सरकारीपना का रोग

श्रीकांत सिंह।

कुछ लोग पत्रकारिता में तारीफ को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, लेकिन जब इसकी वकालत कुछ पत्रकार साथी भी करने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि पत्रकारिता को सरकारीपना का रोग लग गया है। अरे भइया, पत्रकारिता में सरकार की तारीफ से ठीक उसी प्रकार परहेज करना चाहिए जैसे शुगर के मरीज को मीठा से परहेज करना होता है।

तारीफ के लिए सरकार के पास पूरा बजट होता है और वह उस पर खर्च भी करती है। मुफ्त में साहेब की तारीफ करने के लिए डॉक्‍टर ने बताया है क्‍या… आपको कोई भक्‍त पत्रकार कह देगा तो बुरा मान जाएंगे। यदि आप चारण बने रहना चाहते हैं और पत्रकार कहलाने का शौक भी चर्राया रहता है तो यह आपकी समस्‍या हो सकती है, पत्रकारिता की नहीं। वैसे, जनहित में सरकार की किसी कल्‍याणकारी योजना का विश्‍लेषण किया जा सकता है।

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ऐसे लिखें एक संपूर्ण समाचार

पत्रकारिता सीखें-भाग एक

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता यानी समाचार लिखने की कला। वैसे तो यह कला काफी कुछ कुदरत की देन होती है। तमाम बड़े पत्रकार अपनी कुदरती प्रतिभा के बल पर ही नाम रोशन कर सके हैं, क्‍योंकि उनके जमाने में इस क्षेत्र में प्रशिक्षण की व्‍यवस्‍था ही नहीं थी। लेकिन आज पत्रकारिता सिखाने वाले संस्‍थानों की बाढ़ सी आ गई है फिर भी बड़े पत्रकार नहीं पैदा हो रहे हैं। हम इस आलेखमाला के जरिये कुछ ऐसे प्रमुख विंदुओं की चर्चा करेंगे जो समाचार लेखन में मददगार होते हैं।

अच्‍छा समाचार लिखने के लिए पत्रकारीय दृष्टि का होना अतिआवश्‍यक होता है। निरंतर अभ्‍यास से ही यह दृष्टि पैदा हो पाती है। पत्रकारीय दृष्टि का आशय है कि किसी भी घटना की रिपोर्टिंग करते समय ऐसी बातों पर नजर रखना, जिन पर आम आदमी का ध्‍यान नहीं जाता। मसलन, किसी भवन में आग लगने की घटना घटी है तो क्‍या उस भवन में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्‍त उपाय किए गए हैं या नहीं। भवन निर्माण के मानकों का पालन हुआ है या नहीं। वहां जो उद्योग चलाया जा रहा है, उसकी स्‍थानीय प्रशासन से अनुमति है या नहीं।

इसके बाद नंबर आता है समाचार के तत्‍वों का। सामान्‍य तौर पर समाचार के तत्‍वों को 5 डब्‍ल्‍यू और 1 एच के जरिये समझा जाता है। पहला डब्‍ल्‍यू है-ह्वाट यानी क्‍या हुआ। दूसरा डब्‍ल्‍यू है-ह्वेयर यानी कहां की घटना है। तीसरा डब्‍ल्‍यू है-ह्वैन यानी कब की घटना है। चौथा डब्‍ल्‍यू है-ह्वाई यानी घटना क्‍यों घटित हुई। पांचवां डब्‍ल्‍यू है-हू यानी घटना के पीछे कौन है। एच का मतलब है हाऊ यानी घटना कैसे घटी। समाचार लेखन के इन छह तत्‍वों पर ध्‍यान दिया जाए तो एक संपूर्ण समाचार लिखा जा सकता है।

आमतौर पर देखा जाता है कि पत्रकारिता का अधकचरापन इतना बढ़ गया है कि अनगिनत पत्रकारिता संस्‍थानों से पास होकर निकले अधिकांश पत्रकारों के समाचार में इन बुनियादी तत्‍वों का अभाव रहता है। इन बुनियादी बातों के अलावा समाचार को सजाने और उसे जानकारी से लैस करने के और भी टिप्‍स हैं जो एक सफल पत्रकार बनाने में सहायक होते हैं। उन पर चर्चा फिर कभी…।

पत्रकारिता के सारे मानदंड भूल जाता है दैनिक जागरण

फोर्थपिलर टीम।

सुप्रीम कोर्ट में पेशी होती है तो दैनिक जागरण प्रबंधन क्‍वालिटी जर्नलिज्‍म यानी गुणवत्‍ता वाली पत्रकारिता की दुहाई देता है, लेकिन जब पुलिस को बचाना होता है या अपने किसी कर्मचारी का दायित्‍व सिर पर आता है तो वह पत्रकारिता के सारे मानदंड भूल जाता है। पिछले दो दिनों में उसने दो खबरों के साथ जी भरकर अत्‍याचार किया है और यह साबित करने की चेष्‍टा की है कि वह अपने कर्मचारियों पर ही नहीं, खबरों के साथ भी अत्‍याचार करने में नंबर वन है।

पहली खबर गाजीपुर से है, जिसमें दैनिक जागरण के पत्रकार व आरएसएस कार्यकर्ता राजेश मिश्र की दिनदहाड़े गोली मार कर हत्‍या कर दी गई। इस खबर को वहां के अखबारों ने पहले पेज पर स्‍थान दिया है, जबकि दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में भी यह खबर नहीं छपी है। सुबह ईपेपर देखा गया तो गाजीपुर संस्‍करण अपलोड ही नहीं किया गया था। अलबत्‍ता डिजिटल में यह खबर जरूर नजर आ रही है और उसमें इस बात का भी उल्‍लेख है कि राजेश मिश्र दैनिक जागरण के अंशकालिक पत्रकार थे। अब जागरण राजेश मिश्र की कितनी आर्थिक मदद करेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

दूसरी खबर नोएडा से है जिसमें दिनदहाड़े दो लग्‍जरी कारें लूट ली जाती हैं, फिर भी यह खबर नोएडा पुलआउट पर निपटा दी जाती है। इनमें एक कार तो दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव की है। इस मामले में दैनिक जागरण बार-बार एसएसपी का बयान छाप रहा है, लेकिन कारों का कहीं अता-पता नहीं है। कारें बरामद होने की संभावना बहुत कम है, क्‍योंकि चोरों ने अब तक कारों को ठिकाने लगा दिया होगा। इसलिए पुन: अपील की जाती है कि जागरण की कार में कर्मचारियों के खून पसीने का पैसा लगा होने के कारण कम से कम जागरण वालों की कार लौटा दी जाए, क्‍योंकि शोषण की बनियाद पर खरीदी गई कार से किसी को सुख नहीं मिलेगा।

 

पत्रकारिता है कहां…

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता पर हमले हो रहे हैं। ऐसा हमने सुना है। यह भी सुना है कि उससे प्रेस क्‍लब वाले पत्रकार काफी खफा हैं। क्‍यों, एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर संकट आन पडा है। यह भी ताना मारा जा रहा है प्रणय राय ने मजीठिया वेतनमान के बारे में सुना तक नहीं है। हालांकि एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने मजीठिया वेतनमान पर काफी कुछ चर्चा की है। और यह भी कहा जा रहा है कि प्रेस की आजादी के लिए हमें एकजुट होना चाहिए खासकर एनडीटीवी के मामले में क्‍योंकि उसने सरकार की गलत नीतियों पर काफी कुछ उंगली उठाई है। ये सारी बातें अपनी जगह ठीक हैं पर पत्रकारिता है कहां।

पहले पत्रकारिता का मतलब समझने की कोशिश करें। पत्रकारिता का सीधा सा मतलब है सरकार की जवाबदेही को सामने लाना। सरकार के फैसलों पर उठने वाले सवाल मंत्रियों के सामने लाना और उनके जवाब को जनता के सामने लाना। लेकिन सरकार के मंत्री जवाब देने के लिए तैयार कहां होते हैं। मध्‍य प्रदेश के मंदसौर मामले पर केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सवालों के जवाब देने के बजाय किस प्रकार बाबा रामदेव के साथ योग की टांग तोडते नजर आए, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुझे याद है, जब मैंने नरेंद्र मोदी को पहली बार टीवी पर बकैती करते देखा था। उनसे गोधरा पर सवाल पूछे जा रहे थे, जिसके जवाब में वह गुजरात के किसानों की बात कर रहे थे। खैर। आज तो यह प्रचलित है कि मोदी जी से मिलने का मतलब है मंगल ग्रह पर जाने जैसा मुश्किल काम। यह अलग बात है कि विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज कहती हैं कि यदि कोई मंगल ग्रह पर फंसा है तो उसे भी वह बचा लेंगी।

कुल मिलाकर एक आम पत्रकार और सरकार के बीच संवाद समाप्‍त हो चुका है। ऐसे में हमारा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि पत्रकारिता समाप्‍त हो चुकी है। इस पर कुछ लोग बडे गर्व से कहते पाए जाते हैं कि पत्रकारिता थी ही कब। मतलब यह कि पत्रकारिता शुरू से ही पिकनिक मनाने का स्‍थल मात्र रही है, जिसके आयोजन प्रयोजन का संबंध संपादक नामक संस्‍था से हुआ करता रहा है। अब तो इस व्‍यवस्‍था से संपादक भी विदा हो गया है।

तो यह मान लिया जाए कि एस निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, एचके दुआ और टीएन नाइन कभी पत्रकारिता के बडे नाम भले ही रहे हों, लेकिन वे पत्रकारिता की दुकान के काउंटर पर बैठकर ग्राहकों को निपटाते रहे हैं। इन लेागों ने पत्रकारिता में अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, बरखा दत्त, राजदीप सारदेसाई, तरुण तेजपाल, सुभाष गोयल, संजय गुप्ता, शोभना भरतिया जैसे कई लोगों और यहां तक कि प्रणय जेम्स रॉय जैसे लोगों को पत्रकारिता का उपयोग और उपभोग करने पर कभी नहीं टोका और तेजी से पत्रकारिता की गिरती साख और वहां काम कर रहे लोगों की खराब हालत पर कभी चिंता जताने की जरूरत महसूस नहीं की।

इसलिए प्रेस की आजादी क्या है, इस पर साफ-साफ बात होनी चाहिए। अगर ट्वीटर से ज्ञान प्राप्‍त कर उसे परोसना ही पत्रकारिता है, उस पर कोई सवाल-जवाब न किया जाना ही पत्रकारिता है तो पत्रकारिता पर संकट कहां है। कोई भी ट्वीटर की एक झलक देखकर सोशल मीडिया के जरिये पत्रकारिता के झंडे गाड सकता है और नामी गिरामी पत्रकार बन सकता है। सवाल वहीं पर जग रहा है, जहां जवाब नींद में है। नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।