आखिर में एक सामंत ने भी औरत को सुपीरियर माना

शेष नारायण सिंह की एफबी वाल से साभार।

मेरे बाबू, स्व लाल साहेब सिंह, होते तो आज ८७ साल के हो गए होते लेकिन आज से ठीक १० साल पहले १९ फरवरी २००१ को चले गए. मकसूदन के पट्टी पिरथी सिंह के सबसे बुज़ुर्ग बाबू साहेब की मृत्यु हो गयी .अवध के सुल्तानपुर जिले के एक मामूली हैसियत वाले ज़मींदारों के परिवार में उनका जन्म १९२४ में हुआ था. सुल्तानपुर जिले के राजकुमार ठाकुरों की भदैयां शाखा के मकसूदन गाँव के मूल परिवार में जन्मे मेरे बाबू के पूर्वज भी शिक्षित नहीं थे.

१८५७ में जब सुल्तानपुर पर दुबारा क़ब्ज़ा करने के इरादे अंग्रेजों ने हमला किया तो कोई विरोध नहीं हुआ . उसके पहले इस इलाके के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाया था . शायद हमारे पुरखे भी उस लड़ाई में शामिल थे . लेकिन जब १८६१ के बाद अवध के पुनर्गठन का काम शुरू हुआ तो ठा. दुनियापति सिंह को मकसूदन की ज़मींदारी मिल गयी. गोमती नदी के किनारे एक टीले पर उन्होंने अपनी गढ़ी बनायी .अंग्रेजों को बाकायदा लगान देने की शर्त पर मिली यह ज़मींदारी १२ गाँवों की थी . उनके चार लड़के थे और चारों ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद गाँवों का बँटवारा कर लिया . सबसे छोटे भाई , पिरथी सिंह की सातवीं पीढी में मेरे पिता जी का जन्म हुआ था. बाबू के पिता जी तो कुशाग्रबुद्धि थे लेकिन शिक्षा उन्होंने भी चहारुम तक की हे एपाई .

बाबू बहुत लाडले थे , घर में कई बाबा दादा थे लिहाज़ा खेल कूद में ज्यादा रूचि ली और पढाई उन्होंने भी बमुश्किल चहारुम तक ही पाई. जब उनका जन्म हुआ तो देश में महात्मा गाँधी की आंधी चल रही थी लेकिन मेरे गाँव में उसका कहीं कोई पता नहीं था .मेरे गाँव में उन दिनों केवल दो लोगों के पास सरकारी नौकरी थी एक डाकखाने में चिट्ठीरसा थे और दूसरे पुलिस में कांस्टेबिल . रियाया थे दोनों . लेकिन ज़मींदारों के परिवार में कोई भी नौकरी करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था .कहीं कुछ भी रिकार्ड नहीं है मेरे परिवार के बारे में . शायद ज़मीन जायदाद के रिकार्डों में या अवध के ज़मींदारों के बारे में जहां लिखा गया है वहां कुछ जानकारी मिल जायेगी. .१३ साल की उम्र में मेरे बाबू की शादी हो गयी थी . मेरी माँ उनसे २ साल बड़ी थीं और मौजूदा जौनपुर सिटी स्टेशन के पास के गाँव सैदन पुर के किसान ठाकुरों के परिवार से आई थी. १९३७ में मेरी माँ जब आयीं ,उसके बाद का अपने परिवार का ब्यौरा मैंने सुन रखा है . माई अक्सर अपने बचपन और जवानी के दिनों की बातें किया करती थीं . उन्हें मालूम था कि १९३७ में जब उनकी शादी हुई तो देश में गान्ही का राज आ चुका था .

यानी गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट १८३५ के तहत राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बन चुकी थीं .. जौनपुर और सुलतानपुर के बीच ट्रेन चलने लगी थी ,हालांकि मेरे बाबू की शादी में कोई भी ट्रेन से नहीं गया था. हाथी, घोड़े, ऊँट और बैलगाड़ियों से उनकी बारात गयी थी. तीन दिन वहां रुके थे और बारातियों का खूब आदर सत्कार हुआ था . मेरे नाना अपने इलाके के चमेली उगाने वाले बड़े किसान थे जिसके फूल का इस्तेमाल जौनपुर के प्रसिद्ध चमेली के तेल में होता था .इस आदर सत्कार का जलवा था कि उसके बाद से मेरी माँ के गाँव की कई लड़कियों की शादी हमारे इलाके में हुई .शिक्षा दीक्षा के बारे में मेरे ननिहाल में भी ख़ास ध्यान नहीं दिया गया था क्योंकि मेरी माँ और मामा लोगों ने भी कोई
पढाई नहीं की . हालांकि उन दिनों जौनपुर शहर के आस पास के ठाकुरों में शिक्षा का मह्त्व पहचान लिया गया था. जौनपुर में तिलक धारी सिंह ने क्षत्रिय हाई स्कूल की स्थापना कर दी थी जो मेरी माँ के घर से पैदल जाने पर ३० मिनट की दूरी पर था. यह अलग बात है कि मेरी माँ को शिक्षा का मह्त्व मालूम था. मेरे माता पिता की शादी का वही वक़्त है जब देश की राजनीति बहुत गरमा चुकी थी . आज़ादी की लड़ाई अपने उफान पर थी, लखनऊ में अवध तालुकेदार कानफरेंस हो चुकी थी . जिन्ना ने लखनऊ के इसी सम्मलेन में दो राष्ट्र के सिद्धांत का नारा बुलंद कर दिया था. यूरोप में हिटलर और मुसोलिनी पूरी तरह से माज़िनी और नीत्शे के दर्शन को राजनीति में लागू करने के लिए कमर कस चुके थे . अंग्रेजों ने जिन्ना को उकसा कर पाकिस्तान की मांग करने के लिए तैयार कर किया था . १९४० में उन्होंने अलग देश की मांग कर भी दी. . उसी दौर में १९४२ आया जिसने पूरी दुनिया में राजनीतिक संघर्ष के व्याकरण को बदल दिया. हर वह नेता जो भारत की आज़ादी चाहता था जेलों में ठूंस दिया गया , लेकिन अंग्रेजों के वफादार राजनेता ऐश करते रहे. उनमें से कोई जेल नहीं गया .

दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था . लेकिन मेरे पुरखों के घर में सारी बहस इस बात को लेकर थी कि लाल साहेब की शादी को कितने साल हो गए लेकिन कोई औलाद क्यों नहीं हो रही थी. लगभग सब को शक़ था कि किसी भूत का असर है . बहुत सारे पंडितों और ओझाओं को तलब किया गया और शादी के ८ साल बाद मेरी बड़ी बहन का जन्म हुआ. भला बताइये, जब मेरी बहन का जन्म हुआ तो मेरी माँ की उम्र कुल २३ साल की थी लेकिन तब तक उन्हें बाकायदा बाँझ घोषित किया जा चुका था और परिवार के शुभचिन्तक वंश परंपरा चलाने के लिए मेरे पिता जी की दूसरी शादी का सुझाव देने लगे थे . उन दिनों हिन्दू मैरेज एक्ट १९५५ नहीं लागू था इसलिए इस प्रस्ताव पर कोई नाराजगी नहीं थी . लेकिन १९४५ में मेरी बहन के जन्म के साथ वह ख़तरा ख़त्म हो गया .उसके जन्म के बाद लोगों को अंदाज़ लगा कि देश में कहीं हलचल है क्योंकि उसके लिए नए कपड़ों का जुगाड़ करना बहुत ही मुश्किल हो गया . उन दिनों युद्ध की वजह से मिलों का सारा कपड़ा लाम पर तैनात सिपाहियों के लिए जाता था . देशवासियों को कपड़ा देने के लिए राशन प्रणाली लागू कर दी गयी थी.

१९४७ में देश आज़ाद हो गया लेकिन उसका मेरे गाँव में कोई असर नहीं पड़ा . हमारे इलाके में कोई कांग्रेसी नहीं था. लेकिन यू पी ज़मींदारी एबालिशन एक्ट लागू होने के बाद मेरे खानदान में आज़ादी की हैसियत को अनुभव किया गया . रातोंरात सारी ज़मीन किसानों की हो गयी और फिर गंधिया ( महात्मा गाँधी का अपमान सूचक संबोधन ) को गाली देने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह मेरे बड़े होने तक सुना जाता था . दिलचस्प बात यह है कि जब ज़मींदारी उन्मूलन हुआ तो महात्मा गाँधी की शहादत के ४ साल पूरे हो चुके थे लेकिन मेरे खानदान के लोगों को उनकी ताक़त का अंदाज़ १९५२ में लगा जब नए निजाम में ज़मींदार भी आम आदमी हो गए. .मेरा महात्मा गाँधी से परिचय एक ऐसे आदमी के रूप में हुआ जिसने मेरे सभी खेत दूसरों को दे दिया था . मेरी समझ में नहीं आता था कि यह कैसे संभव हुआ . बाद में स्कूल जाने पर साबरमती के संत के बारे में पता चला . स्कूल से लौट कर जब मैंने अपने बाबू के काका को बताया कि महात्मा गाँधी ने देश को आज़ादी दिलवाई थी तो वे बहुत खफा हो गए और मेरे बाबू से कहा कि स्कूल जा कर के बच्चा उल्टी सीधी बातें सीख रहे हैं .

यह अलग बात है कि उनके बेटे और मेरे बाबू के चचेरे भाई उन दिनों खुद हाई स्कूल में पढ़ते थे . लेकिन शायद मेरे काका ने कभी गाँधी को बड़ा आदमी बताने की बेवकूफी नहीं की थी . इसलिये उनकी पढाई से किसी को एतराज़ नहीं था. मेरे काका ने भी दसवीं के बाद पढाई छोड़ दी थी . मेरे बाबू ने भी मंसूबा बना लिया था कि लड़के को दसवीं तक पढायेगें. ज़मींदारी उन्मूलन के वक़्त मेरे पिता जी की उम्र करीब २७-२८ साल की थी. बहुत ताक़तवर थे . लाठी के जोर से उन्होंने अपनी बहुत सारी ज़मीन वापस ले ली जो किसानों के नाम शिकमी लग गयी थी. कई बाग़ हाथ से निकल गए क्योंकि वे १९२२ में ही नीलाम हो चुके थे क़र्ज़ की डिक्री के बाद मकसूदन के कुछ बनियों ने उन बागों को नीलाम करवा लिया था लेकिन क़ब्ज़ा हमारे पुरखों का ही था. हुआ यूं कि जब नीलामी की डुगडुगी बजी तो हमारे बुज़ुर्ग ज़मींदारों ने कहा कि बनिया की हिम्मत है कि वह हमारी बाग़ ले लेगा . नीलामी तो कागज़ में ही होगी , मौके पर तो बाग़ हमारी ही रहेगी . लेकिन १९५२ के बाद सब कुछ ख़त्म हो गया.

इसी अभाव के माहौल में मेरा बचपन शुरू हुआ . अमिलियातर के नन्ह्कऊ सिंह मुझे चुप्पे से स्कूल लेकार गए. मेरे बाबू को पता ही नहीं चला कि मैं कब दूसरी जमात में चला गया .उन्होंने मेरी बड़ी बहन को कभी स्कूल के तरफ मुंह नहीं करने दिया था . मुझसे चार साल छोटी बहन को मेरी बड़ी बहन ने ही मेरे साथ स्कूल भेजना शूरू कर दिया था लेकिन बाबू ने उसे मिडिल स्कूल में कभी नहीं जाने दिया. जहां तक मेरा सवाल है गाँव के लड़कों के साथ मैं स्कूल जाने लगा और जब बाबू के मित्र स्व बब्बन सिंह एक दिन स्कूल गए तो उन्हें पता लगा कि लम्बरदार का बेटा तो दूसरी क्लास में पंहुच गया हैं , आकर बाबू से बताया तब मेरे लिए किताब आई. याद नहीं कब लेकिन प्राइमरी में ही बाबू ने घोषित कर दिया था कि अगर फेल हो जाओगे तो पढाई बंद करवा देगें . माई की इच्छा थी कि लड़का पढ़ लेगा तो दलिद्दर भाग जाएगा. पढाई चलती रही . आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास होने के बाद बाबू बहुत खुश हुए और अपने रिश्ते के चचेरे बड़े भाई धोंधर सिंह से बात कर आये कि अब लड़के को बम्बई में बैंक में नौकरी पर लगवा दें . वे देना बैंक में चपरासी थे. उन्होंने कहा कि अभी पढने दो , लड़का पढने में अच्छा है . बाबू निराश तो हुए लेकिन नौवीं क्लास में नाम लिखवा दिया . वे चाहते थे कि कोई छोटी मोटी नौकरी कर लेगें तो आमदनी में वृद्धि हो जायेगी .

मेरे छोटे भाई को बाबू बहुत पसंद करते थे क्योंकि वह गोरा था और शरीर से मज़बूत था . वे चाहते थे कि अगर बड़ा बेटा कुछ काम कर लेगा तो छोटे की ज़िंदगी बन जायेगी . धोंधर सिंह की बात मानकर बाबू ने नाम तो लिखा दिया लेकिन साथ में चेतावनी भी कि अगर फेल हुए तो पढाई बंद करवा देगें . शायद इसीलिये हाई स्कूल के इम्तिहान के ठीक पहले टाईफाइड हो जाने के बाद भी मैंने दसवीं का इम्तिहान दिया . कमजोरी इतनी थी कि मैं चल नहीं सकता था लेकिन बाबू ने डोली पर बैठाकर कहारों के कंधे से मुझे परीक्षा केंद्र तक पंहुचवा दिया . उसके बाद वे पढाई किसी कीमत पर नहीं होने देना चाहते थे लेकिन माँ की जिद के चलते पढाई हुई और मेरे खानदान में मुझे पहला ग्रेजुएट होने का सौभाग्य मिला. मेरे बाबू बहुत खुश हुए थे जब मैं १९७३ में डिग्री कालेज का लेक्चरर हो गया था लेकिन अपनी खुशी का खुले आम इज़हार कभी नहीं किया . उसके बाद तो उनकी कभी नहीं चली . हालांकि उसके पहले वे दोनों बहनों की शादी का काम निपटा चुके थे .बच्चों के शादी ब्याह को वे काम मानते थे . शायद इसी लिए चौदह पन्द्रह साल की उम्र में सभी बच्चों की शादी करके ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते थे . शिक्षा के मह्त्व को उन्होंने तब समझा जब मेरे कुछ साथी जो सरकार में उच्च पदों पर पंहुच गए थे ,घर आकर बाबू का पाँव छूते थे. जब मेरे बेटे ने आई आई एम में दाखिला लिया और अखबारों में छपने लगा कि इस दाखिले का क्या मतलब है तब उनको लगा कि शिक्षा की वजह से मामूली लोगों का भाग्य भी बदल सकता है. लोग आकर उन्हें बताते थे कि आई आई एम का क्या मतलब है. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी . सिद्धार्थ के एम बी ए करने के अगले साल ही बाबू चले गए .

आज उनकी बहुत याद आ रही है . उनका जीवन इस बात का सबूत है कि माहौल में तरक्की के सारे लक्षण मौजूद हो फिर भी तरक्की तब तक नहीं होती जब तक के आपके अन्दर वह जज़बा न पैदा हो . बच्चों को सही दिशा देने में माँ बाप को जिद नहीं करना चाहिए . अब बाबू के पौत्र का बेटा पैदा हो चुका है . अगर बाबू की चली होती तो मेरे बेटे की शादी वे आज से पंद्रह साल पहले कर चुके होते .लेकिन बाद के वक़्त में वे यह बात स्वीकार करने लगे थे कि वे गलत थे और माई सही थीं . जो लोग ज़मींदारी और सामंती परिवेश से वाकिफ हैं उन्हें समझ में आ जाएगा कि अपनी पत्नी को अपने से सुपीरियर मानना कितनी बड़ी क्रान्तिकारी घटना है .

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गोदी के गदेलवा और मीडिया

श्रीकांत सिंह।

गोदी का गदेला तो सुना था लेकिन गोदी का मीडिया पहली बार सुन रहा हूं। मीडिया की चुनौतियां इतनी जटिल हैं कि गोद लिए बगैर उसे बचाया नहीं जा सकता। हर मीडिया हाउस को किसी न किसी ने गोद ले रखा है। गोदी में मीडिया खुद को सेफ महसूस करता है तो मीडियाकर्मी अपनी नौकरी। और क्‍या चाहिए इस देश को। मीडियाकर्मियों की नौकरी चलती रहे और सरकार की गोद में मीडिया महफूज रहे। पत्रकारिता महफूज रहने की आखिर जरूरत ही क्‍या है।

पत्रकार अगर यह सोचते हैं कि उनके बगैर इस देश में ज्ञान नहीं बंट पाएगा तो यह उनका मुगालता है। आज ज्ञान इतना स्‍मार्ट हो गया है कि वह खुद ब खुद आपके पास पहुंच जाता है। अब मध्‍य प्रदेश के मंदसौर को ही लें तो वहां बताया जा रहा है कि कोई गोली नहीं चलाई गई, लेकिन छह किसानों के मारे जाने की जानकारी आप लोगों तक पहुंच ही गई है। तो जो लोग यह सोच रहे हैं कि मीडिया को गोद ले लेंगे तो लोग ज्ञान से वंचित रह जाएंगे, यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। मीडिया को आप अपनी तरह से चलाइए और ज्ञान आपको अपनी तरह से चलाता रहेगा।

उत्‍तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने भी खुद को गोद लेने की आग्रहपूर्ण विनती की थी, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई थी कि उनकी उमर गोद लेने की नहीं है। लोग शायद गोद का व्‍यापक मतलब नहीं समझ पाए। तभी तो उन्‍होंने अपनी अज्ञानता प्रकट कर दी। गोद का मतलब अभयदान, सुरक्षा और हर गलती पर माफी की विनती स्‍वीकार करने से है। मोदी जी दूरदर्शी हैं। वह पहले से जानते थे कि उत्‍तर प्रदेश को चलाना आसान काम नहीं है। उत्‍तर प्रदेश की जनता उन्‍हें गोद ले लेगी तो हर गलती माफ। क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के लिए तो मोदी जी गोदी के गदेलवा हैं।

गोद के विज्ञान को शायद सबसे पहले मोदी जी ने समझा। उसके बाद मीडिया वालों को इसका ज्ञान हुआ। अब मीडिया वाले गोदी में बैठने के लिए तैयार हैं। कोई किसी की गोदी में बैठ रहा है तो कोई किसी की गोदी में। आपके पास पैसा है तो आप भी किसी मीडिया हाउस को गोद ले लीजिए। क्‍या पता कब जरूरत पड़ जाए कि कोई मीडिया हाउस आपको गोद ले और आपके आर्थिक अपराधों पर मिट्टी डालने के काम आ जाए।

इसलिए गोद लिए जाने की कोई उम्र और शर्त नहीं होनी चाहिए। अब देश की इतनी बड़ी पार्टी कांग्रेस मौका पड़ने पर क्षेत्रीय दल सपा की गोद में जा बैठी। पाकिस्‍तान चीन की गोद में बैठा है। आतंकी पाकिस्‍तान की गोद में बैठे हैं। जो किसी की गोद में नहीं बैठा है, उसका नष्‍ट होना तय है। उसके विकास की कोई संभावना नहीं है। आप मानव हैं पशु नहीं कि पैदा होते ही चलने फिरने लगें। मानव की विकास यात्रा गोद से शुरू होती है और ईश्‍वर की गोद पर समाप्‍त होती है। इसलिए आपको यदि कोई गोदी मीडिया कहे तो कृपया शर्माइगा नहीं।

दरअसल, पत्रकारिता कभी नहीं कहती कि उसे गोद लिया जाए। लेकिन गोद लिए जाने की सर्वाधिक आवश्‍यकता उसी को है। आप कल्‍पना करें कि कितना जोखिम उठाकर एक रिपोर्टर जनहित की खबरों को सामने लाता है और उससे समय समय पर समाज का भला भी होता है। लेकिन उसी रिपोर्टर को जब संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई भी सामने नहीं आता। आज जो भी मदद मिल रही है, वह मीडिया हाउस को मिल रही है। लेकिन मीडिया हाउस ही पत्रकारिता नहीं है।

आज मीडिया हाउस अलग-अलग राजनीतिक दलों की सेना के अंग बन गए हैं। वे उनकी ओर से सूचना के प्रक्षेपास्‍त्र से विरोधियों पर हमले कर रहे हैं और उसकी एवज में लाभ उठाकर फल फूल रहे हैं। इस लड़ाई में अगर कोई उपेक्षित है तो वह है पत्रकार। आज पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है। उनका भविष्‍य अनिश्चितता के खतरे में है, लेकिन इस वर्ग की फिक्र किसी राजनीतिक दल को नहीं है क्‍योंकि राजनीतिक दलों ने तो मीडिया हाउस को ही गोद ले रखा है। इतने से ही उनका काम चल जाता है। फिर वे पत्रकारों की फिक्र क्‍यों करेंगे।