सहारनपुर की महाभारत का शांति पर्व   

श्रीकांत सिंह।

सहारनपुर की महाभारत के युद्ध पर्व का समापन तो हो गया, अब उसके शांति पर्व की चर्चा कर ली जाए। जरा सोचें कि छोटी-छोटी बातों के लिए हम कितना बडा नुकसान कर लेते हैं। लडाई झगडे से हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाते अलबत्‍ता उन लोगों के मनसूबे पूरे हो जाते हैं जो दूसरों के विकास से जलते हैं।

आखिर वे कौन लोग हैं जो जाटवों और राजपूतों को लडाकर अपना मतलब निकाल रहे हैं। वे कौन लोग हैं जो योगी आदित्‍यनाथ की जनकल्‍याणकारी सरकार को फेल करना चाहते हैं। वे कौन लोग हैं जिन्‍हें राजपूतों के अभ्‍युदय से जलन हो रही है। उनकी पहचान करना जरूरी है। यही जाटवों और राजपूतों को समझना है। वे ऐसे लोग हैं जो कभी लडते नहीं, सिर्फ लडाते हैं। यही उनका अमोघ हथियार है। उनके इस हथियार को फेल करना होगा। इसके लिए राजपूतों और जाटवों का जागरूक होना बहुत जरूरी है।

इतिहास की बात करें तो राजपूतों ने कभी दलितों का बुरा नहीं किया। पूर्व प्रधानमंत्री विश्‍वनाथ प्रताप सिंह एक ऐसे राजपूत नेता हुए जिन्‍होंने आरक्षण की व्‍यवस्‍था देकर दलितों का भला ही किया। इसलिए दलितों को यह समझना होगा कि उन्‍हें उपद्रव की आग में कौन लोग झोंक रहे हैं। राजपूतों को भी यह समझ विकसित करनी होगी कि उन्‍हें कभी भी उकसावे में नहीं आना है।

देश के राजपूतों और दलितों में समझ आ गई तो समाज के वे कुत्सित मानसिकता वाले लोग खुद ब खुद फेल हो जाएंगे और तब उनकी कोई भी चाल कामयाब नहीं होगी और उनके मनसूबे धरे के धरे रह जाएंगे। यह भी पता चला है कि सहारनपुर हिंसा को बढाने में उन्‍हीं कुत्सित मानसिकता के लोगों का हाथ रहा है जो राजपूतों और दलितों से जलते हैं। यही लोग मीडिया में भी हावी हैं जो समाचारों से खेल कर सामाजिक सद्भाव बिगाडते हैं। वे जाटवों को बताते हैं कि राजपूत अत्‍याचार करते हैं तो राजपूतों को भी यह कहकर भडका देते हैं कि जाटव खतरा हैं।

हमें पता चला है कि कुछ राजपूतों ने जाटव कन्‍या की शादी में सहयोग कर सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। लेकिन इस खबर को अखबारों में स्‍थान नहीं मिला, क्‍योंकि वहां समाज विरोधी तत्‍व सक्रिय हैं। ये तत्‍व सामाजिक सद्भाव नहीं बनने देना चाहते। उन्‍हें तो योगी जी से चिढ है, राजपूतों से चिढ है, जाटवों से चिढ है। ऐसे समाज विरोधी तत्‍वों की पहचान कर उनसे हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है।