राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों

श्रीकांत सिंह। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि गैरकानूनी काम करने वाली कंपनियों पर कडी कार्रवाई होगी। तीन लाख ऐसी कंपनियां हैं जो आर्थिक लेनदेन के मामले में शक के घेरे में हैं और एक लाख कंपनियों का पंजीकरण निरस्‍त कर दिया गया है। ऐसा फैसला राजनीतिक गुणा भाग करने वाले नहीं, राष्‍ट्र के लिए जीने वाले ही कर सकते हैं। मैं मोदी जी से यह पूछना चाहता हूं-आप अखबार मालिकों के मामले में कब राजनीतिक गुणा भाग लगाना बंद करेंगे। कुछ गिने चुने अखबार मालिक न केवल गैरकानूनी काम कर रहे हैं, मजीठिया अवमामनना मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर देश की सर्वोच्‍च अदालत का अपमान भी कर रहे हैं।

पिछले दिनों मैंने दैनिक जागरण के मुख्‍य महाप्रबंधक नीतेंद्र श्रीवास्‍तव से फोन पर मजीठिया वेतनमान लागू करने का आग्रह किया तो वह सरासर झूठ बोल गए और कहा कि दैनिक जागरण में मजीठिया वेतनमान पहले से लागू है। मतलब साफ है कि वे मजीठिया वेतनमान नहीं देना चाहते हैं, भले इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने आइने की तरह साफ कर दिया है।

मोदी जी, ये अखबार मालिक जिन लोगों के साथ अत्‍याचार कर रहे हैं, वे गरीब लोग ही हैं। आपकी परिभाषा में गरीब कौन है, यह समझ से परे है। अभी तक किसी अखबार मालिक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। किसी अखबार का पंजीकरण भी निरस्‍त नहीं किया गया है। आप राष्‍ट्र के लिए जीने मरने की कसम खा चुके हैं तो सबसे पहले इन मुनाफाखोर अखबार मालिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराएं, भले ही वे भाजपा और आपका गुणगान क्‍यों न करते हों।

आपकी नजर में यदि राष्‍ट्रवाद अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना है तो अपने विरोधियों की कंपनियों को चुन चुन कर बर्बाद कर दीजिए और अखबार मालिकों के अत्‍याचार को फलने फूलने दीजिए। आप सरकार में हैं, सत्‍ता आपके हाथ में है। आप किसी को भी कुचल दें और किसी को भी बचा दें, इस पर फिलहाल आपका अख्तियार है। फिर आप राष्‍ट्र के लिए जीने का ढोंग क्‍यों रच रहे हैं।

दूर से ही दिखने लगा है राजनीतिक संकट

श्रीकांत सिंह

हिंदुओं की एकता के नाम पर बडी मुश्किल से देश की जनता एकजुट हुई है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी मिलकर उसी जनता का भरोसा तोड रहे हैं। गरीबों की गैस सब्सिडी बंद है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इंडियन ऑयल और पीएमओ तक शिकायत करने का कोई असर नहीं हो रहा है। दिल्‍ली और यूपी में मेट्रो ट्रेन के किराये में बेतहासा इजाफा किया जा रहा है। यही तो एक जनहितकारी और पर्यावरण को अनुकूल बनाने वाली व्‍यवस्‍था थी, जिसे धंधे पर लगाया जा रहा है। मेट्रो के किराये में एकायक इतना इजाफा कर दिया गया है कि अब हालत यह है कि लोग अपनी कार सडकों पर लाने की सोचने लगे हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत का भी कोई लाभ जनता को नहीं मिल रहा है। पुलिस आज भी लोगों के एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। कानून व्‍यवस्‍था की हालत खराब है। सरकार मजदूरों की नहीं, मालिकों की बात सुन रही है। लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं है। सरकार सोच रही है कि विपक्ष तो समाप्‍त ही हो गया और मीडिया पालतू हो गया है। अब चाहे कोई काम करें या नहीं, अकंटक राज करेंगे।

ऐसा सोचना सरकार और भाजपा दोनों के लिए आत्‍मघाती होगा। अब यदि जनता का भरोसा टूट गया तो जनता मान लेगी कि तिकडम से उसे मूर्ख बनाया गया है। ऐसी हालत में क्षेत्रीय दलों का उदय फिर होने लगेगा और किसी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में आक्रोश का माहौल बनने लगा है। राजनीतिक संकट दूर से ही दिखाई पडने लगा है।

गणतंत्र दिवस के बहाने

श्रीकांत सिंह

जैसा कि शब्‍द से ही स्‍पष्‍ट है-गण का मतलब समूह और तंत्र का मतलब तार। इस तार में बड़ी ताकत है। यह संवाहक का काम करता है। इसमें बिजली डाल दी जाए तो यह बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देता है। चुंबकीय तरंगें डाल दी जाएं तो उन्‍हें भी यह देश के कोने-कोने में पहुंचा देता है। तकनीकी विकास ने तंत्र यानी तार को भी बीच से हटा दिया है। इसी नियम पर हम टीवी, मोबाइल फोन, इंटरनेट आदि चलाते हैं। तार का काम अब तरंगें करने लगी हैं। राजतंत्र में यही तार राजा के पास होता था। संपूर्ण तंत्र को राजा अपने बाहुबल से हासिल करता था। इसीलिए वीरभोग्‍या वसुंधरा का नियम चलता था।

जाने माने कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा था-वीरता जब भागती है तो राजनीति और छल छंद की धूल उड़ती है। और आज यही हो रहा है। गणतंत्र शब्‍द से गण भी गायब है। आज तरंगें, लहरें, हिलोरें आदि चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। अब गण के रूप में जनता के प्रतिनिधि गायब हैं। एक व्‍यक्ति जिसे धन बल से तरंगित कर दिया गया, हर जगह उसी का बोलबाला है। नियम, कानून, संविधान आदि का कोई मतलब नहीं रह गया है। एक ही व्‍यक्ति के मन की बात ने नियम, कानून, संविधान आदि का रूप ले लिया है। और हम हैं कि प्रमादवश उसी की जयजयकार किए जा रहे हैं।

दरअसल, इसके कारण बहुत ही गहराई में हैं। आप तरह-तरह की तकनीक से सम्‍मोहित किए जा रहे हैं, जिसका आपको पता भी नहीं चल रहा है। और उसका परिणाम यह हो रहा है कि एक व्‍यक्ति विशेष को अहैतुक समर्थन मिल रहा है। अहैतुक का मतलब अकारण समर्थन मिल रहा है। आप अपनी मूर्छा तोड़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि जिस व्‍यक्ति के नाम का आप जप कर रहे हैं, उसने देश, समाज और आपके लिए कुछ भी नहीं किया है। वह मात्र सम्‍मोहन का सौदागर है जो आपके पैसों पर ऐश कर रहा है। बईमानी वह कर रहा है और बेईमान आपको बता रहा है।

देश के लोगों में मूर्छा की यह स्थ्‍िाति बहुत घातक है। इसने चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर दिया तो हालात और भी घातक हो जाएंगे। शीघ्र ही आपकी मूर्छा न टूटी तो बहुत देर हो जाएगी। जो व्‍यक्ति यह कहता है-मित्रो, हम उत्‍तर प्रदेश को गुंडामुक्‍त करना चाहते हैं। ये फर्जी मुकदमों का जो ये सिलसिला चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। ये भूमाफिया का जो आतंक चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। यही व्‍यक्ति सोहराबुद्दीन हत्‍या मामले में 25 जुलाई 2010 को गिरफ्तार हुआ था और जेल भेजा गया था। इस पर अपहरण, हत्‍या, हत्‍या की साजिश, सबूतों से छेड़छाड़, महिलाओं के फोन टेप करने और एक्‍जार्शन (सरकारी पद का दुरुपयोग कर धन संपत्ति हड़पने) के आरोप लगे हैं। तो भला यह आदमी कैसे उत्‍तर प्रदेश को गुंडों से मुक्‍त करा पाएगा।

इसी की तरह का एक और व्‍यक्ति है जो आज कल आपके पास वोट की भीख मांगने जा रहा है। उस पर 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें दो धर्मों के लोगों को लड़ाना, हत्‍या की धमकी देना, हत्‍या की साजिश, हत्‍या करना, मारपीट करना, धर्मों का मजाक उड़ाना, धोखाधड़ी, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना, फर्जी दस्‍तावेज तैयार करना, चोरी, डकैती और दंगे करवाना आदि प्रमुख हैं।

आश्‍चर्य है कि इन पर दंगे के मामले चल रहे हैं और इनका दावा है कि ये उत्‍तर प्रदेश को दंगामुक्‍त प्रदेश बनाएंगे। तो आपके पास ऐसे लोग वोट मांगने जाएं तो उनकी जन्‍म कुंडली किसी काबिल ज्‍योतिषी से जरूर दिखा लेना। जब कुंडली का मिलान विवाह में आवश्‍यक बताया जाता है तो आपके भविष्‍य का विधाता बनने का दावा करने वालों की कुंडली क्‍यों न परख ली जाए। आप इन्‍हें इसलिए वोट न दे देना कि ये देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों में गिने जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों की संख्‍या नौ से कहीं ज्‍यादा हो सकती है, क्‍योंकि उनकी गणना अभी व्‍यवस्थित रूप से नहीं की गई है। कुछ अखबारों और टीवी न्‍यूज चैनलों के मालिक भी मोदी जी के रत्‍नों में शामिल हैं क्‍योंकि वे बिना शर्त मोदी जी का यशोगान करते हैं। ऐसे अखबारों और चैनलों की खबरों पर आप नजर डालें तो आपको कोई प्रमाण नहीं ढूंढना पड़ेगा।

दैनिक जागरण अखबार यह दावा करता है कि वह दुनिया में सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है। उसका सर्कुलेशन चेक करने के लिए मोदी जी सारा जग घूम आए और पाया कि इस जैसा अखबार कोई नहीं है। शायद इसीलिए इस अखबार के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाकर मोदी जी कृत कृत्‍य होते रहते हैं। इस अखबार के मालिक, प्रधान संपादक, सीईओ आदि आदि श्री संजय गुप्‍ता हैं।

बड़े ज्ञानी किस्‍म के आदमी लगते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने एक बार फरमान जारी किया था कि अब दैनिक जागरण स्‍वतंत्रता दिवस समारोह नहीं मनाएगा। क्‍योंकि स्‍वतंत्रता मुनाफाखोरी के रास्‍ते की सबसे बड़ी बाधा है। उन्‍होंने कहा था कि अब दैनिक जागरण के लोग गणतंत्र दिवस समारोह मनाएंगे, क्‍योंकि इसी दिन देश का संविधान लागू हुआ था। और अब जागरण में नियमों पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। फिर क्‍या था। धड़ाधड़ ऐसे नियम बनाए जाने लगे जो मुनाफाखोरी को आगे ले जा सकते थे और कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता छीन सकते थे। उन्‍हीं नियमों ने न जाने कितने निष्‍ठावान कर्मचारियों को भूतपूर्व बना दिया। अब मजीठिया वेजबोर्ड के नियम का पालन करने की बारी आई तो माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी पहाड़ा पढ़ाने लगे हैं। तो कुल मिलाकर गणतंत्र दिवस के बहाने यही कहना था-गणतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है इस देश में। अगर कुछ है तो वह है मोदी जी का नवरत्‍नतंत्र। इसी के इंद्रजाल में जनता छटपटा रही है। किसी को कुछ समझ में नहीं आता कि मोदी जी ईमानदार हैं या बेईमान, देवता हैं या राक्षस, राम हैं या रावण, महान हैं या धनवान, साधू हैं या सवादू, फकीर हैं या अमीर, काबिल हैं या रईस आदि आदि।

चरखा चर्चा में, साइकिल परिचर्चा में

चरखा आर्थिक उत्‍पाद का साधन है तो साइकिल आर्थिक बचत का

श्रीकांत सिंह

भारतीय राजनीति में आज उस चरखे पर चर्चा और साइकिल पर परिचर्चा हो रही है जिसे हम तकनीकी विकास के दौर में बहुत पीछे छोड़ आए थे। चरखा सौ साल पहले अस्तित्‍व में आया था तो साइकिल का आविष्‍कार लगभग पौने दो सौ साल पहले हुआ था। वैसे, इन्‍हें नोटबंदी के दौर में याद किया जाना चाहिए था, क्‍योंकि चरखा आर्थिक उत्‍पाद का साधन है तो साइकिल आर्थिक बचत का। चरखा एक कैशलेस व्‍यवस्‍था भी है। चरखे से सूत कात कर गांधी आश्रम में जमा किया जाता है तो वहां से बिना नकदी के कपड़ा मिल जाता है। कपड़े के अलावा दूसरे सामान भी सूत के बदले मिलते हैं।

a02लेकिन आज जिस संदर्भ में चरखा और साइकिल की चर्चा हो रही है, वह शुद्ध रूप से राजनीतिक है। चरखा इसलिए चर्चा में है कि जो महाशय चरखा नहीं चलाते उनकी फोटो कैलेंडर और डायरी में छप गई और जिन्‍होंने साइकिल चलाकर लोगों का दिल जीता, उन्‍हीं को साइकिल चुनाव निशान के लिए चुनाव आयोग में भटकना पड़ा।

खैर, फोटो छपने की फजीहत होने पर पीएमओ नाराज है तो साइकिल चुनाव निशान मिल जाने पर उत्‍तर प्रदेश के सीएम खुश। उत्‍तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड चुनावी माहौल की गर्मी के सामने बौनी नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश गुट के समर्थकों की मनोदशा एक प्रसिद्ध विज्ञापन की लाइन ‘चले हवा की चाल हीरो साइकिल’ जैसी हो गई है।

दरअसल, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के 2017 के कैलेंडर में कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने कई लोगों को चौंका दिया है। केवीआईसी डायरी के नए साल के कैलेंडर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगी है। जहां इस कैलेंडर पर आपत्ति जताई जा रही है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि पहले भी कई बार केवीआईसी के किसी सामान पर महात्मा गाँधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर डायरी पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी।

तुषार गांधी
तुषार गांधी

प्रतिक्रिया में महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। वहीं भाजपा ने सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। तुषार गाँधी ने कहा-हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। ऐसा कैसे कर सकते हो, कुछ तो शर्म किया करो।

अनिल विज
अनिल विज

बवाल तब मचा जब हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने कहा कि जिस दिन से नोटों पर गांधी की तस्‍वीर लगी है तब से रुपये की कीमत गिरने लगी है। हालांकि विवाद होने के बाद उन्‍होंने बयान वापस ले लिया। वहीं भाजपा ने भी अपने आप को इस बयान से किनारे कर लिया है। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। पार्टी का इससे लेना-देना नहीं है। अपने बयानों को लेकर अक्‍सर विवादों में रहने वाले हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा, गांधी जी के नाम से खादी पेटेंट थोड़े ही हो गया। जब से खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ गया खादी डूब गई।

चर्चित साहित्‍यकार उदय प्रकाश के शब्‍दों में, चरखे से सूत कातना पूँजी और मशीनी टेक्नोलॉजी की तानाशाही का अहिंसावादी, विनम्र, एकाग्र और मानवीय प्रतिरोध था। वहीं चर्चा में रहने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है। कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था। कोई उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है। मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिए गए और खलनायक की तरह दिखाए जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं। इसका स्वागत होना ही चाहिए।

शंभूनाथ शुक्‍ल की फेसबुक वाल कहती है-न वो चरखा समझे न ये समझे। चरखा तो बापू ही समझते थे और चरखे का मतलब कोई सूत कातना भर नहीं था। चरखा एक विचार था और खादी उसका प्रतिफलन। बापू ने न सिर्फ चरखा कातना सिखाया बल्कि नमक बनाना और साबुन बनाना भी। जरा थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि पचास साल पहले हर गांव में जो ऊसर होता था उसकी मिट्टी से कपड़े धोए जाते थे और महुआ से साबुन तथा तेल व घी।

मगर उस विचार को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा जब गांधी जी जिंदा थे और उन्होंने चरखे से स्वावलंबन सिखाया। मेरी चाची, जो अब लगभग 90 साल की हैं आज भी जब समय मिलता है तब चरखा कातती हैं और अपने ही एकमात्र पेड़ महुआ के फूल चैत में लगन से बिनती हैं और उससे बनता है साबुन तथा घी। आज भी वे तालाब में अपने कपड़े ऊसर की मिट्टी से ही धोती हैं। उन्होंने न कभी सनलाइट खरीदा न लाइफबॉय और न ही आज का घड़ी।

उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को विरासत में साइकिल चुनाव निशान समेत समूची विरासत मिलने पर तमाम लोग फूले नहीं समा रहे हैं। संत राम यादव के मुताबिक चुनाव आयोग ने सोमवार को सपा में पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही खींचतान पर विराम लगाते हुए इसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दिया है। इसका अर्थ यह हुआ कि अखिलेश अब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनके नेतृत्व और साइकिल चुनाव चिन्ह के साथ पार्टी उत्तर प्रदेश के चुनावों में उतरेगी।

जितेंद्र भारद्वाज के शब्‍दों में-पिता की विरासत को कौन संभालता है…पुत्र। वही अखिलेश ने किया है। फर्क इतना सा है कि विरासत सौंपने की रस्म अपनों के बीच न होकर चुनाव आयोग में पूरी हुई।

शंभूनाथ शुक्‍ल कहते हैं-सबसे ज्यादा संतुष्ट मेरा नाती है। टीवी पर जैसे ही सुना कि अखिलेश को मिली साइकिल तो वह उछलने लगा। बोला इसका मतलब अखिलेश भैया सरकार बनते ही मुझे फ्री में साइकिल देंगे। अब उसका तो वोट नहीं है पर वह अपने उछाह में जीत लायक वोट तो दिला ही देगा। एसके यादव की प्रतिक्रिया भी एक संकेत दे रही है। इधर अखिलेश को साइकिल मिली, उधर एटीएम से निकासी सीमा बढ़ा कर 10 हज़ार रुपये कर दी गई।

अब उत्‍तर प्रदेश के चुनावी दंगल में दो दो हाथ करने के लिए राजनीतिक दलों की सेनाएं तैयार हैं। एक पार्टी कलह पर कमल खिलाने को उत्‍सुक है तो दूसरी पार्टी के लिए चलती का नाम साइकिल है। तीसरी का दावा है-दलित और मुस्लिम हाथी के साथी। मतदाता तो अभी मजे ले रहे हैं, क्‍योंकि अब रिमोट उनके हाथ में है। चुनाव का हर स्‍टेज गेम का स्‍टेज बन गया है। हर स्‍टेज उन्‍हीं को पार करना है।

चरखा पर चरचा: हंगामा है क्‍यूं बरपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बचकानी हरकत पर लोग हंगामा कर रहे हैं। बचकानी हरकत इसलिए कि जैसे राष्‍ट्रीय पर्वों पर बच्‍चे महात्‍मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों की वेशभूषा में अपने स्‍कूल के कार्यक्रम में शामिल होते हैं, ठीक उसी अंदाज में मोदी जी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर व डायरी में नजर आ रहे हैं। बात तब और बढ़ गई जब हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने महात्‍मा गांधी के बारे में विवादित बयान दे दिया।

दरअसल, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के 2017 के कैलेंडर में कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने कई लोगों को चौंका दिया है। केवीआईसी डायरी के नए साल के कैलेंडर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगी है। जहां इस कैलेंडर पर आपत्ति जताई जा रही है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि पहले कभी भी केवीआईसी के किसी सामान पर महात्मा गाँधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर डायरी पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी।

हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने ने कहा कि जिस दिन से नोटों पर गांधी की तस्‍वीर लगी है तब से रुपये की कीमत गिरने लगी है। हालांकि विवाद होने के बाद उन्‍होंने बयान वापस ले लिया। वहीं भाजपा ने भी अपने आप को इस बयान से किनारे कर लिया है। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। पार्टी का इससे लेना-देना नहीं है। अपने बयानों को लेकर अक्‍सर विवादों में रहने वाले हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा, गांधी जी के नाम से खादी पेटेंट थोड़े ही हो गया। जब से खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ गया खादी डूब गई। खादी उठ ही नहीं पाई। गांधी का ऐसा नाम है जिस दिन से नोट पर चिपक गए, उस दिन से नोट की कीमत गिर गई। तो अच्‍छा किया है गांधी की तस्‍वीर हटा के मोदी के चित्र को लगा दिया गया है। मोदी ज्‍यादा बेटर ब्रैंड नेम है। मोदी का नाम लगने से खादी की सेल 14 प्रतिशत बढ़ी है।

जब उनसे पूछा गया कि आपकी सरकार ने जो नए नोट छापे हैं उनमें भी गांधी की तस्‍वीर है। इस पर विज ने जवाब दिया कि धीरे-धीरे हट जाएंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि कैलेंडर पर बापू की तस्वीर होनी ही चाहिए। यह कहना गलत होगा कि बापू की तस्वीर को पीएम मोदी ने रिप्लेस कर दिया है।

वहीं महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। वहीं भाजपा ने सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। तुषार गाँधी ने कहा-हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। ऐसा कैसे कर सकते हो, कुछ तो शर्म किया करो। टीवी पर ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई बुराई नहीं होती है।

उन्‍होंने कहा कि जिस तरह से भ्रष्ट राजनेता पैसे का इस्तेमाल गलत कार्यों के लिए करते हैं, उससे पहले अच्छा होगा बापू नोट से हटा दिए जाएं। पीएम नरेंद्र मोदी पॉलीवस्त्रों के प्रतीक हैं जबकि बापू ने अपने बकिंगम पैलेस के दौरे के दौरान खादी पहनी थी न कि 10 लाख रुपये का सूट। आप हाथ में चरखा लेकर बापू के हत्यारे नाथूराम को दिल में बसाकर दोनों कार्य नहीं कर सकते हो।

चर्चित साहित्‍यकार उदय प्रकाश के शब्‍दों में, चरखे से सूत कातना पूँजी और मशीनी टेक्नोलॉजी की तानाशाही का अहिंसावादी, विनम्र, एकाग्र और मानवीय प्रतिरोध था। वहीं चर्चा में रहने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है। कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था। कोई उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है। मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिए गए और खलनायक की तरह दिखाए जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं। इसका स्वागत होना ही चाहिए।

शंभूनाथ शुक्‍ल की फेसबुक वाल कहती है-न वो चरखा समझे न ये समझे। चरखा तो बापू ही समझते थे और चरखे का मतलब कोई सूत कातना भर नहीं था। चरखा एक विचार था और खादी उसका प्रतिफलन। बापू ने न सिर्फ चरखा कातना सिखाया बल्कि नमक बनाना और साबुन बनाना भी। जरा थोड़ा पीछे जाएं तो आप पाएंगे कि पचास साल पहले हर गांव में जो ऊसर होता था उसकी मिट्टी से कपड़े धोए जाते थे और महुआ से साबुन तथा तेल व घी। मगर उस विचार को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा जब गांधी जी जिंदा थे और उन्होंने चरखे से स्वावलंबन सिखाया। मेरी चाची, जो अब लगभग 90 साल की हैं आज भी जब समय मिलता है तब चरखा कातती हैं और अपने ही एकमात्र पेड़ महुआ के फूल चैत में लगन से बिनती हैं और उससे बनता है साबुन तथा घी। आज भी वे तालाब में अपने कपड़े ऊसर की मिट्टी से ही धोती हैं। उन्होंने न कभी सनलाइट खरीदा न लाइफबॉय और न ही आज का घड़ी।

प्रतिक्रिया स्‍वरूप राम सागर का कहना है-बड़ा अच्छा लगता है जब कोई गाँव,  देहात की बात करता है, विशेष कर गुजरे जमाने की, उस जमाने के रहन-सहन और रीति-रिवाजों की। बड़े दुख की बात है कि 15-20 वर्षों में आपकी चाची की पीढ़ी न रहेगी तो उस जमाने के क्रियाकलाप आप जैसों की पीढ़ी के लिए केवल यादें बन कर ही रह जाएंगी। हमारी प्राचीन जीवनशैली पर सम्भवतः न पुस्तकें ही लिखी जा रही हैं और न ही फिल्में बन रही हैं। कुछ पुरानी फिल्मों में प्राचीन ग्राम्य जीवनशैली के थोड़े-बहुत दर्शन होते हैं। उनमें से कुछ नाम हैं – दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, सौदागर (अमिताभ बच्चन, नूतन, पद्मा खन्ना अभिनीत), शोले। और भी ऐसी कुछ फिल्में होंगी। आप और आपके पाठक मुझसे अधिक जानते होंगे। काश नई पीढ़ी में कुछ फिल्म निर्माता अपने देश की पुरानी ग्राम्य जीवनशैली और सांस्कृतिक धरोहरों को फिल्मों के माध्यम से संजो पाते।

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