जब कार्यालय पहुंच कर प्रवेश के लिए फिंगर पंच किया तो संस्‍थान के सुरक्षा गार्डों ने मुझ पर हमला बोल दिया और धक्‍कामुक्‍की करने लगे।

मैंने इस अप्रत्‍याशित व्‍यवहार का कारण जानना चाहा तो सुरक्षा गार्डों ने कहा कि यह एचआर मैनेजर आर कुमावत का आदेश है। इसी बीच मेरी जेब में रखे 36 हजार रुपये गायब हो गए। मैंने जब आर कुमावत से बात करने का प्रयास किया तो उन्‍होंने फोन नहीं उठाया। मैंने तुरंत एसएमएस के जरिये उन्‍हें घटना की जानकारी दी, लेकिन उन्‍होंने कोई गंभीरता नहीं दिखाई। इस पर मैंने 100 नंबर डायल कर पुलिस सहायता मांगने का प्रयास किया तो मुझे धमकाने के लिए कुछ लोग मेरे वाहन के पास आ गए और उन्‍होंने मुझे जान से मारने की धमकी दी। पुलिस पीसीआर-47 जब लगभग साढ़े छह बजे मौके पर पहुंची तो इस बीच मेरे साथ धक्‍कमुक्‍की करने वाले वे लोग वहां से खिसक चुके थे।

पीसीआर पुलिस ने पूछताछ के लिए आर कुमावत को बुलवाया, लेकिन वह कार्यालय से बाहर नहीं आए। उन्‍हें मोबाइल फोन से जब मैंने काल किया और पुलिस आने की बात बताई तो वह पुलिस को ही बुरा-भला कहने लगे और मामले की जांच में कोई सहयोग नहीं किया। सुरक्षा गार्डों ने कार्यालय के गेट को भीतर से बंद कर लिया था। इस पर पुलिस को पूछताछ के बगैर लौटना पड़ा। पूरी घटना की तसदीक दैनिक जागरण कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज से भी की जा सकती है। सीसीटीवी कैमरों की फुटेज मेरी शिकायत की पुष्टि करने में भी मददगार होगी।

दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर आर कुमावत के खिलाफ हमला कराने, छिनैती कराने, कार्यालय में प्रवेश करने से रोकने और जान से मारने की धमकी देने की शिकायत मैंने पुलिस से की है लेकिन अब तक इस मामले में कोर्ठ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। मुझे आशंका है कि एचआर मैनेजर आर कुमावत के खिलाफ कार्रवाई न की गई तो दैनिक जागरण प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन देने से बचने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। इस प्रकार जागरण प्रबंधन से मुझे जान और माल का खतरा है। आशा है मेरी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

यह बताना जरूरी है कि दैनिक जागरण प्रबंधन की गुंडागर्दी के विरोध में 8 फरवरी 2015 को जागरण कर्मचारियों ने काम बंद कर दिया था। उस समय काम निकालने के लिए जागरण प्रबंधन ने कर्मचारियों के साथ जो समझौता किया था, उसी के तहत मुझे बातचीत के लिए बुलाया गया था, लेकिन समझौता तोड़ते हुए मुझ पर हमला करा दिया गया।

भवदीय

श्रीकांत सिंह पुत्र स्‍व. सीता राम सिंह

बी-31, सेक्‍टर-12, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर। फोन-9911124356

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उत्‍तर प्रदेश शासन के अधिकारियों ने न तो ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के पत्र पर कोई संज्ञान लिया और न ही उपश्रमायुक्‍त कार्यालय में कराए गए समझौते को दैनिक जागरण प्रबंधन ने माना। समझौते की प्रति यहां अपलोड है।

 

कार्रवाई तो दूर, एसएसपी ऑफिस में गायब हो जाता है डीएम का पत्र

 

डीएम ऑफिस से एसएसपी कैंप कार्यालय की दूरी कुल 10 कदम होगी, लेकिन इस दूरी तक डीएम की चिट्ठी पहुंचना तो दूर, दो बार गायब हो चुकी है। यह तो एक उदाहरण मात्र है, इसी प्रकार गौतमबुद्धनगर के न जाने कितने फरियादी आए दिन पुलिस से निराश हो रहे होंगे। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार पुलिस अधिकारी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को फेल करने में लगे हैं।

दैनिक जागरण के मुख्‍य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने 24 फरवरी 2015 को नोएडा के सेक्‍टर-26 स्थित वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कैंप कार्यालय में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। ततकालीन पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह ने मामले की जांच का आदेश दिया था और उस समय के दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर श्री रमेश कुमावत को बुलाकर पूछताछ की गई थी। उसके बाद मामला ठंडे बस्‍ते में चला गया।

तीन एसएसपी आए और गए, लेकिन मामला ठंडे बस्‍ते में ही पड़ा रहा। जबकि ततकालीन दूसरे अधिकारी कहते रहे-दैनिक जागरण के खिलाफ कार्रवाई करने की मेरी औकात नहीं है। आप अदालत जाएं, तभी मामला दर्ज हो सकता है। अंत में थक हारकर उन्‍होंने ततकालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश भी दिया, लेकिन एसएसपी आफिस में बताया गया कि वहां ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं है। पिछले 21 अप्रैल को उन्‍होंने दोबारा जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की और उनसे फिर पत्र (डिस्‍पैच नंबर-3004/एचडी 4117-21-04-17) लिखवाया। इस बार उन्‍होंने पत्र की फोटो कॉपी भी ले ली। जैसी कि आशंका थी-जिलाधिकारी का पत्र न मिलने की बात दोबारा बता दी गई। उस पत्र को यहां अपलोड भी किया जा रहा है।

इससे पहले भी उन्‍होंने ततकालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से मेल के जरिये संपर्क किया था, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन उस समय भी अधिकारियों ने आदेश को ठंडे बस्‍ते में डाल दिया था। इसके अलावा आरटीआई के जरिये भी उन्‍होंने एफआईआर की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी, जिसका गोलमोल जवाब दे दिया गया था।

अब हालत यह है कि गूगल करेंगे तो वहां आपको गौतमबुद्धनबर के एसएसपी का कोई फोन नंबर नहीं मिलेगा। इस हालत में आखिर अपराध पर नियंत्रण कैसे और क्‍यों हो पाएगा। पुलिस अधिकारी इसी तरह से अन्‍यायी दैनिक जागरण प्रबंधन के अपराधों को इग्‍नोर करेंगे तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश कैसे मानेगा और अपने कर्मचारियों को प्रताडि़त करने से कैसे बाज आएगा। इस मुद्दे पर जनमत तैयार न किया गया और उसे मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के समक्ष न रखा गया तो आम जनता इसी प्रकार उत्‍पीड़न और अन्‍याय झेलने को बाध्‍य होगी।

अभी जीएसटी लागू ही नहीं हुआ तो दाम कैसे घट बढ़ सकते ?

श्रीकांत सिंह।

खबरों में जब भक्ति आ जाती है तो पत्रकारिता का कबाड़ा निकल जाता है। अभी जीएसटी लागू नहीं हुआ है, लेकिन हमारे देश के डिजिटल पत्रकार वस्‍तुओं के दाम घटाने बढ़ाने में लग गए हैं। उनके कारनामे समय समय पर सामने आते रहते हैं। कभी उन्‍हें दो हजार के नोट में चिप नजर आ जाती है तो कभी भारतीय सेना पाकिस्‍तान के सैनिक को मार कर आ जाती है। भारतीय सेना जब उसका खंडन करती है तो उनकी खबरों की भद्द पिट जाती है। कभी कभी तो वे लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे डलवा देते हैं।

पहले तो आल्‍हा में आल्‍हा ऊदल की बहादुरी का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन होता था, लेकिन अब न्‍यूज चैनल आल्‍हा गाने पर उतर आए हैं। सेना की तोपों को लेकर ये भारतीय सेना की बहादुरी का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, जैसे पत्रकारिता में वीर गाथा काल आ गया हो। आप इस लिंक पर क्लिक कर देखें किस प्रकार खबरों का कबाड़ा बनाया जा रहा है।

तभी तो मीडिया को कहा जाता है पालतू

श्रीकांत सिंह।

गूगल समाचार पर मंगलवार को एक ऐसी खबर चली जिसने मीडिया जगत को शर्मसार कर दिया। हालांकि बाद में इस खबर को सुधार लिया गया। खबर यह थी कि राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके नजदीकियों के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छोपेमारी की, लेकिन इस खबर को कुछ इस तरह से चलाया गया कि लालू के 22 ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे।

इस पर लालू ने तपाक से ट्वीट कर दिया कि हमारे वे 22 ठिकाने गिनाओ। लालू का वह ट्वीट यहां दिया जा रहा है, जो मीडिया की भद्द पीटने के लिए काफी है।

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