न्‍याय व्‍यवस्‍था का काला अध्‍याय  

श्रीकांत सिंह।

अराजकता तभी आती है, जब न्‍याय व्‍यवस्‍था फेल हो जाती है। सबसे पहले सक्षम लोग अराजकता फैलाते हैं और शोषण पर टिकी व्‍यवस्‍था परवान चढने लगती है। अक्षम लोगों पर अत्‍याचार इतना बढ जाता है कि वे हथियार उठाने को बाध्‍य हो जाते हैं। नक्‍सल समस्‍या तो इसका एक उदाहरण भर है। भविष्‍य कितना भयावह होने जा रहा है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। मजीठिया अवमानना मामले में 19 जून 2017 को सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह न्‍याय व्‍यवस्‍था के काले अध्‍यायों में दर्ज हो चुका है।

बडी मुश्किल से छोटे पत्रकारों की बडी टीम सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंची। वर्षों तक केस को लटकाए रखा गया। अंत में फैसला वही ढाक के तीन पात। ताजा फैसले में कुछ भी नया नहीं है। अवमानना के केस का मतलब ही यही है कि अदालत के आदेश का उल्‍लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्‍य में वे ऐसी जुर्रत न कर सकें।

तो दोषियों को दंडित कौन करेगा। न्‍याय पालिका ने तो पल्‍ला झाड लिया है। क्‍या इसका मतलब यही समझा जाए कि लोग खुद निपट लें। न्‍याय पालिका, पुलिस, प्रशासन आदि के अधिकारी क्‍या लोगों की गाढी कमाई से जुटाए गए राजस्‍व से केवल सैलरी उठाएंगे और कोई काम नहीं करेंगे। उन्‍हें कर्तव्‍य बोध कौन कराएगा।

हमारे नेता तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। हर पांच साल बाद जुमले छोड कर आपको मूर्ख बनाएंगे और भारी बहुमत से जीत हासिल कर लेंगे। आखिर कब तक चलेगा यह सब। कौन है जो न्‍याय पालिका को पंगु बना रहा है। कौन है जो इस देश को अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहा है। उसे पहचानना और दंडित करना जरूरी हो गया है, क्‍योंकि यह देश हमारा है, उनका नहीं।

 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर लग जाएं अधिकारियों के पीछे

श्रीकांत सिंह।

पिछले आलेख का संदर्भ लें तो हमने कहा था कि मायूस होने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठीक से पढने और समझने की जरूरत है। मैंने आज ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरा पढा और जो मेरी समझ में आया उसे आपके सामने रख रहा हूं। अगर आपको कहीं संदेह लगे तो आप भी आदेश को पढें और उस संदर्भ में मुझसे चर्चा कर सकते हैं। मेरा मेल आईडी-srikant06041961@gmail.com है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जो आशंका जताई जा रही है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुन: हमें श्रम आयुक्‍त या लेबर कोर्ट का रास्‍ता दिखा दिया है, जबकि कोर्ट का आदेश कहता है- Section 17 of the act deals with recovery of money due from an employer. As a core issue on the maintainability of the presrnt contempt cases centers around the remedy provided for by the aforesaid provision of the act, section 17 of the Act may be set out hereunder. यानी, सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना मामलों को न्‍यायसंगत ढंग से निपटाने के लिए धारा 17 के तहत प्रावधान किए गए हैं, जिनका निस्‍तारण संबंधित अधिकारारियों द्वारा ही संभव है। इस बारे में धारा 17 के विभिन्‍न खंडों में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि वे अधिकारी हमें टरकाने लगेंगे तो हम क्‍या करेंगे… उसके लिए आपको जीवटता तो दिखानी ही पडेगी। आपको अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी और संयुक्‍त रूप से अधिकारियों को घेरना होगा और सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उन्‍हें काम करने के लिए बाध्‍य करना होगा, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए स्‍पष्‍ट निर्देश दे रखा है। देखें-धारा 17-1, 17-2, 17-3।

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि 20-जे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कुछ स्‍पष्‍ट नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढें तो उसमें साउथ इंडिया इस्‍टेट लेबर रिलेशंस आर्गनाइजेशन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास की नजीर देकर समझाया गया है कि सेवायोजकों की यह शिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उनके कर्मचारी इस आधार पर कम वेतन पर काम करना चाहते हैं कि वे अत्‍यंत गरीब और असहाय हैं।

तबादला, निलंबन और प्रताडना मामलों के संदर्भ में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ऐसे मामलों का निस्‍तारण उचित प्राधिकारी ही कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संबंधित अधिकारी मनमानी करने के लिए स्‍वतंत्र हैं। उन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिखाकर उनसे काम कराया जा सकता है। ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर पाएंगे मगर आपको भी सख्‍ती दिखानी होगी।

हवा टाइट करने वाली खबर

नई दिल्‍ली।

मजीठिया अवमानना मामले पर कोर्ट नंबर-2 में 19 जून को 3 बजे फैसला सुनाएगा सुप्रीम कोर्ट। अखबार मालिकों के लिए कत्‍ल का दिन और कत्‍ल की रात शुरू। कई के भूमिगत होने की सूचना।

सुप्रीम कोर्ट की एक फाइट, अखबार मालिकों की हवा टाइट

श्रीकांत सिंह।

मजीठिया अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। देश भर के विभिन्‍न अखबारों के पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारी फैसला सुनाए जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं तो अखबार मालिकों की हवा खराब है। जैसे-जैसे अदालत की छुट्टियां समापन की ओर बढ़ रही हैं वैसे-वैसे अखबार मालिकों धैर्य समाप्‍त हो रहा है। वे हड़बड़ी में कुछ ऐसे फैसले कर रहे हैं, जो उन्‍हें कानूनी तौर पर गर्त में धकेलने वाला साबित होने जा रहा है।

दैनिक जागरण की बात करें तो वहां तमाम कर्मचारियों का इंक्रीमेंट रोक लिया गया है। इस उम्‍मीद में कि शायद कुछ लोग धैर्य खो दें और नौकरी छोड़ कर चले जाएं। लेकिन कर्मचारी नेक टू नेक फाइट के लिए तैयार हैं। उनका धैर्य तो जागरण प्रबंधन ने ही मजबूत किया है। वे मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार एरियर और अन्‍य भुगतान लिए बगैर कहीं टसकने वाले नहीं हैं। भले ही दैनिक भास्‍कर ने उम्‍मीदों का महल खड़ा कर दिया है।

बता दें कि दैनिक जागरण की नई भर्ती योजना की हवा निकल गई है। इस योजना के तहत निकाली गई रिक्तियों के बाद जो रेस्‍पांस आए, उनमें 90 फीसद लोगों ने दैनिक जागरण की ओर ऑफर की गई सेवा शर्तों को ठुकरा दिया है। अब मुसीबत बढ़ती देख जागरण प्रबंधन ने एक नई योजना पीआईपी की शुरुआत की है, जिसके तहत यह पता लगाने का नाटक किया जा रहा है कि इंक्रीमेंट रोके जाने का क्‍या कारण रहा है। कुछ कर्मचारियों ने तो एक ही कारण बताया है कि प्रणामी अखाड़े के सदस्‍यों को ही इंक्रीमेंट दिया जाता है। यानी जो लोग विष्‍णु त्रिपाठी का चरण वंदन करते हैं, उन्‍हीं को इंक्रीमेंट दिया जाता है।

मार्केट की हालत यह है कि आज भी काम धाम करने लायक कर्मचारियों की संख्‍या बहुत सीमित है। डॉट कॉम के बाजार ने इस किल्‍लत को और बढ़ा दिया है, जहां तमाम नाकारा लोग भी ऐडजेस्‍ट हो रहे हैं। तो अखबार किस प्रकार निकलेगा, यह टेंशन विष्‍णु त्रिपाठी की है, मैनेजमेंट की नहीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि पुराने कर्मचारियों को वापस लेना दैनिक जागरण की मजबूरी बन जाए। व्‍यावसायिक भी और कानूनी भी।

आप उस स्थिति की कल्‍पना करें, जब मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन और सुख सुविधाओं के साथ पुराने कर्मचारियों की वापसी होगी तो नौकरी जाने के भय के वशीभूत होकर नौकरी कर रहे कर्मचारियों के दिल पर क्‍या बीतेगी। उनके अंदर उबल रहा लावा नहीं फूटेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कुछ कर्मचारी तो हथियार चलाने के अभ्‍यास में लग गए हैं।

दरअसल, विष्‍णु त्रिपाठी ने वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद शुक्‍ला (अब दिवंगत) से पत्रकारिता छोड़कर बाकी सबकुछ सीख लिया था, जिसके दम पर वह अपनी नौकरी बचाए रखने में सफल रहे हैं। अब वह सीधे कर्मचारियों के निशाने पर आने वाले हैं। उन्‍होंने एक बात और नहीं सीखी और वह है सभी कर्मचारियों को साथ लेकर चलने की कला। उन्‍होंने ‘कोई ऐसा सगा नहीं जिसको जमकर ठगा नहीं’ के सहारे दैनिक जागरण जैसे टाइटैनिक को डुबोने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

अब संजय गुप्‍ता की समस्‍या यह है कि वह उंगली पकड़ कर चलने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। कभी निशीकांत ठाकुर की उंगली पकड़ कर चले तो अब विष्‍णु त्रिपाठी की उंगली पकड़ कर चले चल रहे हैं। उनके अंदर रिस्‍क लेकर आगे बढ़ने वाले बिजनेसमैन को कभी अंकुरित ही नहीं होने दिया गया। वह आगे बढ़ कर समस्‍या का समाधान नहीं करते हैं तो अब उनका भगवान ही मालिक है, क्‍योंकि उन्‍होंने कभी मालिक बनकर काम करने का अभ्‍यास ही नहीं किया। (चर्चा जारी रहेगी)