बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां ‘राष्‍ट्रीय मंच’

फोर्थपिलर टीम।  

भाजपा के विरोध में ‘राष्‍ट्रीय मंच’ नाम से बागी नेता यशवंत सिन्‍हा का कारवां निकल पड़ा है। इसमें अभी शत्रुघ्न सिन्हा, दिनेश त्रिवेदी(टीएमसी), माजिद मेमन, संजय सिंह (आप), सुरेश मेहता (पूर्व मुख्यमंत्री गुजरात), हरमोहन धवन (पूर्व केंद्रीय मंत्री), सोमपाल शास्त्री (कृषि अर्थशास्त्र), पवन वर्मा (जेडीयू), शाहिद सिद्दीक़ी, मोहम्मद अदीब, जयंत चैधरी (आरएलडी), उदय नारायण चौधरी (बिहार), नरेंद्र सिंह (बिहार), प्रवीण सिंह (गुजरात के पूर्व मंत्री), आशुतोष (आप) और घनश्याम तिवारी (सपा) शामिल हुए हैं।

बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने कहा, ‘मैं घोषणा करता हूं कि राष्ट्रमंच का सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का होगा। एनपीएस को ही देख लीजिए। नोटबंदी को मैं आर्थिक सुधार मानता हूं, फिर बुरी तरह लागू की गई जीएसटी। उससे छोटे उद्योग मर गए। बेरोज़गारी का क्या हाल है, भूख और कुपोषण के चलते बच्चों का भविष्य ख़तरे में है। आंतरिक सुरक्षा को देख लीजिए-ऐसे लगता है कि भीड़ ही न्याय करेगी और जब जाति और धर्म पर भीड़ तंत्र भारी पड़ता है तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।

बता दें कि किसानों के मुद्दों को लेकर बीजेपी के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने 30 जनवरी 2018 को राष्‍ट्रीय मंच की घोषणा की। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी भी शामिल हुईं। उन्‍होंने कहा कि बताया जाता है कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि विदेश नीति है, पर डोकलाम को ही देख लीजिए। जो चीन 10% था वो 90 % हो गया है। अब कोई 56 इंच की छाती को नहीं पूछता।

यशवंत सिन्‍हा ने दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर कहा कि हम सब अचानक साथ नहीं आए हैं। हम सब कई महीनों से संपर्क में थे और हम सभी देश की वर्तमान स्थिति पर चिंतित हैं। उन्‍होंने कहा कि हमें लगा कि देश की जनता के लिए एक आंदोलन करने की ज़रूरत है और हम वैचारिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हैं।

उन्‍होंने कहा कि हम बापू की समाधि पर गए तो लगा कि बापू का सरकारीकरण हो गया है। हमें अंदर नहीं जाने दिया गया। फिर काफी मानमुनव्‍वल के बाद हमें और मीडिया को अंदर जाने दिया गया। उन्‍होंने कहा कि 70 साल पहले आज के दिन उस महामानव ने देश के लिए अपना बलिदान दिया था। वर्तमान स्थिति में भी देश उन्हीं समस्याओं से ग्रस्त है। अगर आज हम नहीं खड़े हुए तो बापू का बलिदान व्यर्थ जाएगा।

यशवंत सिन्‍हा ने कहा कि न्यायालय में क्या हो रहा है-अब लीपापोती की जा रही है। आरोप क्या था कि कुछ केस को प्रफ़र्ड बेंच पर भेजा जा रहा था। क्या देश की जनता को जानने का हक़ नहीं है ? मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, उसका हाल आप देख ही रहे हैं। जो जांच एजेंसियां हैं सीबीआई, इनकम टैक्स आदि को किसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है। औद्योगिक विकास कम है और हमें देश के 60 करोड़ किसानों की फिक्र है। राज्य और केंद्र सरकारों ने किसान को भिखमंगा बना दिया है। किसान को एमएसपी नहीं मिल रही है। ये कभी मुद्दा नहीं बनता है।

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दूर से ही दिखने लगा है राजनीतिक संकट

श्रीकांत सिंह

हिंदुओं की एकता के नाम पर बडी मुश्किल से देश की जनता एकजुट हुई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी मिलकर उसी जनता का भरोसा तोड रहे हैं। गरीबों की गैस सब्सिडी बंद है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इंडियन ऑयल और पीएमओ तक शिकायत करने का कोई असर नहीं हो रहा है। दिल्‍ली और यूपी में मेट्रो ट्रेन के किराये में बेतहासा इजाफा किया जा रहा है। यही तो एक जनहितकारी और पर्यावरण को अनुकूल बनाने वाली व्‍यवस्‍था थी, जिसे धंधे पर लगाया जा रहा है। मेट्रो के किराये में एकायक इतना इजाफा कर दिया गया है कि अब हालत यह है कि लोग अपनी कार सडकों पर लाने की सोचने लगे हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत का भी कोई लाभ जनता को नहीं मिल रहा है। पुलिस आज भी लोगों के एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। कानून व्‍यवस्‍था की हालत खराब है। सरकार मजदूरों की नहीं, मालिकों की बात सुन रही है। लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं है। सरकार सोच रही है कि विपक्ष तो समाप्‍त ही हो गया और मीडिया पालतू हो गया है। अब चाहे कोई काम करें या नहीं, अकंटक राज करेंगे।

ऐसा सोचना सरकार और भाजपा दोनों के लिए आत्‍मघाती होगा। अब यदि जनता का भरोसा टूट गया तो जनता मान लेगी कि तिकडम से उसे मूर्ख बनाया गया है। ऐसी हालत में क्षेत्रीय दलों का उदय फिर होने लगेगा और किसी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में आक्रोश का माहौल बनने लगा है। राजनीतिक संकट दूर से ही दिखाई पडने लगा है।

बीजेपी का स्टार प्रचारक दैनिक भास्कर !

भवेंद्र प्रकाश

लखनऊ। चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मीडिया ने बीजेपी के प्रचार की जिम्मेदारी संभाल ली है। सीट बंटवारे को लेकर ही बीजेपी में कलह की खबरें आ रही हैं लेकिन इससे बेपरवाह मीडिया ने बीजेपी को जीत दिलानी भी शुरू कर दी है। अभी Times Now-VMR के सर्वे ने बीजेपी को 202 सीटें दिलवाकर इसका आगाज किया ही था कि दैनिक भास्कर का होर्डिंग सामने आया है।

लखनऊ में दैनिक भास्कर ने अपनी होर्डिंगें लगाई हैं। ऐसा ही एक होर्डिंग लखनऊ के लोहिया पथ पर लगा है, जिसमें लिखा है…. न माया का जाल, न अखिलेश का क्लेश।

अखबार की लाइनों पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत ही नहीं है। बगैर कहे ही दैनिक भास्कर का यह होर्डिंग मायावती और अखिलेश को विलेन बताते हुए भारतीय जनता पार्टी का खुले तौर पर प्रचार कर रहा है।

प्रशासन ने अभी तक इस पोस्टर पर कोई संज्ञान नहीं लिया है। वहीं भाजपा की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया है। वहीं चुनाव आयोग की अभी इस होर्डिंग पर नजर नहीं गई है।

गणतंत्र दिवस के बहाने

श्रीकांत सिंह

जैसा कि शब्‍द से ही स्‍पष्‍ट है-गण का मतलब समूह और तंत्र का मतलब तार। इस तार में बड़ी ताकत है। यह संवाहक का काम करता है। इसमें बिजली डाल दी जाए तो यह बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देता है। चुंबकीय तरंगें डाल दी जाएं तो उन्‍हें भी यह देश के कोने-कोने में पहुंचा देता है। तकनीकी विकास ने तंत्र यानी तार को भी बीच से हटा दिया है। इसी नियम पर हम टीवी, मोबाइल फोन, इंटरनेट आदि चलाते हैं। तार का काम अब तरंगें करने लगी हैं। राजतंत्र में यही तार राजा के पास होता था। संपूर्ण तंत्र को राजा अपने बाहुबल से हासिल करता था। इसीलिए वीरभोग्‍या वसुंधरा का नियम चलता था।

जाने माने कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा था-वीरता जब भागती है तो राजनीति और छल छंद की धूल उड़ती है। और आज यही हो रहा है। गणतंत्र शब्‍द से गण भी गायब है। आज तरंगें, लहरें, हिलोरें आदि चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। अब गण के रूप में जनता के प्रतिनिधि गायब हैं। एक व्‍यक्ति जिसे धन बल से तरंगित कर दिया गया, हर जगह उसी का बोलबाला है। नियम, कानून, संविधान आदि का कोई मतलब नहीं रह गया है। एक ही व्‍यक्ति के मन की बात ने नियम, कानून, संविधान आदि का रूप ले लिया है। और हम हैं कि प्रमादवश उसी की जयजयकार किए जा रहे हैं।

दरअसल, इसके कारण बहुत ही गहराई में हैं। आप तरह-तरह की तकनीक से सम्‍मोहित किए जा रहे हैं, जिसका आपको पता भी नहीं चल रहा है। और उसका परिणाम यह हो रहा है कि एक व्‍यक्ति विशेष को अहैतुक समर्थन मिल रहा है। अहैतुक का मतलब अकारण समर्थन मिल रहा है। आप अपनी मूर्छा तोड़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि जिस व्‍यक्ति के नाम का आप जप कर रहे हैं, उसने देश, समाज और आपके लिए कुछ भी नहीं किया है। वह मात्र सम्‍मोहन का सौदागर है जो आपके पैसों पर ऐश कर रहा है। बईमानी वह कर रहा है और बेईमान आपको बता रहा है।

देश के लोगों में मूर्छा की यह स्थ्‍िाति बहुत घातक है। इसने चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर दिया तो हालात और भी घातक हो जाएंगे। शीघ्र ही आपकी मूर्छा न टूटी तो बहुत देर हो जाएगी। जो व्‍यक्ति यह कहता है-मित्रो, हम उत्‍तर प्रदेश को गुंडामुक्‍त करना चाहते हैं। ये फर्जी मुकदमों का जो ये सिलसिला चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। ये भूमाफिया का जो आतंक चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। यही व्‍यक्ति सोहराबुद्दीन हत्‍या मामले में 25 जुलाई 2010 को गिरफ्तार हुआ था और जेल भेजा गया था। इस पर अपहरण, हत्‍या, हत्‍या की साजिश, सबूतों से छेड़छाड़, महिलाओं के फोन टेप करने और एक्‍जार्शन (सरकारी पद का दुरुपयोग कर धन संपत्ति हड़पने) के आरोप लगे हैं। तो भला यह आदमी कैसे उत्‍तर प्रदेश को गुंडों से मुक्‍त करा पाएगा।

इसी की तरह का एक और व्‍यक्ति है जो आज कल आपके पास वोट की भीख मांगने जा रहा है। उस पर 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें दो धर्मों के लोगों को लड़ाना, हत्‍या की धमकी देना, हत्‍या की साजिश, हत्‍या करना, मारपीट करना, धर्मों का मजाक उड़ाना, धोखाधड़ी, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना, फर्जी दस्‍तावेज तैयार करना, चोरी, डकैती और दंगे करवाना आदि प्रमुख हैं।

आश्‍चर्य है कि इन पर दंगे के मामले चल रहे हैं और इनका दावा है कि ये उत्‍तर प्रदेश को दंगामुक्‍त प्रदेश बनाएंगे। तो आपके पास ऐसे लोग वोट मांगने जाएं तो उनकी जन्‍म कुंडली किसी काबिल ज्‍योतिषी से जरूर दिखा लेना। जब कुंडली का मिलान विवाह में आवश्‍यक बताया जाता है तो आपके भविष्‍य का विधाता बनने का दावा करने वालों की कुंडली क्‍यों न परख ली जाए। आप इन्‍हें इसलिए वोट न दे देना कि ये देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों में गिने जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों की संख्‍या नौ से कहीं ज्‍यादा हो सकती है, क्‍योंकि उनकी गणना अभी व्‍यवस्थित रूप से नहीं की गई है। कुछ अखबारों और टीवी न्‍यूज चैनलों के मालिक भी मोदी जी के रत्‍नों में शामिल हैं क्‍योंकि वे बिना शर्त मोदी जी का यशोगान करते हैं। ऐसे अखबारों और चैनलों की खबरों पर आप नजर डालें तो आपको कोई प्रमाण नहीं ढूंढना पड़ेगा।

दैनिक जागरण अखबार यह दावा करता है कि वह दुनिया में सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है। उसका सर्कुलेशन चेक करने के लिए मोदी जी सारा जग घूम आए और पाया कि इस जैसा अखबार कोई नहीं है। शायद इसीलिए इस अखबार के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाकर मोदी जी कृत कृत्‍य होते रहते हैं। इस अखबार के मालिक, प्रधान संपादक, सीईओ आदि आदि श्री संजय गुप्‍ता हैं।

बड़े ज्ञानी किस्‍म के आदमी लगते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने एक बार फरमान जारी किया था कि अब दैनिक जागरण स्‍वतंत्रता दिवस समारोह नहीं मनाएगा। क्‍योंकि स्‍वतंत्रता मुनाफाखोरी के रास्‍ते की सबसे बड़ी बाधा है। उन्‍होंने कहा था कि अब दैनिक जागरण के लोग गणतंत्र दिवस समारोह मनाएंगे, क्‍योंकि इसी दिन देश का संविधान लागू हुआ था। और अब जागरण में नियमों पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। फिर क्‍या था। धड़ाधड़ ऐसे नियम बनाए जाने लगे जो मुनाफाखोरी को आगे ले जा सकते थे और कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता छीन सकते थे। उन्‍हीं नियमों ने न जाने कितने निष्‍ठावान कर्मचारियों को भूतपूर्व बना दिया। अब मजीठिया वेजबोर्ड के नियम का पालन करने की बारी आई तो माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी पहाड़ा पढ़ाने लगे हैं। तो कुल मिलाकर गणतंत्र दिवस के बहाने यही कहना था-गणतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है इस देश में। अगर कुछ है तो वह है मोदी जी का नवरत्‍नतंत्र। इसी के इंद्रजाल में जनता छटपटा रही है। किसी को कुछ समझ में नहीं आता कि मोदी जी ईमानदार हैं या बेईमान, देवता हैं या राक्षस, राम हैं या रावण, महान हैं या धनवान, साधू हैं या सवादू, फकीर हैं या अमीर, काबिल हैं या रईस आदि आदि।

परिवारवाद और दलबदलुओं के चक्रव्‍यूह में भाजपा

श्रीकांत सिंह

वंशवाद या परिवारवाद शासन की वह पद्धति है जिसमें एक ही परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते जाते हैं। वंशवाद, भाई-भतीजावाद का जनक और इसका एक रूप है। ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र में वंशवाद के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर भी अनेक देशों में अब भी वंशवाद का प्रभुत्‍व है। वंशवाद, निकृष्टतम कोटि का आरक्षण है। यह राजतंत्र का एक सुधरा हुआ रूप कहा जा सकता है। वंशवाद, आधुनिक राजनैतिक प्रगतिशीलता के विरुद्ध है।

वंशवाद की कई हानियां हैं जिससे नए लोग राजनीति में नहीं आ पाते। वंशवाद सच्चे लोकतंत्र को मजबूत नहीं होने देता। अयोग्य शासक देश पर शासन करते हैं जिससे प्रतिभातंत्र के बजाय मेडियोक्रैसी को बढ़ावा मिलता है। समान अवसर का सिद्धांत पीछे छूट जाता है। ऐसे कानून एवं नीतियां बनाई जाती हैं जो वंशवाद का भरण-पोषण करती रहती हैं। आम जनता में कुंठा की भावना घर करने लगती है। दुष्प्रचार, चमचातंत्र, धनबल एवं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता है ताकि जनता का ध्यान वंशवाद की कमियों से दूर रखा जा सके। जनता में स्वतंत्रता की भावना की कमी बनी रहती है। देश की सभी प्रमुख संस्थाएं पंगु बनाकर रखी जाती हैं।

भारत में वंशवाद अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। इस मामले में नेहरू खानदान सबसे प्रमुख है जिसमें जवाहर लाल नेहरू,  इंदिरा गांधी,  राजीव गांधी,  सोनिया गांधी और राहुल गांधी सत्ता का आनंद उठाते रहे हैं। इसके अलावा छोटे-मोटे कुछ और भी उदाहरण हैं जैसे बाल ठाकरे द्वारा शिवसेना में परिवारवाद को बढ़ावा देना,  लालू यादव,  शरद पवार, शेख़ अब्दुल्ला,  फ़ारुख़ अब्दुल्ला,  उमर अब्दुल्ला परिवार,  माधवराव सिंधिया परिवार,  मुलायम सिंह यादव आदि भी इसे प्रोत्साहित करते आए हैं।

भाई-भतीजावाद अथवा नेप्टोइज्म दोस्तवाद के बाद आने वाली एक राजनीतिक शब्दावली है जिसमें योग्यता को नजर अंदाज करके अयोग्य परिजनों को उच्च पदों पर आसीन कर दिया जाता है। नेप्टोइज्म शब्द की उत्पत्ति कैथोलिक पोप और बिशप द्वारा अपने परिजनों को उच्च पदों पर आसीन कर देने से हुई। बाद में इस धारणा को राजनीति, मनोरंजन, व्यवसाय और धर्म संबंधी क्षेत्रों में भी बल मिलने लगा।

परिवारवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी अब परिवारवाद से अछूती नहीं रह गई है। सत्‍ता की लालसा में पीएम मोदी की नसीहत काम न आई और यह पार्टी भी परिवारवाद के चक्रव्‍यूह में घिर गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले ही नसीहत दी थी कि पार्टी नेता अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट न मांगें लेकिन चुनावों के लिए टिकट बंटवारे में परिवारवाद धड़ल्‍ले से चला है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 के लिए उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की उसमें जमकर ‘अपनों’ को टिकट बांटे गए। मजेदार बात यह रही कि भाजपा ने पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने वाले कई ऐसे नेताओं को विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है, जो पार्टी में परिवारवाद और दलबदलुओं को तरजीह दिए जाने के हालात को बयां करते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह को अतरौली से टिकट दिया गया है, लेकिन केंद्रीय मंत्री एवं उत्तरप्रदेश के दिग्गज नेता राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह के नाम पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है क्योंकि इस सूची में पंकज सिंह का नाम नहीं है।

उत्तर प्रदेश की पहली लिस्ट में सबसे ज्यादा मेहरबानी पार्टी ने दलबदलुओं पर दिखाई है। बलदेव सीट पर लोक दल से आए पूरन प्रकाश को टिकट मिला है। महज 24 घंटे पहले सपा छोड़कर पार्टी में आई पक्षालिका सिंह को भाजपा ने बाह से पार्टी प्रत्याशी बनाया है। बसपा से पाला बदलकर भाजपा में शामिल हुए महावीर राणा को बेहट से और धर्मसिंह सैनी को नकुट से उम्मीदवारी दी गई है।

गंगोह से कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले प्रदीप चौधरी को और नहटोर से ओम कुमार को टिकट मिला है। ओम बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। इसके अलावा बसपा से आए अरविंद गिरि, रोमी साहनी,  बाला प्रसाद अवस्थी और रोशन लाल वर्मा को भी भाजपा ने टिकट दिया है।

उत्तराखंड में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र सौरभ बहुगुणा को टिकट दिया है जो कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए। भाजपा में शामिल होने वाले प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यशपाल आर्य और उनके पु़त्र संजीव आर्य को टिकट दिया गया है। इसके अलावा केदार सिंह रावत को भी पार्टी ने टिकट दिया है। पार्टी ने पूर्व सांसद सतपाल महाराज को भी टिकट दिया है जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। भाजपा ने रानीखेत से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट को टिकट दिया है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की पु़त्री रितू खंडूरी भूषण को टिकट दिया गया है।

केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने पार्टी मुख्यालय में उम्मीदवारों का ऐलान किया था। यूपी के लिए कुल 149 उम्मीदवारों की घोषणा की गई तो उत्तराखंड के लिए कुल 64 उम्मीदवारों के नामों की सूची जारी की गई है। भाजपा की इस सूची से पार्टी परिवारवाद और दलबदलुओं के चक्रव्‍यूह में फंसी नजर आ रही है। दरअसल, किसी भी पार्टी में जब इस तरह के रवैये को बढ़ावा मिलता है तो वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे कार्यकर्ता निराश और हताश होते हैं, जिससे पार्टी को चुनाव में भितरघात का सामना करना पड़ता है।