संपादकों के लिए ज्ञान

फोर्थपिलर टीम।

संपादकों के लिए समाचार का चयन बहुत बड़ी चुनौती है। सटीक ख़बरों का चयन उनकी विशेष योग्यता होती है। समाचार चयन के साथ ही उनका विभाजन भी कम बड़ी चुनौती नहीं है। ये दोनों काम आंतरिक समाचार प्रबंधन का हिस्सा हैं। इनमें कुशलता अच्छी पढ़ाई, गहन अध्ययन, समझ, अनुभव और फिर इनके आधार पर मानसिक तर्क-वितर्क से आती है।

ये चुनौतियां कम पढ़े-लिखे या कुपढ़ संपादकों के लिए समस्या बन जाती हैं। वे अपनी टीम के पत्रकारों के लिए अलग तरह की दिक्कतें खड़ी कर देते हैं। यह बात उन पर खास तौर से लागू होती है, जो बिना पढ़े-लिखे नाते-रिश्तेदारी अथवा यारी-दोस्ती के रास्ते नौकरी पाने के बाद किसी समाचार संपादक या संपादक का लटक बनकर यह मुकाम पा जाते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। आप जिस अखबार या चैनल में काम करते हैं, मान लीजिए एक खबर आती है कि नीति आयोग ने सरकार को निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया है। अब पहले तय करना होगा कि ख़बर लेनी है या नहीं। लेनी है तो किस डेस्क (जनरल या बिजनेस या खेल डेस्क) से यह खबर बननी चाहिए और फिर कहां ली जानी चाहिए। मोटी अक्ल वाला संपादक भी तय कर लेता है कि यह ख़बर ली जानी है।

हालांकि इसके बाद उसका दिमाग जवाब दे जाता है। फिर वह इस समाचार को बिजनेस डेस्क के हवाले कर देता है। अब बताइए कि इसमें बिजनेस क्या है? यह तो नीतिगत मसला है जिसका संबंध राजनीति और समाज से है। अर्थ या व्यापार से यह तब जुड़ती है जब कंपनियां इसका विरोध अथवा समर्थन करती हैं या फिर मान लीजिए टाटा समूह अपनी कंपनियों में आरक्षण लागू करने की घोषणा कर देता है।

बुनियादी सबक : कोई खबर इसलिए आर्थिक नहीं हो जाती कि उसमें कंपनी, निजी क्षेत्र या उद्योग शब्द आ गया है।

Advertisements

सात मूस खाय के…

एक देशी कहावत है-सात मूस खाय के बिलार चली हज का। यानी सात चूहे खाने के बाद बिल्‍ली धार्मिक होने का नाटक कर रही है। ऐसे ही एक स्‍वनाम धन्‍य दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में हैं, जिन्‍हें चिंदी चोरों के गुरु के नाम से जाना जाता है। उनके लिए चिंदी चोरों का गुरु लिखना ही पर्याप्‍त है, क्‍योंकि इस कर्म से वह ज्‍यादा आसानी से पहचाने जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि उन्‍होंने दारू की बोतल न पेश करने वाले को कभी नौकरी नहीं करने दिया। जिसने दारू की बोतल पेश कर दी, उसके लिए दैनिक जागरण जैसे महापापी के बैनर पर मानो दलाली करने का दरवाजा ही खुल गया। पैदल चलकर जागरण में भर्ती होने आए तमाम लोगों के पास आज चमचमाती कारें हैं।

महिला कर्मचारियों से छेड़छाड़ के मामले में तो ये पक्‍के गुरु हैं। न जाने कितनी बार महिला कर्मचारियों ने इन्‍हें माफी मांगने के लिए मजबूर किया, लेकिन ये आदत से मजबूर हैं। आज कल उन्‍होंने एक नया पाखंड रचा है। सिर पर चोटी, कंधे पर जनेऊ और मुख पर राम। हर कुकर्म आजमाने के बाद उनका नया भेष चौंकाता है, शक पैदा करता है और उनके किसी नए छल की आशंका से डराता भी है, क्‍योंकि बड़े पाप करने के लिए ही इंसान भेष बदलता है।

 

दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति

समाचारों में दैनिक जागरण का बनियौटा और चौर प्रवृत्ति साफ नजर आ रही है। यह सब पकड़ कर लाए गए चिंदी चोरों की वजह से हो रहा है। बनियौटा इसलिए कि स्‍टोरी की जगह स्‍टोर लिखा गया है। चिंदी चोरी इसलिए कि जागरण की वेबसाइट पर चल रही खबर ‘धमकी से समझौते तक, जानें डोकलाम पर डील की इनसाइड स्टोरी’ को ताजा-ताजा टाइम्‍स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज की लीड से झाड़ लिया गया है।

 

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड

भारत में मुसीबतों की जड़ दोहरा मापदंड है। यहां मालिक और नौकर में भारी भेदभाव किया जाता है। मजीठिया की बात करें तो अखबार मालिकों को खुली छूट है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन मनमर्जी से कर सकते हैं। जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के 26 अगस्‍त के अंक में प्रकाशित एक खबर उदाहरण लें तो पता चलेगा कि किस प्रकार दक्षिण कोरिया में सैमसंग जैसी बड़ी कंपनी के वारिस को घूस कांड में पांच साल की कैद हो गई। यहां तो अखबार मालिक चाहे डीएलसी को घूस दें या पूरा प्रशासन ही खरीद लें, कोई पूछने वाला नहीं है।

यह आने वाले तूफान का संकेत

समाचार सार-

अखबार मालिक शांत हैं, लेकिन कर्मचारी प्रताड़ित। यह आने वाले तूफान का संकेत भर है। उधर मजीठिया क्रांतिकारी गुपचुप अपनी तैयारी में लगे हैं। जैसे ही कोई एक कर्मचारी मजीठिया भुगतान हासिल करेगा, समूचे समाचार पत्र जगत में तूफान खड़ा हो जाएगा।

———————————————-

रतन भूषण की फेसबुक वाल से साभार।

जब से देश के प्रधानमंत्री मोदी जी बने हैं, देशवासियों में उनका नारा अच्छे दिन आएंगे ज्यादा ही चर्चा में है। आये मौकों पर मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल चाहे व्यंग्य के रूप में या फिर अच्छे रूप में हर कोई करता ही है। बुरा हुआ तो सभी बोल पड़ते हैं, लो आ गए अच्छे दिन। जब कुछ अच्छा होता है तो यह भी कहते हैं कि हमने पहले ही कहा है या कहते आ रहे हैं कि अच्छे दिन आएंगे। लेकिन हम मोदी जी के इस नारे का इस्तेमाल अखबार कर्मियों के लिए कर रहे हैं। हो सकता है कि अख़बार कर्मियों को मेरी यह बात मोदी जी की ही बात लगे यानी हवाबाजी नजर आये, पर यह सौ प्रतिशत सही है और मैं फिर से यही बात दोहरा रहा हूँ कि अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन आएंगे और यह वक़्त बताएगा, जो बहुत जल्द आने वाला है।

हम यह भी बताते आ रहे हैं कि अख़बार मालिकानों को आजकल यही चिंता सता रही है कि उन्हें कैसे इस मजीठिया की देनदारी से मुक्ति मिले।उनके लोग, वे खुद और उनके वकील इसी काम में दिन रात जुटे रहते हैं कि ऐसा क्या किया जाये कि मजीठिया की देनदारी से बचा जाए। मालिकान माननीय सुप्रीम कोर्ट से 19 जून 2017 को आये फैसले के बाद से ही परेशान हैं और इससे बचने का रास्ता तलाश रहे हैं। हम यह भी बता चुके हैं कि मालिकान अभी कोई ऐसा सबूत वर्कर को नहीं देना चाहते जिससे उनकी कोर्ट में फिर से किरकिरी हो और इस बार कोर्ट में कुछ ऐसा हुआ तो उनका बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा। माननीय कोर्ट यह साफ कह चुका है कि हम मालिकानों को एक मौका दे रहे हैं।यही वजह है कि कुछ अख़बार मालिकों ने अभी तक वर्करों की सालाना तनख्वाह नहीं बढ़ाई है। कुछ ने थोड़ा बहुत दिया है तो वह मजीठिया के हिसाब से नहीं है। कुछ ने सैलरी स्लीप देना बंद कर दिया है तो कुछ ने ऑन लाइन रिसिप्ट देना शुरू किया है। अब आगे देखने वाली बात यह होगी कि अख़बार मालिकान और उनके प्रबंधक और क्या क्या करते हैं मजीठिया की देनदारी से बचने के लिए।

दूसरी ओर अख़बार के वर्कर हैं जो मालिकानों की तमाम बाधाओं को दरकिनार कर और बेकार मान अपने काम में जुटे हैं। जिस तरह मालिकान खुद को बचाने में जुटे हैं, वैसे ही वर्कर मालिकानों को फिर से केस में कैसे फंसाया जाये, इस जुगत में लगे हैं। वर्कर मालिकानों से पैसा लेने में कुछ वक्त लगने की बात से अनजान नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरा यकीन है कि उनका पैसा मालिक देगा जरूर, चाहे हंस के दे,चाहे रो के।तो मोदी जी का नारा देश में सच साबित हो या न हो, पर अख़बार वर्करों के लिए उनका नारा अच्छे दिन आएंगे, जरूर सच होगा। यह बात अब निचली अदालतों में भी दिख रही है और जिन केसों में कोई कानूनी बाधा नहीं है, उनका काम सही तरह से चल रहा है। कुल मिलाकर सभी अख़बार कर्मियों के अच्छे दिन जरूर आएंगे।

न्‍याय व्‍यवस्‍था का काला अध्‍याय  

श्रीकांत सिंह।

अराजकता तभी आती है, जब न्‍याय व्‍यवस्‍था फेल हो जाती है। सबसे पहले सक्षम लोग अराजकता फैलाते हैं और शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था परवान चढने लगती है। अक्षम लोगों पर अत्‍याचार इतना बढ जाता है कि वे हथियार उठाने को बाध्‍य हो जाते हैं। नक्‍सल समस्‍या तो इसका एक उदाहरण भर है। भविष्‍य कितना भयावह होने जा रहा है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। मजीठिया अवमानना मामले में 19 जून 2017 को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह न्‍याय व्‍यवस्‍था के काले अध्‍यायों में दर्ज हो चुका है।

बडी मुश्किल से छोटे पत्रकारों की बडी टीम सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंची। वर्षों तक केस को लटकाए रखा गया। अंत में फैसला वही ढाक के तीन पात। ताजा फैसले में कुछ भी नया नहीं है। अवमानना के केस का मतलब ही यही है कि अदालत के आदेश का उल्‍लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्‍य में वे ऐसी जुर्रत न कर सकें।

तो दोषियों को दंडित कौन करेगा। न्‍याय पालिका ने तो पल्‍ला झाड लिया है। क्‍या इसका मतलब यही समझा जाए कि लोग खुद निपट लें। न्‍याय पालिका, पुलिस, प्रशासन आदि के अधिकारी क्‍या लोगों की गाढी कमाई से जुटाए गए राजस्‍व से केवल सैलरी उठाएंगे और कोई काम नहीं करेंगे। उन्‍हें कर्तव्‍य बोध कौन कराएगा।

हमारे नेता तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। हर पांच साल बाद जुमले छोड कर आपको मूर्ख बनाएंगे और भारी बहुमत से जीत हासिल कर लेंगे। आखिर कब तक चलेगा यह सब। कौन है जो न्‍याय पालिका को पंगु बना रहा है। कौन है जो इस देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहा है। उसे पहचानना और दंडित करना जरूरी हो गया है, क्‍योंकि यह देश हमारा है, उनका नहीं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर लग जाएं अधिकारियों के पीछे

श्रीकांत सिंह।

पिछले आलेख का संदर्भ लें तो हमने कहा था कि मायूस होने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढने और समझने की जरूरत है। मैंने आज ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा पढा और जो मेरी समझ में आया उसे आपके सामने रख रहा हूं। अगर आपको कहीं संदेह लगे तो आप भी आदेश को पढें और उस संदर्भ में मुझसे चर्चा कर सकते हैं। मेरा मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जो आशंका जताई जा रही है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुन: हमें श्रम आयुक्‍त या लेबर कोर्ट का रास्‍ता दिखा दिया है, जबकि कोर्ट का आदेश कहता है- Section 17 of the act deals with recovery of money due from an employer. As a core issue on the maintainability of the presrnt contempt cases centers around the remedy provided for by the aforesaid provision of the act, section 17 of the Act may be set out hereunder. यानी, सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना मामलों को न्‍यायसंगत ढंग से निपटाने के लिए धारा 17 के तहत प्रावधान किए गए हैं, जिनका निस्‍तारण संबंधित अधिकारारियों द्वारा ही संभव है। इस बारे में धारा 17 के विभिन्‍न खंडों में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि वे अधिकारी हमें टरकाने लगेंगे तो हम क्‍या करेंगे… उसके लिए आपको जीवटता तो दिखानी ही पडेगी। आपको अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी और संयुक्‍त रूप से अधिकारियों को घेरना होगा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उन्‍हें काम करने के लिए बाध्‍य करना होगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए स्‍पष्‍ट निर्देश दे रखा है। देखें-धारा 17-1, 17-2, 17-3।

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि 20-जे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढें तो उसमें साउथ इंडिया इस्‍टेट लेबर रिलेशंस आर्गनाइजेशन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास की नजीर देकर समझाया गया है कि सेवायोजकों की यह शिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उनके कर्मचारी इस आधार पर कम वेतन पर काम करना चाहते हैं कि वे अत्‍यंत गरीब और असहाय हैं।

तबादला, निलंबन और प्रताडना मामलों के संदर्भ में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ऐसे मामलों का निस्‍तारण उचित प्राधिकारी ही कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संबंधित अधिकारी मनमानी करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। उन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उनसे काम कराया जा सकता है। ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर पाएंगे मगर आपको भी सख्‍ती दिखानी होगी।