चिंता में डाल गए शरद यादव के अमृत वचन

श्रीकांत सिंह

पत्रकारिता जिस तेजी से पालतू हो रही है, उस पर उतनी तेजी से चिंता नहीं जताई जा रही है। समाज और देश दुनिया के लिए फिक्रमंद माने जाने वाले पत्रकारों की नई पीढी से ज्यादा उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि उसका रास्ता खुदगर्जी के टी-प्वाइंट पर बंद होता है। मेरे पास भी व्यावहारिक होने के दबावपूर्ण सुझाव आ रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्यों खुदगर्जी गले से नीचे नहीं उतर पा रही है।

इसी माहौल में पत्रकारिता पर जदयू नेता शरद यादव के अमृत वचन कानों में मधु घोल गए। उनकी तारीफ करनी ही पडेगी। इसलिए नहीं कि वह उस मजीठिया वेजबोर्ड की वकालत करते नजर आए, जिसका लाभ मुझे भी मिलना है। इसलिए भी कि वह चुनाव सुधार और लोकतंत्र पर मडरा रहे संकट की ओर भी इशारा कर गए हैं।

पत्रकारों के लिए गठित होने वाला वेजबोर्ड एक वर्ग विशेष के लिए राहत का पैकेज मात्र नहीं माना जाना चाहिए। यह तो लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक कवच भी है। यह पत्रकारिता और पत्रकार को पालतू बनने से बचा सकता है। इसलिए पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड एक तरह से समूचे समाज के लिए राहत का पैकेज है। ऐसा समझ कर समाज का हर वर्ग पत्रकारों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन दिए जाने के समर्थन में आगे नहीं आएगा तो यह तय है कि हम एक दूसरे तरह की गुलामी की जंजीर में जकड लिए जाएंगे।

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