मजीठिया : नई दुनिया जागरण को फिर भारी पड़ी चालाकी

अब श्रम न्यायालय ने लगाई पांच-पांच सौ की कॉस्ट

रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

हमने आपको पहले ही बताया था कि मध्यप्रदेश में श्रम न्यायालयों मे चल रहे मजीठिया के मामलों में नईदुनिया जागरण प्रबंधन की हर चाल उलटी पड़ रही है। इसका एक ओर ताजा मामला सामने आया है।
जानकारी के मुताबिक ग्वालियर श्रम न्यायालय में चल रहे मामले कूट परीक्षण तक पहुंच गए हैं, लेकिन प्रबंधन बार-बार बहाना बनाकर मामलों को लटकाना चाहता है। प्रबंधन के वकील लेबर कोर्ट में बहाना बनाकर भागते हैं।

पूर्व में जहां ग्वालियर हाईकोर्ट ने मामले में प्रबंधन को पांच-पांच हजार की कॉस्ट लगाई थी। इसमें सभी कर्मचारियों का प्रबंधन ने 09 अप्रैल को पांच-पांच हजार का नकद भुगतान कर दिया था। लेकिन 09 अप्रैल को राज्य अधिवक्ता संघ की हड़ताल के कारण मामले में कूट परीक्षण नहीं हो सका था और अगली तिथि 18 अप्रैल की निर्धारित हुई थी।

18 अप्रैल को कर्मचारी और उनके वकील पूरी तैयारी के साथ कूट परीक्षण के लिए श्रम न्यायालय पहुंचे थे। लेकिन प्रबंधन की ओर से एक जूनियर वकील कोर्ट में उपस्थित हुए और कूट परीक्षण के लिए अगली तारीख की मांग की।कर्मचारियों के वकील ने इस पर आपत्ति ली और माननीय न्यायाधीश महोदय को प्रबंधन की धूर्तता से अवगत कराया।

इस पर प्रबंधन के जूनियर वकील ने तर्क दिया कि उनके सीनियर वकील के यहां कोई कार्यक्रम है, इसलिए उन्हें अवसर दिया जाए। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कर्मचारियों क े वकील की आपत्ति सुनने के बाद प्रबंधन के वकील से स्पष्ट पूछा कि वे केवल हां या न में ये बताएं कि आज कूट परीक्षण करेंगे या नहीं। इस पर प्रबंधन का वकील बगले झांकने लगा। बात बिगड़ती देख बाहर आकर उसने अपने आकाओं को कोर्ट के रुख से अवगत कराया।

इसके बाद सीनियर वकील भागे-भागे कोर्ट पहुंचे और उन्होंने भी तारीख देने की मांग की। इसके बाद पुन: न्यायाधीश महोदय ने कहा कि केवल अपना उत्तर हां या न में दें। इसके बाद जब प्रबंधन के वकील ने असमर्थता जताई तो माननीय न्यायाधीश महोदय ने प्रत्येक प्रकरण में 500-500 रुपए कॉस्ट लगा दी। साथ ही माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों में सुनवाई हो रही है। इसलिए मामलों को तय समय में निपटाने के लिए अब डे टू डे सुनवाई की जाएगी। इसके बाद सभी प्रकरणों में दो दिन बाद की तारीख दे दी गई है।

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एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल का दर्शन

श्रीकांत सिंह।

गुजरात विधानसभा चुनाव आज यानी 17 दिसंबर 2017 को एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल के बीच त्रिशंकु की भांति लटका हुआ है। चुनावी भविष्‍यवाणी करने में कुछ पत्रकारों को छोड़ दें तो ज्‍यादातर भाजपा के पक्ष में ईवीएम की तरह विनम्र, अतिविनम्र और विनम्राधिराज बने हैं। जयशंकर प्रसाद के एक नाटक का संदर्भ लें तो उसमें लिखा है-‘सीधे तने पर्वत के चरणों में कमजोर और लचकदार लताओं को लोटना ही चाहिए।’ ये कमजोर और लचकदार लताएं आज की पत्रकारिता की ओर संकेत करती हैं जिसकी वजह से कभी कभी एक्जिट पोल और इक्‍जैक्‍ट पोल में उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुव का अंतर सामने आता है। भारत में केजरीवाल के मुख्‍यमंत्री बनने और अमेरिका में डोनाल्‍ड ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने में एक्जिट पोल धोखा खा गए थे। शायद यही वजह रही होगी कि ट्रंप ने अमेरिका के पत्रकारों को फेकू पत्रकार करार दिया था।

दरअसल, एक्जिट पोल के दर्शन की बात करें तो यह उस दशा को दर्शाता है जो हमारे मन की हालत होती है। हमारा मन सत्‍तारूढ़ पार्टी का इतना गुलाम हो चुका होता है कि उसके विरोध में कुछ सोचता ही नहीं। जैसे वैशाख नंदन को वैशाख में सबकुछ हरा-हरा दिखता है वैसे ही आज तमाम पत्रकारों को भाजपा में कोई दोष नजर नहीं आ रहा है। हर कोई अपने आंकड़े में भाजपा को जिताता नजर आता है। किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा भी हो सकती है। अनुमान लगाने में आखिर इतना बड़ा जोखिम कौन उठाए। इसीलिए मैंने भी न तो त्रिशंकु का अनुमान लगाया है और न ही किसी पार्टी विशेष के सत्‍ता में आने का। मैंने साफ-साफ कह दिया है-‘मेरे पास डेढ़ सौ सीटें हैं, जिन्‍हें किसी पार्टी को देना नहीं चाहता। भाजपा को इसलिए नहीं कि उसने उस लायक काम नहीं किया है और विपक्ष को इसलिए नहीं कि वह उतना सक्षम नहीं बन पाया है। ये है एक्जिट पोल का दर्शन।’

हमारे पत्रकारों से कहीं ज्‍यादा सटीक दर्शन जनता यानी मतदाताओं के पास होता है। इसीलिए वे समय समय पर पत्रकारों को चौंकाते रहते हैं। अपने अंदर का हाल किसी पत्रकार को नहीं बताते। बताते वही हैं जो पत्रकार सुनना चाहते हैं और सत्‍ता के समर्थन में भविष्‍यवाणी करना चाहते हैं। मुझे उन पत्रकारों के चिंतन पर कोफ्त होती है जो जनता तो दूर, पत्रकारों के ही हक मजीठिया को दिलाने में नखरे दिखा रही भाजपा को दूध की धुली बताते नहीं थकते और ऊपर से महान होने का आडंबर ओढ़ लेते हैं कि वे इतने महान हैं कि अपने हक की चर्चा भी नहीं करना चाहते। लेकिन सैलरी दस दिन लेट हो जाए तो घोर निराशा में डूबने लगते हैं। ऐसे पत्रकारों की भविष्‍यवाणियां हमेशा सच होंगी, इसमें संदेह की गुंजाइश बनी रहेगी। क्‍योंकि परिवर्तन का पहिया कब घूम जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर युग चाहे वह इंदिरा गांधी का रहा हो या राजीव गांधी का, या वर्तमान प्रात: स्‍मरणीय अथवा निंदनीय नरेंद्र मोदी का, भक्‍त पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी कुकुरमुत्‍ते की तरह उगती रही है। यह कुकुरमुत्‍ता युग अजर और अमर है। जब जब चुनावी बारिश होगी, इसे उगने से कोई रोक नहीं सकेगा। बजाय इस पर भरोसा करने के, आप अपने अंदर की आवाज सुनने का प्रयास करेंगे तो कभी गच्‍चा नहीं खाएंगे।

संपादकों के लिए ज्ञान

फोर्थपिलर टीम।

संपादकों के लिए समाचार का चयन बहुत बड़ी चुनौती है। सटीक ख़बरों का चयन उनकी विशेष योग्यता होती है। समाचार चयन के साथ ही उनका विभाजन भी कम बड़ी चुनौती नहीं है। ये दोनों काम आंतरिक समाचार प्रबंधन का हिस्सा हैं। इनमें कुशलता अच्छी पढ़ाई, गहन अध्ययन, समझ, अनुभव और फिर इनके आधार पर मानसिक तर्क-वितर्क से आती है।

ये चुनौतियां कम पढ़े-लिखे या कुपढ़ संपादकों के लिए समस्या बन जाती हैं। वे अपनी टीम के पत्रकारों के लिए अलग तरह की दिक्कतें खड़ी कर देते हैं। यह बात उन पर खास तौर से लागू होती है, जो बिना पढ़े-लिखे नाते-रिश्तेदारी अथवा यारी-दोस्ती के रास्ते नौकरी पाने के बाद किसी समाचार संपादक या संपादक का लटक बनकर यह मुकाम पा जाते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। आप जिस अखबार या चैनल में काम करते हैं, मान लीजिए एक खबर आती है कि नीति आयोग ने सरकार को निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया है। अब पहले तय करना होगा कि ख़बर लेनी है या नहीं। लेनी है तो किस डेस्क (जनरल या बिजनेस या खेल डेस्क) से यह खबर बननी चाहिए और फिर कहां ली जानी चाहिए। मोटी अक्ल वाला संपादक भी तय कर लेता है कि यह ख़बर ली जानी है।

हालांकि इसके बाद उसका दिमाग जवाब दे जाता है। फिर वह इस समाचार को बिजनेस डेस्क के हवाले कर देता है। अब बताइए कि इसमें बिजनेस क्या है? यह तो नीतिगत मसला है जिसका संबंध राजनीति और समाज से है। अर्थ या व्यापार से यह तब जुड़ती है जब कंपनियां इसका विरोध अथवा समर्थन करती हैं या फिर मान लीजिए टाटा समूह अपनी कंपनियों में आरक्षण लागू करने की घोषणा कर देता है।

बुनियादी सबक : कोई खबर इसलिए आर्थिक नहीं हो जाती कि उसमें कंपनी, निजी क्षेत्र या उद्योग शब्द आ गया है।

सात मूस खाय के…

एक देशी कहावत है-सात मूस खाय के बिलार चली हज का। यानी सात चूहे खाने के बाद बिल्‍ली धार्मिक होने का नाटक कर रही है। ऐसे ही एक स्‍वनाम धन्‍य दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में हैं, जिन्‍हें चिंदी चोरों के गुरु के नाम से जाना जाता है। उनके लिए चिंदी चोरों का गुरु लिखना ही पर्याप्‍त है, क्‍योंकि इस कर्म से वह ज्‍यादा आसानी से पहचाने जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि उन्‍होंने दारू की बोतल न पेश करने वाले को कभी नौकरी नहीं करने दिया। जिसने दारू की बोतल पेश कर दी, उसके लिए दैनिक जागरण जैसे महापापी के बैनर पर मानो दलाली करने का दरवाजा ही खुल गया। पैदल चलकर जागरण में भर्ती होने आए तमाम लोगों के पास आज चमचमाती कारें हैं।

महिला कर्मचारियों से छेड़छाड़ के मामले में तो ये पक्‍के गुरु हैं। न जाने कितनी बार महिला कर्मचारियों ने इन्‍हें माफी मांगने के लिए मजबूर किया, लेकिन ये आदत से मजबूर हैं। आज कल उन्‍होंने एक नया पाखंड रचा है। सिर पर चोटी, कंधे पर जनेऊ और मुख पर राम। हर कुकर्म आजमाने के बाद उनका नया भेष चौंकाता है, शक पैदा करता है और उनके किसी नए छल की आशंका से डराता भी है, क्‍योंकि बड़े पाप करने के लिए ही इंसान भेष बदलता है।

 

दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति

समाचारों में दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति साफ नजर आ रही है। यह सब पकड़ कर लाए गए चिंदी चोरों की वजह से हो रहा है। बनियौटा इसलिए कि स्‍टोरी की जगह स्‍टोर लिखा गया है। चिंदी चोरी इसलिए कि जागरण की वेबसाइट पर चल रही खबर ‘धमकी से समझौते तक, जानें डोकलाम पर डील की इनसाइड स्टोरी’ को ताजा-ताजा टाइम्‍स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज की लीड से झाड़ लिया गया है।

 

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड है। यहां मालिक और नौकर में भारी भेदभाव किया जाता है। मजीठिया की बात करें तो अखबार मालिकों को खुली छूट है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन मनमर्जी से कर सकते हैं। जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के 26 अगस्‍त के अंक में प्रकाशित एक खबर उदाहरण लें तो पता चलेगा कि किस प्रकार दक्षिण कोरिया में सैमसंग जैसी बड़ी कंपनी के वारिस को घूस कांड में पांच साल की कैद हो गई। यहां तो अखबार मालिक चाहे डीएलसी को घूस दें या पूरा प्रशासन ही खरीद लें, कोई पूछने वाला नहीं है।

यह आने वाले तूफान का संकेत

समाचार सार-

अखबार मालिक शांत हैं, लेकिन कर्मचारी प्रताड़ित। यह आने वाले तूफान का संकेत भर है। उधर मजीठिया क्रांतिकारी गुपचुप अपनी तैयारी में लगे हैं। जैसे ही कोई एक कर्मचारी मजीठिया भुगतान हासिल करेगा, समूचे समाचार पत्र जगत में तूफान खड़ा हो जाएगा।

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रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

जब से देश के प्रधानमंत्री मोदी जी बने हैं, देशवासियों में उनका नारा अच्छे दिन आएंगे ज्यादा ही चर्चा में है। आये मौकों पर मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल चाहे व्यंग्य के रूप में या फिर अच्छे रूप में हर कोई करता ही है। बुरा हुआ तो सभी बोल पड़ते हैं, लो आ गए अच्छे दिन। जब कुछ अच्छा होता है तो यह भी कहते हैं कि हमने पहले ही कहा है या कहते आ रहे हैं कि अच्छे दिन आएंगे। लेकिन हम मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल अखबार कर्मियों के लिए कर रहे हैं। हो सकता है कि अख़बार कर्मियों को मेरी यह बात मोदी जी की ही बात लगे यानी हवाबाजी नजर आये, पर यह सौ प्रतिशत सही है और मैं फिर से यही बात दोहरा रहा हूँ कि अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन आएंगे और यह वक़्त बताएगा, जो बहुत जल्द आने वाला है।

हम यह भी बताते आ रहे हैं कि अख़बार मालिकानों को आजकल यही चिंता सता रही है कि उन्हें कैसे इस मजीठिया की देनदारी से मुक्ति मिले।उनके लोग, वे खुद और उनके वकील इसी काम में दिन रात जुटे रहते हैं कि ऐसा क्या किया जाये कि मजीठिया की देनदारी से बचा जाए। मालिकान माननीय सुप्रीम कोर्ट से 19 जून 2017 को आये फैसले के बाद से ही परेशान हैं और इससे बचने का रास्ता तलाश रहे हैं। हम यह भी बता चुके हैं कि मालिकान अभी कोई ऐसा सबूत वर्कर को नहीं देना चाहते जिससे उनकी कोर्ट में फिर से किरकिरी हो और इस बार कोर्ट में कुछ ऐसा हुआ तो उनका बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा। माननीय कोर्ट यह साफ कह चुका है कि हम मालिकानों को एक मौका दे रहे हैं।यही वजह है कि कुछ अख़बार मालिकों ने अभी तक वर्करों की सालाना तनख्वाह नहीं बढ़ाई है। कुछ ने थोड़ा बहुत दिया है तो वह मजीठिया के हिसाब से नहीं है। कुछ ने सैलरी स्लीप देना बंद कर दिया है तो कुछ ने ऑन लाइन रिसिप्ट देना शुरू किया है। अब आगे देखने वाली बात यह होगी कि अख़बार मालिकान और उनके प्रबंधक और क्या क्या करते हैं मजीठिया की देनदारी से बचने के लिए।

दूसरी ओर अख़बार के वर्कर हैं जो मालिकानों की तमाम बाधाओं को दरकिनार कर और बेकार मान अपने काम में जुटे हैं। जिस तरह मालिकान खुद को बचाने में जुटे हैं, वैसे ही वर्कर मालिकानों को फिर से केस में कैसे फंसाया जाये, इस जुगत में लगे हैं। वर्कर मालिकानों से पैसा लेने में कुछ वक्त लगने की बात से अनजान नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरा यकीन है कि उनका पैसा मालिक देगा जरूर, चाहे हंस के दे,चाहे रो के।तो मोदी जी का नारा देश में सच साबित हो या न हो, पर अख़बार वर्करों के लिए उनका नारा अच्छे दिन आएंगे, जरूर सच होगा। यह बात अब निचली अदालतों में भी दिख रही है और जिन केसों में कोई कानूनी बाधा नहीं है, उनका काम सही तरह से चल रहा है। कुल मिलाकर सभी अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन जरूर आएंगे।