न्‍याय व्‍यवस्‍था का काला अध्‍याय  

श्रीकांत सिंह।

अराजकता तभी आती है, जब न्‍याय व्‍यवस्‍था फेल हो जाती है। सबसे पहले सक्षम लोग अराजकता फैलाते हैं और शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था परवान चढने लगती है। अक्षम लोगों पर अत्‍याचार इतना बढ जाता है कि वे हथियार उठाने को बाध्‍य हो जाते हैं। नक्‍सल समस्‍या तो इसका एक उदाहरण भर है। भविष्‍य कितना भयावह होने जा रहा है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। मजीठिया अवमानना मामले में 19 जून 2017 को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह न्‍याय व्‍यवस्‍था के काले अध्‍यायों में दर्ज हो चुका है।

बडी मुश्किल से छोटे पत्रकारों की बडी टीम सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंची। वर्षों तक केस को लटकाए रखा गया। अंत में फैसला वही ढाक के तीन पात। ताजा फैसले में कुछ भी नया नहीं है। अवमानना के केस का मतलब ही यही है कि अदालत के आदेश का उल्‍लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्‍य में वे ऐसी जुर्रत न कर सकें।

तो दोषियों को दंडित कौन करेगा। न्‍याय पालिका ने तो पल्‍ला झाड लिया है। क्‍या इसका मतलब यही समझा जाए कि लोग खुद निपट लें। न्‍याय पालिका, पुलिस, प्रशासन आदि के अधिकारी क्‍या लोगों की गाढी कमाई से जुटाए गए राजस्‍व से केवल सैलरी उठाएंगे और कोई काम नहीं करेंगे। उन्‍हें कर्तव्‍य बोध कौन कराएगा।

हमारे नेता तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। हर पांच साल बाद जुमले छोड कर आपको मूर्ख बनाएंगे और भारी बहुमत से जीत हासिल कर लेंगे। आखिर कब तक चलेगा यह सब। कौन है जो न्‍याय पालिका को पंगु बना रहा है। कौन है जो इस देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहा है। उसे पहचानना और दंडित करना जरूरी हो गया है, क्‍योंकि यह देश हमारा है, उनका नहीं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर लग जाएं अधिकारियों के पीछे

श्रीकांत सिंह।

पिछले आलेख का संदर्भ लें तो हमने कहा था कि मायूस होने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढने और समझने की जरूरत है। मैंने आज ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा पढा और जो मेरी समझ में आया उसे आपके सामने रख रहा हूं। अगर आपको कहीं संदेह लगे तो आप भी आदेश को पढें और उस संदर्भ में मुझसे चर्चा कर सकते हैं। मेरा मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जो आशंका जताई जा रही है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुन: हमें श्रम आयुक्‍त या लेबर कोर्ट का रास्‍ता दिखा दिया है, जबकि कोर्ट का आदेश कहता है- Section 17 of the act deals with recovery of money due from an employer. As a core issue on the maintainability of the presrnt contempt cases centers around the remedy provided for by the aforesaid provision of the act, section 17 of the Act may be set out hereunder. यानी, सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना मामलों को न्‍यायसंगत ढंग से निपटाने के लिए धारा 17 के तहत प्रावधान किए गए हैं, जिनका निस्‍तारण संबंधित अधिकारारियों द्वारा ही संभव है। इस बारे में धारा 17 के विभिन्‍न खंडों में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि वे अधिकारी हमें टरकाने लगेंगे तो हम क्‍या करेंगे… उसके लिए आपको जीवटता तो दिखानी ही पडेगी। आपको अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी और संयुक्‍त रूप से अधिकारियों को घेरना होगा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उन्‍हें काम करने के लिए बाध्‍य करना होगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए स्‍पष्‍ट निर्देश दे रखा है। देखें-धारा 17-1, 17-2, 17-3।

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि 20-जे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढें तो उसमें साउथ इंडिया इस्‍टेट लेबर रिलेशंस आर्गनाइजेशन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास की नजीर देकर समझाया गया है कि सेवायोजकों की यह शिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उनके कर्मचारी इस आधार पर कम वेतन पर काम करना चाहते हैं कि वे अत्‍यंत गरीब और असहाय हैं।

तबादला, निलंबन और प्रताडना मामलों के संदर्भ में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ऐसे मामलों का निस्‍तारण उचित प्राधिकारी ही कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संबंधित अधिकारी मनमानी करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। उन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उनसे काम कराया जा सकता है। ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर पाएंगे मगर आपको भी सख्‍ती दिखानी होगी।

हवा टाइट करने वाली खबर

नई दिल्‍ली।

मजीठिया अवमानना मामले पर कोर्ट नंबर-2 में 19 जून को 3 बजे फैसला सुनाएगा सुप्रीम कोर्ट। अखबार मालिकों के लिए कत्‍ल का दिन और कत्‍ल की रात शुरू। कई के भूमिगत होने की सूचना।

सुप्रीम कोर्ट की एक फाइट, अखबार मालिकों की हवा टाइट

श्रीकांत सिंह।

मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। देश भर के विभिन्‍न अखबारों के पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारी फैसला सुनाए जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं तो अखबार मालिकों की हवा खराब है। जैसे-जैसे अदालत की छुट्टियां समापन की ओर बढ़ रही हैं वैसे-वैसे अखबार मालिकों धैर्य समाप्‍त हो रहा है। वे हड़बड़ी में कुछ ऐसे फैसले कर रहे हैं, जो उन्‍हें कानूनी तौर पर गर्त में धकेलने वाला साबित होने जा रहा है।

दैनिक जागरण की बात करें तो वहां तमाम कर्मचारियों का इंक्रीमेंट रोक लिया गया है। इस उम्‍मीद में कि शायद कुछ लोग धैर्य खो दें और नौकरी छोड़ कर चले जाएं। लेकिन कर्मचारी नेक टू नेक फाइट के लिए तैयार हैं। उनका धैर्य तो जागरण प्रबंधन ने ही मजबूत किया है। वे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर और अन्‍य भुगतान लिए बगैर कहीं टसकने वाले नहीं हैं। भले ही दैनिक भास्‍कर ने उम्‍मीदों का महल खड़ा कर दिया है।

बता दें कि दैनिक जागरण की नई भर्ती योजना की हवा निकल गई है। इस योजना के तहत निकाली गई रिक्तियों के बाद जो रेस्‍पांस आए, उनमें 90 फीसद लोगों ने दैनिक जागरण की ओर ऑफर की गई सेवा शर्तों को ठुकरा दिया है। अब मुसीबत बढ़ती देख जागरण प्रबंधन ने एक नई योजना पीआईपी की शुरुआत की है, जिसके तहत यह पता लगाने का नाटक किया जा रहा है कि इंक्रीमेंट रोके जाने का क्‍या कारण रहा है। कुछ कर्मचारियों ने तो एक ही कारण बताया है कि प्रणामी अखाड़े के सदस्‍यों को ही इंक्रीमेंट दिया जाता है। यानी जो लोग विष्‍णु त्रिपाठी का चरण वंदन करते हैं, उन्‍हीं को इंक्रीमेंट दिया जाता है।

मार्केट की हालत यह है कि आज भी काम धाम करने लायक कर्मचारियों की संख्‍या बहुत सीमित है। डॉट कॉम के बाजार ने इस किल्‍लत को और बढ़ा दिया है, जहां तमाम नाकारा लोग भी ऐडजेस्‍ट हो रहे हैं। तो अखबार किस प्रकार निकलेगा, यह टेंशन विष्‍णु त्रिपाठी की है, मैनेजमेंट की नहीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि पुराने कर्मचारियों को वापस लेना दैनिक जागरण की मजबूरी बन जाए। व्‍यावसायिक भी और कानूनी भी।

आप उस स्थिति की कल्‍पना करें, जब मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन और सुख सुविधाओं के साथ पुराने कर्मचारियों की वापसी होगी तो नौकरी जाने के भय के वशीभूत होकर नौकरी कर रहे कर्मचारियों के दिल पर क्‍या बीतेगी। उनके अंदर उबल रहा लावा नहीं फूटेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कुछ कर्मचारी तो हथियार चलाने के अभ्‍यास में लग गए हैं।

दरअसल, विष्‍णु त्रिपाठी ने वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद शुक्‍ला (अब दिवंगत) से पत्रकारिता छोड़कर बाकी सबकुछ सीख लिया था, जिसके दम पर वह अपनी नौकरी बचाए रखने में सफल रहे हैं। अब वह सीधे कर्मचारियों के निशाने पर आने वाले हैं। उन्‍होंने एक बात और नहीं सीखी और वह है सभी कर्मचारियों को साथ लेकर चलने की कला। उन्‍होंने ‘कोई ऐसा सगा नहीं जिसको जमकर ठगा नहीं’ के सहारे दैनिक जागरण जैसे टाइटैनिक को डुबोने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

अब संजय गुप्‍ता की समस्‍या यह है कि वह उंगली पकड़ कर चलने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। कभी निशीकांत ठाकुर की उंगली पकड़ कर चले तो अब विष्‍णु त्रिपाठी की उंगली पकड़ कर चले चल रहे हैं। उनके अंदर रिस्‍क लेकर आगे बढ़ने वाले बिजनेसमैन को कभी अंकुरित ही नहीं होने दिया गया। वह आगे बढ़ कर समस्‍या का समाधान नहीं करते हैं तो अब उनका भगवान ही मालिक है, क्‍योंकि उन्‍होंने कभी मालिक बनकर काम करने का अभ्‍यास ही नहीं किया। (चर्चा जारी रहेगी)

 

मिशन मजीठिया/भाग एक-दैनिक जागरण में बंपर वैकेंसी का राज

नई  दिल्‍ली।

दैनिक जागरण में अचानक बंपर वैकेंसी आई है, यह कदाचित आपको पता हो लेकिन शायद आप यह नहीं जानते होंगे कि जिस दैनिक जागरण ने ओवर स्‍टाफ की बात कहकर पिछले वर्ष सैकड़ों लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया उसी दैनिक जागरण को अचानक बंपर स्‍टाफ की जरूरत कैसे आन पड़ी। संस्‍थान के एक भरोसेमंद सूत्र ने बताया कि मजीठिया अवमानना का फैसला आने से उत्‍पन्‍न संकट से निपटने की तैयारी जागरण प्रबंधन अभी से कर रहा है। उसके तहत नए लोगों की भर्ती 15 हजार रुपये प्रति माह पगार के आधार पर की जाएगी। जो लोग ज्‍यादा बार्गेनिंग करेंगे उन्‍हें झूठे वादे के तहत पहले फंसा लिया जाएगा और उनके साथ मनमानी बाद में की जाएगी।

इस बात पर भरोसा करने का आधार यह है कि जागरण कभी अपने पास से कुछ नहीं देता। प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए पैसा वह अपने कर्मचारियों की सैलरी काट कर जुटाता है और पीएम मोदी के बगल में उपस्थित होकर फोटू खिंचवा लेता है। उसके जरिये कर्मचारियों पर इस बात का दबाव बनाता है कि जब देश का पीएम ही उसके साथ खड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट में उसका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता। खैर, जागरण के बारे में यह जगजाहिर है कि वह कभी अपने पास से कुछ खर्च नहीं करता। उसे यह पता है कि मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट उसकी खाल खींचने वाला है तो उसने नई भर्ती का फार्मूला निकाला है। पुराने कर्मचारियों को तो उसे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर अथवा बकाया देना ही होगा जिसमें उसे करोड़ों का चूना लगना तय है। इन करोड़ों रुपयों का खर्च वह 15 हजार रुपये प्रति माह पगार वाले नई भर्ती कर्मचारियों से निकालेगा।

दैनिक जागरण की इस तैयारी से एक बात तय है कि इस समय कार्यरत पुराने कर्मचारियों को अपनी नौकरी बिना किसी गलती के गंवानी होगी। अब यह उन कर्मचारियों को ही तय करना होगा कि वे लड़कर मरते हैं या मरने के बाद लड़ाई की तैयारी करते हैं। लेकिन दैनिक जागरण को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि नई भर्ती के जरिये वह मजीठिया से फुर्सत नहीं पा सकता। मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन देना होगा। नौकरी की गर्ज से आए नए लोग भले ही मजीठिया न मांगें, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के जुर्म में याचिका के जरिये सुप्रीम कोर्ट घसीट ले जाएंगे।

 

सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

नई दिल्‍ली।

सुप्रीम कोर्ट में पिछले तीन वर्षों से चल रही मजीठिया वेजबोर्ड अवमानना मामले में सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई और अदालत ने अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। हालांकि कोर्ट ने फैसला सुनाने की तारीख अभी तय नहीं की है, लेकिन सुनवाई के मौके पर अदालत में उपस्थित अखबार कर्मचारियों के जोश और उत्‍साह से एक सकारात्‍मक संकेत जरूर मिल रहा है।

दोनों पक्षों, मीडिया संस्थानों और अखबारों के पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर जारी सुनवाई पूरी होने की घोषणा कर दी और कहा कि फैसले को सुरक्षित रख लिया गया है।

पत्रकारों-गैरपत्रकारों की ओर से केस की पैरवी कर रहे एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विश, उमेश शर्मा व परमानंद पाण्डे  एवं याचिकाकर्ताओं के अन्‍य वकीलों ने अदालत में दलील दी और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी देश भर के ज्‍यादातर अखबार मालिक अपने पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों को वेजबोर्ड के अनुरूप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। उलटे वेजबोर्ड के अनुसार वेतन की मांग करने वाले कर्मचारियों को टर्मिनेट, संस्पेंड और ट्रांसफर करके परेशान किया जा रहा है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने,  मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और परेशान किए गए कर्मचारियों को राहत दिलाने की गुहार लगाई है।

मीडिया संस्थानों का पक्ष रखने वाले वकीलों ने मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधान 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी स्वेच्छा से बेजबोर्ड के अनुसार वेतन न लेने की लिखित सहमति दे चुके हैं। मीडिया संस्थानों ने न तो कोई अवमानना की है और न ही कर्मचारियों पर दबाव बना कर उन्‍हें परेशान किया है।

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई पूरी होने की घोषणा की और फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया। सुनवाई के मौके पर देश भर से बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

यह है मामला

देश भर के अखबारों में कार्यरत पत्रकारों और गैरपत्रकारों का वेतनमान तय करने के लिए 2008 में जस्टिस जेआर मजीठिया की अध्‍यक्षता में गठित मजीठिया वेजबोर्ड के प्रावधानों को अखबार मालिकों ने लागू नहीं किया और उलटे उसकी संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए जहां उन्‍हें बुरी तरह हारना पड़ा। 7 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश कर्मचारियों के पक्ष में आ गया। मगर अदालत के आदेश के बावजूद ज्‍यादातर अखबार मालिकों ने वेजबोर्ड को लागू नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर अपने कर्मचारियों को परेशान करना शुरू कर दिया। अंतत: अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का मामला दायर कर दिया। अदालत की अवमानना मामले में पहला और प्रमुख मामला अवमानना वाद (सिविल) 411/2014 शोषण करने वालों के सिरमौर अखबार दैनिक जागरण के खिलाफ अभिषेक राजा एवं अन्‍य बनाम संजय गुप्‍ता दायर हुआ। उसके बाद तो सुप्रीम कोर्ट में अवमानना मामलों की भरमार लग गई और देश भर के करीब छह हजार अखबार कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पत्रकार व गैरपत्रकार कर्मियों को वेतनमान,  एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ जो लाखों रुपये में बनता है, देने के आदेश पहले ही दिए जा चुके हैं। लेकिन अखबार मालिक तमाम तिकड़मों के सहारे इस आदेश का पालन करने से बचते रहे। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका,  दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण,  अमर उजाला,  हिन्दुस्तान टाइम्स,  नवभारत टाइम्स,  पंजाब केसरी जैसे सैकड़ों अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया है। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए। जिन कर्मचारियों ने उनकी बात नहीं मानी, उन्‍हें स्थानांतरित और बर्खास्‍त करके परेशान किया गया। इस कानूनी लड़ाई में देश भर के हजारों अखबार कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। उम्‍मीद है कि अब उन्‍हें जल्‍द ही राहत मिलेगी।

पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश

मजीठिया वेतनमान लागू करके देश की सभी समस्‍याओं का समाधान किया जा सकता है। पत्रकारों के आर्थिक हालात जानबूझकर खराब रखने की साजिश लंबे समय से चली आ रही है। उन्‍हें आज तक कोई भी वेतनमान नहीं दिया गया। यही वजह है कि टुच्‍चे टुच्‍चे लोग पत्रकारों को अपने हिसाब से घुमा लेते हैं। और जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अखबार के मालिकों और सरकारों का गठजोड़ लंबे समय से चला आ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गठजोड़ को शिखर पर पहुंचा दिया है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट से भी पत्रकारों को न्‍याय नहीं मिल पा रहा है। सरकार यदि इच्‍छा शक्ति का उचित प्रदर्शन करती तो पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान कब का मिल गया होता और उन्‍हें सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर नाक न रगड़नी पड़ती। अब आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री इसमें क्‍या कर सकते हैं… कानून की बात करें तो जो मुझे मोटामोटी जानकारी है, उसके अनुसार जो व्‍यवस्‍था अखबार मालिकों के लिए सरकारी विज्ञापन और कोटे के कागज की व्‍यवस्‍था करती है, उसी व्‍यवस्‍था में पत्रकारों के लिए वेतनमान की भी व्‍यवस्‍था है।

इस व्‍यवस्‍था को अव्‍यवस्थित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अखबार मालिकों के साथ खड़े नजर आते हैं। वह बिजली के लिए तो ईद, दीपावली और होली की चर्चा करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि मजीठिया वेतनमान हिंदू पत्रकार को चाहिए तो मुसलिम पत्रकार को भी। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो जाएं तो इन राजनीतिबाजों के होश ठिकाने लग जाएंगे। स्‍वच्‍छ पत्रकारिता और स्‍वच्‍छ राजनीति के लिए मजीठिया वेतनमान का लागू होना जरूरी है। उसके लिए सरकार अखबार मालिकों का सरकारी विज्ञापन और कोटे का कागज बंद करके उन्‍हें रास्‍ते पर ला सकती है। जब तक अखबार मालिकों को रास्‍ते पर नहीं लाया जाएगा, समाज और देश के विकास की कल्‍पना तक नहीं की जा सकती।

सारे भ्रष्‍टाचार और अपराधों की जड़ में कहीं न कहीं अखबार मालिकों की मनमानी काम करती है। क्‍योंकि उन्‍होंने पत्रकारिता को कुंद बना दिया है। उम्‍मीद है कि मोदी जी इस दिशा में अवश्‍य इच्‍छाशक्ति दिखाएंगे। महिमामंडन के मोह में उन्‍हें अखबार मालिकों की गुलामी करने से बाज आना चाहिए। दिल्‍ली और बिहार के चुनावों में दैनिक जागरण ने उनका महिमामंडन तो किया, लेकिन परिणाम क्‍या हुआ…भाजपा चुनाव हार गई। इसलिए महिमामंडन का कोई मतलब नहीं होता। ये तो पब्लिक है, सब जानती है। हिंदू और मुसलमान एकजुट हो रहे हैं। इसलिए मोदी जी को महिमामंडन की बैसाखी का परित्‍याग कर देना चाहिए और मजीठिया वेतनमान लागू कराने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।