सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत

श्रीकांत सिंह

समाज में सिस्‍टम के प्रति निर्भीकता आना एक शुभ संकेत है। सेना के एक सिपाही का वीडियो बना कर उसे वायरल कर देना; खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपने पर मुंबई के विले पार्ले स्थित खादी भंडार के कर्मचारियों का विरोध करना और बाहर आकर प्रदर्शन भी करना; भारतीय रिज़र्व बैंक के कर्मचारियों का भी गवर्नर उर्जित पटेल को पत्र लिखकर संस्थान की स्वायत्तता और गरिमा से खिलवाड़ न होने देने के लिए आगाह करना आदि ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि लोग संस्‍थानों की मनमर्जी सहने के लिए अब तैयार नहीं हैं। उसके लिए वे कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।

कुछ इसी तरह की मनमर्जी का विरोध मीडिया संस्‍थानों खासतौर पर प्रिंट मीडिया में हुआ है। अखबार मालिक इन दिनों बिचौलियों पर अपनी मुनाफाखोरी लाद रहे थे, जिसके विरोध में लोगों ने नौकरियां छोड़ी तो तमाम लोग मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों का क्रियान्‍वयन न किए जाने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन किए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। जाहिर है कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति संजीदा है। इसलिए भय दिखाकर शासन करने वालों को अब चिंतित हो जाना चाहिए।

प्रिट मीडिया की एक चिंता रही है कि आने वाले दिनों में कागज की किल्‍लत की वजह से मीडिया का प्रिंट स्‍वरूप समाप्‍त हो जाएगा। लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ी चिंता का विषय उनका यह अहंकार है कि वे ही जनमत तैयार करते हैं। आपको बता दें कि ज्‍यादातर लोग अखबार नहीं पढ़ते। ऐसे लोगों की संख्‍या कम नहीं है जो टीवी भी नहीं देखते। लेकिन ये मीडिया संस्‍थान सरकार और नेताओं पर अपनी धौंस जमाते रहते हैं, क्‍योंकि वहीं से इनकी मुनाफाखोरी का रास्‍ता निकलता है।

हमारे देश की संस्‍थाएं मीडिया घरानों की कुछ इस तरह से गुलाम हैं कि वर्षों बीत गए, लेकिन प्रिंट मीडिया के पीडि़तों को न्‍याय नहीं मिल सका। आगे भी न्‍याय में देरी करने की प्रवृत्ति जारी है। यह प्रवृति इतनी घातक है कि लोगों का न्‍यायपालिका से भी विश्‍वास उठता जा रहा है। सरकार है कि उसे इसकी कोई चिंता ही नहीं है। इसलिए वह दिन दूर नहीं जब लोग न्‍यायपालिका का भी सम्‍मान करना बंद कर देंगे। यह बहुत ही घातक स्थिति होगी, क्‍योंकि लोग त्‍वरित न्‍याय के लिए खुद ही निपटना शुरू कर देंगे।

कानून का राज बनाए रखने के लिए न्‍यायपालिका को अपने कर्तव्‍यों के प्रति संजीदा होना होगा। कितनी अजीब बात है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश का उल्‍लंघन सहना पड़ रहा है। पता कीजिए कि यह सब कौन करा रहा है; क्‍यों करा रहा है; क्‍या परिणाम होगा इसका। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मजीठिया मामले को पेंडिंग में डाल दिया गया है। आखिर क्‍यों… क्‍या अखबारों में काम कर रहे लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है कि वे इतना लंबा इंतजार कर पाएंगे। मानवीय आधार पर सुप्रीम कोर्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्‍योंकि लोग अब भयभीत रहने के लिए राजी नहीं हैं। डर के आगे जीत का रहस्‍य लोग समझ गए हैं।

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गणतंत्र दिवस के बहाने

श्रीकांत सिंह

जैसा कि शब्‍द से ही स्‍पष्‍ट है-गण का मतलब समूह और तंत्र का मतलब तार। इस तार में बड़ी ताकत है। यह संवाहक का काम करता है। इसमें बिजली डाल दी जाए तो यह बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देता है। चुंबकीय तरंगें डाल दी जाएं तो उन्‍हें भी यह देश के कोने-कोने में पहुंचा देता है। तकनीकी विकास ने तंत्र यानी तार को भी बीच से हटा दिया है। इसी नियम पर हम टीवी, मोबाइल फोन, इंटरनेट आदि चलाते हैं। तार का काम अब तरंगें करने लगी हैं। राजतंत्र में यही तार राजा के पास होता था। संपूर्ण तंत्र को राजा अपने बाहुबल से हासिल करता था। इसीलिए वीरभोग्‍या वसुंधरा का नियम चलता था।

जाने माने कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा था-वीरता जब भागती है तो राजनीति और छल छंद की धूल उड़ती है। और आज यही हो रहा है। गणतंत्र शब्‍द से गण भी गायब है। आज तरंगें, लहरें, हिलोरें आदि चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। अब गण के रूप में जनता के प्रतिनिधि गायब हैं। एक व्‍यक्ति जिसे धन बल से तरंगित कर दिया गया, हर जगह उसी का बोलबाला है। नियम, कानून, संविधान आदि का कोई मतलब नहीं रह गया है। एक ही व्‍यक्ति के मन की बात ने नियम, कानून, संविधान आदि का रूप ले लिया है। और हम हैं कि प्रमादवश उसी की जयजयकार किए जा रहे हैं।

दरअसल, इसके कारण बहुत ही गहराई में हैं। आप तरह-तरह की तकनीक से सम्‍मोहित किए जा रहे हैं, जिसका आपको पता भी नहीं चल रहा है। और उसका परिणाम यह हो रहा है कि एक व्‍यक्ति विशेष को अहैतुक समर्थन मिल रहा है। अहैतुक का मतलब अकारण समर्थन मिल रहा है। आप अपनी मूर्छा तोड़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि जिस व्‍यक्ति के नाम का आप जप कर रहे हैं, उसने देश, समाज और आपके लिए कुछ भी नहीं किया है। वह मात्र सम्‍मोहन का सौदागर है जो आपके पैसों पर ऐश कर रहा है। बईमानी वह कर रहा है और बेईमान आपको बता रहा है।

देश के लोगों में मूर्छा की यह स्थ्‍िाति बहुत घातक है। इसने चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर दिया तो हालात और भी घातक हो जाएंगे। शीघ्र ही आपकी मूर्छा न टूटी तो बहुत देर हो जाएगी। जो व्‍यक्ति यह कहता है-मित्रो, हम उत्‍तर प्रदेश को गुंडामुक्‍त करना चाहते हैं। ये फर्जी मुकदमों का जो ये सिलसिला चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। ये भूमाफिया का जो आतंक चला है, उसको हम समाप्‍त करना चाहते हैं। यही व्‍यक्ति सोहराबुद्दीन हत्‍या मामले में 25 जुलाई 2010 को गिरफ्तार हुआ था और जेल भेजा गया था। इस पर अपहरण, हत्‍या, हत्‍या की साजिश, सबूतों से छेड़छाड़, महिलाओं के फोन टेप करने और एक्‍जार्शन (सरकारी पद का दुरुपयोग कर धन संपत्ति हड़पने) के आरोप लगे हैं। तो भला यह आदमी कैसे उत्‍तर प्रदेश को गुंडों से मुक्‍त करा पाएगा।

इसी की तरह का एक और व्‍यक्ति है जो आज कल आपके पास वोट की भीख मांगने जा रहा है। उस पर 11 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें दो धर्मों के लोगों को लड़ाना, हत्‍या की धमकी देना, हत्‍या की साजिश, हत्‍या करना, मारपीट करना, धर्मों का मजाक उड़ाना, धोखाधड़ी, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना, फर्जी दस्‍तावेज तैयार करना, चोरी, डकैती और दंगे करवाना आदि प्रमुख हैं।

आश्‍चर्य है कि इन पर दंगे के मामले चल रहे हैं और इनका दावा है कि ये उत्‍तर प्रदेश को दंगामुक्‍त प्रदेश बनाएंगे। तो आपके पास ऐसे लोग वोट मांगने जाएं तो उनकी जन्‍म कुंडली किसी काबिल ज्‍योतिषी से जरूर दिखा लेना। जब कुंडली का मिलान विवाह में आवश्‍यक बताया जाता है तो आपके भविष्‍य का विधाता बनने का दावा करने वालों की कुंडली क्‍यों न परख ली जाए। आप इन्‍हें इसलिए वोट न दे देना कि ये देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों में गिने जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवरत्‍नों की संख्‍या नौ से कहीं ज्‍यादा हो सकती है, क्‍योंकि उनकी गणना अभी व्‍यवस्थित रूप से नहीं की गई है। कुछ अखबारों और टीवी न्‍यूज चैनलों के मालिक भी मोदी जी के रत्‍नों में शामिल हैं क्‍योंकि वे बिना शर्त मोदी जी का यशोगान करते हैं। ऐसे अखबारों और चैनलों की खबरों पर आप नजर डालें तो आपको कोई प्रमाण नहीं ढूंढना पड़ेगा।

दैनिक जागरण अखबार यह दावा करता है कि वह दुनिया में सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है। उसका सर्कुलेशन चेक करने के लिए मोदी जी सारा जग घूम आए और पाया कि इस जैसा अखबार कोई नहीं है। शायद इसीलिए इस अखबार के मालिकों के साथ फोटो खिंचवाकर मोदी जी कृत कृत्‍य होते रहते हैं। इस अखबार के मालिक, प्रधान संपादक, सीईओ आदि आदि श्री संजय गुप्‍ता हैं।

बड़े ज्ञानी किस्‍म के आदमी लगते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने एक बार फरमान जारी किया था कि अब दैनिक जागरण स्‍वतंत्रता दिवस समारोह नहीं मनाएगा। क्‍योंकि स्‍वतंत्रता मुनाफाखोरी के रास्‍ते की सबसे बड़ी बाधा है। उन्‍होंने कहा था कि अब दैनिक जागरण के लोग गणतंत्र दिवस समारोह मनाएंगे, क्‍योंकि इसी दिन देश का संविधान लागू हुआ था। और अब जागरण में नियमों पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। फिर क्‍या था। धड़ाधड़ ऐसे नियम बनाए जाने लगे जो मुनाफाखोरी को आगे ले जा सकते थे और कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता छीन सकते थे। उन्‍हीं नियमों ने न जाने कितने निष्‍ठावान कर्मचारियों को भूतपूर्व बना दिया। अब मजीठिया वेजबोर्ड के नियम का पालन करने की बारी आई तो माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी पहाड़ा पढ़ाने लगे हैं। तो कुल मिलाकर गणतंत्र दिवस के बहाने यही कहना था-गणतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है इस देश में। अगर कुछ है तो वह है मोदी जी का नवरत्‍नतंत्र। इसी के इंद्रजाल में जनता छटपटा रही है। किसी को कुछ समझ में नहीं आता कि मोदी जी ईमानदार हैं या बेईमान, देवता हैं या राक्षस, राम हैं या रावण, महान हैं या धनवान, साधू हैं या सवादू, फकीर हैं या अमीर, काबिल हैं या रईस आदि आदि।