पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश

मजीठिया वेतनमान लागू करके देश की सभी समस्‍याओं का समाधान किया जा सकता है। पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश लंबे समय से चली आ रही है। उन्‍हें आज तक कोई भी वेतनमान नहीं दिया गया। यही वजह है कि टुच्‍चे टुच्‍चे लोग पत्रकारों को अपने हिसाब से घुमा लेते हैं। और जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अखबार के मालिकों और सरकारों का गठजोड़ लंबे समय से चला आ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गठजोड़ को शिखर पर पहुंचा दिया है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट से भी पत्रकारों को न्‍याय नहीं मिल पा रहा है। सरकार यदि इच्‍छा शक्ति का उचित प्रदर्शन करती तो पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान कब का मिल गया होता और उन्‍हें सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर नाक न रगड़नी पड़ती। अब आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री इसमें क्‍या कर सकते हैं… कानून की बात करें तो जो मुझे मोटामोटी जानकारी है, उसके अनुसार जो व्‍यवस्‍था अखबार मालिकों के लिए सरकारी विज्ञापन और कोटे के कागज की व्‍यवस्‍था करती है, उसी व्‍यवस्‍था में पत्रकारों के लिए वेतनमान की भी व्‍यवस्‍था है।

इस व्‍यवस्‍था को अव्‍यवस्थित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अखबार मालिकों के साथ खड़े नजर आते हैं। वह बिजली के लिए तो ईद, दीपावली और होली की चर्चा करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि मजीठिया वेतनमान हिंदू पत्रकार को चाहिए तो मुसलिम पत्रकार को भी। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो जाएं तो इन राजनीतिबाजों के होश ठिकाने लग जाएंगे। स्‍वच्‍छ पत्रकारिता और स्‍वच्‍छ राजनीति के लिए मजीठिया वेतनमान का लागू होना जरूरी है। उसके लिए सरकार अखबार मालिकों का सरकारी विज्ञापन और कोटे का कागज बंद करके उन्‍हें रास्‍ते पर ला सकती है। जब तक अखबार मालिकों को रास्‍ते पर नहीं लाया जाएगा, समाज और देश के विकास की कल्‍पना तक नहीं की जा सकती।

सारे भ्रष्‍टाचार और अपराधों की जड़ में कहीं न कहीं अखबार मालिकों की मनमानी काम करती है। क्‍योंकि उन्‍होंने पत्रकारिता को कुंद बना दिया है। उम्‍मीद है कि मोदी जी इस दिशा में अवश्‍य इच्‍छाशक्ति दिखाएंगे। महिमामंडन के मोह में उन्‍हें अखबार मालिकों की गुलामी करने से बाज आना चाहिए। दिल्‍ली और बिहार के चुनावों में दैनिक जागरण ने उनका महिमामंडन तो किया, लेकिन परिणाम क्‍या हुआ…भाजपा चुनाव हार गई। इसलिए महिमामंडन का कोई मतलब नहीं होता। ये तो पब्लिक है, सब जानती है। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो रहे हैं। इसलिए मोदी जी को महिमामंडन की बैसाखी का परित्‍याग कर देना चाहिए और मजीठिया वेतनमान लागू कराने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

Advertisements

ऐतिहासिक दिन और ऐतिहासिक फैसला

मजीठिया मंच

वह ऐतिहासिक तारीख आज ही की तारीख थी जब सर्वोच्च न्यायालय ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। न्यायालय के इतने स्पष्ट फैसले और आदेश के बाद भी मीडियाकर्मियों में अपने हक के प्रति कोई खास लालसा नहीं जगी। कारण साफ था। पिछले वेतनबोर्ड की सिफारिशों का हश्र हम सबके दिल और दिमाग पर छाया था। साथ ही प्रबंधन की शातिराना चालबाजी भी।
फरवरी से लेकर मार्च तक देश में मजीठिया को लेकर लोगों में बस उत्सुकता भर थी। प्रबंधन और मालिक अपनी चाल चलने में लगे थे। इस फैसले के खिलाफ जानबूझकर देर से पुनर्निरीक्षण याचिका लगाई गई ताकि प्रधान न्यायाधीश महोदय की सेवानिवृत्ति के बाद यह मामला कई महीनों और सालों तक लटका रहे। लेकिन हम हजारों मेहनतकश के साथ हमारी तकदीर नहीं तो क्या, कानून और संविधान है। मालिकों की चालाकी धरी की धरी रह गई और उनकी पुनर्निरीक्षण याचिका 10 अप्रैल 2014 को खारिज कर दी गई। मेहनतकशों के लिए दूसरी सफलता और आशा।
अब रास्ता साफ था, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। अप्रैल तक फिर सन्नाटा रहा लेकिन दैनिक जागरण के कुछ साथियों ने जागरूकता फैलाने की पहल की। सोशल मीडिया के सहारे और आप सभी साथियों के बीच अवमानना के मामले की पुरजोर तरीके से प्रचार–प्रसार किया गया। जून–जुलाई आते-आते परिणाम भी दिखने लगा।
इंडियन एक्सप्रेस के साथी और भास्ककर के तीन साथी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। कुछ कारणों से पहल करने वाले दैनिक जागरण के साथी बाद में सुप्रीम कोर्ट जा सके।
इन घटनाओं का व्यापक असर पूरे देश में पड़ा। रांची, पटना, इंदौर, भोपाल, रायपुर, मुंबई, अहमदाबाद, पुणे, जयपुर, हैदराबाद, बंगलोर, चेन्नई, लखनऊ, कानपुर वाराणसी कोलकाता और भुवनेश्वर, जैसे शहरों में मजीठिया की मांग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी। डर का माहौल थोड़ा कम हुआ और लोग सामने आने लगे।
एक्सप्रेस और दैनिक जागरण, भास्कर के खिलाफ पहली सुनवाई के बाद स्थिति और बदल गई। मालिकों द्वारा यह अफवाह फैलाने के बाद कि वे कोर्ट में लड़ रहे साथियों को खरीद लेंगे, साथियों में जैसे मजीठिया लेने की जिद पैदा हो गई। और जब उन्हें पता चला कि अवमानना का मामला दर्ज कराने का मौका एक साल तक ही है, प्रबंधन के खिलाफ जाने वालों का तांता लग गया। आज के हालात जो हैं आपके सामने हैं।
हम सभी साथियों ने सुप्रीम कोर्ट को यह विश्वास दिला दिया है कि प्रबंधन अपने कर्मचारियों के साथ न सिर्फ मक्कारी कर रहा है बल्कि माननीय अदालत के फैसले से बचने का अवैध और वैध तरीके ढूंढ़ रहा है। लगभग सभी शहरों में अखबारों के कार्यालयों में साथियों को परेशान किया जा रहा है। लेकिन अब कोई न तो डर रहा है और न ही किसी को डरने की जरूरत है।
साथियों इस ऐतिहासिक दिन पर हम इस बात की कोशिश करें कि हमारी यह एकता बनी रहे। मालिकों और प्रबंधन की अफवाह का शिकार हम न बनें। यही हमारी जीत की कुंजी होगी। धैर्य और शांति जरूरी है।

हमारे देश का वोटर बहुत कन्‍फ्यूज होता है

यहां स्‍कैम का फुलफार्म कुछ ऐसे बताते हैं

हमारे देश का वोटर बहुत कन्‍फ्यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है

कहीं रैली, कहीं नारा, कहीं हमला भी होता है

कहीं पर दम दिखाने को बड़ा जुमला भी होता है

मगर होती नहीं है कद्र अब उत्‍तम विचारों की

सैलरी के लिए मुद्दत से लड़ते पत्रकारों की

यही तबका है जो हरहाल में मिसयूज होता है।

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है।

नहीं है लोक का वो तंत्र जो सबका भला चाहे

यहां बनता वही नेता जो खुद अपना भला चाहे

कहीं पर बात की बातें, कहीं जजबात की बातें

जमीं पर कुछ नहीं दिखता, सभी की बात की बातें

दिखा दे जो यहां चैनल, बस वही न्‍यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है, कहीं पर यूज होता है

किसानों की कसक का नाम लेकर जीत जाते हैं

विरोधी की ठसक का नाम लेकर जीत जाते हैं

 

मगर कुछ काम करने की, जिन्‍हें आदत नहीं होती

वही हर बार का देखो एलेक्‍शन जीत जाते हैं

कोई चूना लगाकर देश से क्‍यूं भाग जाता है

कोई वादे से अपने जीत कर भी भाग जाता है

मगर अब तक नहीं निपटा जो हम पर ड्यूज होता है

कहीं पर न्‍यूज होता है कहीं पर यूज होता है

-SHRIKANT SINGH

 

मोदी और जेटली को आर्थिक नीतियों का ज्ञान नहीं

अरुण माहेश्‍वरी

कल यानी 31 जनवरी को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण ने जिन तथ्यों की ताईद की है, वे हैं-

  1. नोटबंदी ने देश की अर्थ-व्यवस्था को गहरा नुक़सान पहुँचाया है। जीडीपी में वृद्धि की पिछले साल की दर 7.6 से घट कर 6.5 प्रतिशत रहेगी। इससे न काला धन पर कोई असर आया है और न जाली रुपयों पर। इसने अनौपचारिक कही जाने वाली असंगठित मज़दूरों से जुड़ी अर्थ-व्यवस्था को तबाह किया है। इससे न कैशलेस अर्थ-व्यवस्था को कोई बल मिलेगा, न डिजिटलाइजेशन को। इससे न सरकार के पास कोई अतिरिक्त धन आएगा जिससे वह कल्याणमूलक कामों में ख़र्च में कोई बढ़ोतरी कर पाएगी। इस वजह से सरकार का बजट भी प्रभावित होगा।
  2. आर्थिक सर्वेक्षण में खुले आम पिछले सत्तर साल के स्वाधीन भारत की आर्थिक उपलब्धियों को स्वीकारा गया है, जिसके बारे में मोदी कंपनी दिन रात यही कहती रहती है कि इन सभी सालों में कुछ भी नहीं किया गया है! आजादी के वक़्त भारत के सत्तर प्रतिशत लोग ग़रीबी की सीमा रेखा के नीचे थे, आज 22 प्रतिशत हैं। इससे भी बड़ी बात यह रही कि ये उपलब्धियाँ जनतंत्र के राजनीतिक ढाँचे को क़ायम रखते हुए की गई हैं।
  3. इसमें मनमोहन सिंह और चिदंबरम के वित्त मंत्री के काल की उपलब्धियों को स्वीकारा गया है, जबकि दो दिन पहले मोदी के सूचना मंत्री वैंकय्या नायडू इन्हें विफल अर्थशास्त्री कह कर इनकी निंदा कर रहे थे।
  4. कुल मिला कर यह आर्थिक सर्वेक्षण इस सचाई का बयान है कि नरेंद्र मोदी और उनके वक़ील वित्त मंत्री को आर्थिक नीतियों के बारे में रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है । ये गाल बजाने में ही उस्ताद है।

रोहित दुबे कहते हैं-नोटबन्दी से क्या लाभ होगा, ये बात सीधे सीधे आर्थिक सर्वे में भी नहीं बताई गई है। हाँ यह कह देना कि दीर्घकालीन लाभ हो सकते हैं,  यह आर्थिक विश्लेषण कम, राजनीतिक विश्लेषण आधिक लग रहा है। वो दीर्घकालिक लाभ क्या होगा, सरकार को भी नहीं पता। हाँ भविष्य में किसी भी लाभ को,  नोटबन्दी की वजह से हुआ लाभ को बताने के लिए पात्रा साहब और जेटली जी समय समय पर अपने कुतर्क देते रह सकते हैं।

इस पर अरुण माहेश्‍वरी कहते हैं-इसमें अल्पकालिक या दीर्घकालीन, किसी प्रकार के लाभ की बात नहीं कही गई है। सिर्फ और सिर्फ नुक़सान की बात कही गई है।

महेश सारस्‍वत कहते हैं-नोटबन्दी के 83 दिन के भी देश की जनता को कोई राहत नहीं आईएमएफ़ ने अपने आर्थिक सर्वे में भारत की विकास दर को 1% घटाया और खुद सरकार ने अपने बजट प्रतिवेदन में देश की औद्योगिक विकास दर में होने वाले संभावित 1% नुकसान को भी स्वीकार किया। बाकी कृषि विकास दर में भी 1% गिरावट दर्ज हुई ….!

आर्थिक_सर्वे_2017_में यह भी बताया गया है कि मोदी सरकार की नीतियों से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की वजह से बैंकों के डूबे कर्ज इस साल बढ़कर दोगुने हो गए;  सरकारी बैंकों में तो ये बढ़कर 12% हो गए। वैसे ये पूरी संख्या नहीं है क्योंकि बट्टे खाते में डाले कर्ज (write off) इसमें नहीं जोड़े जाते। इसमें से 71% सिर्फ 50 कम्पनियों द्वारा दबाए गए हैं जिन्होंने औसतन 20 हजार करोड़ दबा लिया है। सबसे बड़ी 10 कम्पनियों ने तो प्रति कम्पनी 40 हजार करोड़ रुपये दबा लिए हैं।

सर्वे में उपाय सुझाया गया है कि रिजर्व बैंक के पास 4 लाख करोड़ रुपये की फालतू पूँजी है,  उससे लेकर इसे सरकारी बैंकों को दे दिया जाए, ताकि वे इन ‘उद्यमियों’ को और बड़े कर्जे दबा लेने का मौका देकर पुरस्कृत कर सकें! जब तक ऐसा हो तब तक के लिए सरकार बजट से 70 हजार करोड़ देगी !

बीजेपी का स्टार प्रचारक दैनिक भास्कर !

भवेंद्र प्रकाश

लखनऊ। चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मीडिया ने बीजेपी के प्रचार की जिम्मेदारी संभाल ली है। सीट बंटवारे को लेकर ही बीजेपी में कलह की खबरें आ रही हैं लेकिन इससे बेपरवाह मीडिया ने बीजेपी को जीत दिलानी भी शुरू कर दी है। अभी Times Now-VMR के सर्वे ने बीजेपी को 202 सीटें दिलवाकर इसका आगाज किया ही था कि दैनिक भास्कर का होर्डिंग सामने आया है।

लखनऊ में दैनिक भास्कर ने अपनी होर्डिंगें लगाई हैं। ऐसा ही एक होर्डिंग लखनऊ के लोहिया पथ पर लगा है, जिसमें लिखा है…. न माया का जाल, न अखिलेश का क्लेश।

अखबार की लाइनों पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत ही नहीं है। बगैर कहे ही दैनिक भास्कर का यह होर्डिंग मायावती और अखिलेश को विलेन बताते हुए भारतीय जनता पार्टी का खुले तौर पर प्रचार कर रहा है।

प्रशासन ने अभी तक इस पोस्टर पर कोई संज्ञान नहीं लिया है। वहीं भाजपा की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया है। वहीं चुनाव आयोग की अभी इस होर्डिंग पर नजर नहीं गई है।

सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत

श्रीकांत सिंह

समाज में सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत है। सेना के एक सिपाही का वीडियो बना कर उसे वायरल कर देना; खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपने पर मुंबई के विले पार्ले स्थित खादी भंडार के कर्मचारियों का विरोध करना और बाहर आकर प्रदर्शन भी करना; भारतीय रिज़र्व बैंक के कर्मचारियों का भी गवर्नर उर्जित पटेल को पत्र लिखकर संस्थान की स्वायत्तता और गरिमा से खिलवाड़ न होने देने के लिए आगाह करना आदि ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि लोग संस्‍थानों की मनमर्जी सहने के लिए अब तैयार नहीं हैं। उसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।

कुछ इसी तरह की मनमर्जी का विरोध मीडिया संस्‍थानों खासतौर पर प्रिंट मीडिया में हुआ है। अखबार मालिक इन दिनों बिचौलियों पर अपनी मुनाफाखोरी लाद रहे थे, जिसके विरोध में लोगों ने नौकरियां छोड़ी तो तमाम लोग मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों का क्रियान्‍वयन न किए जाने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन किए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। जाहिर है कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति संजीदा है। इसलिए भय दिखाकर शासन करने वालों को अब चिंतित हो जाना चाहिए।

प्रिट मीडिया की एक चिंता रही है कि आने वाले दिनों में कागज की किल्‍लत की वजह से मीडिया का प्रिंट स्‍वरूप समाप्‍त हो जाएगा। लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ी चिंता का विषय उनका यह अहंकार है कि वे ही जनमत तैयार करते हैं। आपको बता दें कि ज्‍यादातर लोग अखबार नहीं पढ़ते। ऐसे लोगों की संख्‍या कम नहीं है जो टीवी भी नहीं देखते। लेकिन ये मीडिया संस्‍थान सरकार और नेताओं पर अपनी धौंस जमाते रहते हैं, क्‍योंकि वहीं से इनकी मुनाफाखोरी का रास्‍ता निकलता है।

हमारे देश की संस्‍थाएं मीडिया घरानों की कुछ इस तरह से गुलाम हैं कि वर्षों बीत गए, लेकिन प्रिंट मीडिया के पीडि़तों को न्‍याय नहीं मिल सका। आगे भी न्‍याय में देरी करने की प्रवृत्ति जारी है। यह प्रवृति इतनी घातक है कि लोगों का न्‍यायपालिका से भी विश्‍वास उठता जा रहा है। सरकार है कि उसे इसकी कोई चिंता ही नहीं है। इसलिए वह दिन दूर नहीं जब लोग न्‍यायपालिका का भी सम्‍मान करना बंद कर देंगे। यह बहुत ही घातक स्थिति होगी, क्‍योंकि लोग त्‍वरित न्‍याय के लिए खुद ही निपटना शुरू कर देंगे।

कानून का राज बनाए रखने के लिए न्‍यायपालिका को अपने कर्तव्‍यों के प्रति संजीदा होना होगा। कितनी अजीब बात है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश का उल्‍लंघन सहना पड़ रहा है। पता कीजिए कि यह सब कौन करा रहा है; क्‍यों करा रहा है; क्‍या परिणाम होगा इसका। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मजीठिया मामले को पेंडिंग में डाल दिया गया है। आखिर क्‍यों… क्‍या अखबारों में काम कर रहे लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है कि वे इतना लंबा इंतजार कर पाएंगे। मानवीय आधार पर सुप्रीम कोर्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्‍योंकि लोग अब भयभीत रहने के लिए राजी नहीं हैं। डर के आगे जीत का रहस्‍य लोग समझ गए हैं।

मोदी ने भारत को 1970 के दशक में धकेल दिया

नोटबंदी पर लिखा पत्रकार बरखा दत्त का लेख हुआ वायरल

जनता का रिपोर्टर से साभार

पत्रकार बरखा दत्त ने वॉशिंगटन पोस्ट में एक लेख लिखा है। बरखा दत्त के मुताबिक, बीजेपी के मार्केटिंग कंसलटेंट सुनील अलघ ने कहा, भारत में कुछ ज्यादा ही डेमॉक्रेसी है, इसलिए मुश्किल फैसले नहीं लिए जाते। उनका यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले पर आया था।

नोटबंदी और इससे उपजी परेशानी पर बरखा अपना विशेलेषण करते हुए लिखती है कि पीएम मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट अमान्य कर दिए। एेसे देश में जहां करीब 90 प्रतिशत ट्रांजेक्शंस कैश में होती हैं, वहां सिर्फ 4 घंटों पहले यह सूचना दी गई थी। इसका मकसद था कि टैक्स चोर को समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं उसे खत्म करना। लेकिन खराब संपर्क और प्लानिंग के कारण लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ा।

इसके बाद बरखा 1971 को याद करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषण और पीएम मोदी के भाषण में सामान्तर विषय पर बात करते हुए कहती है कि नरेंद्र मोदी का नोटबंदी फैसला और केंद्र के पास सारी ताकत कई मायनों में 1970 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाता है। नरेंद्र मोदी का यह नोटबंदी का फैसला 1969 में इंदिरा द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के जैसा ही है।

मोदी ने नए साल की पूर्व संध्या पर जो भाषण दिया था, उसमें कुछ नारे इंदिरा के 1971 में दिए गए नारों जैसा था। उस समय इंदिरा ने कहा था, वह कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने कहा, वह कहते हैं मोदी को हटाओ, मैं कहता हूं भ्रष्टाचार हटाओ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बरखा लिखती हैं कि नरेंद्र मोदी ने 50 दिन मांगे थे, लेकिन 2 महीने बीत जाने के बाद हमें पूछना चाहिए कि आखिर इस फैसले से हासिल क्या हुआ। अॉल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ने कहा कि राजस्व में 50 प्रतिशत और लघु उद्योगों की नौकरियों में 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी से जो लक्ष्य हासिल किया जाना था वह तो अब साफ नहीं हुआ। अगर मसकद सिस्टम से काला धन हटाना था तो वह भी नहीं हुआ। सिर्फ 6 से 10 प्रतिशत पैसा ही काले धन के रूप में सामने आया। दूसरी चीज सारे बंद हुए नोट वापस सिस्टम में आ गए।