सुप्रीम कोर्ट की एक फाइट, अखबार मालिकों की हवा टाइट

श्रीकांत सिंह।

मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। देश भर के विभिन्‍न अखबारों के पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारी फैसला सुनाए जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं तो अखबार मालिकों की हवा खराब है। जैसे-जैसे अदालत की छुट्टियां समापन की ओर बढ़ रही हैं वैसे-वैसे अखबार मालिकों धैर्य समाप्‍त हो रहा है। वे हड़बड़ी में कुछ ऐसे फैसले कर रहे हैं, जो उन्‍हें कानूनी तौर पर गर्त में धकेलने वाला साबित होने जा रहा है।

दैनिक जागरण की बात करें तो वहां तमाम कर्मचारियों का इंक्रीमेंट रोक लिया गया है। इस उम्‍मीद में कि शायद कुछ लोग धैर्य खो दें और नौकरी छोड़ कर चले जाएं। लेकिन कर्मचारी नेक टू नेक फाइट के लिए तैयार हैं। उनका धैर्य तो जागरण प्रबंधन ने ही मजबूत किया है। वे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर और अन्‍य भुगतान लिए बगैर कहीं टसकने वाले नहीं हैं। भले ही दैनिक भास्‍कर ने उम्‍मीदों का महल खड़ा कर दिया है।

बता दें कि दैनिक जागरण की नई भर्ती योजना की हवा निकल गई है। इस योजना के तहत निकाली गई रिक्तियों के बाद जो रेस्‍पांस आए, उनमें 90 फीसद लोगों ने दैनिक जागरण की ओर ऑफर की गई सेवा शर्तों को ठुकरा दिया है। अब मुसीबत बढ़ती देख जागरण प्रबंधन ने एक नई योजना पीआईपी की शुरुआत की है, जिसके तहत यह पता लगाने का नाटक किया जा रहा है कि इंक्रीमेंट रोके जाने का क्‍या कारण रहा है। कुछ कर्मचारियों ने तो एक ही कारण बताया है कि प्रणामी अखाड़े के सदस्‍यों को ही इंक्रीमेंट दिया जाता है। यानी जो लोग विष्‍णु त्रिपाठी का चरण वंदन करते हैं, उन्‍हीं को इंक्रीमेंट दिया जाता है।

मार्केट की हालत यह है कि आज भी काम धाम करने लायक कर्मचारियों की संख्‍या बहुत सीमित है। डॉट कॉम के बाजार ने इस किल्‍लत को और बढ़ा दिया है, जहां तमाम नाकारा लोग भी ऐडजेस्‍ट हो रहे हैं। तो अखबार किस प्रकार निकलेगा, यह टेंशन विष्‍णु त्रिपाठी की है, मैनेजमेंट की नहीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि पुराने कर्मचारियों को वापस लेना दैनिक जागरण की मजबूरी बन जाए। व्‍यावसायिक भी और कानूनी भी।

आप उस स्थिति की कल्‍पना करें, जब मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन और सुख सुविधाओं के साथ पुराने कर्मचारियों की वापसी होगी तो नौकरी जाने के भय के वशीभूत होकर नौकरी कर रहे कर्मचारियों के दिल पर क्‍या बीतेगी। उनके अंदर उबल रहा लावा नहीं फूटेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कुछ कर्मचारी तो हथियार चलाने के अभ्‍यास में लग गए हैं।

दरअसल, विष्‍णु त्रिपाठी ने वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद शुक्‍ला (अब दिवंगत) से पत्रकारिता छोड़कर बाकी सबकुछ सीख लिया था, जिसके दम पर वह अपनी नौकरी बचाए रखने में सफल रहे हैं। अब वह सीधे कर्मचारियों के निशाने पर आने वाले हैं। उन्‍होंने एक बात और नहीं सीखी और वह है सभी कर्मचारियों को साथ लेकर चलने की कला। उन्‍होंने ‘कोई ऐसा सगा नहीं जिसको जमकर ठगा नहीं’ के सहारे दैनिक जागरण जैसे टाइटैनिक को डुबोने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

अब संजय गुप्‍ता की समस्‍या यह है कि वह उंगली पकड़ कर चलने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। कभी निशीकांत ठाकुर की उंगली पकड़ कर चले तो अब विष्‍णु त्रिपाठी की उंगली पकड़ कर चले चल रहे हैं। उनके अंदर रिस्‍क लेकर आगे बढ़ने वाले बिजनेसमैन को कभी अंकुरित ही नहीं होने दिया गया। वह आगे बढ़ कर समस्‍या का समाधान नहीं करते हैं तो अब उनका भगवान ही मालिक है, क्‍योंकि उन्‍होंने कभी मालिक बनकर काम करने का अभ्‍यास ही नहीं किया। (चर्चा जारी रहेगी)

 

रियल एस्टेट बन गए अखबार घराने

नई तकनीक के कारण कई विभाग ही खत्म हो गए, मालिकों का विज्ञापन और प्रसार पर जोर भाग-3

टाइम्सं ऑफ इंडिया का कहना कि “ALREADY.IMPLEMENTATION OF THE LATEST WAGE BOARD RECOMMENDATIONS HAS BLED A NUMBER OF PRINT COMPANIES TO THE POINT OF SICKNESS.”

पिछली कड़ी में आपने देखा कैसे झूठ को सच साबित करने की कोशिश की गई। 58 प्रतिशत श्रम बोझ की हकीकत ये है कि कंप्यूटीकरण और नई तकनीक आने के बाद इन अखबारों ने कई विभागों को बंद कर उनका काम एक विभाग के कर्मचारियों को दे दिया है। मसलन संपादकीय, प्रशासनिक, मुद्रण और प्रसार एवं विज्ञापन विभाग के श्रम शक्ति में व्यापक फेर-बदल और कटौती की गई है।

अखबारों में पेजमेकर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर खत्म कर दिए गए हैं। अब इनका बहुत सारा काम सब एडिटर को करना पड़ता है। लगभग सभी अखबरों में, उदाहरण के लिए सब एडिटर खबरों का संपादन, करके पेज तैयार करता है और फिर उसका प्रूफ भी ठीक करता है। इस तरह कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी संख्या का प्रयोग अखबार वाले दूसरे कामों में कर रहे हैं या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मशीन के लोगों के वेतन में संपादकीय की तरह कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। बाकी प्रसार और विज्ञापन के साथियों के वेतन के बारे में कोई नहीं पूछता क्योंकि वे अपने को कमाऊ पूत कहते हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया कह रहा है कि विज्ञापन और प्रसार में भारी गिरावट आई है। हमारा कहना है कि विज्ञापन और प्रसार में कमी का रोना रोकर आम लोगों की सहानुभूति लेने की कोशिश की जा रही है। इसकी पुष्टि आरएनआई और एबीसी और रीडर सर्वे से की जा सकती है। हर साल ये अखबार रीडर सर्वे छाप कर वाहवाही लूटते रहे हैं। वैसे ये भी भारतीय चुनावों के दौरान ओपिनियन पोल जैसा ही है। इसके अलावा तकनीकी विकास के कारण समाचार संग्रह के खर्च में कई गुना कमी आई है जिसके कारण भारतीय अखबारों की मुद्रण क्षमता और गुणवत्ता में काफी वृद्धि और विस्तार हुआ है।

जहां तक राजस्व में कमी आने की बात है, यह भी भ्रामक है। मजीठिया वेतन बोर्ड के अनुसार सकल राजस्व की गणना समाचार पत्र के सभी तरह के स्रोतों से प्राप्त राजस्व‍ और उनमें लगी पूंजी के अनुसार होगी। इस तरह उदाहरण के लिए राजस्थान पत्रिका के राजस्व की गणना उसके सभी तरह के व्यवसाय से प्राप्त आय को मिलाकर की जाएगी। इसमें रियल एस्टेट से लेकर दूसरे जितने धंधे इस समूह के मालिक करते हैं सभी का कुल उनका सकल राजस्व में शामिल होगा। (देखें मजीठिया वेज बोर्ड रिपोर्ट का पृष्ठ– 67, अध्याय- XIX की धारा-I की उपधारा- 5)