न्‍याय व्‍यवस्‍था का काला अध्‍याय  

श्रीकांत सिंह।

अराजकता तभी आती है, जब न्‍याय व्‍यवस्‍था फेल हो जाती है। सबसे पहले सक्षम लोग अराजकता फैलाते हैं और शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था परवान चढने लगती है। अक्षम लोगों पर अत्‍याचार इतना बढ जाता है कि वे हथियार उठाने को बाध्‍य हो जाते हैं। नक्‍सल समस्‍या तो इसका एक उदाहरण भर है। भविष्‍य कितना भयावह होने जा रहा है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। मजीठिया अवमानना मामले में 19 जून 2017 को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह न्‍याय व्‍यवस्‍था के काले अध्‍यायों में दर्ज हो चुका है।

बडी मुश्किल से छोटे पत्रकारों की बडी टीम सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंची। वर्षों तक केस को लटकाए रखा गया। अंत में फैसला वही ढाक के तीन पात। ताजा फैसले में कुछ भी नया नहीं है। अवमानना के केस का मतलब ही यही है कि अदालत के आदेश का उल्‍लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्‍य में वे ऐसी जुर्रत न कर सकें।

तो दोषियों को दंडित कौन करेगा। न्‍याय पालिका ने तो पल्‍ला झाड लिया है। क्‍या इसका मतलब यही समझा जाए कि लोग खुद निपट लें। न्‍याय पालिका, पुलिस, प्रशासन आदि के अधिकारी क्‍या लोगों की गाढी कमाई से जुटाए गए राजस्‍व से केवल सैलरी उठाएंगे और कोई काम नहीं करेंगे। उन्‍हें कर्तव्‍य बोध कौन कराएगा।

हमारे नेता तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। हर पांच साल बाद जुमले छोड कर आपको मूर्ख बनाएंगे और भारी बहुमत से जीत हासिल कर लेंगे। आखिर कब तक चलेगा यह सब। कौन है जो न्‍याय पालिका को पंगु बना रहा है। कौन है जो इस देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहा है। उसे पहचानना और दंडित करना जरूरी हो गया है, क्‍योंकि यह देश हमारा है, उनका नहीं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर लग जाएं अधिकारियों के पीछे

श्रीकांत सिंह।

पिछले आलेख का संदर्भ लें तो हमने कहा था कि मायूस होने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढने और समझने की जरूरत है। मैंने आज ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा पढा और जो मेरी समझ में आया उसे आपके सामने रख रहा हूं। अगर आपको कहीं संदेह लगे तो आप भी आदेश को पढें और उस संदर्भ में मुझसे चर्चा कर सकते हैं। मेरा मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जो आशंका जताई जा रही है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुन: हमें श्रम आयुक्‍त या लेबर कोर्ट का रास्‍ता दिखा दिया है, जबकि कोर्ट का आदेश कहता है- Section 17 of the act deals with recovery of money due from an employer. As a core issue on the maintainability of the presrnt contempt cases centers around the remedy provided for by the aforesaid provision of the act, section 17 of the Act may be set out hereunder. यानी, सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना मामलों को न्‍यायसंगत ढंग से निपटाने के लिए धारा 17 के तहत प्रावधान किए गए हैं, जिनका निस्‍तारण संबंधित अधिकारारियों द्वारा ही संभव है। इस बारे में धारा 17 के विभिन्‍न खंडों में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि वे अधिकारी हमें टरकाने लगेंगे तो हम क्‍या करेंगे… उसके लिए आपको जीवटता तो दिखानी ही पडेगी। आपको अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी और संयुक्‍त रूप से अधिकारियों को घेरना होगा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उन्‍हें काम करने के लिए बाध्‍य करना होगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए स्‍पष्‍ट निर्देश दे रखा है। देखें-धारा 17-1, 17-2, 17-3।

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि 20-जे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढें तो उसमें साउथ इंडिया इस्‍टेट लेबर रिलेशंस आर्गनाइजेशन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास की नजीर देकर समझाया गया है कि सेवायोजकों की यह शिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उनके कर्मचारी इस आधार पर कम वेतन पर काम करना चाहते हैं कि वे अत्‍यंत गरीब और असहाय हैं।

तबादला, निलंबन और प्रताडना मामलों के संदर्भ में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ऐसे मामलों का निस्‍तारण उचित प्राधिकारी ही कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संबंधित अधिकारी मनमानी करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। उन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उनसे काम कराया जा सकता है। ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर पाएंगे मगर आपको भी सख्‍ती दिखानी होगी।

हवा टाइट करने वाली खबर

नई दिल्‍ली।

मजीठिया अवमानना मामले पर कोर्ट नंबर-2 में 19 जून को 3 बजे फैसला सुनाएगा सुप्रीम कोर्ट। अखबार मालिकों के लिए कत्‍ल का दिन और कत्‍ल की रात शुरू। कई के भूमिगत होने की सूचना।

पत्रकारिता है कहां…

श्रीकांत सिंह।

पत्रकारिता पर हमले हो रहे हैं। ऐसा हमने सुना है। यह भी सुना है कि उससे प्रेस क्‍लब वाले पत्रकार काफी खफा हैं। क्‍यों, एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर संकट आन पडा है। यह भी ताना मारा जा रहा है प्रणय राय ने मजीठिया वेतनमान के बारे में सुना तक नहीं है। हालांकि एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने मजीठिया वेतनमान पर काफी कुछ चर्चा की है। और यह भी कहा जा रहा है कि प्रेस की आजादी के लिए हमें एकजुट होना चाहिए खासकर एनडीटीवी के मामले में क्‍योंकि उसने सरकार की गलत नीतियों पर काफी कुछ उंगली उठाई है। ये सारी बातें अपनी जगह ठीक हैं पर पत्रकारिता है कहां।

पहले पत्रकारिता का मतलब समझने की कोशिश करें। पत्रकारिता का सीधा सा मतलब है सरकार की जवाबदेही को सामने लाना। सरकार के फैसलों पर उठने वाले सवाल मंत्रियों के सामने लाना और उनके जवाब को जनता के सामने लाना। लेकिन सरकार के मंत्री जवाब देने के लिए तैयार कहां होते हैं। मध्‍य प्रदेश के मंदसौर मामले पर केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह सवालों के जवाब देने के बजाय किस प्रकार बाबा रामदेव के साथ योग की टांग तोडते नजर आए, यह किसी से छिपा नहीं है।

मुझे याद है, जब मैंने नरेंद्र मोदी को पहली बार टीवी पर बकैती करते देखा था। उनसे गोधरा पर सवाल पूछे जा रहे थे, जिसके जवाब में वह गुजरात के किसानों की बात कर रहे थे। खैर। आज तो यह प्रचलित है कि मोदी जी से मिलने का मतलब है मंगल ग्रह पर जाने जैसा मुश्किल काम। यह अलग बात है कि विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज कहती हैं कि यदि कोई मंगल ग्रह पर फंसा है तो उसे भी वह बचा लेंगी।

कुल मिलाकर एक आम पत्रकार और सरकार के बीच संवाद समाप्‍त हो चुका है। ऐसे में हमारा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि पत्रकारिता समाप्‍त हो चुकी है। इस पर कुछ लोग बडे गर्व से कहते पाए जाते हैं कि पत्रकारिता थी ही कब। मतलब यह कि पत्रकारिता शुरू से ही पिकनिक मनाने का स्‍थल मात्र रही है, जिसके आयोजन प्रयोजन का संबंध संपादक नामक संस्‍था से हुआ करता रहा है। अब तो इस व्‍यवस्‍था से संपादक भी विदा हो गया है।

तो यह मान लिया जाए कि एस निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, एचके दुआ और टीएन नाइन कभी पत्रकारिता के बडे नाम भले ही रहे हों, लेकिन वे पत्रकारिता की दुकान के काउंटर पर बैठकर ग्राहकों को निपटाते रहे हैं। इन लेागों ने पत्रकारिता में अर्णब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, बरखा दत्त, राजदीप सारदेसाई, तरुण तेजपाल, सुभाष गोयल, संजय गुप्ता, शोभना भरतिया जैसे कई लोगों और यहां तक कि प्रणय जेम्स रॉय जैसे लोगों को पत्रकारिता का उपयोग और उपभोग करने पर कभी नहीं टोका और तेजी से पत्रकारिता की गिरती साख और वहां काम कर रहे लोगों की खराब हालत पर कभी चिंता जताने की जरूरत महसूस नहीं की।

इसलिए प्रेस की आजादी क्या है, इस पर साफ-साफ बात होनी चाहिए। अगर ट्वीटर से ज्ञान प्राप्‍त कर उसे परोसना ही पत्रकारिता है, उस पर कोई सवाल-जवाब न किया जाना ही पत्रकारिता है तो पत्रकारिता पर संकट कहां है। कोई भी ट्वीटर की एक झलक देखकर सोशल मीडिया के जरिये पत्रकारिता के झंडे गाड सकता है और नामी गिरामी पत्रकार बन सकता है। सवाल वहीं पर जग रहा है, जहां जवाब नींद में है। नींद में और कब तक रहोगे सुबह। बोझ पर बोझ कब तक सहोगे सुबह। लोक के तंत्र के मंत्र ही की तरह। बाज को हंस कब तक कहोगे सुबह।

 

गोदी के गदेलवा और मीडिया

श्रीकांत सिंह।

गोदी का गदेला तो सुना था लेकिन गोदी का मीडिया पहली बार सुन रहा हूं। मीडिया की चुनौतियां इतनी जटिल हैं कि गोद लिए बगैर उसे बचाया नहीं जा सकता। हर मीडिया हाउस को किसी न किसी ने गोद ले रखा है। गोदी में मीडिया खुद को सेफ महसूस करता है तो मीडियाकर्मी अपनी नौकरी। और क्‍या चाहिए इस देश को। मीडियाकर्मियों की नौकरी चलती रहे और सरकार की गोद में मीडिया महफूज रहे। पत्रकारिता महफूज रहने की आखिर जरूरत ही क्‍या है।

पत्रकार अगर यह सोचते हैं कि उनके बगैर इस देश में ज्ञान नहीं बंट पाएगा तो यह उनका मुगालता है। आज ज्ञान इतना स्‍मार्ट हो गया है कि वह खुद ब खुद आपके पास पहुंच जाता है। अब मध्‍य प्रदेश के मंदसौर को ही लें तो वहां बताया जा रहा है कि कोई गोली नहीं चलाई गई, लेकिन छह किसानों के मारे जाने की जानकारी आप लोगों तक पहुंच ही गई है। तो जो लोग यह सोच रहे हैं कि मीडिया को गोद ले लेंगे तो लोग ज्ञान से वंचित रह जाएंगे, यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। मीडिया को आप अपनी तरह से चलाइए और ज्ञान आपको अपनी तरह से चलाता रहेगा।

उत्‍तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने भी खुद को गोद लेने की आग्रहपूर्ण विनती की थी, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई थी कि उनकी उमर गोद लेने की नहीं है। लोग शायद गोद का व्‍यापक मतलब नहीं समझ पाए। तभी तो उन्‍होंने अपनी अज्ञानता प्रकट कर दी। गोद का मतलब अभयदान, सुरक्षा और हर गलती पर माफी की विनती स्‍वीकार करने से है। मोदी जी दूरदर्शी हैं। वह पहले से जानते थे कि उत्‍तर प्रदेश को चलाना आसान काम नहीं है। उत्‍तर प्रदेश की जनता उन्‍हें गोद ले लेगी तो हर गलती माफ। क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के लिए तो मोदी जी गोदी के गदेलवा हैं।

गोद के विज्ञान को शायद सबसे पहले मोदी जी ने समझा। उसके बाद मीडिया वालों को इसका ज्ञान हुआ। अब मीडिया वाले गोदी में बैठने के लिए तैयार हैं। कोई किसी की गोदी में बैठ रहा है तो कोई किसी की गोदी में। आपके पास पैसा है तो आप भी किसी मीडिया हाउस को गोद ले लीजिए। क्‍या पता कब जरूरत पड़ जाए कि कोई मीडिया हाउस आपको गोद ले और आपके आर्थिक अपराधों पर मिट्टी डालने के काम आ जाए।

इसलिए गोद लिए जाने की कोई उम्र और शर्त नहीं होनी चाहिए। अब देश की इतनी बड़ी पार्टी कांग्रेस मौका पड़ने पर क्षेत्रीय दल सपा की गोद में जा बैठी। पाकिस्‍तान चीन की गोद में बैठा है। आतंकी पाकिस्‍तान की गोद में बैठे हैं। जो किसी की गोद में नहीं बैठा है, उसका नष्‍ट होना तय है। उसके विकास की कोई संभावना नहीं है। आप मानव हैं पशु नहीं कि पैदा होते ही चलने फिरने लगें। मानव की विकास यात्रा गोद से शुरू होती है और ईश्‍वर की गोद पर समाप्‍त होती है। इसलिए आपको यदि कोई गोदी मीडिया कहे तो कृपया शर्माइगा नहीं।

दरअसल, पत्रकारिता कभी नहीं कहती कि उसे गोद लिया जाए। लेकिन गोद लिए जाने की सर्वाधिक आवश्‍यकता उसी को है। आप कल्‍पना करें कि कितना जोखिम उठाकर एक रिपोर्टर जनहित की खबरों को सामने लाता है और उससे समय समय पर समाज का भला भी होता है। लेकिन उसी रिपोर्टर को जब संस्‍थान से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है तो उसकी मदद के लिए कोई भी सामने नहीं आता। आज जो भी मदद मिल रही है, वह मीडिया हाउस को मिल रही है। लेकिन मीडिया हाउस ही पत्रकारिता नहीं है।

आज मीडिया हाउस अलग-अलग राजनीतिक दलों की सेना के अंग बन गए हैं। वे उनकी ओर से सूचना के प्रक्षेपास्‍त्र से विरोधियों पर हमले कर रहे हैं और उसकी एवज में लाभ उठाकर फल फूल रहे हैं। इस लड़ाई में अगर कोई उपेक्षित है तो वह है पत्रकार। आज पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है। उनका भविष्‍य अनिश्चितता के खतरे में है, लेकिन इस वर्ग की फिक्र किसी राजनीतिक दल को नहीं है क्‍योंकि राजनीतिक दलों ने तो मीडिया हाउस को ही गोद ले रखा है। इतने से ही उनका काम चल जाता है। फिर वे पत्रकारों की फिक्र क्‍यों करेंगे।

 

अखबार मालिकों के धमकाने पर मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

‘पत्रकार आवाज’ से साभार।

तीन चार महीने पहले ही हिंदुस्‍तान नोएडा ने अपने मशीन के 15-16 कर्मचारियों से बर्खास्‍तगी और ग्रेच्‍युटी आदि रोकने की धमकी देकर जबरन इस्‍तीफा ले लिया और कई अन्‍य पर इस्‍तीफा देने का दबाव बनाया हुआ है। मजबूरी में इस्‍तीफा देने वाले वे साथी अब सड़क पर हैं या कोई छोटा-मोटा काम कर गुजर बसर कर रहे हैं। वहीं, भास्‍कर ने भी जबरन इस्‍तीफा लेने का अभियान चलाया हुआ है। यहां बस इतना ही अंतर है कि जिन साथियों के इस्‍तीफे लिए गए हैं उनमें से ज्‍यादातर अभी संस्‍थान में ही कार्यरत हैं। इनके इस्‍तीफों का कहां और कैसे इस्‍तेमाल होगा किसी को नहीं पता। ऐसा ही कुछ अन्‍य संस्‍थानों में भी चल रहा है या चल चुका है। ‘आज समाज’ जैसे कुछ समाचार-पत्रों में तो स्‍थायी कर्मियों को तीन साल के लिए अनुबंध पत्र दे दिए गए।

इस्‍तीफा देकर क्‍या खो रहे हैं आप

प्रबंधन एक सोची समझी नीति के तहत काम कर रहा है। उसे पता है 7 फरवरी 2014 में मजीठिया वेजबोर्ड और वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 को खत्‍म करने को लेकर सिविल पिटिशन 246/2011 के साथ सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी अन्‍य सभी याचिकाएं खारिज हो गई थीं। उसके बाद उनकी रिव्‍यू पिटिशन भी खारिज हो गई। ऐसे में उनको अपने संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड आज नहीं तो कल लागू करना ही पड़ेगा और उन्‍हें अपने कर्मियों को मजीठिया के अनुसार वेतन और एरियर का भुगतान करना ही पड़ेगा। ऐसे में व़े मजीठिया वेजबोर्ड के तहत आने वाले कर्मियों की संख्‍या में कमी करके भविष्‍य में अपने ऊपर आने वाले आर्थिक बोझ को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

यहां आने वाले बोझ शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए किया गया है, क्‍योंकि जिन कर्मियों का वह इस्‍तीफा नहीं ले पाएगा उन्‍हें उसे मजीठिया के अनुसार एरियर तो देना ही पड़ेगा वहीं,  फि‍टमेंट और प्रमोशन के अनुसार व़ेजबोर्ड के सभी लाभ देने पड़ेंगे तब तक जब तक कि वह नौकरी पर रहता है। यानी मजीठिया के अनुसार जो वेतन बनता है वो देना पड़ेगा। आपको समझाने के लिए नीचे एक उदाहरण दे रहे हैं-मजीठिया के अनुसार नवंबर 2011 में ग्रेड ए के समाचार पत्र में एक्‍स श्रेणी के शहर में भर्ती सीनियर सब एडिटर रमेश का 17,000 रुपये बेसिक के हिसाब से 37,761 रुपये मासिक वेतन बनता है, जो कि बढ़ते-बढ़ते मई 2017 में 63,163 रुपये हो जाता है। इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है।

ऐसे में रमेश का नवंबर 2011 से मई 2017 तक का औसत वेतन 25 हजार रुपये प्रतिमाह मान लिया जाए तो ऱमेश को कम से कम 15 लाख रुपये का एरियर संस्‍थान को देना पड़ेगा (इसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये के करीब रात्रि भत्‍ता और पीएफ, एलटीए आदि का अंतर शामिल नहीं है)। इसके अलावा इसका बढ़ा हुआ वेतन अर्थात कम से कम 63,163 रुपये हर माह देने पड़ेंगे और इसके अलावा न चाहते हुए भी मजीठिया के अनुसार हर साल वेतन में बढ़ोतरी और हर पांच साल में एक विशेष इंक्रीमेंट और हर दस साल में एक प्रमोशन देना पड़ेगा। प्रबंधन जानता है कि वेजबोर्ड के अंतर्गत आने वाले रमेश जैसे कर्मियों का वेतन कुछ समय बाद लाख रुपये से ऊपर पहुंच जाएगा। ऐसे में उनकी ग्रेच्‍युटी और पीएफ का एमाउंट भी बढ़ता जाएगा।

इसलिए वे जबरन इस्‍तीफा अभियान चलाए हुए हैं कि एरियर से नहीं बच सकते तो कम से कम बढ़ते हुए वेतनमान पर तो कैंची चला दी जाए। कैसे, इसे भी उदाहरण देकर समझाते हैं।

संस्‍थान ने रमेश के साथ ही उसी तिथि और पद पर भर्ती ओम से मई 2017 में जबरन इस्‍तीफा ले लिया। अब जब संस्‍थान को मजीठिया वेजबोर्ड लागू करना पड़ेगा तो रमेश अपने 15 लाख रुपये के एरियर के साथ कम से कम 21,510 के बेसिक पर 63,163 रुपये वेतनमान के रूप में प्राप्‍त करेगा (रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं)। वहीं,  ओम के हाथ लगेंगे एरियर के केवल 15 लाख रुपये। यदि कंपनी ओम को उसी पद पर नई भर्ती दिखाकर नौकरी पर रखती भी है तो,  उसका 17,000 के बेसिक के अनुसार वेतनमान 50,129 रुपये होगा (इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है)। यानी कि हर महीने कम से कम 13 हजार रुपये और पीएफ, ग्रेच्‍युटी, एलटीए, प्रमोशन आदि में नुकसान, जोकि समय के साथ-साथ तेजी से बढ़ता ही जाएगा। और यदि हिंदुस्‍तान के साथियों की तरह कंपनी उन्‍हें नौकरी पर नहीं रखती हैं तो अब आप खुद समझ सकते हैं आपका कितना बड़ा नुकसान हो रहा है।

मजबूरी में न दें इस्‍तीफा

उपरोक्‍त उदाहरणों से आपको वस्‍तुस्थिति समझ में आ गई होगी। हिंदुस्‍तान के कुछ साथियों ने ग्रेच्‍युटी की मामूली सी राशि रुकने के डर से और कुछ ने अन्‍य कारणों से इस्‍तीफा दे दिया। संस्‍थान ने इस्‍तीफा लेने के बाद उन्‍हें तुरंत बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। ऐसे में इस्‍तीफा देकर क्‍या आप भी उनकी श्रेणी में आना चाहते हैं। इसलिए यदि आपसे संस्‍थान जबरन ग्रेच्‍युटी रोकने, बर्खास्‍तगी,  तबादले आदि की धमकी देकर इस्‍तीफा मांगता है तो कतई न दें और कानूनी उपायों को अपनाने की तरफ कदम बढ़ाएं।

इस स्थिति में क्‍या करें

ऐसा नहीं है सुप्रीम कोर्ट इससे अनजान है, सुनवाई के दौरान यह मुद्दा हमारे वकीलों द्वारा कई बार उठाया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2016 की सुनवाई के बाद दिए ऑर्डर में उल्‍लेख किया है… It has been brought to our notice by the learned counsels for some of the contesting parties that in case of some establishments, details of which need not be specifically mentioned herein, employees have been retrenched/terminated and in respect of certain other establishments the employees have been forced/compelled to sign undertakings which were later on used as to make out declarations that the employees do not desire to be covered by the Wage Board reommendations.

जबरन इस्‍तीफे के एक मामले का उल्‍लेख मध्‍यप्रदेश श्रमायुक्‍त द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिपोर्ट में भी है। उसमें पेज नंबर 20 पर भास्‍कर के साथी sanjay kumar chuhan के Forced Resignation का मामला इंदौर उप श्रमायुक्‍त द्वारा लेबर कोर्ट को रेफर करने का जिक्र है।

इसके अलावा कुछ अन्‍य साथियों ने भी अलग-अलग राज्‍यों में जबरन इस्‍तीफा देने के बाद उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज करवाने के साथ रिकवरी भी लगा रखी है, जिन पर सुनवाई जारी है। इसलिए हमारा उन सभी साथियों से अनुरोध है जिनका जबरन इस्‍तीफा प्रबंधन ने लिया है, वे पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं। हम जानते हैं एफआईआर दर्ज कराने में आपको कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ेगा, क्‍योंकि प्रभावशाली समाचार पत्र प्रबंधन के कारण पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर सकती है। ऐसे में यदि आपके राज्‍य में ऑनलाइन पुलिस शिकायत दर्ज कराने की सुविधा है तो वहां ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवाएं। नहीं तो केस लड़ रहे अपने साथियों से संपर्क कर उनकी मदद मांगें। इसके बाद आप रिकवरी बनवाकर और किसी कानून के जानकार से मैटर लिखवाकर डीएलसी में 17(1) और जबरन इस्‍तीफे के खिलाफ अलग-अलग केस लगवाएं। डीएलसी में दायर 17(1) की रिकवरी और इस्‍तीफे के खिलाफ लगवाए गए केस की प्रतिलिपि पर मोहर लगवाना व साइन करवाना न भूलें।

मिशन मजीठिया/भाग एक-दैनिक जागरण में बंपर वैकेंसी का राज

नई  दिल्‍ली।

दैनिक जागरण में अचानक बंपर वैकेंसी आई है, यह कदाचित आपको पता हो लेकिन शायद आप यह नहीं जानते होंगे कि जिस दैनिक जागरण ने ओवर स्‍टाफ की बात कहकर पिछले वर्ष सैकड़ों लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया उसी दैनिक जागरण को अचानक बंपर स्‍टाफ की जरूरत कैसे आन पड़ी। संस्‍थान के एक भरोसेमंद सूत्र ने बताया कि मजीठिया अवमानना का फैसला आने से उत्‍पन्‍न संकट से निपटने की तैयारी जागरण प्रबंधन अभी से कर रहा है। उसके तहत नए लोगों की भर्ती 15 हजार रुपये प्रति माह पगार के आधार पर की जाएगी। जो लोग ज्‍यादा बार्गेनिंग करेंगे उन्‍हें झूठे वादे के तहत पहले फंसा लिया जाएगा और उनके साथ मनमानी बाद में की जाएगी।

इस बात पर भरोसा करने का आधार यह है कि जागरण कभी अपने पास से कुछ नहीं देता। प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए पैसा वह अपने कर्मचारियों की सैलरी काट कर जुटाता है और पीएम मोदी के बगल में उपस्थित होकर फोटू खिंचवा लेता है। उसके जरिये कर्मचारियों पर इस बात का दबाव बनाता है कि जब देश का पीएम ही उसके साथ खड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट में उसका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता। खैर, जागरण के बारे में यह जगजाहिर है कि वह कभी अपने पास से कुछ खर्च नहीं करता। उसे यह पता है कि मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट उसकी खाल खींचने वाला है तो उसने नई भर्ती का फार्मूला निकाला है। पुराने कर्मचारियों को तो उसे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर अथवा बकाया देना ही होगा जिसमें उसे करोड़ों का चूना लगना तय है। इन करोड़ों रुपयों का खर्च वह 15 हजार रुपये प्रति माह पगार वाले नई भर्ती कर्मचारियों से निकालेगा।

दैनिक जागरण की इस तैयारी से एक बात तय है कि इस समय कार्यरत पुराने कर्मचारियों को अपनी नौकरी बिना किसी गलती के गंवानी होगी। अब यह उन कर्मचारियों को ही तय करना होगा कि वे लड़कर मरते हैं या मरने के बाद लड़ाई की तैयारी करते हैं। लेकिन दैनिक जागरण को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि नई भर्ती के जरिये वह मजीठिया से फुर्सत नहीं पा सकता। मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन देना होगा। नौकरी की गर्ज से आए नए लोग भले ही मजीठिया न मांगें, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन करने के जुर्म में याचिका के जरिये सुप्रीम कोर्ट घसीट ले जाएंगे।